श्रीगणेशाय नमः।

दक्षिणोपाख्यान : कर्मों को फल प्रदान करने वाली शक्ति कौन है?

कर्म और फल का आधार

श्रीमद्देवीभागवत महापुराणके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान — मूल श्लोक और पृष्ठ-सङ्केतके साथ।

देवी भागवत उत्तरार्द्ध · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · पृष्ठ 571–580

1,059 शब्द · 6 मिनटका पाठ · 9 श्लोक

श्रीनारायण ने नारद से कहा

कर्मों की निष्फलता और फल प्राप्ति के रहस्य को समझाने हेतु

श्रीनारायण बोले— "हे नारद! मैंने भगवती स्वाहा तथा स्वधा का अत्यन्त मधुर तथा कल्याणकारी उपाख्यान बता दिया। अब मैं भगवती दक्षिणा का आख्यान कह रहा हूँ, सावधान होकर सुनिये।"

जो मनुष्य त्रिकाल सन्ध्याके समय स्वधा, स्वधा, स्वधा — ऐसा उच्चारण करता है; उसे पुत्रों ३० तथा सद्गुणोंसे सम्पन्न, विनम्र, प्रिय तथा पतिव्रता स्त्री प्राप्त होती है ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · श्लोक 30पृष्ठ 571

गोलोक में सुशीला नामक एक गोपी थी, जो रसज्ञान से परिपूर्ण थी। वह भगवान श्रीकृष्ण की प्रिय भामिनी थी और उनके भावों को भली-भाँति जानती थी। वह सदा श्रीकृष्ण के प्रेमरस के हेतु लालायित रहती थी। एक बार, वह राधा के सामने ही भगवान श्रीकृष्ण के वाम अङ्क में बैठ गयी। सुशीला के इस व्यवहार को देखकर कामिनी राधा का मुख लाल हो गया और उनके नेत्र रक्तकमल के समान हो गये; क्रोध से उनके अङ्ग काँप रहे थे और ओठ प्रस्फुरित हो रहे थे। राधा की ओर देखते ही सुशीला भयभीत होकर अपना मुख नीचे कर लिया। उस समय श्रीकृष्ण भी राधा के क्रोध को देखकर अत्यन्त डरे हुए अन्तर्धान हो गये।

श्रीनारायण उवाच

कामिनीं रक्तवदनां रक्तपङ्कजलोचनाम् ।
कोपेन कम्पिताङ्गीं च कोपेन स्फुरिताधराम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · श्लोक 9पृष्ठ 572

श्रीकृष्ण को अन्तर्धान होते देख सुशीला आदि गोपियाँ भय से काँपने लगीं। वहाँ उपस्थित तीन लाख करोड़ गोपियाँ भक्तिपूर्वक कन्धा झुकाकर और दोनों हाथ जोड़कर— 'रक्षा कीजिये- रक्षा कीजिये!'— कहते हुए बार-बार भगवती राधा से कहने लगीं और उनके चरण कमलों की शरण में जा पहुँचीं। परमेश्वरी राधा ने अपने कान्त श्रीकृष्ण को अन्तर्धान होता और सहचरी सुशीला को पलायन करते देखकर उन्हें शाप दे दिया— "यदि गोपी सुशीला आज से गोलोक में आयेगी, तो वह आते ही भस्मसात् हो जायगी।"

श्रीनारायण उवाच

सम्बभूवानम्रमुखो भयेन मधुसूदनः ।
दृष्ट्वा राधां च पुरतो गोपीनां प्रवरोत्तमाम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · श्लोक 8पृष्ठ 572

इसके पश्चात, गोलोक से च्युत सुशीला नामक वह गोपी 'दक्षिणा' नाम से प्रसिद्ध हुई। दूसरी ओर, विरह से दुःखित और दीन राधिका प्रेम के कारण रो रही थीं और अपने कान्त का ध्यान करते हुए कह रही थीं— "हे नाथ! हे रमण! मुझे दर्शन दीजिये।"

