श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1451–1460
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1451–1460
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रक्ष्यतां सौहृदं तस्मादन्योन्यप्रीतिभावकम् ।
यथा वो नात्र भेदः स्यात् तत् कुरुष्व युधिष्ठिर ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर! इसलिये आपसकी प्रीतिको बढ़ानेवाले सौहार्दकी रक्षा करो और ऐसा कोई नियम बनाओ, जिससे यहाँ तुमलोगोंमें वैर - विरोध न हो ॥ २१ ॥
युधिष्ठिर उवाच
सुन्दोपसुन्दावसुरी कस्य पुत्रौ महामुने ।
उत्पन्नश्च कथं भेदः कथं चान्योन्यमघ्नताम् ॥ २२ ॥
युधिष्ठिरने पूछा — महामुने! सुन्द और उपसुन्द नामक असुर किसके पुत्र थे? उनमें कैसे विरोध उत्पन्न हुआ और किस प्रकार उन्होंने एक- दूसरेको मार डाला? ॥ २२ ॥
अप्सरा देवकन्या वा कस्य चैषा तिलोत्तमा ।
यस्याः कामेन सम्मत्तौ जघ्नतुस्तौ परस्परम् ॥ २३ ॥
यह तिलोत्तमा अप्सरा थी? किसी देवताकी कन्या थी? तथा वह किसके अधिकारमें थी, जिसकी कामनासे उन्मत्त होकर उन्होंने एक- दूसरेको मार डाला ॥ २३ ॥
एतत् सर्वं यथावृत्तं विस्तरेण तपोधन ।
श्रोतुमिच्छामहे ब्रह्मन् परं कौतूहलं हि नः ॥ २४ ॥
तपोधन! यह सब वृत्तान्त जिस प्रकार घटित हुआ था, वह सब हम विस्तारपूर्वक सुनना चाहते हैं । ब्रह्मन्! उसे सुननेके लिये हमारे मनमें बड़ी उत्कण्ठा है ॥ २४ ॥
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि युधिष्ठिरनारदसंवादे सप्ताधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें युधिष्ठिर- नारद- संवादविषयक दोसौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २०७ ॥
( दाक्षिणात्य अधिक पाठके २५३ श्लोक मिलाकर कुल ४ ९ ३ श्लोक हैं ) कण्ठ, तालू, मूर्धा, दन्त और ओष्ठ–इन पाँच स्थानों अथवा पाँच आभ्यन्तर प्रयत्नोंके भेदसे पाँच प्रकारके अक्षरसमूह कहे गये हैं । अ इ उ ऋ लृ ये पाँच ही मूल स्वर हैं, अन्य स्वर इन्हींके दीर्घ आदि भेद अथवा संधिज हैं ।
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अष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः सुन्द- उपसुन्दकी तपस्या, ब्रह्माजीके द्वारा उन्हें वर प्राप्त होना और दैत्योंके यहाँ आनन्दोत्सव नारद उवाच
शृणु मे विस्तरेणेममितिहासं पुरातनम् ।
भ्रातृभिः सहितः पार्थ यथावृत्तं युधिष्ठिर ॥ १ ॥
नारदजीने कहा – कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर! यह वृत्तान्त जिस प्रकार संघटित हुआ था, वह प्राचीन इतिहास तुम मुझसे भाइयोंसहित विस्तारपूर्वक सुनो ॥ १ ॥
महासुरस्यान्ववाये हिरण्यकशिपोः पुरा ।
निकुम्भो नाम दैत्येन्द्रस्तेजस्वी बलवानभूत् ॥ २ ॥
प्राचीनकालमें महान् दैत्य हिरण्यकशिपुके कुलमें निकुम्भ नामसे प्रसिद्ध एक दैत्यराज हो गया है, जो अत्यन्त तेजस्वी और बलवान् था ॥ २ ॥
