श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1471–1480

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1471–1480

पृष्ठ 1471

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1471 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

सुन्दने सुन्दर भौंहोंवाली तिलोत्तमाका दाहिना हाथ पकड़ा और उपसुन्दने उसका बायाँ हाथ पकड़ लिया ॥ १३ ॥

वरप्रदानमत्तौ तावौरसेन बलेन च ।

धनरत्नमदाभ्यां च सुरापानमदेन च ॥ १४ ॥

एक तो वे दुर्लभ वरदानके मदसे उन्मत्त थे, दूसरे उनपर अपने स्वाभाविक बलका नशा सवार था । इसके सिवा धनमद, रत्नमद और सुरापानके मदसे भी वे उन्मत्त हो रहे थे ॥ १४ ॥

सर्वैरेतैर्मदैर्मत्तावन्योन्यं भ्रुकुटीकृतौ ।

(तौ कटाक्षेण दैत्येन्द्रावाकर्षति मुहुर्मुहुः ।

दक्षिणेन कटाक्षेण सुन्दं जग्राह कामिनी ॥

वामेनैव कटाक्षेण उपसुन्दं जिघृक्षती । गन्धाभरणरूपैस्तौ व्यामोहं जग्मतुस्तदा ॥ ) मदकामसमाविष्टौ परस्परमथोचतुः ॥ १५ ॥

इन सभी मदोंसे उन्मत्त होनेके कारण आपसमें ही एक- दूसरेपर उनकी भौंहें तन गयीं । तिलोत्तमा कटाक्षद्वारा उन दोनों दैत्यराजोंको बार- बार अपनी ओर आकृष्ट कर रही थी । उस कामिनीने अपने दाहिने कटाक्षसे सुन्दको आकृष्ट कर लिया और बायें कटाक्षसे वह उपसुन्दको वशमें करनेकी चेष्टा करने लगी । उसकी दिव्य सुगन्ध, आभूषणराशि तथा रूपसम्पत्तिसे वे दोनों दैत्य तत्काल मोहित हो गये । उनमें मद और कामका आवेश हो गया; अतः वे एक- दूसरेसे इस प्रकार बोले- ॥ १५ ॥

मम भार्या तव गुरुरिति सुन्दोऽभ्यभाषत ।

मम भार्या तव वधूरुपसुन्दोऽभ्यभाषत ॥ १६ ॥

सुन्दने कहा – ' अरे! यह मेरी पत्नी है, तुम्हारे लिये माताके समान है । ' यह सुनकर उपसुन्द बोल उठा — ‘ नहीं -नहीं, यह मेरी भार्या है, तुम्हारे लिये तो पुत्रवधूके समान है ' ॥ १६ ॥

नैषा तव ममैषेति ततस्तौ मन्युराविशत् ।

तस्या रूपेण सम्मत्तौ विगतस्नेहसौहृदौ ॥ १७ ॥

' यह तुम्हारी नहीं है, मेरी है ', यही कहते -कहते उन दोनोंको क्रोध चढ़ आया ।

तिलोत्तमाके रूपसे मतवाले होकर वे दोनों स्नेह और सौहार्दसे शून्य हो गये ॥ १७ ॥

तस्या हेतोर्गदे भीमे संगृह्णीतावुभौ तदा ।

प्रगृह्य च गदे भीमे तस्यां तौ काममोहितौ ॥ १८ ॥

उस सुन्दरीको पानेके लिये दोनों भाइयोंने उस समय हाथमें भयंकर गदाएँ ले लीं । दोनों ही उसके प्रति कामसे मोहित हो रहे थे ॥ १८ ॥

अहं पूर्वमहं पूर्वमित्यन्योन्यं निजघ्नतुः ।

पृष्ठ 1472

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1472 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तौ गदाभिहतौ भीमौ पेततुर्धरणीतले ॥ १ ९ ॥ ‘ पहले मैं इसे प्राप्त करूँगा', ' नहीं, पहले मैं '; ऐसा कहते हुए दोनों एक- दूसरेको मारने लगे । इस प्रकार गदाओंकी चोट खाकर वे दोनों भयानक दैत्य धरतीपर गिर पड़े ॥ १ ९ ॥

