Author name: Dwaipayan Pradhan

माया के स्वरूप और भेद – भाग ५

स्वायम्भूवा लोकपितामहेन उत्पादकत्वात् रजसोऽतिरेकात् ।कालस्य योगात् नियमाबद्धेन क्षेत्रज्ञयुक्तान् कुरुते विकारान् ॥ ब्रह्माण्ड के प्रत्येक वस्तु एक अन्य का सापेक्ष (relative) है (इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यैसर्वाणि भूतानि मधु …. मधुब्राह्मण । everything is interconnected and interdependent) । कार्य-कारण सम्बन्ध अनादि है । प्रत्येक कार्य का कारण भिन्न है । परन्तु इन वैचित्र्य के मध्यमें […]

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माया के स्वरूप और भेद – भाग ४

जब केवल निजस्वरूपमें अवस्थित सिसृक्षा (सर्जनेच्छा) रूप उपाधिविशिष्ट (जो किसीमें अन्वित हो कर यावत्कालस्थायी हो – जब तक एक रहता है, तब तक अन्य भी रहे – तो उसे विशेषण कहते हैं । इन दोनोंमें से एक रहनेसे, अन्य नहीं रहनेसे, उसे उपाधि कहते हैं । मुमूक्षा आनेपर सिसृक्षा नहीं रहती) परम्ब्रह्मका “बहुस्यां प्रजायेय” इति

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माया के स्वरूप और भेद – भाग ३

प्राणस्य ही क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता । द्रव्यस्फुरणविज्ञानमिन्द्रियाणामनुग्रह । रस का एक प्रदेश को त्याग कर अन्य प्रदेशमें जानेवाला बल ही क्रिया है । क्रिया परिच्छिन्न वस्तुमें कम्प अर्थात स्थानच्युति करती है । परन्तु रस विभु होने से अवयवरहित है । सर्वत्र उसका उपस्थिति है । अतः उसमें स्थानच्युति सम्भव नहीं है । वह अच्युत है । क्रिया भी

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माया के स्वरूप और भेद – भाग २

रस-बल के संसर्ग से विविध विशेष (विशेषताएं – भेद) उदित होते हैं । निर्विशेष सविशेष होता है । यह विशेष रूप कहाँ से आते हैं, कहाँ जाते हैं, यह न जानने के कारण इसे माया कहा जाता है । माया शब्द का अर्थ जिससे परिमित (परिच्छेद) कर के किसीका मान निर्धारण किया जाता है (मा॒ङ् माने॑) ।

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न तस्य प्रतिमाऽअस्ति ।

न तस्य प्रतिमाऽअस्ति ।
जाकिर नायक जैसे पाखण्डी तथा कुछ आर्यसमाजी इस वेदमन्त्र का कदर्थ करते हुए, इसे मूर्तिपूजा का विरोधी प्रचार कर रहे हैँ । वह लोग इस मन्त्र का आंशिक वर्णन कर रहे हैँ तथा तस्य का अर्थ ब्रह्म कह रहे हैँ । जाकिर नायक इसे अल्लाह मान कर बूतपरस्ती के विरुद्ध कह रहा है । उन्हे न शास्त्र का ज्ञान है न मूर्तितत्त्व का ।

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