तस्य पुत्रौ महावीर्यौ जातौ भीमपराक्रमौ ।
सुन्दोपसुन्दौ दैत्येन्द्रौ दारुणौ क्रूरमानसौ ॥ ३ ॥
उसके महाबली और भयानक पराक्रमी दो पुत्र हुए, जिनका नाम था सुन्द और उपसुन्द । वे दोनों दैत्यराज बड़े भयंकर और क्रूर हृदयके थे ॥ ३ ॥
तावेकनिश्चयो दैत्यावेककार्यार्थसम्मतौ ।
निरन्तरमवर्तेतां समदुःखसुखावुभौ ॥ ४ ॥
उनका एक ही निश्चय होता था और एक ही कार्यके लिये वे सदा सहमत रहते थे ।
उनके सुख और दुःख भी एक ही प्रकारके थे । वे दोनों सदा साथ रहते थे ॥ ४ ॥
विनान्योन्यं न भुञ्जाते विनान्योन्यं न जल्पतः ।
अन्योन्यस्य प्रियकरावन्योन्यस्य प्रियंवदौ ॥ ५ ॥
उनमेंसे एकके बिना दूसरा न तो खाता - पीता और न किसीसे कुछ बात - चीत ही करता था । वे दोनों एक- दूसरेका प्रिय करते और परस्पर मीठे वचन बोलते थे ॥ ५ ॥
एकशीलसमाचारौ द्विधैवैकोऽभवत् कृतः ।
तौ विवृद्धौ महावीर्यौ कार्येष्वप्येकनिश्चयौ ॥ ६ ॥
उनके शील और आचरण एक-से थे, मानो एक ही जीवात्मा दो शरीरोंमें विभक्त कर दिया गया हो । वे महापराक्रमी दैत्य साथ-साथ बढ़ने लगे । वे प्रत्येक कार्यमें एक ही निश्चयपर पहुँचते थे ॥ ६ ॥
त्रैलोक्यविजयार्थाय समाधायैकनिश्चयम् ।
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दीक्षां कृत्वा गतौ विन्ध्यं तावुग्रं तेपतुस्तपः ॥ ७ ॥
किसी समय वे तीनों लोकोंपर विजय पानेकी इच्छासे एकमत होकर गुरुसे दीक्षा ले विन्ध्य पर्वतपर आये और वहाँ कठोर तपस्या करने लगे ॥ ७ ॥
तौ तु दीर्घेण कालेन तपोयुक्तौ बभूवतुः ।
क्षुत्पिपासापरिश्रान्तौ जटावल्कलधारिणौ ॥ ८ ॥
भूख और प्यासका कष्ट सहते हुए सिरपर जटा तथा शरीरपर वल्कल धारण किये वे दोनों भाई दीर्घकालतक भारी तपस्यामें लगे रहे ॥ ८ ॥
मलोपचितसर्वाङ्गौ वायुभक्षौ बभूवतुः ।
आत्ममांसानि जुह्वन्तौ पादाङ्गुष्ठाग्रविष्ठितौ ।
ऊर्ध्वबाहू चानिमिषौ दीर्घकालं धृतव्रतौ ॥ ९ ॥
उनके सम्पूर्ण अंगोंमें मैल जम गयी थी, वे हवा पीकर रहते थे और अपने ही शरीरके मांसखण्ड काट - काटकर अग्निमें आहुति देते थे । तदनन्तर बहुत समयतक पैरोंके अंगूठोंके अग्रभागके बलपर खड़े हो दोनों भुजाएँ ऊपर उठाये एकटक दृष्टिसे देखते हुए वे दोनों व्रत धारण करके तपस्यामें संलग्न रहे ॥ ९ ॥
तयोस्तपः प्रभावेण दीर्घकालं प्रतापितः ।
धूमं प्रमुमुचे विन्ध्यस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ १० ॥
उन दैत्योंकी तपस्याके प्रभावसे दीर्घकालतक संतप्त होनेके कारण विन्ध्य पर्वत धुआँ छोड़ने लगा, यह एक अद्भुत - सी बात हुई ॥ १० ॥
ततो देवा भयं जग्मुरुग्रं दृष्ट्वा तयोस्तपः ।
तपोविघातार्थमथो देवा विघ्नानि चक्रिरे ॥ ११ ॥
उनकी उग्र तपस्या देखकर देवताओंको बड़ा भय हुआ । वे देवतागण उनके तपको भंग करनेके लिये अनेक प्रकारके विघ्न डालने लगे ॥ ११ ॥