रुधिरेणावसिक्ताङ्गी द्वाविवार्कौ नभश्युतौ ।

ततस्ता विद्रुता नार्यः स च दैत्यगणस्तथा ॥ २० ॥

पातालमगमत् सर्वो विषादभयकम्पितः ।

ततः पितामहस्तत्र सह देवैर्महर्षिभिः ॥ २१ ॥

आजगाम विशुद्धात्मा पूजयंश्च तिलोत्तमाम् ।

वरेणच्छन्दयामास भगवान् प्रपितामहः ॥ २२ ॥

उनके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे । ऐसा जान पड़ता था, मानो आकाशसे दो सूर्य पृथ्वीपर गिर गये हों । उनके मारे जानेपर वे सब स्त्रियाँ वहाँसे भाग गयीं और दैत्योंका वह सारा समुदाय विषाद और भयसे कम्पित होकर पातालमें चला गया । तत्पश्चात् विशुद्ध अन्तःकरणवाले भगवान् ब्रह्माजी देवताओं और महर्षियोंके साथ तिलोत्तमाकी प्रशंसा करते हुए वहाँ आये और भगवान् पितामहने उसे वरके द्वारा प्रसन्न किया ॥ २०–२२ ॥

वरं दित्सुः स तत्रैनां प्रीतः प्राह पितामहः ।

आदित्यचरिताँल्लोकान् विचरिष्यसि भाविनि ॥ २३ ॥

तेजसा च सुदृष्टां त्वां न करिष्यति कश्चन ।

एवं तस्यै वरं दत्त्वा सर्वलोकपितामहः ॥ २४ ॥

इन्द्रे त्रैलोक्यमाधाय ब्रह्मलोकं गतः प्रभुः । वर देनेके लिये उत्सुक हुए ब्रह्माजी स्वयं ही प्रसन्नतापूर्वक बोले- ' भामिनि! जहाँतक सूर्यकी गति है, उन सभी लोकोंमें तू इच्छानुसार विचर सकेगी । तुझमें इतना तेज होगा कि कोई आँख भरकर तुझे अच्छी तरह देख भी न सकेगा । ' इस प्रकार सम्पूर्ण लोकोंके पितामह ब्रह्माजी तिलोत्तमाको वरदान देकर तथा त्रिलोकीकी रक्षाका भार इन्द्रको सौंपकर पुनः ब्रह्मलोकको चले गये ॥ २३-२४ ॥ नारद उवाच एवं तौ सहितौ भूत्वा सर्वार्थेष्वेकनिश्चयौ ॥ २५ ॥

तिलोत्तमार्थं संक्रुद्धावन्योन्यमभिजघ्नतुः ।

तस्माद् ब्रवीमि वः स्नेहात् सर्वान् भरतसत्तमाः ॥ २६ ॥

यथा वो नात्र भेदः स्यात् सर्वेषां द्रौपदीकृते ।

तथा कुरुत भद्रं वो मम चेत् प्रियमिच्छथ ॥ २७ ॥

नारदजी कहते हैं - युधिष्ठिर! इस प्रकार सुन्द और उपसुन्दने परस्पर संगठित और सभी बातोंमें एकमत रहकर भी तिलोत्तमाके लिये कुपित हो एक- दूसरेको मार डाला । अतः

पृष्ठ 1473

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1473 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

भरतवंशशिरोमणियो! मैं तुम सब लोगोंसे स्नेहवश कहता हूँ कि यदि मेरा प्रिय चाहते हो,

तो ऐसा कुछ नियम बना लो, जिससे द्रौपदीके लिये तुम सब लोगोंमें फूट न होने पावे ।

तुम्हारा कल्याण हो ॥ २५–२७ ॥

वैशम्पायन उवाच एवमुक्ता महात्मानो नारदेन महर्षिणा ।

समयं चक्रिरे राजंस्तेऽन्योन्यवशमागताः ।

समक्षं तस्य देवर्षेर्नारदस्यामितौजसः ॥ २८ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! देवर्षि नारदके ऐसा कहनेपर एक- दूसरेके अधीन रहनेवाले उन अमिततेजस्वी महात्मा पाण्डवोंने देवर्षिके सामने ही यह नियम बनाया— ॥ २८ ॥