॥ १६ ऐसा कहकर देवदेवेश्वरी रासेश्वरी राधा रोषपूर्वक रासमण्डलके मध्य रासेश्वर भगवान् श्रीकृष्णको ।
पुकारने लगीं ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · श्लोक 17पृष्ठ 573

इधर, जब देवताओं को यज्ञों का फल प्राप्त नहीं हुआ, तब वे उदास होकर ब्रह्माजी के पास गये। उस समय भगवान नारायण ने महालक्ष्मी के विग्रह से मर्त्यलक्ष्मी को प्रकट किया और उसका नाम 'दक्षिणा' रखकर ब्रह्माजी को सौंप दिया। ब्रह्माजी ने भी यज्ञकार्यों की सम्पन्नता के लिये उन देवी दक्षिणा को यज्ञपुरुष को समर्पित कर दिया। तब यज्ञपुरुष ने प्रसन्नतापूर्वक उन देवी दक्षिणा की विधिवत् पूजा की।

श्रीनारायण बोले— हे मुने! दक्षिणाविहीन कर्म का फल हो ही कहाँ सकता है? दक्षिणायुक्त कर्म में ही फल प्रदान करने का सामर्थ्य होता है। जो कर्म बिना दक्षिणा के सम्पन्न होता है, उसके फल का भोग राजा बलि करते हैं। पूर्वकाल में भगवान वामन स्वयं राजा बलिके लिये वैसा कर्म अर्पण कर चुके हैं। अश्रोत्रिय व्यक्ति द्वारा श्रद्धाहीन होकर दिया गया श्राद्ध-द्रव्य, शूद्रापति ब्राह्मणों का पूजा-द्रव्य और सदाचारहीन विप्रों द्वारा किया गया यज्ञ— इन सबमें संशय नहीं है कि इन निष्फल कर्मों के फल को राजा बलि आहार के रूप में ग्रहण करते हैं।

श्रीनारायण उवाच

उक्तं स्वाहास्वधाख्यानं प्रशस्तं मधुरं परम् ।
वक्ष्यामि दक्षिणाख्यानं सावधानो निशामय ।
१ गोपी सुशीला गोलोके पुरासीत्प्रेयसी हरेः ।
राधा प्रधाना सध्रीची धन्या मान्या मनोहरा ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · श्लोक 2पृष्ठ 572

हे मुने! भगवती दक्षिणा का जो भी ध्यान, स्तोत्र तथा पूजा-विधि है, वह सब कण्वशाखा में वर्णित है; अब मैं उसे बताऊँगा, आप ध्यानपूर्वक सुनिये। पूर्वकाल में कर्म का फल प्रदान करने में दक्ष उन भगवती दक्षिणा को प्राप्त करके वे यज्ञपुरुष कामपीड़ित होकर उनके स्वरूप पर मोहित हो गये और उनकी स्तुति करने लगे।

यज्ञपुरुष ने अत्यन्त भाव से कहा— "हे महाभागे! तुम पूर्वकाल में गोलोक की एक गोपी थीं और गोपियों में परम श्रेष्ठ थीं। श्रीकृष्ण तुमसे अत्यधिक प्रेम करते थे और तुम राधा के समान ही उन श्रीकृष्ण की प्रिय सखी थीं। हे शोभने! इससे भी पहले अपने उत्तम शील के कारण तुम सुशीला नाम से प्रसिद्ध थीं। तुम भगवती राधिका के शाप से गोलोक से च्युत होकर और पुनः देवी लक्ष्मी के दक्षिणांश से आविर्भूत हो, अब देवी दक्षिणा के रूप में मेरे सौभाग्य से मुझे प्राप्त हुई हो। हे महाभागे! मुझ पर कृपा करो और मुझे ही अपना स्वामी बना लो। तुम्हीं यज्ञ करने वालों को उनके कर्मों का सदा फल प्रदान करने वाली देवी हो। तुम्हारे बिना सम्पूर्ण प्राणियों का सारा कर्म निष्फल हो जाता है और तुम्हारे बिना अनुष्ठानकर्ताओं का कर्म शोभा नहीं पाता। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, दिक्पाल आदि भी तुम्हारे बिना प्राणियों को कर्म का फल प्रदान करने में समर्थ नहीं हैं।"

