सुन्दोपसुन्दोपाख्यान : समान लक्ष्य वाले दो शक्तिशाली योद्धा आपस में क्यों लड़ गए?
अहङ्कार और आकर्षण का विनाश
महर्षि वेदव्यास कृत महाभारतके सन्दर्भ सहित वास्तविक आख्यान पढ़ें।
आदिपर्व → विदुरागमनराज्यलम्भपर्व · अध्याय 209–211 · पृष्ठ 1458–1473
नारद ने युधिष्ठिर से कहा
पाण्डवों के मध्य एकता बनाए रखने हेतु परामर्श
नारद जी युधिष्ठिर से कहते हैं— उत्सव समाप्त होने के पश्चात, तीनों लोकों को अपने अधिकार में करने की तीव्र इच्छा लिए उन दोनों दैत्यों ने आपस में सलाह की और सेना को कूच करने का आदेश दे दिया। सुहृदों तथा बूढ़े मन्त्रियों की अनुमति लेकर, उन्होंने रात के समय मघा नक्षत्र में अपनी यात्रा प्रारम्भ कर दी। उनके पीछे गदा, पट्टिश, शूल, मुद्गर और कवच से सुसज्जित दैत्यों की एक विशाल सेना चल रही थी। चारण लोग विजय के मङ्गल गीत गाते हुए उन दोनों के गुण गाते जा रहे थे और वे दोनों दैत्य बड़े आनन्द के साथ यात्रा कर रहे थे। युद्ध के लिए उन्मत्त ये दोनों दैत्य सर्वत्र जाने में समर्थ थे, इसलिए वे आकाश में उछलकर सबसे पहले देवताओं के घरों पर ही जा चढ़े। उनका आगमन देखकर और ब्रह्माजी से मिले हुए वरदानों का विचार करके देवता स्वर्ग छोड़कर ब्रह्मलोक की ओर प्रस्थान कर गए। इस प्रकार इन्द्रलोक पर विजय पाकर वे तीव्रपराक्रमी दैत्य यक्षों, राक्षसों और अन्य आकाशचारी भूतों को पीड़ा देने लगे।
उन दोनों महारथियों ने पाताल के नागों को जीतकर समुद्र तट पर निवास करने वाली समस्त म्लेच्छ जातियों को परास्त किया। तदनन्तर, वे भयङ्कर शासन करने वाले दैत्य पूरी पृथ्वी को जीतने के लिए उद्यत हुए। उन्होंने अपने सैनिकों को बुलाकर अत्यन्त तीखे स्वर में कहा— 'इस पृथ्वी पर बहुत से राजर्षि और ब्राह्मण रहते हैं, जो बड़े-बड़े यज्ञ करके हव्य-कव्यों द्वारा देवताओं के तेज, बल और लक्ष्मी की वृद्धि किया करते हैं। इस प्रकार यज्ञादि कर्मों में लगे हुए वे सभी लोग असुरों के द्रोही हैं। इसलिए हम सबको सङ्गठित होकर उन सबका सब प्रकार से वध कर डालना चाहिए।'
तेषामेवंप्रवृत्तानां सर्वेषामसुरद्विषाम् ।
सम्भूय सर्वैरस्माभिः कार्यः सर्वात्मना वधः ॥
‘ इस प्रकार यज्ञादि कर्मोंमें लगे हुए वे सभी लोग असुरोंके द्रोही हैं । इसलिये हम सबको संगठित होकर उन सबका सब प्रकारसे वध कर डालना चाहिये '
समुद्र के पूर्व तट पर अपने सैनिकों को यह आदेश देकर और मन में क्रूर सङ्कल्प लिए, वे दोनों भाई सब ओर आक्रमण करने लगे। जो ब्राह्मण आचार्य बनकर यज्ञ कराते थे, वे महाबली दैत्य उनका बलपूर्वक वध कर आगे बढ़ जाते थे। उनके सैनिक मुनियों के आश्रमों में घुसकर अग्निहोत्र की सामग्री उठाकर बिना किसी भय के पानी में फेंक देते थे। कुछ तपस्वी महात्माओं ने क्रोधित होकर उन्हें शाप भी दिए, किन्तु वे शाप उन दैत्यों के वरदान से टकराकर पत्थर पर चलाए गए बाणों की भाँति निष्प्रभावी हो गए। जब शाप उन्हें पीड़ित न कर सके, तब ब्राह्मण अपने सारे नियम छोड़कर वहाँ से भागने लगे। जैसे साँप गरुड़ के डर से भागते हैं, वैसे ही शान्तिपरायण और तपःसिद्ध महात्मा भी उन दैत्यों के भय से पलायन करने लगे।
नाक्रामन्त यदा शापा बाणा मुक्ताः शिलास्विव ।
नियमान् सम्परित्यज्य व्यद्रवन्त द्विजातयः ॥
