उत्तङ्कोपाख्यान : क्या धर्म केवल व्यक्तिगत साधना है या सामूहिक कल्याण?
धर्म और कर्तव्य का विस्तार
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
पर्व → अनुगीतापर्व · अध्याय 53–58 · पृष्ठ 1839–1879
वैशम्पायन ने जनमेजय से कहा
राजा जनमेजय के प्रश्न पर उत्तर देने हेतु।
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! इस प्रकार द्वारका जाते हुए भगवान् श्रीकृष्णको हृदयसे लगाकर भरतवंशके श्रेष्ठ वीर शत्रुसन्तापी पाण्डव अपने सेवकों सहित पीछे लौटे। अर्जुनने वृष्णिवंशी प्यारे सखा श्रीकृष्णको बारम्बार छातीसे लगाया और जबतक वे आँखोंसे ओझल नहीं हुए, तबतक उन्हींकी ओर वे बारम्बार देखते रहे। जब रथ दूर चला गया, तब पार्थने बड़े कष्टसे श्रीकृष्णकी ओर लगी हुई अपनी दृष्टिको पीछे लौटाया। किसीसे पराजित न होनेवाले श्रीकृष्णकी भी यही दशा थी।
कृच्छ्रेणैव तु तां पार्थो गोविन्दे विनिवेशिताम् ।
संजहार ततो दृष्टिं कृष्णश्चाप्यपराजितः ॥
जब रथ दूर चला गया, तब पार्थने बड़े कष्टसे श्रीकृष्णकी ओर लगी हुई अपनी दृष्टिको पीछे लौटाया । किसीसे पराजित न होनेवाले श्रीकृष्णकी भी यही दशा थी ।
महामना भगवान्की यात्राके समय जो बहुत-से अद्भुत शकुन प्रकट हुए, उन्हें बताता हूँ, सुनो! उनके रथके आगे बड़े वेगसे हवा आती और रास्तेकी धूल, कङ्कण तथा काँटोंको उड़ाकर अलग कर देती थी। इस प्रकार मरुभूमिके समतल प्रदेशमें पहुँचकर महाबाहु श्रीकृष्णने अमिततेजस्वी मुनिश्रेष्ठ उत्तङ्कका दर्शन किया। विशाल नेत्रोंवाले तेजस्वी श्रीकृष्ण उत्तङ्क मुनिकी पूजा करके स्वयं भी उनके द्वारा पूजित हुए। तत्पश्चात् उन्होंने मुनिका कुशल-समाचार पूछा।
स पृष्टः कुशलं तेन सम्पूज्य मधुसूदनम् ।
उत्तङ्को ब्राह्मणश्रेष्ठस्ततः पप्रच्छ माधवम् ॥
उनके कुशल- मंगल पूछनेपर विप्रवर उत्तंकने भी मधुसूदन माधवकी पूजा करके उनसे इस प्रकार प्रश्न किया—
उनके कुशल-मङ्गल पूछनेपर विप्रवर उत्तङ्कने भी मधुसूदन माधवकी पूजा करके उनसे इस प्रकार प्रश्न किया— 'शूरनन्दन! क्या तुम कौरवों और पाण्डवोंके घर जाकर उनमें अविचल भ्रातृभाव स्थापित कर आये? यह बात मुझे विस्तारके साथ बताओ। केशव! क्या तुम उन वीरोंमें सन्धि कराकर ही लौट रहे हो? वृष्णिपुङ्गव! वे कौरव, पाण्डव तुम्हारे सम्बन्धी तथा तुम्हें सदा ही परम प्रिय रहे हैं। परन्तप! क्या पाण्डुके पाँचों पुत्र और धृतराष्ट्रके भी सभी आत्मज संसारमें तुम्हारे साथ सुखपूर्वक विचर सकेंगे? स्वराष्ट्रे ते राजानः कच्चित् प्राप्स्यन्ति वै सुखम्। कौरवेषु प्रशान्तेषु त्वया नाथेन केशव।
केशव! तुम-जैसे रक्षक एवं स्वामीके द्वारा कौरवोंके शान्त कर दिये जानेपर अब पाण्डवनरेशोंको अपने राज्यमें सुख तो मिलेगा न? तात! मैं सदा तुमसे इस बातकी सम्भावना करता था कि तुम्हारे प्रयत्नसे कौरव-पाण्डवोंमें मेल हो जावेगा। मेरी जो वह सम्भावना थी, भरतवंशियोंके सम्बन्धमें तुमने वह सफल तो किया है न?'
या मे सम्भावना तात त्वयि नित्यमवर्तत ।
अपि सा सफला तात कृता ते भरतान् प्रति ॥
' तात! मैं सदा तुमसे इस बातकी सम्भावना करता था कि तुम्हारे प्रयत्नसे कौरव-पाण्डवोंमें मेल हो जायगा । मेरी जो वह सम्भावना थी, भरतवंशियोंके सम्बन्धमें तुमने वह सफल तो किया है न? '
श्रीभगवान्ने कहा— 'महर्षे! मैंने पहले कौरवोंके पास जाकर उन्हें शान्त करनेके लिये बड़ा प्रयत्न किया, परन्तु वे किसी तरह सन्धिके लिये तैयार न किये जा सके। जब उन्हें समतापूर्ण मार्गमें स्थापित करना असम्भव हो गया, तब वे सब-के-सब अपने पुत्र और बन्धु-बान्धवोंसहित युद्धमें मारे गये। महर्षे! प्रारब्धके विधानको कोई बुद्धि अथवा बलसे नहीं मिटा सकता। अनघ! आपको तो ये सब बातें मालूम ही होंगी कि कौरवोंने मेरी, भीष्मजीकी तथा विदुरजीकी सम्मतिको भी ठुकरा दिया। इसलिये वे आपसमें लड़-भिड़कर यमलोक जा पहुँचे। इस युद्धमें केवल पाँच पाण्डव ही अपने शत्रुओंको मारकर जीवित बच गये हैं। उनके पुत्र भी मार डाले गये हैं। धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जो गान्धारीके पेटसे पैदा हुए थे, अपने पुत्र और बान्धवोंसहित नष्ट हो गये।'
ततो यमक्षयं जग्मुः समासाद्येतरेतरम् ।
पञ्चैव पाण्डवाः शिष्टा हतामित्रा हतात्मजाः ।
धार्तराष्ट्राश्च निहताः सर्वे ससुतबान्धवाः ॥
इसीलिये वे आपसमें लड़-भिड़कर यमलोक जा पहुँचे । इस युद्धमें केवल पाँच पाण्डव ही अपने शत्रुओं को मारकर जीवित बच गये हैं । उनके पुत्र भी मार डाले गये हैं । धृतराष्ट्रके सभी पुत्र, जो गान्धारीके पेटसे पैदा हुए थे, अपने पुत्र और बान्धवोंसहित नष्ट हो गये ।
