श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1471–1480
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1471–1480
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सुन्दने सुन्दर भौंहोंवाली तिलोत्तमाका दाहिना हाथ पकड़ा और उपसुन्दने उसका बायाँ हाथ पकड़ लिया ॥ १३ ॥
वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन बलेन च ।
धनरत्नमदाभ्यां च सुरापानमदेन च ॥ १४ ॥
एक तो वे दुर्लभ वरदानके मदसे उन्मत्त थे, दूसरे उनपर अपने स्वाभाविक बलका नशा सवार था । इसके सिवा धनमद, रत्नमद और सुरापानके मदसे भी वे उन्मत्त हो रहे थे ॥ १४ ॥
सर्वैरेतैर्मदैर्मत्तावन्योन्यं भ्रुकुटीकृतौ ।
(तौ कटाक्षेण दैत्येन्द्रावाकर्षति मुहुर्मुहुः ।
दक्षिणेन कटाक्षेण सुन्दं जग्राह कामिनी ॥
वामेनैव कटाक्षेण उपसुन्दं जिघृक्षती । गन्धाभरणरूपैस्तौ व्यामोहं जग्मतुस्तदा ॥ ) मदकामसमाविष्टौ परस्परमथोचतुः ॥ १५ ॥
इन सभी मदोंसे उन्मत्त होनेके कारण आपसमें ही एक- दूसरेपर उनकी भौंहें तन गयीं । तिलोत्तमा कटाक्षद्वारा उन दोनों दैत्यराजोंको बार- बार अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी । उस कामिनीने अपने दाहिने कटाक्षसे सुन्दको आकृष्ट कर लिया और बायें कटाक्षसे वह उपसुन्दको वशमें करनेकी चेष्टा करने लगी । उसकी दिव्य सुगन्ध, आभूषणराशि तथा रूपसम्पत्तिसे वे दोनों दैत्य तत्काल मोहित हो गये । उनमें मद और कामका आवेश हो गया; अतः वे एक- दूसरेसे इस प्रकार बोले- ॥ १५ ॥
मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभाषत ।
मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभाषत ॥ १६ ॥
सुन्दने कहा – ' अरे! यह मेरी पत्नी है, तुम्हारे लिये माताके समान है । ' यह सुनकर उपसुन्द बोल उठा — ‘ नहीं -नहीं, यह मेरी भार्या है, तुम्हारे लिये तो पुत्रवधूके समान है ' ॥ १६ ॥
नैषा तव ममैषेति ततस्तौ मन्युराविशत् ।
तस्या रूपेण सम्मत्तौ विगतस्नेहसौहृदौ ॥ १७ ॥
' यह तुम्हारी नहीं है, मेरी है ', यही कहते -कहते उन दोनोंको क्रोध चढ़ आया ।
तिलोत्तमाके रूपसे मतवाले होकर वे दोनों स्नेह और सौहार्दसे शून्य हो गये ॥ १७ ॥
तस्या हेतोर्गदे भीमे संगृह्णीतावुभौ तदा ।
प्रगृह्य च गदे भीमे तस्यां तौ काममोहितौ ॥ १८ ॥
उस सुन्दरीको पानेके लिये दोनों भाइयोंने उस समय हाथमें भयंकर गदाएँ ले लीं । दोनों ही उसके प्रति कामसे मोहित हो रहे थे ॥ १८ ॥
अहं पूर्वमहं पूर्वमित्यन्योन्यं निजघ्नतुः ।
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तौ गदाभिहतौ भीमौ पेततुर्धरणीतले ॥ १ ९ ॥ ‘ पहले मैं इसे प्राप्त करूँगा', ' नहीं, पहले मैं '; ऐसा कहते हुए दोनों एक- दूसरेको मारने लगे । इस प्रकार गदाओंकी चोट खाकर वे दोनों भयानक दैत्य धरतीपर गिर पड़े ॥ १ ९ ॥
रुधिरेणावसिक्ताङ्गी द्वाविवार्कौ नभश्युतौ ।
ततस्ता विद्रुता नार्यः स च दैत्यगणस्तथा ॥ २० ॥
पातालमगमत् सर्वो विषादभयकम्पितः ।
ततः पितामहस्तत्र सह देवैर्महर्षिभिः ॥ २१ ॥
आजगाम विशुद्धात्मा पूजयंश्च तिलोत्तमाम् ।
वरेणच्छन्दयामास भगवान् प्रपितामहः ॥ २२ ॥
उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे । ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशसे दो सूर्य पृथ्वीपर गिर गये हों । उनके मारे जानेपर वे सब स्त्रियाँ वहाँसे भाग गयीं और दैत्योंका वह सारा समुदाय विषाद और भयसे कम्पित होकर पातालमें चला गया । तत्पश्चात् विशुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् ब्रह्माजी देवताओं और महर्षियोंके साथ तिलोत्तमाकी प्रशंसा करते हुए वहाँ आये और भगवान् पितामहने उसे वरके द्वारा प्रसन्न किया ॥ २०–२२ ॥
वरं दित्सुः स तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः ।
आदित्यचरिताँल्लोकान् विचरिष्यसि भाविनि ॥ २३ ॥
तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्चन ।
एवं तस्यै वरं दत्त्वा सर्वलोकपितामहः ॥ २४ ॥
इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः । वर देनेके लिये उत्सुक हुए ब्रह्माजी स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक बोले- ' भामिनि! जहाँतक सूर्यकी गति है, उन सभी लोकोंमें तू इच्छानुसार विचर सकेगी । तुझमें इतना तेज होगा कि कोई आँख भरकर तुझे अच्छी तरह देख भी न सकेगा । ' इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजी तिलोत्तमाको वरदान देकर तथा त्रिलोकीकी रक्षाका भार इन्द्रको सौंपकर पुनः ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २३-२४ ॥ नारद उवाच एवं तौ सहितौ भूत्वा सर्वार्थेष्वेकनिश्चयौ ॥ २५ ॥
तिलोत्तमार्थं संक्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः ।
तस्माद् ब्रवीमि वः स्नेहात् सर्वान् भरतसत्तमाः ॥ २६ ॥
यथा वो नात्र भेदः स्यात् सर्वेषां द्रौपदीकृते ।
तथा कुरुत भद्रं वो मम चेत् प्रियमिच्छथ ॥ २७ ॥
नारदजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार सुन्द और उपसुन्दने परस्पर संगठित और सभी बातोंमें एकमत रहकर भी तिलोत्तमाके लिये कुपित हो एक- दूसरेको मार डाला । अतः
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भरतवंशशिरोमणियो! मैं तुम सब लोगोंसे स्नेहवश कहता हूँ कि यदि मेरा प्रिय चाहते हो,
तो ऐसा कुछ नियम बना लो, जिससे द्रौपदीके लिये तुम सब लोगोंमें फूट न होने पावे ।
तुम्हारा कल्याण हो ॥ २५–२७ ॥
वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता महात्मानो नारदेन महर्षिणा ।
समयं चक्रिरे राजंस्तेऽन्योन्यवशमागताः ।
समक्षं तस्य देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवर्षि नारदके ऐसा कहनेपर एक- दूसरेके अधीन रहनेवाले उन अमिततेजस्वी महात्मा पाण्डवोंने देवर्षिके सामने ही यह नियम बनाया— ॥ २८ ॥
(एकैकस्य गृहे कृष्णा वसेद् वर्षमकल्मषा । )
द्रौपद्या नः सहासीनानन्योन्यं योऽभिदर्शयेत् ।
स नो द्वादश वर्षाणि ब्रह्मचारी वने वसेत् ॥ २ ९ ॥
' हममेंसे प्रत्येकके घरमें पापरहित द्रौपदी एक-एक वर्ष निवास करे । द्रौपदीके साथ एकान्तमें बैठे हुए हममेंसे एक भाईको यदि दूसरा देख ले, तो वह बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यपूर्वक वनमें निवास करे ' ॥ २ ९ ॥
कृते तु समये तस्मिन् पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ।
नारदोऽप्यगमत् प्रीत इष्टं देशं महामुनिः ॥ ३० ॥
