आरण्यकम् Aranyakam

आरण्यकम् ।

-श्रीमद्वासुदेव मिश्रशर्म्मा।

ग्रामे॒ मन॑सा स्वाध्या॒यमधी॑यीत॒ दिवा॒ नक्त॑व्वेँ॒ति ह॑स्मा॒ह शौ॒च आह्ने॒य उ॒तार॑ण्ये॒बल॑ उ॒त वा॒चोत तिष्ठ॑न्नु॒त व्रज॑न्नु॒तासी॑न उ॒त शया॑नो॒ऽधीयी॑तै॒व स्वाध्या॒यन्तप॑स्वी॒ पुण्यो॑ भवति॒ । तैत्तिरीयारण्यकम् २.१२ ।।

अरण्याध्ययनादेतदारण्यकमितीर्यते ।
अरण्ये तदधीयीतेत्येवं वाक्यं प्रवक्ष्यते ।।

वैदिक यज्ञों के अन्तरतम अर्थवत्ता, वास्तविक वैज्ञानिक रहस्यों के सन्धान के लिए जिस शास्त्र का प्रकाश हुआ, उसे आरण्यक कहते हैँ । समूह को ग्राम कहते हैँ । एकाकीको अरण्य कहते हैँ । अरण्ये भवम् आरण्यकम् (तत्रभवः – अष्टाध्यायी ४-३ -५३) । समूह को ग्राम कहते हैँ । एकाकी को आरण्य कहते हैँ । वेद में ऋषि-छन्द-देवता-विनियोग के समूह (ग्राम) के अनुरोध में मन्त्रों का वर्णन किया गया है । जो वैज्ञानिक चर्चा एक ही विषयमें होता है, उसे आरण्यकम् कहते हैँ । उदाहरण के लिए, तैत्तिरीय आरण्यक में विश्वसृष्टि में शक्ति के विवर्त का सम्पूर्ण विवेचन है । इसे एकदेशीय ब्राह्मण कहा जा सकता है । इसलिए बौधायन धर्मसूत्र में कहागया है – विज्ञायते कर्मादिष्वेतैर्जुहुयात् पूतो देवलोकात् समश्नुते इति हि ब्राह्मणमिति हि ब्राह्मणम् – यज्ञकर्म कैसे करने से यह देवलोकके (quantum world) फल देते हैँ, उसका ब्राह्मण होने से इसे ब्राह्मण कहा जाता है ।

नवनीतं यथा दध्नो मलयाच्चन्दनं यथा ।
आरण्यकं च वेदेभ्य औषधिभ्योऽमृतं यथा ।।

आरण्यकों में आत्मविद्या, तत्त्वचिन्तन और रहस्यात्मक विषयों का वर्णन है, जो वेदविज्ञानका सार है ।

इमे सर्वे वेदा निर्मिताः सकल्पाः सरहस्याः सब्राह्मणाः सोपनिषत्काः सेतिहासाः सान्वाख्यानाः सपुराणाः सस्वराः ससंस्काराः सनिरुक्ताः सानुशासनाः सानुमार्जनाः सवाकोवाक्यास् तेषां यज्ञम् अभिपद्यमानानां छिद्यते नामधेयं यज्ञ इत्य् एवाचक्षते ॥ गोपथब्राह्मण १.२.१० ॥

इसीलिए आरण्यकों को रहस्य भी कहा जाता है । निरुक्त के टीकाकार दुर्गाचार्य ने भी आरण्यकों को रहस्य कहा है । आरण्यकों में यज्ञ का गूढ रहस्य और ब्रह्मविद्या का प्रतिपादन है, अतः इन्हें रहस्य कहा जाता है । इसको रहस्य कहने का अन्स कारण स्मृति, प्रत्यक्षम्, ऐतिह्यम्, अनुमानम् के द्वारा यह सृष्टितत्त्व का निर्द्धारण करते हैँ । वय, वयोनाध, वयुन के द्वारा, तथा मा, प्रमा, प्रतिमा छन्द के द्वारा त्रिविक्रम से सृष्टिरहस्य वर्णन करते हैँ ।

सोऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धस्तद्यथाऽयमाकाशः प्राणेन बृहत्या विष्टब्ध एवं सर्वाणि भूतान्यापिपीलिकाभ्यः प्राणेन बृहत्या विष्टब्धानीत्येवं विद्यात्, इति ।। ऐतरेय आरण्यकम् २.१.६ ।।

