आरण्यकम् Aranyakam

आरण्यकम् । -श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा। ग्रामे॒ मन॑सा स्वाध्या॒यमधी॑यीत॒ दिवा॒ नक्त॑व्वेँ॒ति ह॑स्मा॒ह शौ॒च आह्ने॒य उ॒तार॑ण्ये॒बल॑ उ॒त वा॒चोत तिष्ठ॑न्नु॒त व्रज॑न्नु॒तासी॑न उ॒त शया॑नो॒ऽधीयी॑तै॒व स्वाध्या॒यन्तप॑स्वी॒ पुण्यो॑ भवति॒ । तैत्तिरीयारण्यकम् २.१२ ।। अरण्याध्ययनादेतदारण्यकमितीर्यते ।अरण्ये तदधीयीतेत्येवं वाक्यं प्रवक्ष्यते ।। वैदिक यज्ञों के अन्तरतम अर्थवत्ता, वास्तविक वैज्ञानिक रहस्यों के सन्धान के लिए जिस शास्त्र का प्रकाश हुआ, उसे आरण्यक कहते हैँ । समूह […]

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शब्दब्रह्म और परम्ब्रह्म ।

शब्दब्रह्म और परम्ब्रह्म । -श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा मैत्रायणी उपनिषद 6-22 में कहा गया है –द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् ।शब्दे ब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति । अमृतविन्दु उपनिषद् 1-17 में भी कहा गया है –द्वे विद्ये वेदितव्ये तु शब्दब्रह्म परं च यत् ।शब्दब्रह्मणि निष्णातः परं ब्रह्माधिगच्छति ॥ ब्रह्म का दो भेद जानने योग्य है –

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वेदः Veda

वेदः । –श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा। जिसमें समस्त शाश्वत ज्ञान निहित है (विदँ ज्ञाने॑), अथवा जिसमें समस्त सत्तावानवस्तु के विज्ञान है (वि॒दँ॒ सत्ता॑याम्), अथवा उसका विवेचना किया गया है (वि॒दँ॒ वि॒चार॑णे), अथवा जिसका विवेचना करने से हम इच्छितवस्तु को सुगमता से प्राप्त कर सकते हैँ (विदॢँ॑ ला॒भे),अथवा जिसमें जाननेयोग्य सबकुछ है (विदँ॒ चेतनाख्याननिवा॒सेषु॑), उसे वेद कहते हैँ

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सर्ग विज्ञान

पुराणों में कहीं दश या नौ सर्गों में सृष्टि का वर्णन किया गया है। श्रीमद्भागवतम् के तृतीय स्कन्ध के आधार पर यहाँ दशविध सर्ग विज्ञान उद्घाटित किया गया है।

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