धर्मका आचरण करनेवाले पाण्डवोंद्वारा यह नियम स्वीकार कर लिये जानेपर महामुनि नारदजी प्रसन्न हो अभीष्ट स्थानको चले गये ॥ ३० ॥
एवं तैः समयः पूर्वं कृतो नारदचोदितैः ।
न चाभिद्यन्त ते सर्वे तदान्योन्येन भारत ॥ ३१ ॥
भारत! इस प्रकार नारदजीकी प्रेरणासे पाण्डवोंने पहले ही नियम बना लिया था ।
इसीलिये वे सब आपसमें कभी एक - दूसरेके विरोधी नहीं हुए ॥ ३१ ॥
(एतद् विस्तरशः सर्वमाख्यातं ते नरेश्वर । काले च तस्मिन् सम्पन्नं यथावज्जनमेजय ॥ ) नरेश्वर जनमेजय! उस समय जो बातें जिस प्रकार घटित हुई थीं, वे सब मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बतायी हैं । इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्याने एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २११ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यम्भपर्वमें सुन्दोपसुन्दोपाख्यानविषयक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २११ ॥
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( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल ३४३ श्लोक हैं )
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(अर्जुनवनवासपर्व ) द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान वैशम्पायन उवाच
एवं ते समयं कृत्वा न्यवसंस्तत्र पाण्डवाः ।
वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान् महीक्षितः ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार नियम बनाकर पाण्डवलोग वहाँ रहने लगे । वे अपने अस्त्र- शस्त्रोंके प्रतापसे दूसरे राजाओंको अधीन करते रहते थे ॥ १ ॥
तेषां मनुजसिंहानां पञ्चानाममितौजसाम् ।
बभूव कृष्णा सर्वेषां पार्थानां वशवर्तिनी ॥ २ ॥
कृष्णा मनुष्यों में सिंहके समान वीर और अमित तेजस्वी उन पाँचों पाण्डवोंकी आज्ञाके अधीन रहती थी ॥ २ ॥
ते तया तैश्च सा वीरैः पतिभिः सह पञ्चभिः ।
बभूव परमप्रीता नागैर्भोगवती यथा ॥ ३ ॥
पाण्डव द्रौपदीके साथ और द्रौपदी उन पाँचों वीर पतियोंके साथ ठीक उसी तरह अत्यन्त प्रसन्न रहती थी जैसे नागोंके रहनेसे भोगवतीपुरी परम शोभायुक्त होती है ॥ ३ ॥
वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु ।
व्यवर्धन् कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः ॥ ४ ॥
महात्मा पाण्डवोंके धर्मानुसार बर्ताव करनेके कारण समस्त कुरुवंशी निर्दोष एवं सुखी रहकर निरन्तर उन्नति करने लगे ॥ ४ ॥
अथ दीर्घेण कालेन ब्राह्मणस्य विशाम्पते ।
कस्यचित् तस्करा जहुः केचिद् गा नृपसत्तम ॥ ५ ॥
महाराज! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् एक दिन कुछ चोरोंने किसी ब्राह्मणकी गौएँ चुरा लीं ॥ ५ ॥
ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणः क्रोधमूर्च्छितः ।
आगम्य खाण्डवप्रस्थमुदक्रोशत् स पाण्डवान् ॥ ६ ॥
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अपने गोधनका अपहरण होता देख ब्राह्मण अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और खाण्डवप्रस्थमें आकर उसने उच्चस्वरसे पाण्डवोंको पुकारा- ॥ ६ ॥
ह्रियते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः ।