रत्नैः प्रलोभयामासुः स्त्रीभिश्चोभौ पुनः पुनः ।
न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥ १२ ॥
उन्होंने बार-बार रत्नोंके ढेर तथा सुन्दरी स्त्रियोंको भेज भेजकर उन दोनोंको प्रलोभनमें डालनेकी चेष्टा की; किंतु उन महान् व्रतधारी दैत्योंने अपने तपको भंग नहीं किया ॥ १२ ॥
अथ मायां पुनर्देवास्तयोश्चक्रुर्महात्मनोः ।
भगिन्यो मातरो भार्यास्तयोश्चात्मजनस्तथा ॥ १३ ॥
प्रपात्यमाना विस्रस्ताः शूलहस्तेन रक्षसा ।
भ्रष्टाभरणकेशान्ता भ्रष्टाभरणवाससः ॥ १४ ॥
अभिभाष्य ततः सर्वास्तौ त्राहीति विचुक्रुशुः ।
न च तौ चक्रतुर्भङ्गं व्रतस्य सुमहाव्रतौ ॥ १५ ॥
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तत्पश्चात् देवताओंने महान् आत्मबलसे सम्पन्न उन दोनों दैत्योंके सामने पुनः मायाका प्रयोग किया । उनकी मायानिर्मित बहनें, माताएँ, पत्नियाँ तथा अन्य आत्मीयजन वहाँ भागते हु आते और उन्हें कोई शूलधारी राक्षस बार- बार खदेड़ता तथा पृथ्वीपर पटक देता था । उनके आभूषण गिर जाते, वस्त्र खिसक जाते और बालोंकी लटें खुल जाती थीं । वे सभी आत्मीयजन सुन्द-उपसुन्दको पुकारकर चीखते हुए कहते — ' बेटा! मुझे बचाओ, भैया! मेरी रक्षा करो । ' यह सब सुनकर भी वे दोनों महान् व्रतधारी तपस्वी अपनी तपस्यासे नहीं डिगे; अपने व्रतको नहीं तोड़ सके ॥ १३–१५ ॥
यदा क्षोभं नोपयाति नार्तिमन्यतरस्तयोः ।
ततः स्त्रियस्ता भूतं च सर्वमन्तरधीयत ॥ १६ ॥
जब उन दोनोंमेंसे एक भी न तो इन घटनाओंसे क्षुब्ध हुआ और न किसीके मनमें कष्टका ही अनुभव हुआ, तब वे मायामयी स्त्रियाँ और वह राक्षस सब- के - सब अदृश्य हो गये ॥ १६ ॥
ततः पितामहः साक्षादभिगम्य महासुरौ ।
वरेणच्छन्दयामास सर्वलोकहितः प्रभुः ॥ १७ ॥
तब सम्पूर्ण लोकोंके हितैषी पितामह साक्षात् भगवान् ब्रह्माने उन दोनों महादैत्योंके निकट आकर उन्हें इच्छानुसार वर माँगनेको कहा ॥ १७ ॥
ततः सुन्दोपसुन्दौ तौ भ्रातरौ दृढविक्रमौ ।
दृष्ट्वा पितामहं देवं तस्थतुः प्राञ्जली तदा ॥ १८ ॥
ऊचतुश्च प्रभुं देवं ततस्तौ सहितौ तदा ।
आवयोस्तपसानेन यदि प्रीतः पितामहः ॥ १ ९ ॥
मायाविदावस्त्रविदौ बलिनौ कामरूपिणौ ।
उभावप्यमरौ स्यावः प्रसन्नो यदि नौ प्रभुः ॥ २० ॥
तदनन्तर सुदृढ़ पराक्रमी दोनों भाई सुन्द और उपसुन्द भगवान् ब्रह्माको उपस्थित देख हाथ जोड़कर खड़े हो गये और एक साथ भगवान् ब्रह्मासे बोले — ' भगवन्! यदि आप हमारी तपस्यासे प्रसन्न हैं तो हम दोनों सम्पूर्ण मायाओंके ज्ञाता, अस्त्र- शस्त्रोंके विद्वान्, बलवान्, इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले और अमर हो जायँ' ॥ १८–२० ॥ ब्रह्मोवाच
ऋतेऽमरत्वं युवयोः सर्वमुक्तं भविष्यति ।
अन्यद् वृणीतं मृत्योश्च विधानममरैः समम् ॥ २१ ॥