(एकैकस्य गृहे कृष्णा वसेद् वर्षमकल्मषा । )

द्रौपद्या नः सहासीनानन्योन्यं योऽभिदर्शयेत् ।

स नो द्वादश वर्षाणि ब्रह्मचारी वने वसेत् ॥ २ ९ ॥

' हममेंसे प्रत्येकके घरमें पापरहित द्रौपदी एक-एक वर्ष निवास करे । द्रौपदीके साथ एकान्तमें बैठे हुए हममेंसे एक भाईको यदि दूसरा देख ले, तो वह बारह वर्षोंतक ब्रह्मचर्यपूर्वक वनमें निवास करे ' ॥ २ ९ ॥

कृते तु समये तस्मिन् पाण्डवैर्धर्मचारिभिः ।

नारदोऽप्यगमत् प्रीत इष्टं देशं महामुनिः ॥ ३० ॥

धर्मका आचरण करनेवाले पाण्डवोंद्वारा यह नियम स्वीकार कर लिये जानेपर महामुनि नारदजी प्रसन्न हो अभीष्ट स्थानको चले गये ॥ ३० ॥

एवं तैः समयः पूर्वं कृतो नारदचोदितैः ।

न चाभिद्यन्त ते सर्वे तदान्योन्येन भारत ॥ ३१ ॥

भारत! इस प्रकार नारदजीकी प्रेरणासे पाण्डवोंने पहले ही नियम बना लिया था ।

इसीलिये वे सब आपसमें कभी एक - दूसरेके विरोधी नहीं हुए ॥ ३१ ॥

(एतद् विस्तरशः सर्वमाख्यातं ते नरेश्वर । काले च तस्मिन् सम्पन्नं यथावज्जनमेजय ॥ ) नरेश्वर जनमेजय! उस समय जो बातें जिस प्रकार घटित हुई थीं, वे सब मैंने तुम्हें विस्तारपूर्वक बतायी हैं । इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि विदुरागमनराज्यलम्भपर्वणि सुन्दोपसुन्दोपाख्याने एकादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २११ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत विदुरागमनराज्यम्भपर्वमें सुन्दोपसुन्दोपाख्यानविषयक दो सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ २११ ॥

पृष्ठ 1474

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1474 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३३ श्लोक मिलाकर कुल ३४३ श्लोक हैं )

पृष्ठ 1475

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1475 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

(अर्जुनवनवासपर्व ) द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः अर्जुनके द्वारा ब्राह्मणके गोधनकी रक्षाके लिये नियमभंग और वनकी ओर प्रस्थान वैशम्पायन उवाच

एवं ते समयं कृत्वा न्यवसंस्तत्र पाण्डवाः ।

वशे शस्त्रप्रतापेन कुर्वन्तोऽन्यान् महीक्षितः ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! इस प्रकार नियम बनाकर पाण्डवलोग वहाँ रहने लगे । वे अपने अस्त्र- शस्त्रोंके प्रतापसे दूसरे राजाओंको अधीन करते रहते थे ॥ १ ॥

तेषां मनुजसिंहानां पञ्चानाममितौजसाम् ।

बभूव कृष्णा सर्वेषां पार्थानां वशवर्तिनी ॥ २ ॥

कृष्णा मनुष्यों में सिंहके समान वीर और अमित तेजस्वी उन पाँचों पाण्डवोंकी आज्ञाके अधीन रहती थी ॥ २ ॥