प्रसह्य चास्मद्विषयादभ्यधावत पाण्डवाः ॥ ७ ॥
‘ पाण्डवो! हमारे गाँवसे कुछ नीच, क्रूर और पापात्मा चोर जबरदस्ती गोधन चुराकर
लिये जा रहे हैं । उसकी रक्षाके लिये दौड़ो ॥ ७ ॥
ब्राह्मणस्य प्रशान्तस्य हविर्ध्वाक्षैः प्रलुप्यते ।
शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाभिमर्दति ॥ ८ ॥
‘ आज एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणका हविष्य कौए लूटकर खा रहे हैं । नीच सियार सिंहकी सूनी गुफाको रौंद रहा है ॥ ८ ॥
अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् ।
तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रं पापचारिणम् ॥ ९ ॥
'जो राजा प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें वसूल करता है, किंतु प्रजाकी रक्षाकी कोई व्यवस्था नहीं करता, उसे सम्पूर्ण लोकोंमें पूर्ण पापाचारी कहा गया है ॥ ९ ॥
ब्राह्मणस्वे हृते चौरैर्धर्मार्थे च विलोपिते ।
रोरूयमाणे च मयि क्रियतामस्त्रधारणम् ॥ १० ॥
'मुझ ब्राह्मणका धन चोर लिये जा रहे हैं, मेरे गौके न रहनेपर दुग्ध आदि हविष्यके अभावसे धर्म और अर्थका लोप हो रहा है तथा मैं यहाँ आकर रो रहा हूँ । पाण्डवो! (चोरोंको दण्ड देनेके लिये ) अस्त्र धारण करो ' ॥ १० ॥
वैशम्पायन उवाच
रोरूयमाणस्याभ्याशे भृशं विप्रस्य पाण्डवः ।
तानि वाक्यानि शुश्राव कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ ११ ॥
श्रुत्वैव च महाबाहुर्मा भैरित्याह तं द्विजम् । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वह ब्राह्मण निकट आकर बहुत रो रहा था । पाण्डुपुत्र कुन्तीनन्दन धनंजयने उसकी कही हुई सारी बातें सुनीं और सुनकर उन महाबाहुने उस ब्राह्मणसे कहा – ' डरो मत' ॥ ११३ ॥
आयुधानि च यत्रासन् पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १२ ॥
कृष्णया सह तत्रास्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
सम्प्रवेशाय चाशक्तो गमनाय च पाण्डवः ॥ १३ ॥
महात्मा पाण्डवोंके अस्त्र- शस्त्र जहाँ रखे गये थे, वहीं धर्मराज युधिष्ठिर कृष्णाके साथ एकान्तमें बैठे थे । अतः पाण्डुपुत्र अर्जुन न तो घरके भीतर प्रवेश कर सकते थे और न खाली हाथ चोरोंका ही पीछा कर सकते थे ॥ १२-१३ ॥
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तस्य चार्तस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः ।
आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दुःखितः ॥ १४ ॥
इधर उस आर्त ब्राह्मणकी बातें उन्हें बार - बार शस्त्र ले आनेको प्रेरित कर रही थीं । जब वह अधिक रोने - चिल्लाने लगा, तब अर्जुनने दुःखी होकर सोचा- ॥ १४ ॥
ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।
अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चयः ॥ १५ ॥
‘ इस तपस्वी ब्राह्मणके गोधनका अपहरण हो रहा है; अतः ऐसे समयमें इसके आँसू
पोंछना मेरा कर्तव्य है । यही मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥
उपक्षेपणजोऽधर्मः सुमहान् स्यान्महीपतेः ।
यद्यस्य रुदतो द्वारि न करोम्यद्य रक्षणम् ॥ १६ ॥