ब्रह्माजीने कहा — अमरत्वके सिवा तुम्हारी माँगी हुई सब वस्तुएँ तुम्हें प्राप्त होंगी । तुम मृत्युका कोई दूसरा ऐसा विधान माँग लो, जो तुम्हें देवताओंके समान बनाये रख सके ॥ २१ ॥
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प्रभविष्याव इति यन्महदभ्युद्यतं तपः ।
युवयोर्हेतुनानेन नामरत्वं विधीयते ॥ २२ ॥
हम तीनों लोकोंके ईश्वर होंगे, ऐसा संकल्प करके जो तुमलोगोंने यह बड़ी भारी तपस्या प्रारम्भ की थी, इसीलिये तुमलोगोंको अमर नहीं बनाया जाता; क्योंकि अमरत्व तुम्हारी तपस्याका उद्देश्य नहीं था ॥ २२ ॥
त्रैलोक्यविजयार्थाय भवद्भ्यामास्थितं तपः ।
हेतुनानेन दैत्येन्द्रौ न वा कामं करोम्यहम् ॥ २३ ॥
दैत्यपतियो! तुम दोनोंने त्रिलोकीपर विजय पानेके लिये ही इस तपस्याका आश्रय लिया था, इसीलिये तुम्हारी अमरत्वविषयक कामनाकी पूर्ति मैं नहीं कर रहा हूँ ॥ २३ ॥
सुन्दोपसुन्दावूचतुः
त्रिषु लोकेषु यद् भूतं किंचित् स्थावरजङ्गमम् ।
सर्वस्मान्नो भयं न स्यादृतेऽन्योन्यं पितामह ॥ २४ ॥
सुन्द और उपसुन्द बोले - पितामह! तब यह वर दीजिये कि हम दोनोंमेंसे एक-दूसरेको छोड़कर तीनों लोकोंमें जो कोई भी चर या अचर भूत हैं, उनसे हमें मृत्युका भय न हो ॥ २४ ॥
पितामह उवाच यत् प्रार्थितं यथोक्तं च काममेतद् ददानि वाम् ।
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मृत्योर्विधानमेतच्च यथावद् वा भविष्यति ॥ २५ ॥
ब्रह्माजीने कहा — तुमने जैसी प्रार्थना की है, तुम्हारी वह मुँहमाँगी वस्तु तुम्हें अवश्य दूँगा । तुम्हारी मृत्युका विधान ठीक इसी प्रकार होगा ॥ २५ ॥
नारद उवाच
ततः पितामहो दत्त्वा वरमेतत् तदा तयोः ।
निवर्त्त्य तपसस्तौ च ब्रह्मलोकं जगाम ह ॥ २६ ॥
नारदजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उस समय उन दोनों दैत्योंको यह वरदान देकर और उन्हें तपस्यासे निवृत्त करके ब्रह्माजी ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २६ ॥
लब्ध्वा वराणि दैत्येन्द्रावथ तौ भ्रातरावुभौ ।
अवध्यौ सर्वलोकस्य स्वमेव भवनं गतौ ॥ २७ ॥
फिर वे दोनों भाई दैत्यराज सुन्द और उपसुन्द यह अभीष्ट वर पाकर सम्पूर्ण लोकोंके लिये अवध्य हो पुनः अपने घरको ही लौट गये ॥ २७ ॥
तौ तु लब्धवरौ दृष्ट्वा कृतकामौ मनस्विनौ ।
सर्वः सुहृज्जनस्ताभ्यां प्रहर्षमुपजग्मिवान् ॥ २८ ॥
वरदान पाकर पूर्णकाम होकर लौटे हुए उनदोनों मनस्वी वीरोंको देखकर उनके सभी सगे - सम्बन्धी बड़े प्रसन्न हुए ॥ २८ ॥
ततस्तौ तु जटा भित्त्वा मौलिनौ सम्बभूवतुः ।
महार्हाभरणोपेतौ विरजोऽम्बरधारिणौ ॥ २ ९ ॥
अकालकौमुदीं चैव चक्रतुः सार्वकालिकीम् ।
नित्यप्रमुदितः सर्वस्तयोश्चैव सुहृज्जनः ॥ ३० ॥