भगवान् श्रीकृष्णके इतना कहते ही उत्तङ्क मुनि अत्यन्त क्रोधसे जल उठे और रोषसे आँखें फाड़-फाड़कर देखने लगे। उन्होंने श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा— 'श्रीकृष्ण! कौरव तुम्हारे प्रिय सम्बन्धी थे, तथापि शक्ति रखते हुए भी तुमने उनकी रक्षा न की। इसलिये मैं तुम्हें अवश्य शाप दूँगा! मधुसूदन! तुम उन्हें जबर्दस्ती पकड़कर रोक सकते थे, पर ऐसा नहीं किया। इसलिये मैं क्रोधमें भरकर तुम्हें शाप दूँगा! माधव! कितने खेदकी बात है, तुमने समर्थ होते हुए भी मिथ्याचारका आश्रय लिया। युद्धमें सब ओरसे आये हुए वे श्रेष्ठ कुरुवंशी नष्ट हो गये और तुमने उनकी उपेक्षा कर दी।'
श्रीकृष्णने कहा— 'भृगुनन्दन! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे विस्तारपूर्वक सुनिये। भार्गव! आप तपस्वी हैं, इसलिये मेरी अनुनय-विनय स्वीकार कीजिये। न च ते तपसो नाशमिच्छामि तपतां वर। मैं आपको अध्यात्मतत्त्व सुना रहा हूँ। उसे सुननेके पश्चात् यदि आपकी इच्छा हो तो आज मुझे शाप दीजियेगा। तपस्वी पुरुषोंमें श्रेष्ठ महर्षे! आप यह याद रखिये कि कोई भी पुरुष थोड़ी-सी तपस्याके बलपर मेरा तिरस्कार नहीं कर सकता। मैं नहीं चाहता कि आपकी तपस्या नष्ट हो जाय। आपका तप और तेज बहुत बढ़ा हुआ है। आपने गुरुजनोंको भी सेवासे सन्तुष्ट किया है। द्विजश्रेष्ठ! आपने बाल्यावस्थासे ही ब्रह्मचर्यका पालन किया है। ये सारी बातें मुझे अच्छी तरह ज्ञात हैं। इसलिये अत्यन्त कष्ट सहकर सञ्चित किये हुए आपके तपका मैं नाश कराना नहीं चाहता हूँ।'
शृणु मे विस्तरेणेदं यद् वक्ष्ये भृगुनन्दन ।
गृहाणानुनयं चापि तपस्वी ह्यसि भार्गव ॥
श्रीकृष्णने कहा – भृगुनन्दन! मैं जो कुछ कहता हूँ, उसे विस्तारपूर्वक सुनिये । भार्गव! आप तपस्वी हैं, इसलिये मेरी अनुनय- विनय स्वीकार कीजिये ।
श्रीकृष्ण बोले— 'ब्रह्मर्षे! आपको यह विदित होना चाहिये कि तमोगुण, रजोगुण और सत्त्वगुण — ये सभी भाव मेरे ही आश्रित हैं। रुद्रों और वसुओंको भी आप मुझसे ही उत्पन्न जानिये। सम्पूर्ण भूत मुझमें हैं और सम्पूर्ण भूतोंमें मैं स्थित हूँ। इस बातको आप अच्छी तरह समझ लें। इसमें आपको संशय नहीं होना चाहिये। विप्रवर! सम्पूर्ण दैत्यगण, यक्ष, गन्धर्व, राक्षस, नाग और अप्सराओंको मुझसे ही उत्पन्न जानिये। विद्वान् लोग जिसे सत्-असत्, व्यक्त-अव्यक्त और क्षर-अक्षर कहते हैं, यह सब मेरा ही स्वरूप है। मुने! चारों आश्रमोंमें जो चार प्रकारके धर्म प्रसिद्ध हैं तथा जो सम्पूर्ण वेदोक्त कर्म हैं, उन सबको मेरा स्वरूप ही समझिये। असत्, सदसत् तथा उससे भी परे जो अव्यक्त जगत् है, वह भी मैं सनातन देवाधिदेव उस मुझसे पृथक् नहीं है।
भृगुश्रेष्ठ! ॐकारसे आरम्भ होनेवाले चारों वेद मुझे ही समझिये। यज्ञमें यूप, सोम, चरु, देवताओंको तृप्त करनेवाला होम, होता और हवन सामग्री भी मुझे ही जानिये। भृगुनन्दन! अध्वर्यु, कल्पक और अच्छी प्रकार संस्कार किया हुआ हविष्य — ये सब मेरे ही स्वरूप हैं। उद्गाता चापि मां स्तौति गीताघोषैर्महाध्वरे। प्रायश्चित्तेषु मां ब्रह्मन् शान्तिमङ्गलवाचकाः। मानसं दयितं विप्र सर्वभूतदयात्मकम्। बड़े-बड़े यज्ञोंमें उद्गाता उच्च स्वरसे सामगान करके मेरी ही स्तुति करते हैं। ब्रह्मन्! प्रायश्चित्त-कर्ममें शान्तिपाठ तथा मङ्गलपाठ करनेवाले ब्राह्मण सदा मुझ विश्वकर्माका ही स्तवन करते हैं। द्विजश्रेष्ठ! तुम्हें मालूम होना चाहिये कि सम्पूर्ण प्राणियोंपर दया करना-रूप जो धर्म है, वह मेरा परमप्रिय ज्येष्ठ पुत्र है। मेरे मनसे उसका प्रादुर्भाव हुआ है। तत्राहं वर्तमानैश्च निवृत्तैश्चैव मानवैः तैस्तैर्वेषैश्च रूपैश्च त्रिषु लोकेषु भार्गव।
उस धर्ममें प्रवृत्त होकर जो पाप कर्मोंसे निवृत्त हो गये हैं, ऐसे मनुष्योंके साथ मैं सदा निवास करता हूँ। साधुशिरोमणे! मैं धर्मकी रक्षा और स्थापनाके लिये तीनों लोकोंमें बहुत-सी योनियोंमें अवतार धारण करके उन रूपों और वेषोंद्वारा तदनुरूप बर्ताव करता हूँ। भूतग्रामस्य सर्वस्य स्रष्टा संहार एव च। मैं ही विष्णु, मैं ही ब्रह्मा और मैं ही इन्द्र हूँ। सम्पूर्ण भूतोंकी उत्पत्ति और प्रलयका कारण भी मैं ही हूँ। समस्त प्राणिसमुदायकी सृष्टि और संहार भी मेरे ही द्वारा होते हैं।
धर्मस्य सेतुं बध्नामि चलिते चलिते युगे ।
तास्ता योनीः प्रविश्याहं प्रजानां हितकाम्यया ॥
अधर्ममें लगे हुए सभी मनुष्योंको दण्ड देनेवाला और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाला ईश्वर मैं ही हूँ । जब- जब युगका परिवर्तन होता है, तब - तब मैं प्रजाकी भलाईके लिये भिन्न -भिन्न योनियोंमें प्रविष्ट होकर धर्ममर्यादाकी स्थापना करता हूँ ।