प्राणविद्या के महत्त्व का निरूपण आरण्यकों का विशिष्ट प्रतिपाद्य है । तदनुसार प्राण ही इस विश्व का धारक है । प्राण की शक्ति से जैसे यह आकाश अपने स्थान पर स्थित है, उसी प्रकार पिपीलिका से लेकर समस्त प्राणी इसी प्राण के द्वारा प्रतिष्ठित हैं ।

प्राणेन सृष्टावन्तरिक्षं च वायुश्चान्तरिक्षं वा अनु चरन्त्यन्तरिक्षमनु शृण्वन्ति वायुरस्मै पुण्यं गन्धमावहत्येवमेतौ प्राणं पितरं परिचरतोऽन्तरिक्षं च वायुश्च यावदन्वन्तरिक्षं यावदनु वायुस्तावानस्य लोको भवति नास्य तावल्लोको जीर्यते यावदेतयोर्न जीर्यन्तेऽन्तरिक्षस्य च वायोश्च य एवमेतां प्राणस्य विभूतिं वेद, इति ।
।। ऐतरेय आरण्यकम् २.१.७ ।।

प्राण ही आयु का कारण है ।, कौषीतकिउपनिषद् में कहा गया है – यावद्ध्यस्मिन् शरीरे प्राणो वसति तावदायुः। जब तक प्राण है, तब तक आयु है । चरक ने भी कहा है – प्राणधारणं जीवनम् । अन्तरिक्ष और वायु प्राण की सेवा में संलग्न रहते हैं ।

ता वा एताः सर्वा ऋचः सर्वे वेदाः सर्वे घोषा एकैव व्याहृतिः प्राण एव प्राण ऋच इत्येव विद्यात्, इति ।। ऐतरेय आरण्यकम् २.२.२ ।।
सभी ऋचाएँ, यहाँ तक की सभी वेद और ध्वनियाँ प्राण में ही सन्निहित हैं ।

मुण्डकोपनिषद् में विद्या का परा-अपरा विभाग करते हुये कहा गया है कि “अथ परा यया तदक्षरमधिगम्यते”। परम्ब्रह्मविद्या शब्दातीत आत्मसंवेद्यमात्र है (यतो वाचो निवर्तन्ते। अप्राप्य मनसा सह। तैत्तिरीयोपनिषद् २.४)। इसमें अथ शब्द आनन्तर्य का वोधक है । किसके अनन्तर? अपरा विश्व के अनन्तर । “कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्रह्माक्षरसमुद्भवम्” (गीता ३.१५) के अनुसार ब्रह्मा क्षर नामसे जाने जाते हैँ । “सर्वं ह्येतद् ब्रह्म” में सर्वं शब्द क्षर का वोधक है । कारण क्षर ही समस्त विश्व का उपादान कारण है । इसका ब्रह्म और सुब्रह्म दो विभाग है (गोपथब्राह्मणम् पूर्व १.१,२)। ब्रह्मसे मूल अनस्था (स्थिर) सृष्टि होती है । ब्रह्मगर्भित सुब्रह्म से अस्थन्वा सृष्टि होती है (को ददर्श प्रथमं जायमानमस्थन्वन्तं यदनस्था बिभर्ति – ऋग्वेद- १.१६४.४) । सुब्रह्म ही शुक्र है । यह मैथुनीसृष्टि का मूल है । इसलिये इसे ही (सृष्टि के पूर्व होने के कारण) अव्यक्त कहा जाता है । बिना विज्ञानसूर्य के सम्बन्ध से यह घोर तमोरूप है (तम आसीत् तमसा गुळ्ढमग्रे – ऋग्वेद – १०-१२९-३)। यही शुक्र विज्ञानसूर्य के सम्बन्ध से महान् नाम धारण कर के त्रिगुणभावापन्न हो जाता है । इन सबका आलम्बन अव्ययपुरुष है (“कर्माणि विज्ञानमयश्च आत्मा परेऽव्यये सर्व एकीभवन्ति” – मुण्डकोपनिषद् ३.२.७, “यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्र्वरः” – गीता १५-१७)। यही अव्यय-अक्षर-क्षर(ब्रह्म-सुब्रह्म) मिलकर चतुष्पात् ब्रह्म है ।