तदनन्तर उन्होंने जटाएँ कटाकर मस्तकपर मुकुट धारण कर लिये और बहुमूल्य आभूषण तथा निर्मल वस्त्र धारण करके ऐसा प्रकाश फैलाया, मानो असमयमें ही चाँदनी छिटक गयी हो और सर्वदा दिन - रात एकरस रहने लगी हो । उनके सभी सगे - सम्बन्धी सदा आमोद-प्रमोदमें डूबे रहते थे ॥ २ ९ -३० ॥
भक्ष्यतां भुज्यतां नित्यं दीयतां रम्यतामिति ।
गीयतां पीयतां चेति शब्दश्चासीद् गृहे गृहे ॥ ३१ ॥
प्रत्येक घरमें सर्वदा ‘ खाओ, भोग करो, लुटाओ, मौज करो, गाओ और पीओ’का शब्द गूँजता रहता था ॥ ३१ ॥
तत्र तत्र महानादैरुत्कृष्टतलनादितैः ।
हृष्टं प्रमुदितं सर्वं दैत्यानामभवत् पुरम् ॥ ३२ ॥
जहाँ- तहाँ जोर- जोरसे तालियाँ पीटनेकी ऊँची आवाजसे दैत्योंका वह सारा नगर हर्ष और आनन्दमें मग्न जान पड़ता था ॥ ३२ ॥
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तैस्तैर्विहारैर्बहुभिर्दैत्यानां कामरूपिणाम् ।
समाः संक्रीडतां तेषामहरेकमिवाभवत् ॥ ३३ ॥
इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले वे दैत्य वर्षोंतक भाँति- भाँतिके खेल- कूद और आमोद- प्रमोद करनेमें लगे रहे; किंतु वह सारा समय उन्हें एक दिनके समान लगा ॥ ३३ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्यानेऽष्टाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २०८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यलम्भपर्वमें सुन्दोपसुन्दोपाख्यानविषयक दो सौ आठवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २०८ ॥
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नवाधिकद्विशततमोऽध्यायः सुन्द और उपसुन्दद्वारा क्रूरतापूर्ण कर्मोंसे त्रिलोकीपर विजय प्राप्त करना नारद उवाच
उत्सवे वृत्तमात्रे तु त्रैलोक्याकाङ्क्षिणावुभौ ।
मन्त्रयित्वा ततः सेनां तावाज्ञापयतां तदा ॥ १ ॥
नारदजी कहते हैं - युधिष्ठिर! उत्सव समाप्त हो जानेपर तीनों लोकोंको अपने अधिकारमें करनेकी इच्छासे आपसमें सलाह करके उन दोनों दैत्योंने सेनाको कूच करनेकी आज्ञा दी ॥ १ ॥
सुहृद्भिरप्यनुज्ञातौ दैत्यैर्वृद्धैश्च मन्त्रिभिः ।
कृत्वा प्रास्थानिकं रात्रौ मघासु ययतुस्तदा ॥ २ ॥
सुहृदों तथा दैत्यजातीय बूढ़े मन्त्रियोंकी अनुमति लेकर उन्होंने रातके समय मघा नक्षत्रमें प्रस्थान करके यात्रा प्रारम्भ की ॥ २ ॥
गदापट्टिशधारिण्या शूलमुद्गरहस्तया ।
प्रस्थितौ सह वर्मिण्या महत्या दैत्यसेनया ॥ ३ ॥
मङ्गलैः स्तुतिभिश्चापि विजयप्रतिसंहितैः ।
चारणैः स्तूयमानौ तौ जग्मतुः परया मुदा ॥ ४ ॥
उनके साथ गदा, पट्टिश, शूल, मुद्गर और कवचसे सुसज्जित दैत्योंकी विशाल सेना जा रही थी । वे दोनों सेनाके साथ प्रस्थान कर रहे थे । चारणलोग विजयसूचक मंगल और स्तुतिपाठ करते हुए उन दोनोंके गुण गाते जाते थे । इस प्रकार उन दोनों दैत्योंने बड़े आनन्दसे यात्रा की ॥ ३-४ ॥
तावन्तरिक्षमुत्प्लुत्य दैत्यौ कामगमावुभौ ।
देवानामेव भवनं जग्मतुर्युद्धदुर्मदौ ॥ ५ ॥