अधर्मे वर्तमानानां सर्वेषामहमच्युतः। अधर्ममें लगे हुए सभी मनुष्योंको दण्ड देनेवाला और अपनी मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाला ईश्वर मैं ही हूँ। जब-जब युगका परिवर्तन होता है, तब-तब मैं प्रजाकी भलाईके लिये भिन्न-भिन्न योनियोंमें प्रविष्ट होकर धर्ममर्यादाकी स्थापना करता हूँ। भृगुनन्दन! जब मैं देवयोनिमें अवतार लेता हूँ, तब देवताओंकी ही भाँति सारे आचार-विचारका पालन करता हूँ, इसमें संशय नहीं है। भृगुकुलको आनन्द प्रदान करनेवाले महर्षे! जब मैं गन्धर्व-योनिमें प्रकट होता हूँ, तब मेरे सारे आचार-विचार गन्धर्वोंके ही समान होते हैं, इसमें सन्देह नहीं है। नागयोनौ यदा चैव तदा वर्तामि नागवत्। जब मैं नागयोनिमें जन्म ग्रहण करता हूँ, तब नागोंकी तरह बर्ताव करता हूँ। यक्षराक्षसयोन्योस्तु यथावद् विचराम्यहम्। जब मैं यक्षों और राक्षसों की योनियोंमें प्रकट होता हूँ, तब उन्हींके आचार-विचारका यथावत् रूपसे पालन करता हूँ।
यदा त्वहं देवयोनौ वर्तामि भृगुनन्दन ।
तदाहं देववत् सर्वमाचरामि न संशयः ॥
भृगुनन्दन! जब मैं देवयोनिमें अवतार लेता हूँ, तब देवताओंकी ही भाँति सारे आचार-विचारका पालन करता हूँ, इसमें संशय नहीं है ।
इस समय मैं मनुष्ययोनिमें अवतीर्ण हुआ हूँ, इसलिये कौरवोंपर अपनी ईश्वरीय शक्तिका प्रयोग न करके पहले मैंने दीनतापूर्वक ही सन्धिके लिये प्रार्थना की थी; परन्तु वे मोहग्रस्त होने के कारण मेरी हितकर बात नहीं मानी। इसके बाद क्रोधमें भरकर मैंने कौरवोंको बड़े-बड़े भय दिखाए और उन्हें बहुत डराया-धमकाया तथा यथार्थरूपसे युद्धका भावी परिणाम भी उन्हें दिखाया; परन्तु वे तो अधर्मसे युक्त एवं कालसे ग्रस्त थे। अतः मेरी बात माननेको राजी न हुए। फिर क्षत्रिय-धर्मके अनुसार युद्धमें मारे गये। इसमें सन्देह नहीं कि वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें गये हैं। द्विजश्रेष्ठ! पाण्डव अपने धर्माचरणके कारण समस्त लोकोंमें विख्यात हुए हैं। आपने जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार मैंने यह सारा प्रसङ्ग कह सुनाया।'
लोकेषु पाण्डवाश्चैव गताः ख्यातिं द्विजोत्तम ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥
द्विजश्रेष्ठ! पाण्डव अपने धर्माचरणके कारण समस्त लोकोंमें विख्यात हुए हैं । आपने जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार मैंने यह सारा प्रसङ्ग कह सुनाया ।
उत्तङ्कने कहा— 'जनार्दन! मैं यह जानता हूँ कि आप सम्पूर्ण जगत्के कर्ता हैं। निश्चय ही यह आपकी कृपा है कि आपने मुझे अध्यात्मतत्त्वका उपदेश दिया, इसमें संशय नहीं है। शत्रुओंको सन्ताप देनेवाले अच्युत! अब मेरा चित्त अत्यन्त प्रसन्न और आपके प्रति भक्तिभावसे परिपूर्ण हो गया है; अतः इसे शाप देनेके विचारसे निवृत्त हुआ समझें। जनार्दन! यदि मैं आपसे कुछ भी कृपा प्राप्त करनेका अधिकारी होऊँ तो आप मुझे अपना ईश्वरीय रूप दिखा दीजिये। आपके उस रूपको देखनेकी बड़ी इच्छा है।'
तब परम बुद्धिमान् भगवान् श्रीकृष्णने प्रसन्नचित्त होकर उन्हें अपने उसी सनातन वैष्णव स्वरूपका दर्शन कराया, जिसे युद्धके प्रारम्भमें अर्जुनने देखा था। उत्तङ्क मुनिने उस विश्वरूपका दर्शन किया, जिसका स्वरूप महान् था। जो सहस्रों सूर्योंके समान प्रकाशमान तथा बड़ी-बड़ी भुजाओंसे सुशोभित था। उससे प्रज्वलित अग्निके समान लपटें निकल रही थीं।
भगवान् विष्णु के उस अद्भुत एवं उत्कृष्ट वैष्णव रूप को देखकर ब्रह्मर्षि उत्तङ्क को बड़ा विस्मय हुआ। वह स्वरूप सम्पूर्ण आकाश को घेरकर खड़ा था; उसके सब ओर मुख थे और वह समस्त जगत को व्याप्त किए हुए था। भगवान के इस विराट दर्शन के पश्चात उत्तङ्क ने श्रद्धापूर्वक उन्हें प्रणाम किया और प्रार्थना की— "जनार्दन! आप स्वयं ही दया करके दुःखजनित मोह से मेरा उद्धार करें। मैं बहुत-से पाप-कर्मों द्वारा बँधा हुआ हूँ, कृपया मेरी रक्षा करें।"
उत्तङ्क ने उस विश्वरूप की महिमा का गान करते हुए कहा— "विश्वकर्मन्! आपको नमस्कार है। सम्पूर्ण विश्व की उत्पत्ति के स्थानभूत विश्वात्मन्! आपके दोनों पैरों से पृथ्वी और सिर से आकाश व्याप्त है। आकाश और पृथ्वी के बीच का जो भाग है, वह आपके उदर से व्याप्त हो रहा है। आपकी भुजाओं ने सम्पूर्ण दिशाओं को घेर लिया है। अच्युत! यह सारा दृश्य-प्रपञ्च आप ही हैं। देव! अब अपने इस उत्तम एवं अविनाशी स्वरूप को फिर समेट लीजिये। मैं आप सनातन पुरुष को पुनः अपने पूर्वरूप में ही देखना चाहता हूँ।"
वैशम्पायन जी कहते हैं कि जनमेजय! मुनि की बात सुनकर सदा प्रसन्नचित्त रहने वाले भगवान श्रीकृष्ण ने कहा— 'महर्षे! आप मुझसे कोई वर माँगिये।' तब उत्तङ्क ने कहा— 'महातेजस्वी पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण! आपके इस स्वरूप का जो मैं दर्शन कर रहा हूँ, यही मेरे लिये आज आपकी ओर से बहुत बड़ा वरदान प्राप्त हो गया है।' यह सुनकर श्रीकृष्ण ने पुनः कहा— 'मुने! आप इसमें कोई अन्यथा विचार न करें। आपको अवश्य ही मुझसे वर माँगना चाहिये; क्योंकि मेरा दर्शन अमोघ है।'