‘ यदि मैं राजद्वारपर रोते हुए इस ब्राह्मणकी रक्षा आज नहीं करूँगा, तो महाराज युधिष्ठिरको उपेक्षाजनित महान् अधर्मका भागी होना पड़ेगा ॥ १६ ॥
अनास्तिक्यं च सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे ।
प्रतितिष्ठेत लोकेऽस्मिन्नधर्मश्चैव नो भवेत् ॥ १७ ॥
‘ इसके सिवा लोकमें यह बात फैल जायगी कि हम सब लोग किसी आर्तकी रक्षारूप
धर्मके पालनमें श्रद्धा नहीं रखते । साथ ही हमें अधर्म भी प्राप्तहोगा ॥ १७ ॥
अनादृत्य तु राजानं गते मयि न संशयः ।
अजातशत्रोर्नृपतेर्मम चैवानृतं भवेत् ॥ १८ ॥
‘ यदि राजाका अनादर करके मैं घरके भीतर चला जाऊँ, तो महाराज अजातशत्रुके प्रति मेरी प्रतिज्ञा मिथ्या होगी ॥ १८ ॥
अनुप्रवेशे राज्ञस्तु वनवासो भवेन्मम ।
सर्वमन्यत् परिहृतं धर्षणात् तु महीपतेः ॥ १ ९ ॥
‘ राजाकी उपस्थितिमें घरके भीतर प्रवेश करनेपर मुझको वनमें निवास करना होगा । इसमें महाराजके तिरस्कारके सिवा और सारी बातें तुच्छ होनेके कारण उपेक्षणीय हैं ॥ १ ९ ॥
अधर्मो वै महानस्तु वने वा मरणं मम ।
शरीरस्य विनाशेन धर्म एव विशिष्यते ॥ २० ॥
‘चाहे राजाके तिरस्कारसे मुझे नियमभंगका महान् दोष प्राप्त हो अथवा वनमें ही मेरी मृत्यु हो जाय तथापि शरीरको नष्ट करके भी गौ- ब्राह्मण- रक्षारूप धर्मका पालन ही श्रेष्ठ है ' ॥ २० ॥
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एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।
अनुप्रविश्य राजानमापृच्छ्य च विशाम्पते ॥ २१ ॥
धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत । जनमेजय! ऐसा निश्चय करके कुन्तीकुमार धनंजयने राजासे पूछकर घरके भीतर प्रवेश करके धनुष ले लिया और ( बाहर आकर) प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणसे कहा- ॥ २१३ || ब्राह्मणागम्यतां शीघ्रं यावत् परधनैषिणः ॥ २२ ॥
न दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद् गच्छावहे सह ।
यावन्निवर्तयाम्यद्य चौरहस्ताद् धनं तव ॥ २३ ॥
‘ विप्रवर! शीघ्र आइये । जबतक दूसरोंके धन हड़पनेकी इच्छावाले वे क्षुद्र चोरदूर नहीं चले जाते, तभीतक हम दोनों एक साथ वहाँ पहुँच जायँ । मैं अभी आपका गोधन चोरोंके हाथसे छीनकर आपको लौटा देता हूँ' ॥ २२-२३ ॥
सोऽनुसृत्य महाबाहुर्धन्वी वर्मी रथी ध्वजी ।
शरैर्विध्वस्य तांश्चौरानवजित्य च तद् धनम् ॥ २४ ॥
ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने धनुष और कवच धारण करके ध्वजायुक्त रथपर आरूढ़ हो उन चोरोंका पीछा किया और बाणोंसे चोरोंका विनाश करके सारा गोधन जीत
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लिया ॥ २४ ॥
ब्राह्मणं समुपाकृत्य यशः प्राप्य च पाण्डवः ।
ततस्तद् गोधनं पार्थो दत्त्वा तस्मै द्विजातये ॥ २५ ॥
आजगाम पुरं वीरः सव्यसाची धनंजयः ।
सोऽभिवाद्य गुरून् सर्वान् सर्वैश्चाप्यभिनन्दितः ॥ २६ ॥
फिर ब्राह्मणको वह सारा गोधन देकर प्रसन्न करके अनुपम यशके भागी हो पाण्डुपुत्र सव्यसाची वीर धनंजय पुनः अपने नगरमें लौट आये । वहाँ आकर उन्होंने समस्त गुरुजनोंको प्रणाम किया और उन सभी गुरुजनोंने उनकी बड़ी प्रशंसा एवं अभिनन्दन किया ॥ २५-२६ ॥
धर्मराजमुवाचेदं व्रतमादिश मे प्रभो ।
समयः समतिक्रान्तो भवत्संदर्शने मया ॥ २७ ॥