युद्धके लिये उन्मत्त रहनेवाले वे दोनों दैत्य इच्छानुसार सर्वत्र जानेकी शक्ति रखते थे; अतः आकाशमें उछलकर पहले देवताओंके ही घरोंपर जा चढ़े ॥ ५ ॥
तयोरागमनं ज्ञात्वा वरदानं च तत् प्रभोः ।
हित्वा त्रिविष्टपं जग्मुर्ब्रह्मलोकं ततः सुराः ॥ ६ ॥
उनका आगमन सुनकर और ब्रह्माजीसे मिले हुए उनके वरदानका विचार करके देवतालोग स्वर्ग छोड़कर ब्रह्मलोकमें चले गये ॥ ६ ॥
ताविन्द्रलोकं निर्जित्य यक्षरक्षोगणांस्तदा ।
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खेचराण्यपि भूतानि जघ्नतुस्तीव्रविक्रमौ ॥ ७ ॥
इस प्रकार इन्द्रलोकपर विजय पाकर वे तीव्रपराक्रमी दैत्य यक्षों, राक्षसों तथा अन्यान्य आकाशचारी भूतोंको मारने और पीड़ा देने लगे ॥ ७ ॥
अन्तर्भूमिगतान् नागाञ्जित्वा तौ च महारथौ ।
समुद्रवासिनीः सर्वा म्लेच्छजातीर्विजिग्यतुः ॥ ८ ॥
उन दोनों महारथियोंने भूमिके अंदर पातालमें रहनेवाले नागोंको जीतकर समुद्रके तटपर निवास करनेवाली सम्पूर्ण म्लेच्छ जातियोंको परास्त किया ॥ ८ ॥
ततः सर्वां महीं जेतुमारब्धावुग्रशासनौ ।
सैनिकांश्च समाहूय सुतीक्ष्णं वाक्यमूचतुः ॥ ९ ॥
तदनन्तर भयंकर शासन करनेवाले वे दोनों दैत्य सारी पृथ्वीको जीतनेके लिये उद्यत हो गये और अपने सैनिकोंको बुलाकर अत्यन्त तीखे वचन बोले- ॥ ९ ॥
राजर्षयो महायज्ञैर्हव्यकव्यैर्द्विजातयः ।
तेजो बलं च देवानां वर्धयन्ति श्रियं तथा ॥ १० ॥
' इस पृथ्वीपर बहुतसे राजर्षि और ब्राह्मण रहते हैं, जो बड़े -बड़े यज्ञ करके हव्य-कव्योंद्वारा देवताओंके तेज, बल और लक्ष्मीकी वृद्धि किया करते हैं ' ॥ १० ॥
तेषामेवंप्रवृत्तानां सर्वेषामसुरद्विषाम् ।
सम्भूय सर्वैरस्माभिः कार्यः सर्वात्मना वधः ॥ ११ ॥
‘ इस प्रकार यज्ञादि कर्मोंमें लगे हुए वे सभी लोग असुरोंके द्रोही हैं । इसलिये हम सबको संगठित होकर उन सबका सब प्रकारसे वध कर डालना चाहिये ' ॥ ११ ॥
एवं सर्वान् समादिश्य पूर्वतीरे महोदधेः ।
क्रूरां मतिं समास्थाय जग्मतुः सर्वतोमुखौ ॥ १२ ॥
समुद्रके पूर्वतटपर अपने समस्त सैनिकोंको ऐसा आदेश देकर मनमें क्रूर संकल्प लिये वे दोनों भाई सब ओर आक्रमण करने लगे ॥ १२ ॥
यज्ञैर्यजन्ति ये केचिद् याजयन्ति च ये द्विजाः ।
तान् सर्वान् प्रसभं हत्वा बलिनौ जग्मतुस्ततः ॥ १३ ॥
जो लोग यज्ञ करते तथा जो ब्राह्मण आचार्य बनकर यज्ञ कराते थे, उन सबका बलपूर्वक वध करके वे महाबली दैत्य आगे बढ़ जाते थे ॥ १३ ॥
आश्रमेष्वग्निहोत्राणि मुनीनां भावितात्मनाम् ।
गृहीत्वा प्रक्षिपन्त्यप्सु विश्रब्धं सैनिकास्तयोः ॥ १४ ॥
उनके सैनिक शुद्धात्मा मुनियोंके आश्रमोंपर जाकर उनके अग्निहोत्रकी सामग्री उठाकर बिना किसी डर- भयके पानीमें फेंक देते थे ॥ १४ ॥
तपोधनैश्च ये क्रुद्धैः शापा उक्ता महात्मभिः ।
नाक्रामन्त तयोस्तेऽपि वरदाननिराकृताः ॥ १५ ॥