उत्तङ्क बोले— 'प्रभो! यदि वर माँगना आप मेरे लिये आवश्यक कर्तव्य मानते हैं, तो मैं यही चाहता हूँ कि मुझे यहाँ यथेष्ट जल प्राप्त हो; क्योंकि इस मरुभूमि में जल बड़ा ही दुर्लभ है।' तब भगवान ने अपने उस तेजोमय स्वरूप को समेटकर उत्तङ्क मुनि से कहा— ‘मुने! जब आपको जल की इच्छा हो, तब आप मेरा स्मरण कीजियेगा।' ऐसा कहकर वे द्वारका चले गये।
तत्पश्चात् एक दिन उत्तङ्क मुनि को बड़ी प्यास लगी। वे पानी की इच्छा से उस मरुभूमि में चारों ओर घूमने लगे। घूमते-घूमते उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण का स्मरण किया। इतने ही में उन बुद्धिमान मुनि को उस मरुप्रदेश में कुत्तों के झुण्ड से घिरा हुआ एक नङ्ग-धड़ङ्ग चाण्डाल दिखाई पड़ा, जिसके शरीर में मैल और कीचड़ जमी हुई थी। वह देखने में बड़ा भयङ्कर था; उसने कमर में तलवार बाँध रखी थी और हाथों में धनुष-बाण धारण किये थे। द्विजश्रेष्ठ उत्तङ्क ने देखा कि उसके नीचे पैरों के समीप एक छिद्र से प्रचुर जल की धारा गिर रही है।
मुनि को पहचानते ही वह चाण्डाल जोर-जोर से हँसता हुआ बोला— 'भृगकुलतिलक उत्तङ्क! आओ, मुझसे जल ग्रहण करो। तुम्हें प्यास से पीड़ित देखकर मुझे तुम पर बड़ी दया आ रही है।' चाण्डाल के ऐसे कहने पर भी मुनि ने उसके जल का अभिनन्दन नहीं किया और उसे लेने से इनकार कर दिया। उस समय बुद्धिमान उत्तङ्क अपने कठोर वचनों द्वारा श्रीकृष्ण पर भी आक्षेप करने लगे। उधर चाण्डाल बार-बार आग्रह करता रहा— 'महर्षे! जल पी लीजिये।' किन्तु उत्तङ्क अत्यन्त कुपित थे; उनके अन्तःकरण में बड़ा क्षोभ था और वे अपने निश्चय पर अटल रहकर चाण्डाल को जवाब देते रहे।
जैसे ही मुनि ने इनकार किया, कुत्तों सहित वह चाण्डाल वहीं अन्तर्धान हो गया। यह देखकर उत्तङ्क मन ही मन बहुत लज्जित हुए और सोचने लगे कि 'शत्रुघाती श्रीकृष्ण ने मुझे ठग लिया।' तभी शङ्ख, चक्र और गदा धारण करने वाले भगवान श्रीकृष्ण उसी मार्ग से प्रकट होकर आये। उन्हें देखकर महामति उत्तङ्क ने कहा— 'पुरुषोत्तम! प्रभो! आपको श्रेष्ठ ब्राह्मणों के लिये चाण्डाल से स्पर्श किया हुआ वैसा अपवित्र जल देना उचित नहीं है।'
अथ तेनैव मार्गेण शङ्खचक्रगदाधरः ॥
आजगाम महाबुद्धिरुत्तङ्कश्चेनमब्रवीत् ।
न युक्तं तादृशं दातुं त्वया पुरुषसत्तम ॥
सलिलं विप्रमुख्येभ्यो मातङ्गस्रोतसा विभो । तदनन्तर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण उसी मार्गसे प्रकट होकर आये । उन्हें देखकर महामति उत्तंकने कहा - ' पुरुषोत्तम! प्रभो! आपको श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके लिये चाण्डालसे स्पर्श किया हुआ वैसा अपवित्र जल देना उचित नहीं है'
उत्तङ्क के ऐसे कहने पर जनार्दन ने मधुर वाणी द्वारा उन्हें सान्त्वना दी और कहा— 'महर्षे! वहाँ जैसा रूप धारण करके वह जल आपके लिये देना उचित था, उसी रूप से दिया गया; किन्तु आप उसे समझ न सके। मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्र से जाकर कहा था कि तुम उत्तङ्क मुनि को जल के रूप में अमृत प्रदान करो। मेरी बात सुनकर देवेन्द्र ने बार-बार मुझसे कहा कि मनुष्य अमर नहीं हो सकता, इसलिये उन्हें अमृत न देकर कोई और वर दीजिये। परन्तु मैंने शचीपति इन्द्र से जोर देकर कहा कि उत्तङ्क को तो अमृत ही देना है। तब देवराज इन्द्र ने मुझे प्रसन्न करके कहा था— 'यदि भृगुनन्दन महात्मा उत्तङ्क को अमृत अवश्य देना है, तो मैं चाण्डाल का रूप धारण करके उन्हें अमृत प्रदान करूँगा। यदि वे इस प्रकार आज भृगुवंशी उत्तङ्क अमृत लेना स्वीकार करेंगे, तो मैं उन्हें वर देने के लिये अभी जा रहा हूँ; अन्यथा मैं उन्हें अमृत नहीं दूँगा।'
मया त्वदर्थमुक्तो वै वज्रपाणिः पुरंदरः ॥
उत्तङ्कायामृतं देहि तोयरूपमिति प्रभुः ।
स मामुवाच देवेन्द्रो न मर्त्योऽमर्त्यतां व्रजेत् ॥
अन्यमस्मै वरं देहीत्यसकृद् भृगुनन्दन ।
अमृतं देयमित्येव मयोक्तः स शचीपतिः ॥
‘ भृगुनन्दन! मैंने आपके लिये वज्रधारी इन्द्रसे जाकर कहा था कि तुम उत्तंक मुनिको जलके रूपमें अमृत प्रदान करो । मेरी बात सुनकर प्रभावशाली देवेन्द्रने बारम्बार मुझसे कहा कि ‘ मनुष्य अमर नहीं हो सकता । इसलिये आप उन्हें अमृत न देकर और कोई वर दीजिये । ' परंतु मैंने शचीपति इन्द्रसे जोर देकर कहा कि उत्तङ्कको तो अमृत ही देना है ।
इन्द्र ने इसी शर्त के साथ चाण्डाल का रूप धारण कर यहाँ उपस्थित होकर आपको अमृत दिया था; परन्तु आपने उसे ठुकरा दिया। आपने चाण्डाल रूपधारी भगवान इन्द्र को ठुकराया है, यह आपका महान अपराध है। अच्छा, आपकी इच्छा पूर्ण करने के लिये मैं पुनः जो कुछ कर सकता हूँ, वह करूँगा। ब्रह्मण! आपकी तीव्र पिपासा को मैं अवश्य सफल करूँगा। जिन दिनों आपको जल पीने की इच्छा होगी, उन्हीं दिनों मरुप्रदेश में जल से भरे हुए मेघ प्रकट होंगे। वे आपको सरस जल प्रदान करेंगे और इस पृथ्वी पर आप 'उत्तङ्क मेघ' के नाम से विख्यात होंगे।'