पत्थरपर चलाये हुए बाणोंकी भाँति जब शाप उन्हें पीड़ित न कर सके, तब ब्राह्मणलोग अपने सारे नियम छोड़कर वहाँसे भाग चले ।
आश्रम मथकर उजाड़ दिए गए, कलश और स्रुव तोड़-फोड़कर फेंक दिए गए। सारा जगत् ऐसा सूना हो गया मानो काल द्वारा विनष्ट हुआ हो। जब गुफाओं में छिपे ऋषि दिखाई न दिए, तब उन दोनों ने एक राय की और अपने स्वरूप को अनेक जीव-जन्तुओं में बदल लिया। वे कभी सिंह या बाघ बनते, तो कभी अदृश्य होकर शिकार करते, और कभी मद बहाने वाले हाथी का रूप धारण कर मुनियों को यमलोक पहुँचा देते थे। इस प्रकार वे विभिन्न उपायों से ऋषियों को ढूँढ-ढूँढकर मारने लगे। पृथ्वी पर यज्ञ, स्वाध्याय, कृषि और गोरक्षा का नामोनिशान मिट गया। नगर और आश्रम खण्डहर बन गए और चारों ओर केवल हड्डियाँ व कङ्काल भरे पड़े थे। श्राद्धकर्म और मङ्गल के स्वर लुप्त हो चुके थे। सुन्द और उपसुन्द के इस भयानक कर्म को देखकर सूर्य, चन्द्रमा, नक्षत्र और देवता सभी अत्यन्त खिन्न हो उठे। वे दोनों दैत्य अपने क्रूर कर्मों से दिशाओं को जीतकर कुरुक्षेत्र में निवास करने लगे।
एवं सर्वा दिशो दैत्यौ जित्वा क्रूरेण कर्मणा ।
निःसपत्नौ कुरुक्षेत्रे निवेशमभिचक्रतुः ॥
इस प्रकार वे दोनों दैत्य अपने क्रूर कर्मद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंको जीतकर शत्रुओंसे रहित हो कुरुक्षेत्रमें निवास करने लगे ।
यह सब देखकर सम्पूर्ण देवर्षि और सिद्ध महर्षि अत्यन्त दुःखी हुए। वे ब्रह्माजी के धाम में पहुँचे, जहाँ ब्रह्माजी देवताओं और ऋषियों से घिरे बैठे थे। उन्होंने ब्रह्माजी को दैत्यों द्वारा किए गए लूट-पाट और हत्याओं का समाचार दिया। ब्रह्माजी ने कुछ विचार किया और उन दोनों के वध हेतु विश्वकर्मा को बुलाया। महातपस्वी ब्रह्माजी ने विश्वकर्मा को देखकर कहा— 'तुम एक तरुणी स्त्री के शरीर की रचना करो, जो सबका मन लुभा लेने वाली हो।'
ततो देवर्षयः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः ।
जग्मुस्तदा परामार्तिं दृष्ट्वा तत् कदनं महत् ॥
नारदजी कहते हैं - युधिष्ठिर! तदनन्तर सम्पूर्ण देवर्षि और सिद्ध महर्षि वह महान् हत्याकाण्ड देखकर बहुत दुःखी हुए ।
ब्रह्माजी की आज्ञा पाकर विश्वकर्मा ने सोचा और एक दिव्य युवती का निर्माण किया। उन्होंने तीनों लोकों के चर-अचर पदार्थों का सारांश उस सुन्दरी में भर दिया। करोड़ों रत्नों को उसके अङ्गों में समाविष्ट कर उन्होंने उसे बनाया। वह युवती इतनी सुन्दर थी कि उसके शरीर में कहीं तिल भर भी ऐसी जगह नहीं थी जहाँ दर्शकों की दृष्टि न ठहर सके। उत्तम रत्नों के अंश से निर्मित होने के कारण ब्रह्माजी ने उसका नाम 'तिलोत्तमा' रखा।
तिलोत्तमा ने ब्रह्माजी को नमस्कार कर हाथ जोड़कर पूछा— 'प्रजापते! मुझ पर किस कार्य का भार रखा गया है, जिसके लिए आज मेरे शरीर का निर्माण हुआ है?' ब्रह्माजी ने कहा— 'भद्रे तिलोत्तमे! तू सुन्द और उपसुन्द के पास जा और अपने कमनीय रूप से उन्हें लुभा। तुझे देखते ही उन दोनों दैत्यों में परस्पर विरोध हो जाए, ऐसा प्रयत्न कर।' तिलोत्तमा ने प्रतिज्ञा की और ब्रह्माजी के चरणों में प्रणाम कर देवमण्डली की परिक्रमा करने लगी। उस समय ब्रह्माजी के दक्षिण भाग में भगवान महेश्वर पूर्वाभिमुख होकर बैठे थे, उत्तर भाग में देवता थे और ऋषि-मुनि चारों ओर विराजमान थे।