ते तया तैश्च सा वीरैः पतिभिः सह पञ्चभिः ।

बभूव परमप्रीता नागैर्भोगवती यथा ॥ ३ ॥

पाण्डव द्रौपदीके साथ और द्रौपदी उन पाँचों वीर पतियोंके साथ ठीक उसी तरह अत्यन्त प्रसन्न रहती थी जैसे नागोंके रहनेसे भोगवतीपुरी परम शोभायुक्त होती है ॥ ३ ॥

वर्तमानेषु धर्मेण पाण्डवेषु महात्मसु ।

व्यवर्धन् कुरवः सर्वे हीनदोषाः सुखान्विताः ॥ ४ ॥

महात्मा पाण्डवोंके धर्मानुसार बर्ताव करनेके कारण समस्त कुरुवंशी निर्दोष एवं सुखी रहकर निरन्तर उन्नति करने लगे ॥ ४ ॥

अथ दीर्घेण कालेन ब्राह्मणस्य विशाम्पते ।

कस्यचित् तस्करा जहुः केचिद् गा नृपसत्तम ॥ ५ ॥

महाराज! तदनन्तर दीर्घकालके पश्चात् एक दिन कुछ चोरोंने किसी ब्राह्मणकी गौएँ चुरा लीं ॥ ५ ॥

ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणः क्रोधमूर्च्छितः ।

आगम्य खाण्डवप्रस्थमुदक्रोशत् स पाण्डवान् ॥ ६ ॥

पृष्ठ 1476

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1476 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

अपने गोधनका अपहरण होता देख ब्राह्मण अत्यन्त क्रुद्ध हो उठा और खाण्डवप्रस्थमें आकर उसने उच्चस्वरसे पाण्डवोंको पुकारा- ॥ ६ ॥

ह्रियते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः ।

प्रसह्य चास्मद्विषयादभ्यधावत पाण्डवाः ॥ ७ ॥

‘ पाण्डवो! हमारे गाँवसे कुछ नीच, क्रूर और पापात्मा चोर जबरदस्ती गोधन चुराकर

लिये जा रहे हैं । उसकी रक्षाके लिये दौड़ो ॥ ७ ॥

ब्राह्मणस्य प्रशान्तस्य हविर्ध्वाक्षैः प्रलुप्यते ।

शार्दूलस्य गुहां शून्यां नीचः क्रोष्टाभिमर्दति ॥ ८ ॥

‘ आज एक शान्तस्वभाव ब्राह्मणका हविष्य कौए लूटकर खा रहे हैं । नीच सियार सिंहकी सूनी गुफाको रौंद रहा है ॥ ८ ॥

अरक्षितारं राजानं बलिषड्भागहारिणम् ।

तमाहुः सर्वलोकस्य समग्रं पापचारिणम् ॥ ९ ॥

'जो राजा प्रजाकी आयका छठा भाग करके रूपमें वसूल करता है, किंतु प्रजाकी रक्षाकी कोई व्यवस्था नहीं करता, उसे सम्पूर्ण लोकोंमें पूर्ण पापाचारी कहा गया है ॥ ९ ॥

ब्राह्मणस्वे हृते चौरैर्धर्मार्थे च विलोपिते ।

रोरूयमाणे च मयि क्रियतामस्त्रधारणम् ॥ १० ॥

'मुझ ब्राह्मणका धन चोर लिये जा रहे हैं, मेरे गौके न रहनेपर दुग्ध आदि हविष्यके अभावसे धर्म और अर्थका लोप हो रहा है तथा मैं यहाँ आकर रो रहा हूँ । पाण्डवो! (चोरोंको दण्ड देनेके लिये ) अस्त्र धारण करो ' ॥ १० ॥

वैशम्पायन उवाच

रोरूयमाणस्याभ्याशे भृशं विप्रस्य पाण्डवः ।

तानि वाक्यानि शुश्राव कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ ११ ॥

श्रुत्वैव च महाबाहुर्मा भैरित्याह तं द्विजम् । वैशम्पायनजी कहते हैं— जनमेजय! वह ब्राह्मण निकट आकर बहुत रो रहा था । पाण्डुपुत्र कुन्तीनन्दन धनंजयने उसकी कही हुई सारी बातें सुनीं और सुनकर उन महाबाहुने उस ब्राह्मणसे कहा – ' डरो मत' ॥ ११३ ॥