चाण्डालरूपी भगवान् सुमहांस्ते व्यतिक्रमः ।
यत् तु शक्यं मया कर्तुं भूय एव तवेप्सितम् ॥
‘ आपने चाण्डालरूपधारी भगवान् इन्द्रको ठुकराया है, यह आपका महान् अपराध है । अच्छा, आपकी इच्छा पूर्ण करनेके लिये मैं पुनः जो कुछ कर सकता हूँ, करूँगा ।
भगवान श्रीकृष्ण के ऐसा कहने पर विप्रवर उत्तङ्क बड़े प्रसन्न हुए। आज भी मरुभूमि में 'उत्तङ्क मेघ' प्रकट होकर जल की वर्षा करते हैं।
उत्तङ्को महता युक्तस्तपसा जनमेजय ।
गुरुभक्तः स तेजस्वी नान्यत् किंचिदपूजयत् ॥
वैशम्पायनजीने कहा-जनमेजय! उत्तंक मुनि बड़े भारी तपस्वी, तेजस्वी और गुरुभक्त थे। उन्होंने जीवनमें गुरुके सिवा दूसरे किसी देवताकी आराधना नहीं की थी ।
वैशम्पायनजी कहते हैं - महाराज! गुरुपत्नी की बात सुनकर उत्तङ्क ने फिर कहा, 'माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये—मैं क्या करूँ? मुझे आपका प्रिय कार्य अवश्य करना है।'
अहल्या बोली, 'बेटा! राजा सौदास की रानी ने जो दो दिव्य मणिमय कुण्डल धारण कर रखे हैं, उन्हें ले आओ। तुम्हारा कल्याण हो। उनके ला देने से तुम्हारी गुरु-दक्षिणा पूरी हो जाएगी।' यह सुनकर उत्तङ्क ने 'बहुत अच्छा' कहा और गुरुपत्नी की आज्ञा स्वीकार कर उनका प्रिय करने के सङ्कल्प के साथ उन कुण्डलों को लाने के लिए शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए।
स तथेति प्रतिश्रुत्य जगाम जनमेजय ।
गुरुपत्नीप्रियार्थं वै ते समानयितुं तदा ॥
जनमेजय! तब ‘ बहुत अच्छा' कहकर उत्तंकने गुरुपत्नीकी आज्ञा स्वीकार कर ली और उनका प्रिय करनेकी इच्छासे उन कुण्डलोंको लानेके लिये चल दिये ।
उत्तङ्क के चले जाने पर गौतम ने अपनी पत्नी से पूछा, 'आज उत्तङ्क क्यों नहीं दिखाई देता है?' अहल्या ने उत्तर दिया, 'वह सौदास की महारानी के कुण्डल ले आने के लिये गया है।' यह सुनकर गौतम चिन्तित हो उठे और बोले, 'देवि! यह तुमने अच्छा नहीं किया। राजा सौदास शापवश राक्षस हो गये हैं। अतः वे उस ब्राह्मण को अवश्य मार डालेंगे।' अहल्या ने सङ्कोचवश कहा, 'भगवन्! मैं इस बात को नहीं जानती थी, इसलिये उस ब्राह्मण को ऐसा काम सौंप दिया। मुझे विश्वास है कि आपकी कृपा से उसे वहाँ कोई भय प्राप्त नहीं होगा।'
ततः प्रोवाच पत्नीं स न ते सम्यगिदं कृतम् ।
शप्तः स पार्थिवो नूनं ब्राह्मणं तं वधिष्यति ॥
यह सुनकर गौतमने पत्नीसे कहा – ' देवि! यह तुमने अच्छा नहीं किया । राजा सौदास शापवश राक्षस हो गये हैं । अतः वे उस ब्राह्मणको अवश्य मार डालेंगे '
जनमेजय! राजा सौदास राक्षस होकर अत्यन्त भयानक दिखते थे। उनकी मूँछ और दाढ़ी बहुत बड़ी थी और वे मनुष्यों के रक्त से रँगे हुए थे। किन्तु विप्रवर उत्तङ्क को उन्हें देखकर तनिक भी घबराहट नहीं हुई। जैसे ही उन्होंने महातेजस्वी राजा को देखा, जो यमराज के समान भयङ्कर दिख रहे थे, वे उठकर खड़े हो गये और उत्तङ्क के पास जाकर बोले, 'कल्याणस्वरूप द्विजश्रेष्ठ! बड़े सौभाग्य की बात है कि दिन के छठे भाग में आप स्वयं मेरे पास चले आये। मैं इस समय आहार ही ढूँढ़ रहा था।'
उत्तङ्क ने धैर्यपूर्वक कहा, 'राजन! आपको मालूम होना चाहिये कि मैं गुरु-दक्षिणा के लिये घूमता-फिरता यहाँ आया हूँ। जो गुरु-दक्षिणा जुटाने के लिये उद्योगशील हो, उसकी हिंसा नहीं करनी चाहिये—ऐसा मनीषी पुरुषों का कथन है।' राजा बोले, 'द्विजश्रेष्ठ! दिन के छठे भाग में मेरे लिये आहार का विधान किया गया है। मैं भूख से पीड़ित हो रहा हूँ, इसलिये मेरे हाथों से तुम छूट नहीं सकते।'
राजोवाच षष्ठे काले ममाहारो विहितो द्विजसत्तम ।
न शक्यस्त्वं समुत्स्रष्टुं क्षुधितेन मयाद्य वै ॥
राजाने कहा – द्विजश्रेष्ठ! दिनके छठे भागमें मेरे लिये आहारका विधान किया गया है । यह वही समय है । मैं भूखसे पीड़ित हो रहा हूँ। इसलिये मेरे हाथोंसे तुम छूट नहीं सकते ।
उत्तङ्क ने एक शर्त रखी, 'महाराज! ऐसा ही सही, किन्तु मेरे साथ एक शर्त कर लीजिये। मैं गुरु-दक्षिणा चुकाकर फिर आपके वश में आ जाऊँगा। नृपश्रेष्ठ! मैंने गुरु को जो वस्तु देने की प्रतिज्ञा की है, वह आपके ही अधीन है; अतः मैं आपसे उसकी भीख माँगता हूँ। आप प्रतिदिन बहुत से श्रेष्ठ ब्राह्मणों को रत्न प्रदान करते हैं और इस पृथ्वी पर एक श्रेष्ठ दानी के रूप में प्रसिद्ध हैं। मैं भी दान लेने का पात्र हूँ। शत्रुदमन राजेन्द्र! गुरु का धन जो आपके अधीन है, उन्हें अर्पित करके मैं अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार फिर आपके अधीन हो जाऊँगा। मैं आपसे सच्ची प्रतिज्ञा करता हूँ; मैंने पहले कभी परिहास में भी झूठ नहीं बोला, तो अन्य अवसरों पर क्या बोल सकता हूँ?'