वनवासो गमिष्यामि समयो ह्येष नः कृतः । इसके बाद अर्जुनने धर्मराजसे कहा - ' प्रभो! मैंने आपको द्रौपदीके साथ देखकर पहलेके निश्चित नियमको भंग किया है; अतः आप इसके लिये मुझे प्रायश्चित्त करनेकी आज्ञा दीजिये । मैं वनवासके लिये जाऊँगा; क्योंकि हमलोगोंमें यह शर्त हो चुकी है ' ॥ २७ ॥ इत्युक्तो धर्मराजस्तु सहसा वाक्यमप्रियम् ॥ २८ ॥
कथमित्यब्रवीद् वाचा शोकार्तः सज्जमानया ।
युधिष्ठिरो गुडाकेशं भ्राता भ्रातरमच्युतम् ॥ २ ९ ॥
उवाच दीनो राजा च धनंजयमिदं वचः ।
प्रमाणमस्मि यदि ते मत्तः शृणु वचोऽनघ ॥ ३० ॥
अर्जुनके मुखसे सहसा यह अप्रिय वचन सुनकर धर्मराज शोकातुर होकर लड़खड़ाती हुई वाणीमें बोले – ' ऐसा क्यों करते हो? ' इसके बाद राजा युधिष्ठिर धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले अपने भाई गुडाकेश धनंजयसे फिर दीन होकर बोले — ‘ अनघ! यदि तुम मुझको प्रमाण मानते हो, तो मेरी यह बात सुनो— ॥ २८–३० ॥
अनुप्रवेशे यद् वीरकृतवांस्त्वं मम प्रियम् ।
सर्वं तदनुजानामि व्यलीकं न च मे हृदि ॥ ३१ ॥
‘ वीरवर! तुमने घरके भीतर प्रवेश करके तो मेरा प्रिय कार्य किया है, अतः उसके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ; क्योंकि मेरे हृदयमें वह अप्रिय नहीं है ॥ ३१ ॥
गुरोरनुप्रवेशो हि नोपघातो यवीयसः ।
यवीयसोऽनुप्रवेशो ज्येष्ठस्य विधिलोपकः ॥ ३२ ॥
‘ यदि बड़ा भाई घरमें स्त्रीके साथ बैठा हो, तो छोटे भाईका वहाँ जाना दोषकी बात नहीं है; परंतु छोटा भाई घरमें हो, तो बड़े भाईका वहाँ जाना उसके धर्मका नाश करनेवाला
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है ॥ ३२ ॥
निवर्तस्व महाबाहो कुरुष्व वचनं मम ।
न हि ते धर्मलोपोऽस्ति न च ते धर्षणा कृता ॥ ३३ ॥
‘ अतः महाबाहो! मेरी बात मानो; वनवासका विचार छोड़ दो । न तो तुम्हारे धर्मका लोप हुआ है और न तुम्हारे द्वारा मेरा तिरस्कार ही किया गया है ' ॥ ३३ ॥
अर्जुन उवाच
न व्याजेन चरेद् धर्ममिति मे भवतः श्रुतम् ।
न सत्याद् विचलिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥ ३४ ॥
अर्जुन बोले- प्रभो! मैंने आपके ही मुखसे सुना है कि धर्माचरणमें कभी बहानेबाजी नहीं करनी चाहिये । अतः मैं सत्यकी शपथ खाकर और शस्त्र छूकर कहता हूँ कि सत्यसे विचलित नहीं होऊँगा ॥ ३४ ॥
(आज्ञा तु मम दातव्या भवता कीर्तिवर्धन । भवदाज्ञामृते किंचिन्न कार्यमिति निश्चितम् ॥ ) यशोवर्धन! मुझे आप वनवासके लिये आज्ञा दें, मेरा यह निश्चय है कि मैं आपकी आज्ञाके बिना कोई कार्य नहीं करूँगा ॥ वैशम्पायन उवाच
सोऽभ्यनुज्ञाय राजानं वनचर्याय दीक्षितः ।
वने द्वादश वर्षाणि वासायानुजगाम ह ॥ ३५ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजाकी आज्ञा लेकर अर्जुनने वनवासकी दीक्षा ली और वनमें बारह वर्षोंतक रहनेके लिये वे वहाँसे चल पड़े ॥ ३५ ॥
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनतीर्थयात्रायां द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनतीर्थयात्राविषयक दोसौ बारहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २१२ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलकर कुल ३६ श्लोक हैं )