त्वत्कृते दर्शनादेव रूपसम्पतत्कृतेन वै ।
विरोधः स्याद् यथा ताभ्यामन्योन्येन तथा कुरु ॥
तुझे देखते ही तेरे लिये - तेरी रूपसम्पत्तिके लिये उन दोनों दैत्योंमें परस्पर विरोध हो जाय, ऐसा प्रयत्न कर ।
तिलोत्तमा जब देवमण्डली की प्रदक्षिणा करने लगी, तब इन्द्र और भगवान् शङ्कर अपने स्थानों पर धैर्यपूर्वक बैठे रहे। जैसे ही वह दक्षिण पार्श्व की ओर बढ़ी, भगवान् शङ्कर के दक्षिण भाग में कमलसदृश नेत्रों वाला एक नया मुख प्रकट हो गया। जब वह पश्चिम की ओर मुड़ी, तो उनका पश्चिम मुख प्रकट हुआ और उत्तर पार्श्व की ओर जाने पर शिव का उत्तरवर्ती मुख दृष्टिगोचर होने लगा। इसी प्रकार इन्द्र के भी सहस्रों विशाल और लाल कोनों वाले नेत्र प्रकट हो गए। इस प्रकार महादेव के चार मुख और इन्द्र के हजार नेत्र प्रकट हुए। दूसरे-दूसरे देवताओं और महर्षियों के मुख भी तिलोत्तमा की गति के साथ घूमते रहे। उसकी अनुपम रूपसम्पत्ति देखकर देवताओं को विश्वास हो गया कि अब सारा कार्य सिद्ध ही है।
एवं चतुर्मुखः स्थाणुर्महादेवोऽभवत् पुरा ।
तथा सहस्रनेत्रश्च बभूव बलसूदनः ॥
इस प्रकार पूर्वकालमें अविनाशी भगवान् महादेवजीके चार मुख प्रकट हुए और बलहन्ता इन्द्रके हजार नेत्र हुए ।
तिलोत्तमा के प्रस्थान के पश्चात, लोकस्रष्टा ब्रह्माजी ने उन सम्पूर्ण देवताओं और महर्षियों को विदा किया। दूसरी ओर, सुन्द और उपसुन्द ने सारी पृथ्वी जीतकर और शत्रुओं से रहित होकर तीनों लोकों को अपने वश में कर लिया था। उन्होंने देवताओं, गन्धर्वों, यक्षों, नागों और मनुष्यों के समस्त रत्नों को छीन लिया था। वे दोनों दैत्य अब देवताओं की भान्ति अकर्मण्य होकर भोग-विलास में लीन थे। वे सुन्दरी स्त्रियों, मनोहर मालाओं, सुगन्धित द्रव्यों और स्वादिष्ट भोजन के बीच आनन्द से दिन बिताने लगे।
तिलोत्तमायां तस्यां तु गतायां लोकभावनः ।
सर्वान् विसर्जयामास देवानृषिगणांश्च तान् ॥
तिलोत्तमाके चले जानेपर लोकस्रष्टा ब्रह्माजीने उन सम्पूर्ण देवताओं और महर्षियोंको विदा किया ।
एक दिन, वे दोनों भाई विन्ध्यपर्वत के शिखर पर, जहाँ शिलामयी भूमि समतल थी और शाल वृक्ष फूलों से लदे थे, वहाँ विहार करने पहुँचे। वहाँ उनके लिए दिव्य भोग प्रस्तुत किए गए और वे सुन्दरी स्त्रियों के बीच श्रेष्ठ आसनों पर बैठ गए। तभी तिलोत्तमा वहाँ वन में फूल चुनती हुई आयी। उसके शरीर पर एक ही लाल रङ्ग की महीन साड़ी थी और उसका वेश किसी भी पुरुष को उन्मत्त करने वाला था। नदी किनारे कनेर के फूलों का सङ्ग्रह करती वह धीरे-धीरे उन दोनों दैत्यों की ओर बढ़ने लगी।
सुन्द और उपसुन्द ने मादक रस पी रखा था, जिससे उनके नेत्र लाल थे। तिलोत्तमा को देखते ही वे कामवेदना से व्यथित होकर अपने आसन छोड़ खड़े हो गए। सुन्द ने उसका दाहिना हाथ पकड़ा और उपसुन्द ने बायाँ। दोनों ही धन, रत्न और सुरा के मद के साथ-साथ उस सुन्दरी के सौन्दर्य से भी उन्मत्त थे। तिलोत्तमा अपने कटाक्षों से दोनों को अपनी ओर खींच रही थी। इस पर सुन्द चिल्लाया— 'अरे! यह मेरी पत्नी है, तुम्हारे लिये माता के समान है।' उपसुन्द ने तुरन्त उत्तर दिया— 'नहीं-नहीं, यह मेरी भार्या है, तुम्हारे लिये तो पुत्रवधू के समान है!'
मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभाषत ।
मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभाषत ॥
सुन्दने कहा – ' अरे! यह मेरी पत्नी है, तुम्हारे लिये माताके समान है । ' यह सुनकर उपसुन्द बोल उठा — ‘ नहीं -नहीं, यह मेरी भार्या है, तुम्हारे लिये तो पुत्रवधूके समान है '
'यह तुम्हारी नहीं, मेरी है!'—यह कहते-कहते दोनों में भयङ्कर क्रोध भर गया। स्नेह और सौहार्द समाप्त हो गया। उस सुन्दरी को पाने के लिए दोनों भाइयों ने हाथ में भयङ्कर गदाएँ ले लीं। 'पहले मैं इसे प्राप्त करूँगा!', 'नहीं, पहले मैं!'—ये शब्द गूँजने लगे और वे एक-दूसरे पर प्रहार करने लगे। अन्ततः गदाओं की चोट खाकर वे दोनों भयानक दैत्य लहूलुहान होकर धरती पर गिर पड़े। उनके मारे जाने के बाद वहाँ की स्त्रियाँ भाग गईं और वह सारा समुदाय भयभीत होकर पाताल में चला गया।
ततपश्चात्, विशुद्ध अन्तःकरण वाले ब्रह्माजी देवताओं और महर्षियों के साथ वहाँ आए। प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने तिलोत्तमा से कहा— 'भामिनि! जहाँ तक सूर्य की गति है, उन सभी लोकों में तू इच्छानुसार विचर सकेगी।' इस वरदान के बाद उन्होंने त्रिलोकी की रक्षा का भार इन्द्र को सौंपा और ब्रह्मलोक चले गए।
वरं दित्सुः स तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः ।
आदित्यचरिताँल्लोकान् विचरिष्यसि भाविनि ॥
तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्चन ।
एवं तस्यै वरं दत्त्वा सर्वलोकपितामहः ॥
इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः । वर देनेके लिये उत्सुक हुए ब्रह्माजी स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक बोले- ' भामिनि! जहाँतक सूर्यकी गति है, उन सभी लोकोंमें तू इच्छानुसार विचर सकेगी । तुझमें इतना तेज होगा कि कोई आँख भरकर तुझे अच्छी तरह देख भी न सकेगा । ' इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजी तिलोत्तमाको वरदान देकर तथा त्रिलोकीकी रक्षाका भार इन्द्रको सौंपकर पुनः ब्रह्मलोकको चले गये ।
नारद जी युधिष्ठिर से कहते हैं— "सुन्द और उपसुन्द ने परस्पर सङ्गठित रहने के बावजूद तिलोत्तमा के लिए एक-दूसरे को मार डाला। इसलिए, यदि तुम मेरा प्रिय चाहते हो, तो ऐसा नियम बना लो जिससे द्रौपदी के लिये तुम सब में फूट न पड़े।" देवर्षि नारद की प्रेरणा से पाण्डवों ने यह नियम बनाया— 'हममें से प्रत्येक के घर में पापरहित द्रौपदी एक-एक वर्ष निवास करेगी। यदि द्रौपदी के साथ एकान्त में बैठा कोई भाई दूसरे को देख ले, तो वह बारह वर्षों तक ब्रह्मचर्यपूर्वक वन में निवास करेगा।' इस नियम के स्वीकार होने पर नारद जी प्रसन्न होकर अपने अभीष्ट स्थान को चले गये।
(एकैकस्य गृहे कृष्णा वसेद् वर्षमकल्मषा ।
) द्रौपद्या नः सहासीनानन्योन्यं योऽभिदर्शयेत् ।
स नो द्वादश वर्षाणि ब्रह्मचारी वने वसेत् ॥
' हममेंसे प्रत्येकके घरमें पापरहित द्रौपदी एक-एक वर्ष निवास करे । द्रौपदीके साथ एकान्तमें बैठे हुए हममेंसे एक भाईको यदि दूसरा देख ले, तो वह बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यपूर्वक वनमें निवास करे '
In English
The Creation of Tilottama and the Fall of Sunda and Upasunda
Two demon brothers, Sunda and Upasunda, conquer the three worlds and terrorize sages and gods. To stop them, Brahma has Vishwakarma create a beautiful woman named Tilottama to distract them. The brothers fight over her and kill each other, allowing the gods to reclaim their realms.
This page answers
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- Why did brahma create tilottama?
- What rule did the pandavas make regarding draupadi?
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