यज्ञ उवाच

पुरा गोलोकगोपी त्वं गोपीनां प्रवरा वरा ॥

राधासमा तत्सखी च श्रीकृष्णप्रेयसी प्रिया ।
कार्तिकीपूर्णिमायां तु रासे राधामहोत्सवे ॥

आविर्भूता दक्षिणांसाल्लक्ष्म्याश्च तेन दक्षिणा ।
पुरा त्वं च सुशीलाख्या ख्याता शीलेन शोभने ॥

लक्ष्मीदक्षांसभागात्त्वं राधाशापाच्च दक्षिणा ।
गोलोकात्त्वं परिभ्रष्टा मम भाग्यादुपस्थिता ॥

कृपां कुरु महाभागे मामेव स्वामिनं कुरु ।
कर्मिणां कर्मणां देवी त्वमेव फलदा सदा ॥

त्वया विना च सर्वेषां सर्वं कर्म च निष्फलम् ।
त्वया विना तथा कर्म कर्मिणां च न शोभते ॥

ब्रह्मविष्णुमहेशाश्च दिक्पालादय एव च ।
कर्मणश्च फलं दातुं न शक्ताश्च त्वया विना ॥

स्कन्ध ५६ ९ अश्रोत्रिय व्यक्तिके द्वारा श्रद्धाहीन होकर दिया गया श्राद्धद्रव्य तथा दान आदि, शूद्रापति ब्राह्मणोंका पूजा - द्रव्य आदि, सदाचारहीन विप्रोंद्वारा किया गया यज्ञ, अपवित्र व्यक्तिका पूजन और गुरुभक्तिसे हीन मनुष्यके कर्मफलको राजा बलि आहारके रूपमें ग्रहण करते हैं, इसमें संशय नहीं है ।

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · श्लोक 67-683पृष्ठ 578

ऐसा कहकर यज्ञपुरुष देवी दक्षिणा के समक्ष स्थित हो गये। तब भगवती कमला की कला स्वरूपिणी देवी दक्षिणा प्रसन्न हो गयीं और उन्होंने यज्ञपुरुष का वरण कर लिया।

अ ० ४५ ] नवम अश्रोत्रियः श्राद्धद्रव्यम श्रद्धादानमेव च ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · श्लोक 67पृष्ठ 578

यज्ञपुरुष ने उनकी स्तुति इस प्रकार की— "लक्ष्मीदक्षांससम्भूतां दक्षिणां कमलाकलाम्। सर्वकर्मसुदक्षां च फलदां सर्वकर्मणाम्॥ विष्णोः शक्तिस्वरूपां च पूजितां वन्दितां शुभाम्। शुद्धिदां शुद्धिरूपां च सुशीलां शुभदां भजे॥"

वृषलीपतिविप्राणां पूजाद्रव्यादिकं च यत् ।
असद्विजैः कृतं यज्ञमशुचेः पूजनं च यत् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · श्लोक 68पृष्ठ 578

"हे कान्ते! जन्म-जन्मान्तर में तुम्हीं सदा मेरी शक्ति रही हो। हे वरानने! तुम्हारे साथ रहकर ही मैं सारा कर्म करने में समर्थ हूँ।" ऐसा कहकर यज्ञ के अधिष्ठातृ देवता भगवान यज्ञपुरुष, देवी दक्षिणा के समक्ष स्थित हो गये। तब भगवती कमला की कला स्वरूपिणी देवी दक्षिणा प्रसन्न होकर उन्होंने यज्ञपुरुष का वरण कर लिया।

गुरावभक्तस्य कर्म बलिर्भुङ्गे न संशयः ।
दक्षिणायाश्च यद्ध्यानं स्तोत्रं पूजाविधिक्रमम् ॥