आत्मा एकपात् है । विश्व अव्यय-अक्षर-क्षर त्रिपात् है । आत्मा शब्द सापेक्ष है । किसका आत्मा? जैसे पुत्र कहने से प्रश्न उठता है कि किसका पुत्र, उसीप्रकार आत्मा कहने से प्रश्न उठता है कि किसका आत्मा? आत्मा का परिभाषा है “यदुक्थं सत् यत् साम सत् यद् ब्रह्म स्यात् स तस्य आत्मा” – जो किसीका उक्थ-ब्रह्म-साम है, वह उस वस्तु का आत्मा है । “यत उत्तिष्ठति तदुक्थम्” अर्थमें जिसके आलम्बनमें वस्तुका प्रतिष्ठा है (जो है तो वस्तु है, नहीं है तो वस्तु नहीं है), वह उसका उक्थ है। “बिभर्त्ति” अर्थमें जो वस्तुका आत्मप्रतिष्ठा को धारण करता है, वह उस वस्तुका ब्रह्म है । “ऋचा समं मेने” अर्थमें जो वस्तुमें आलोम-आनखाग्र सर्वत्र समानरूपमें रहता है, वह उस वस्तुका साम है । इस आत्मा का प्रथम पाद अव्यय सृष्टिका उक्थ है – आलम्बन है। द्वितीय अक्षरपाद सृष्टिका धारक होने से निमित्त कारण है । तृतीय-चतुर्थ पाद ब्रह्म-सुब्रह्म (quark-gluon plasma) बिभागयुक्त क्षर सृष्टिका उपादानकारण है ।

अव्यय अध्यात्म है । अक्षर अधिदैव है। क्षर अधिभूत है। अव्ययके आनन्द, विज्ञान, मन, प्राण और वाक् (अन्न) – यह पञ्चकोष अथवा कलायें हैं । वाक् के द्वारा ही समस्त विश्व हमारे वोधगम्य होता है । किसी वस्तु का तत्त्व पद (वाक्) के द्वारा निर्देशित होता है । वस्तु उसी पद द्वारा निर्देशित तत्त्व का अर्थ है । इसलिए वस्तुमात्र को पदार्थ (पद+अर्थ) कहते हैं । विश्वके समस्त पदार्थ वाक् हैं । समस्त शक्तिका मूल प्राण ही है । शतपथब्राह्मणम् (६.१.१.१) के मतसे “प्राणा वा ऋषयस्ते यत्पुराऽऽस्मात् सर्वस्मादिदमिच्छन्तः श्रमेण तपसारिषन्-तस्मादृषयः” – प्राण ही वह ऋषि थे जो पूर्वकालसे अपने श्रम और तपसे सबको धारण किया करते हैं (अरिषन् – रिषँ हिं॒साया॑म्, तत् विपरीतः)। प्राणका सप्तविभाग ही सप्तऋषि है। प्राण, अपान, व्यान, उदान, समान – यह ५ सत् प्राण है, २ असत् प्राण – परोरजाप्राण तथा ऋषिप्राण है ।

अव्ययके प्राणनामक कला स्वयम्भूका परोरजा प्राण (जिसे विरज भी कहते हैं), आत्मरूप है – प्रजापति है (प्राणा उ वै प्रजापतिः – शतपथब्राह्मणम् ८.४..१.४) । इसलिये उसे ब्रह्म भी कहते हैं (प्राणा उ वै ब्रह्म – शतपथब्राह्मणम् ८.४.१.३) । मूलकेन्द्र से उठनेवाले रश्मिसमूह को भी प्राण कहते हैं (प्राणो वा अर्कः – शतपथब्राह्मणम् १०-४ -१-२३) । उसके अधीन परमेष्ठी महान् का प्राण अग्नि-सोम (रयि-प्राण) विभागसे भृगु एवं अङ्गिरा नामसे जानेजाते हैं (गोपथब्राह्मणम् पूर्व १.३, ७) । “ध्रुवोऽसि-धर्त्रमसि-धरुणमसि” (यजुः संहिता १.१८) के अनुसार पदार्थों का तीन श्रेणियों में वर्गीकरण हुआ है । ध्रुवावस्था ही निबिडावस्था, अथवा घनावस्था है । धर्त्रावस्था ही द्रवावस्था अथवा तरलावस्था है । एव धरुणावस्था ही वाष्पावस्था, अथवा विरलावस्था है । जगत् के उपादानभूत भृगु और अंगिरा नामक तत्व इन्हीं तीन अवस्थाओं के कारण क्रमशः आप-वायुः-सोमः एवं अग्निः-यम-आदित्यः इन तीन-तीन अवस्थाभावों में परिणत हो रहे हैं । तीनों भार्गव-सौम्य तत्वों में से तथा तीनों आंगिरस-आग्नेय तत्वों में से ध्रुवसोम तथा ध्रुवाग्नि के अन्तर्यामसम्बन्धात्मक चितिसम्बन्ध से ही भौतिक पिण्ड की स्वरूपनिष्पत्ति होती है ।