उपाहृत्य गुरोरर्थं त्वदायत्तमरिंदम ।
समयेनेह राजेन्द्र पुनरेष्यामि ते वशम् ॥
शत्रुदमन राजेन्द्र! गुरुका धन जो आपके ही अधीन है, उन्हें अर्पित करके मैं अपनी की हुई प्रतिज्ञाके अनुसार फिर आपके अधीन हो जाऊँगा ।
सौदास ने प्रसन्न होकर कहा, 'ब्रह्मन्! यदि आपकी गुरु-दक्षिणा मेरे अधीन है, तो उसे मिली हुई ही समझिये। आप मेरी कौन सी वस्तु लेना चाहते हैं?' उत्तङ्क बोले, 'पुरुषप्रवर! मैं आपकी रानी के दोनों मणिमय कुण्डल माँगने के लिये आया हूँ।' राजा ने तुरन्त मना कर दिया, 'ब्रह्मर्षे! वे कुण्डल तो मेरी रानी के ही योग्य हैं। आप कोई और वस्तु माँगिये, मैं अवश्य दे दूँगा।'
पत्न्यास्ते मम विप्रर्षे उचिते मणिकुण्डले ।
वरयार्थं त्वमन्यं वै तं ते दास्यामि सुव्रत ॥
सौदासने कहा — ब्रह्मर्षे! वे मणिमय कुण्डल तो मेरी रानीके ही योग्य हैं । सुव्रत! आप और कोई वस्तु माँगिये, उसे मैं आपको अवश्य दे दूँगा ।
उत्तङ्क ने दृढ़ता से कहा, 'पृथ्वीनाथ! अब बहाना करना व्यर्थ है। यदि आप मुझ पर विश्वास करते हैं, तो वे दोनों कुण्डल मुझे दे दें और सत्यवादी बनें।' राजा ने हार मानकर कहा, 'साधु शिरोमणे! आप रानी के पास जाइये और मेरी आज्ञा सुनाकर कहिये कि वे आपको कुण्डल दे दें।' राजा ने आगे बताया, 'ब्रह्मन्! उन्हें आप इस समय वन में किसी झरने के पास देखेंगे। यह दिन का छठा भाग है और मैं आहार की खोज में हूँ, अतः इस समय मैं उनसे मिल नहीं सकता।'
इत्युक्तस्त्वब्रवीद् राजा तमुत्तङ्कं पुनर्वचः ।
गच्छ मद्वचनाद् देवीं ब्रूहि देहीति सत्तम ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! उनके ऐसा कहनेपर राजा फिर उत्तंकसे बोले —'साधुशिरोमणे! आप रानीके पास जाइये और मेरी आज्ञा सुनाकर कहिये । आप मुझे कुण्डल दे दें ।
उत्तङ्क मुनि महारानी मदयन्ती के पास पहुँचे और राजा का सन्देश सुनाया। रानी ने उत्तर दिया, 'ब्रह्मन्! आप सत्य बोलते हैं, किन्तु महाराज के सन्देश का कोई प्रमाण तो लाइये। मेरे ये दोनों कुण्डल दिव्य हैं; देवता, यक्ष और महर्षि इन्हें चुराने के लिए सदा छिद्र ढूँढ़ते रहते हैं। यदि इन्हें पृथ्वी पर रख दिया जाए, तो नाग लोग इन्हें हड़प लेंगे। अपवित्र अवस्था में पहनने पर यक्ष उड़ा ले जाते हैं और यदि इन्हें पहनकर सो गये, तो देवतालोग बलात् छीन लेंगे। ये कुण्डल रात-दिन सोना टपकाते हैं और नक्षत्रों की प्रभा भी छीन लेते हैं। इन्हें धारण करने पर भूख-प्यास या हिंसक जन्तुओं का भय नहीं रहता। छोटे कद के मनुष्य इन्हें पहनकर छोटे हो जाते हैं और बड़े डील-डौल वाले इन्हें पहनकर बड़े हो जाते हैं। अतः आप महाराज की आज्ञा का प्रमाण लाइये।'
उत्तङ्क मुनि पुनः राजा सौदास के पास गए और उनसे पहचान माँगी। तब इक्ष्वाकु वंश में श्रेष्ठ उस नरेश ने सन्देश दिया, 'प्रिये! मैं जिस दुर्गति में पड़ा हूँ, यह मेरे लिये कल्याणकारी नहीं है। अब दूसरी कोई गति नहीं है। तुम अपने दोनों मणिमय कुण्डल इस ब्राह्मण को दे डालो।'
न चैवैषा गतिः क्षेम्या न चान्या विद्यते गतिः ।
एतन्मे मतमाज्ञाय प्रयच्छ मणिकुण्डले ॥
सौदास बोले — प्रिये! मैं जिस दुर्गतिमें पड़ा हूँ, यह मेरे लिये कल्याण करनेवाली नहीं है तथा इसके सिवा अब दूसरी कोई भी गति नहीं है । मेरे इस विचारको जानकर तुम अपने दोनों मणिमय कुण्डल इन ब्राह्मणदेवताको दे डालो ।
उत्तङ्क मुनि रानी के पास गए और राजा का वही सन्देश ज्यों का त्यों दोहरा दिया। महारानी मदयन्ती ने स्वामी का वचन सुनकर तुरन्त अपने दिव्य कुण्डल उत्तङ्क को सौंप दिए। कुण्डल पाकर उत्तङ्क पुनः राजा के पास आए और बोले, 'पृथ्वीनाथ! आपके गूढ़ वचन का क्या अभिप्राय था?'
सौदास ने भारी मन से कहा, 'ब्रह्मन्! क्षत्रिय ब्राह्मणों की पूजा करते हैं, किन्तु एक ब्राह्मण के शाप से मुझे यह दुर्गति प्राप्त हुई है। मैं मदयन्ती के साथ यहाँ रहकर इस दुर्गति से छुटकारा पाने का कोई उपाय नहीं देख पा रहा हूँ। कोई भी राजा ब्राह्मणों से विरोध करके न तो इस लोक में चैन से रह सकता है और न परलोक में। अब आपने अपने कुण्डल ले लिये हैं, अपनी प्रतिज्ञा पूरी कीजिये।'
न हि राज्ञा विशेषेण विरुद्धेन द्विजातिभिः ।
शक्यं हि लोके स्थातुं वै प्रेत्य वा सुखमेधितुम् ॥
कोई भी राजा विशेषरूपसे ब्राह्मणोंके साथ विरोध करके न तो इसी लोकमें चैनसे रह सकता है और न परलोकमें ही सुख पा सकता है । यही मेरे गूढ़ संदेशका तात्पर्य है ।
उत्तङ्क ने कहा, 'राजन! मैं आपकी प्रतिज्ञा पूरी करूँगा, किन्तु एक प्रश्न पूछने आया हूँ। धर्मनिपुण विद्वानों ने कहा है कि जो सत्यवादी है वही ब्राह्मण है। आज मेरी आपसे मित्रता हो गयी है, तो बताइये—क्या इस अवस्था में मेरा आपके पास लौटकर आना उचित है?'