श्रीमद्देवीभागवत महापुराण · नवम स्कन्ध · अध्याय 45 · श्लोक 69पृष्ठ 578

यज्ञपुरुष ने देवी दक्षिणा को पत्नी रूप में स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात् उन्होंने सभी कर्मों के फलरूप पुत्र को जन्म दिया। जब कर्म परिपूर्ण हुआ, तो वही पुत्र फल प्रदान करने वाला हुआ। वेदवेत्ता पुरुषों ने कहा है कि भगवान यज्ञ, भगवती दक्षिणा तथा अपने पुत्र के फल से युक्त होने पर ही कर्म करने वालों को फल प्रदान करते हैं। इस प्रकार देवी दक्षिथा और फलदायक पुत्र को प्राप्त कर यज्ञपुरुष सभी प्राणियों को उनके कर्मों का फल प्रदान करने लगे। तदनन्तर, परिपूर्ण मनोरथ वाले वे सभी देवगण प्रसन्न होकर अपने-अपने स्थान को चले गये।

हे मुने! जो मनुष्य यज्ञ के अवसर पर भगवती दक्षिणा का यह स्तोत्र पाठ करता है, वह सम्पूर्ण यज्ञों का फल प्राप्त कर लेता है। गजमेध, लोहयज्ञ, स्वर्णयज्ञ, रत्नयज्ञ, ताम्रयज्ञ, शिवयज्ञ, रुद्रयज्ञ, इन्द्रयज्ञ, बन्धुकयज्ञ, वृष्टिकारक वरुणयज्ञ, वैरिमर्दन कण्डकयज्ञ, शुचियज्ञ, धर्मयज्ञ, पापमोचनयज्ञ, ब्रह्माणीकर्मयज्ञ और कल्याणकारी अम्बायज्ञ— इन सभी के आरम्भ में जो व्यक्ति इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसका सारा यज्ञकर्म निर्विघ्न रूप से अवश्य ही सम्पन्न हो जाता है।

विद्वान पुरुष को चाहिए कि वह शालग्राम या कलश पर देवी दक्षिणा का आवाहन करके उनकी पूजा करे। वे देवी साक्षात् कमला की कला हैं, सभी कर्मों में अत्यन्त प्रवीण हैं, सम्पूर्ण कर्मों का फल प्रदान करने वाली हैं, भगवान विष्णु की शक्तिस्वरूपा हैं, सबकी वन्दनीय तथा पूजनीय हैं, मङ्गलमयी हैं, शुद्धिदायिनी हैं और शुभशील हैं— ऐसी देवी की मैं आराधना करता हूँ।

हे मुने! इस प्रकार ध्यान करके विद्वान पुरुष वेदोक्त मन्त्र के द्वारा देवी दक्षिणा को पाद अर्पण कर 'ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं दक्षिणायै स्वाहा' इस मूल मन्त्र से उनकी भक्तिपूर्वक विधिवत् पूजा करे। हे ब्रह्मन्! इस प्रकार मैंने भगवती दक्षिणा का यह आख्यान आपसे कह दिया; यह सुख, प्रीति तथा सम्पूर्ण कर्मों का फल प्रदान करने वाला है। जो मनुष्य सङ्कट, बन्धु-विच्छेद अथवा विपत्ति की स्थिति में एक माह तक इस आख्यान का श्रवण करता है, वह इनसे मुक्त हो जाता है।

In English

The Story of Goddess Dakshina

A gopi named Sushila is cursed by Radha to leave Goloka after causing her jealousy during an encounter with Krishna. Sushila is reborn as the goddess Dakshina, a manifestation of Lakshmi, who is later given to Yajñapuruṣa to ensure that rituals yield their intended fruits.

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  • Why did radha curse the gopi sushila?
  • How was the goddess dakshina created?
  • What happens to rituals performed without dakshina?
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Also written: Dakshinopakhyana, Dakshina, Sushila, Radha, Shrikrishna, Yagyapurusha, Brahma, Narayana, दक्षिणोपाख्यान