आयुधानि च यत्रासन् पाण्डवानां महात्मनाम् ॥ १२ ॥

कृष्णया सह तत्रास्ते धर्मराजो युधिष्ठिरः ।

सम्प्रवेशाय चाशक्तो गमनाय च पाण्डवः ॥ १३ ॥

महात्मा पाण्डवोंके अस्त्र- शस्त्र जहाँ रखे गये थे, वहीं धर्मराज युधिष्ठिर कृष्णाके साथ एकान्तमें बैठे थे । अतः पाण्डुपुत्र अर्जुन न तो घरके भीतर प्रवेश कर सकते थे और न खाली हाथ चोरोंका ही पीछा कर सकते थे ॥ १२-१३ ॥

पृष्ठ 1477

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1477 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

तस्य चार्तस्य तैर्वाक्यैश्चोद्यमानः पुनः पुनः ।

आक्रन्दे तत्र कौन्तेयश्चिन्तयामास दुःखितः ॥ १४ ॥

इधर उस आर्त ब्राह्मणकी बातें उन्हें बार - बार शस्त्र ले आनेको प्रेरित कर रही थीं । जब वह अधिक रोने - चिल्लाने लगा, तब अर्जुनने दुःखी होकर सोचा- ॥ १४ ॥

ह्रियमाणे धने तस्मिन् ब्राह्मणस्य तपस्विनः ।

अश्रुप्रमार्जनं तस्य कर्तव्यमिति निश्चयः ॥ १५ ॥

‘ इस तपस्वी ब्राह्मणके गोधनका अपहरण हो रहा है; अतः ऐसे समयमें इसके आँसू

पोंछना मेरा कर्तव्य है । यही मेरा निश्चय है ॥ १५ ॥

उपक्षेपणजोऽधर्मः सुमहान् स्यान्महीपतेः ।

यद्यस्य रुदतो द्वारि न करोम्यद्य रक्षणम् ॥ १६ ॥

‘ यदि मैं राजद्वारपर रोते हुए इस ब्राह्मणकी रक्षा आज नहीं करूँगा, तो महाराज युधिष्ठिरको उपेक्षाजनित महान् अधर्मका भागी होना पड़ेगा ॥ १६ ॥

अनास्तिक्यं च सर्वेषामस्माकमपि रक्षणे ।

प्रतितिष्ठेत लोकेऽस्मिन्नधर्मश्चैव नो भवेत् ॥ १७ ॥

‘ इसके सिवा लोकमें यह बात फैल जायगी कि हम सब लोग किसी आर्तकी रक्षारूप

धर्मके पालनमें श्रद्धा नहीं रखते । साथ ही हमें अधर्म भी प्राप्तहोगा ॥ १७ ॥

अनादृत्य तु राजानं गते मयि न संशयः ।

अजातशत्रोर्नृपतेर्मम चैवानृतं भवेत् ॥ १८ ॥

‘ यदि राजाका अनादर करके मैं घरके भीतर चला जाऊँ, तो महाराज अजातशत्रुके प्रति मेरी प्रतिज्ञा मिथ्या होगी ॥ १८ ॥

अनुप्रवेशे राज्ञस्तु वनवासो भवेन्मम ।

सर्वमन्यत् परिहृतं धर्षणात् तु महीपतेः ॥ १ ९ ॥

‘ राजाकी उपस्थितिमें घरके भीतर प्रवेश करनेपर मुझको वनमें निवास करना होगा । इसमें महाराजके तिरस्कारके सिवा और सारी बातें तुच्छ होनेके कारण उपेक्षणीय हैं ॥ १ ९ ॥