प्राहुर्वाक्संयतं विप्रं धर्मनैपुणदर्शिनः ।
मित्रेषु यश्च विषमः स्तेन इत्येव तं विदुः ॥
उत्तंकने कहा — राजन्! धर्मनिपुण विद्वानोंने उसीको ब्राह्मण कहा है, जो अपनी वाणीका संयम करता हो - सत्यवादी हो । जो मित्रोंके साथ विषमताका व्यवहार करता है, उसे चोर माना गया है ।
सौदास ने गम्भीर स्वर में कहा, 'द्विजश्रेष्ठ! यदि यहाँ मुझे कुछ कहना है, तो मैं यही कहूँगा कि आपको मेरे पास किसी तरह नहीं आना चाहिये। ऐसा करने में ही आपकी भलाई है; यदि आप आए, तो आपकी मृत्यु निश्चित है।'
एवं तव प्रपश्यामि श्रेयो भृगुकुलोद्वह ।
आगच्छतो हि ते विप्र भवेन्मृत्युर्न संशयः ॥
भृगुकुलभूषण विप्र! ऐसा करनेमें ही मैं आपकी भलाई देखता हूँ । यदि आयेंगे तो आपकी मृत्यु हो जायगी । इसमें संशय नहीं है ।
राजा सौदास के इन हितकारी वचनों को सुनकर उत्तङ्क मुनि तुरन्त अहल्या के पास चल दिए। गुरुपत्नी का प्रिय करने वाले वे दोनों दिव्य कुण्डल लेकर बड़े वेग से आश्रम की ओर बढ़े।
रानी मदयन्ती ने उन कुण्डलों की रक्षा के लिये जैसी विधि बताई थी, उसी प्रकार उन्हें काले मृगचर्म में बाँधकर वे ले जा रहे थे। चलते-चलते एक समय उत्तङ्क मुनि को बड़े जोर की भूख लगी। मार्ग में ही फलों के भार से झुका हुआ एक बेल का वृक्ष दिखाई दिया। ब्रह्मर्षि उत्तङ्क उस वृक्ष पर चढ़ गए और उस काले मृगचर्म को उसकी एक शाखामें बाँध दिया। फिर वे ब्राह्मणपुङ्गव उन बेलों को तोड़-तोड़कर गिराने लगे। उनका सारा ध्यान उन गिरते हुए फलों पर ही था, जिससे उन्हें यह ज्ञात न रहा कि वे कहाँ गिर रहे हैं। उनके तोड़े हुए प्रायः सभी बेल उसी मृगछाला पर गिरे जिसमें उन्होंने वे दोनों कुण्डल बाँध रखे थे। उन बेलों की चोट से बन्धन टूट गया और कुण्डल सहित वह मृगचर्म सहसा वृक्ष से नीचे जा गिरा।
विशीर्णबन्धने तस्मिन् गते कृष्णाजिने महीम् ॥
अपश्यद् भुजगः कश्चित् ते तत्र मणिकुण्डले ।
ऐरावतकुलोद्भूतः शीघ्रो भूत्वा तदा हि सः ॥
विदश्यास्येन वल्मीकं विवेशाथ स कुण्डले । बन्धन टूट जानेपर उस काले मृगछालेके पृथ्वीपर गिरते ही किसी सर्पकी दृष्टि उसपर पड़ी । वह ऐरावतके कुलमें उत्पन्न हुआ तक्षक था । उसने मृगछालाके भीतर रखे हुए उस मणिमय कुण्डलोंको देखा । फिर तो बड़ी शीघ्रता करके वह उन कुण्डलोंको दाँतोंमें दबाकर एक बाँबीमें घुस गया ।
उस काले मृगछाले के पृथ्वी पर गिरते ही किसी सर्प की दृष्टि उस पर पड़ी। वह ऐरावत के कुल में उत्पन्न हुआ तक्षक था। उसने मृगछाला के भीतर रखे हुए उन मणिमय कुण्डलों को देखा और बड़ी शीघ्रता से उन्हें अपने दाँतों में दबाकर एक बाँबी में घुस गया। सर्प द्वारा कुण्डलों का अपहरण होते देख उत्तङ्क मुनि उद्विग्न हो उठे। वे अत्यन्त क्रोध में भरकर वृक्ष से नीचे कूद पड़े। उन्होंने एक काठ का डण्डा हाथ में लिया और उसी से उस बाँबी को खोदने लगे।
ब्राह्मणशिरोमणि उत्तङ्क क्रोध और अमर्ष से सन्तप्त होकर लगातार पैंतीस दिनों तक बिना किसी घबराहट के उस बिल को खोदते रहे। उनके उस असह्य वेग को पृथ्वी भी नहीं सह सकी; डण्डे की चोट से घायल होकर वह व्याकुल होकर डगमगाने लगी। उत्तङ्क नागलोक में जाने का मार्ग बनाने के निश्चय के साथ धरती खोदते जा रहे थे कि तभी महातेजस्वी वज्रधारी इन्द्र घोड़े जुते हुए रथ पर सवार होकर वहाँ आ पहुँचे।
ततः खनत एवाथ विप्रर्षेर्धरणीतलम् ।
नागलोकस्य पन्थानं कर्तुकामस्य निश्चयात् ॥
रथेन हरियुक्तेन तं देशमुपजग्मिवान् ।
वज्रपाणिर्महातेजास्तं ददर्श द्विजोत्तमम् ॥
उत्तंक नागलोकमें जानेका मार्ग बनानेके लिये निश्चय करके धरती खोदते ही जा रहे थे कि महातेजस्वी वज्रधारी इन्द्र घोड़े जुते हुए रथपर बैठकर उस स्थानपर आ पहुँचे और विप्रवर उत्तंकसे मिले ।
इन्द्र उत्तङ्क के दुःख से दुखी थे, इसलिए उन्होंने एक ब्राह्मण का वेष धारण किया और बोले— "ब्रह्मन्! यह काम तुम्हारे वश का नहीं है। नागलोक यहाँ से हजारों योजन दूर है। इस काठ के डण्डे से वहाँ का रास्ता बनाना सम्भव नहीं जान पड़ता।"
उत्तङ्क ने दृढ़ता से कहा— "ब्रह्मन्! द्विजश्रेष्ठ! यदि नागलोक में जाकर उन कुण्डलों को प्राप्त करना मेरे लिए असम्भव है, तो मैं आपके सामने ही अपने प्राणों का परित्याग कर दूँगा।"
नागलोके यदि ब्रह्मन् न शक्ये कुण्डले मया ।
प्राप्तुं प्राणान् विमोक्ष्यामि पश्यतस्तु द्विजोत्तम ॥
उत्तंकने कहा —ब्रह्मन्! द्विजश्रेष्ठ! यदि नागलोकमें जाकर उन कुण्डलोंको प्राप्त करना मेरे लिये असम्भव है तो मैं आपके सामने ही अपने प्राणोंका परित्याग कर दूँगा ।
जब इन्द्र उन्हें अपने निश्चय से न हटा सके, तब उन्होंने उत्तङ्क के डण्डे के अग्रभाग में अपने वज्रास्त्र का संयोग कर दिया। उस वज्र के प्रहार से विदीर्ण होकर पृथ्वी ने नागलोक का मार्ग प्रकट कर दिया। उसी मार्ग से उत्तङ्क मुनि ने नागलोक में प्रवेश किया। वहाँ उन्होंने देखा कि नागों का लोक सहस्रों योजन तक विस्तृत है। उसके चारों ओर सोने की ईंटों से बने दिव्य परकोटे हैं, जो मणियों और मोतियों से अलङ्कृत हैं। उन्होंने वहाँ स्फटिक मणियों से बनी सीढ़ियाँ, निर्मल जल वाली अनेक नदियाँ और विहगवृन्द से सुशोभीत मनोहर वृक्ष भी देखे।
यदा स नाशकत् तस्य निश्चयं कर्तुमन्यथा ।
वज्रपाणिस्तदा दण्डं वज्रास्त्रेण युयोज ह ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! वज्रधारी इन्द्र जब किसी तरह उत्तंकको अपने निश्चयसे न हटा सके, तब उन्होंने उनके डंडेके अग्रभागमें अपने वज्रास्त्रका संयोग कर दिया ।
भृगुकुलतिलक उत्तङ्क ने नागलोक का बाहरी दरवाजा देखा, जो सौ योजन लम्बा और पाँच योजन चौड़ा था। उस विशालता को देखकर उत्तङ्क मुनि दीन और हतोत्साह हो गए; अब उन्हें कुण्डल पाने की आशा नहीं रही। तभी उनके पास एक घोड़ा आया, जिसके नेत्र और मुख लाल थे तथा पूँछ के बाल काले-सफेद थे। वह घोड़ा अपने तेज से प्रज्वलित सा हो रहा था।
नागलोकमुत्तङ्कस्तु प्रेक्ष्य दीनोऽभवत् तदा ।
निराशश्चाभवत् तत्र कुण्डलाहरणे पुनः ॥
नागलोककी वह विशालता देखकर उत्तंक मुनि उस समय दीन- हतोत्साह हो गये । अब उन्हें फिर कुण्डल पानेकी आशा नहीं रही ।
उस घोड़े ने कहा— "विप्रवर! तुम मेरे इस अपान मार्ग में फूँक मारो। ऐसा करने से ऐरावत के पुत्र द्वारा लाए गए तुम्हारे दोनों कुण्डल तुम्हें मिल जाएँगे।"
धमस्वापानमेतन्मे ततस्त्वं विप्र लप्स्यसे ।
ऐरावतसुतेनेह तवानीते हि कुण्डले ॥
उसने उत्तंकसे कहा— विप्रवर! तुम मेरे इस अपान मार्गमें फूँक मारो । ऐसा करनेसे ऐरावतके पुत्रने जो तुम्हारे दोनों कुण्डल लाये हैं, वे तुम्हें मिल जायँगे ।
उत्तङ्क ने विस्मित होकर पूछा— "मैं आपके इस कथन को कैसे जानूँ? और आपने कहा कि मैंने आपके कार्य आश्रम में अनेक बार किए हैं, वह क्या है?"
घोड़े ने उत्तर दिया— "ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे गुरु का भी गुरु, जातवेदा अग्नि हूँ। तुमने अपने गुरु के लिए सदा पवित्र रहकर मेरी पूजा की है, इसलिए मैं तुम्हारा कल्याण करूँगा। अब विलम्ब न करो।"
इत्युक्तस्तु तथाकार्षीदुत्तङ्कश्चित्रभानुना ।
घृतार्चिः प्रीतिमांश्चापि प्रजज्वाल दिधक्षया ॥
अग्निदेवके ऐसा कहनेपर उत्तंकने उनकी आज्ञाका पालन किया । तब घृतमयी अर्चिवाले अग्निदेव प्रसन्न होकर नागलोकको जला डालनेकी इच्छासे प्रज्वलित हो उठे ।
अग्निदेव के कहने पर उत्तङ्क ने उनकी आज्ञा का पालन करते हुए घी से भरी अर्चिवाले अग्निदेव की ओर फूँक मारी। जैसे ही उन्होंने फूँक मारी, अग्निदेव प्रज्वलित होकर नागलोक को जला डालने की इच्छा से उठ खड़े हुए। उनके रोम-रोम से घनीभूत धूम उठने लगी, जिसने पूरे नागलोक को आच्छन्न कर दिया।
ततोऽस्य रोमकूपेभ्यो धम्यतस्तत्र भारत ।
घनः प्रादुरभूद् धूमो नागलोकभयावहः ॥
भारत! जिस समय उत्तंकने फूँक मारना आरम्भ किया, उसी समय उस अश्वरूपधारी अग्निके रोम - रोमसे घनीभूत धूम उठने लगा; जो नागलोकको भयभीत करनेवाला था ।
उस महान धूम के कारण नागलोक में कुछ भी सूझ नहीं पड़ रहा था। ऐरावत के सारे घरों में हाहाकार मच गया। वासुकि आदि नागों के घर धुएँ से ढक गए और उनमें अँधेरा छा गया; वे ऐसे लग रहे थे मानो कुहासे से ढके हुए वन और पर्वत हों। धुआँ लगने से नागों की आँखें लाल हो गई थीं और वे आग की आँच से तप रहे थे।
जब वासुकि आदि नाग यह जानने के लिए एकत्र हुए कि यह क्या निश्चय है, तब उन्होंने उस तेजस्वी महर्षि उत्तङ्क को देखा। उत्तङ्क के तेज को देखकर सबकी आँखें भय से कातर हो गईं और सबने उनका विधिवत् पूजन किया। अन्त में सभी नाग—बूढ़े और बालकों को आगे करके—हाथ जोड़कर बोले— "भगवन्! हम पर प्रसन्न हो जाइए।"
श्रुत्वा च निश्चयं तस्य महर्षेरतितेजसः ।
सम्भ्रान्तनयनाः सर्वे पूजां चक्रुर्यथाविधि ॥
उस समय उन अत्यन्त तेजस्वी महर्षिका निश्चय सुनकर सबकी आँखें भयसे कातर हो गयीं तथा सबने उनका विधिवत् पूजन किया ।
नागों ने उन्हें पाद्य और अर्घ्य निवेदन किया और वे दोनों परम पूजित दिव्य कुण्डल वापस कर दिए। नागों से सम्मानित होकर प्रतापी उत्तङ्क मुनि अग्निदेव की प्रदक्षिणा करके गुरु के आश्रम की ओर चल दिए। वहाँ पहुँचकर उन्होंने अपने गुरु महर्षि गौतम को वासुकि आदि नागों के यहाँ घटी इस पूरी घटना का सारा समाचार ठीक-ठीक सुनाया।
वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय ।
सर्वं शशंस गुरवे यथावद् द्विजसत्तमः ॥
जनमेजय! वासुकि आदि नागोंके यहाँ जो घटना घटी थी, उसका सारा समाचार द्विजश्रेष्ठ उत्तंकने अपने गुरु महर्षि गौतमसे ठीक- ठीक कह सुनाया ।
In English
Krishna and Uttanka Muni
After the war, Krishna meets the sage Uttanka, who curses him for not protecting the Kauravas. Krishna explains the nature of the universe and his divine role before showing Uttanka his cosmic Vishwarupa form.
This page answers
- Why did uttanka curse krishna?
- What is the relationship between krishna and the universe?
- What is the vishwarupa form seen by uttanka?
- Did krishna try to make peace with the kauravas?
Also written: Uttankopakhyana, Uttanka, Shrikrishna, Arjuna, Bhishma, Vidura, Indra, Gautama, Ahalya, Madayanti, Saudasa, Takshaka, Agnideva, Vasuki, उत्तङ्कोपाख्यान