अधर्मो वै महानस्तु वने वा मरणं मम ।

शरीरस्य विनाशेन धर्म एव विशिष्यते ॥ २० ॥

‘चाहे राजाके तिरस्कारसे मुझे नियमभंगका महान् दोष प्राप्त हो अथवा वनमें ही मेरी मृत्यु हो जाय तथापि शरीरको नष्ट करके भी गौ- ब्राह्मण- रक्षारूप धर्मका पालन ही श्रेष्ठ है ' ॥ २० ॥

पृष्ठ 1478

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1478 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

एवं विनिश्चित्य ततः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ।

अनुप्रविश्य राजानमापृच्छ्य च विशाम्पते ॥ २१ ॥

धनुरादाय संहृष्टो ब्राह्मणं प्रत्यभाषत । जनमेजय! ऐसा निश्चय करके कुन्तीकुमार धनंजयने राजासे पूछकर घरके भीतर प्रवेश करके धनुष ले लिया और ( बाहर आकर) प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणसे कहा- ॥ २१३ || ब्राह्मणागम्यतां शीघ्रं यावत् परधनैषिणः ॥ २२ ॥

न दूरे ते गताः क्षुद्रास्तावद् गच्छावहे सह ।

यावन्निवर्तयाम्यद्य चौरहस्ताद् धनं तव ॥ २३ ॥

‘ विप्रवर! शीघ्र आइये । जबतक दूसरोंके धन हड़पनेकी इच्छावाले वे क्षुद्र चोरदूर नहीं चले जाते, तभीतक हम दोनों एक साथ वहाँ पहुँच जायँ । मैं अभी आपका गोधन चोरोंके हाथसे छीनकर आपको लौटा देता हूँ' ॥ २२-२३ ॥

सोऽनुसृत्य महाबाहुर्धन्वी वर्मी रथी ध्वजी ।

शरैर्विध्वस्य तांश्चौरानवजित्य च तद् धनम् ॥ २४ ॥

ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने धनुष और कवच धारण करके ध्वजायुक्त रथपर आरूढ़ हो उन चोरोंका पीछा किया और बाणोंसे चोरोंका विनाश करके सारा गोधन जीत

पृष्ठ 1479

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1479 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

लिया ॥ २४ ॥

ब्राह्मणं समुपाकृत्य यशः प्राप्य च पाण्डवः ।

ततस्तद् गोधनं पार्थो दत्त्वा तस्मै द्विजातये ॥ २५ ॥

आजगाम पुरं वीरः सव्यसाची धनंजयः ।

सोऽभिवाद्य गुरून् सर्वान् सर्वैश्चाप्यभिनन्दितः ॥ २६ ॥

फिर ब्राह्मणको वह सारा गोधन देकर प्रसन्न करके अनुपम यशके भागी हो पाण्डुपुत्र सव्यसाची वीर धनंजय पुनः अपने नगरमें लौट आये । वहाँ आकर उन्होंने समस्त गुरुजनोंको प्रणाम किया और उन सभी गुरुजनोंने उनकी बड़ी प्रशंसा एवं अभिनन्दन किया ॥ २५-२६ ॥

धर्मराजमुवाचेदं व्रतमादिश मे प्रभो ।

समयः समतिक्रान्तो भवत्संदर्शने मया ॥ २७ ॥

वनवासो गमिष्यामि समयो ह्येष नः कृतः । इसके बाद अर्जुनने धर्मराजसे कहा - ' प्रभो! मैंने आपको द्रौपदीके साथ देखकर पहलेके निश्चित नियमको भंग किया है; अतः आप इसके लिये मुझे प्रायश्चित्त करनेकी आज्ञा दीजिये । मैं वनवासके लिये जाऊँगा; क्योंकि हमलोगोंमें यह शर्त हो चुकी है ' ॥ २७ ॥ इत्युक्तो धर्मराजस्तु सहसा वाक्यमप्रियम् ॥ २८ ॥

कथमित्यब्रवीद् वाचा शोकार्तः सज्जमानया ।

युधिष्ठिरो गुडाकेशं भ्राता भ्रातरमच्युतम् ॥ २ ९ ॥

उवाच दीनो राजा च धनंजयमिदं वचः ।

प्रमाणमस्मि यदि ते मत्तः शृणु वचोऽनघ ॥ ३० ॥

अर्जुनके मुखसे सहसा यह अप्रिय वचन सुनकर धर्मराज शोकातुर होकर लड़खड़ाती हुई वाणीमें बोले – ' ऐसा क्यों करते हो? ' इसके बाद राजा युधिष्ठिर धर्ममर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले अपने भाई गुडाकेश धनंजयसे फिर दीन होकर बोले — ‘ अनघ! यदि तुम मुझको प्रमाण मानते हो, तो मेरी यह बात सुनो— ॥ २८–३० ॥

अनुप्रवेशे यद् वीरकृतवांस्त्वं मम प्रियम् ।

सर्वं तदनुजानामि व्यलीकं न च मे हृदि ॥ ३१ ॥

‘ वीरवर! तुमने घरके भीतर प्रवेश करके तो मेरा प्रिय कार्य किया है, अतः उसके लिये मैं तुम्हें आज्ञा देता हूँ; क्योंकि मेरे हृदयमें वह अप्रिय नहीं है ॥ ३१ ॥

गुरोरनुप्रवेशो हि नोपघातो यवीयसः ।

यवीयसोऽनुप्रवेशो ज्येष्ठस्य विधिलोपकः ॥ ३२ ॥

‘ यदि बड़ा भाई घरमें स्त्रीके साथ बैठा हो, तो छोटे भाईका वहाँ जाना दोषकी बात नहीं है; परंतु छोटा भाई घरमें हो, तो बड़े भाईका वहाँ जाना उसके धर्मका नाश करनेवाला

पृष्ठ 1480

महाभारत — खण्ड १, पृष्ठ 1480 का मूल पृष्ठ
पूरे पर्दे पर देखने के लिये चित्र दबाएँ
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ

है ॥ ३२ ॥

निवर्तस्व महाबाहो कुरुष्व वचनं मम ।

न हि ते धर्मलोपोऽस्ति न च ते धर्षणा कृता ॥ ३३ ॥

‘ अतः महाबाहो! मेरी बात मानो; वनवासका विचार छोड़ दो । न तो तुम्हारे धर्मका लोप हुआ है और न तुम्हारे द्वारा मेरा तिरस्कार ही किया गया है ' ॥ ३३ ॥

अर्जुन उवाच

न व्याजेन चरेद् धर्ममिति मे भवतः श्रुतम् ।

न सत्याद् विचलिष्यामि सत्येनायुधमालभे ॥ ३४ ॥

अर्जुन बोले- प्रभो! मैंने आपके ही मुखसे सुना है कि धर्माचरणमें कभी बहानेबाजी नहीं करनी चाहिये । अतः मैं सत्यकी शपथ खाकर और शस्त्र छूकर कहता हूँ कि सत्यसे विचलित नहीं होऊँगा ॥ ३४ ॥

(आज्ञा तु मम दातव्या भवता कीर्तिवर्धन । भवदाज्ञामृते किंचिन्न कार्यमिति निश्चितम् ॥ ) यशोवर्धन! मुझे आप वनवासके लिये आज्ञा दें, मेरा यह निश्चय है कि मैं आपकी आज्ञाके बिना कोई कार्य नहीं करूँगा ॥ वैशम्पायन उवाच

सोऽभ्यनुज्ञाय राजानं वनचर्याय दीक्षितः ।

वने द्वादश वर्षाणि वासायानुजगाम ह ॥ ३५ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! राजाकी आज्ञा लेकर अर्जुनने वनवासकी दीक्षा ली और वनमें बारह वर्षोंतक रहनेके लिये वे वहाँसे चल पड़े ॥ ३५ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि अर्जुनवनवासपर्वणि अर्जुनतीर्थयात्रायां द्वादशाधिकद्विशततमोऽध्यायः ॥ २१२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत अर्जुनवनवासपर्वमें अर्जुनतीर्थयात्राविषयक दोसौ बारहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २१२ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलकर कुल ३६ श्लोक हैं )