Author name: Dwaipayan Pradhan

माया के स्वरूप और भेद – भाग ६

ब्रह्म ह वा इदमग्र असीत् स्ययंभ्वेकमेव । ….. तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य ललाटे स्नेहो यदार्द्रमाजायत । तेनानन्दत्तद्ब्रवीन्महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति । तद्यदब्रवीन्महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति तस्मात्सुवेदो ऽभवत्तं वा एतं सुवेदं सन्तं स्वेदइत्याचक्षते परोक्षेण … । गोपथब्राह्मणम् । उस स्ययम्भू ब्रह्मने जब सृष्टिकाम हुआ, तो क्रिया की उत्पत्ति हुई । क्रियासे ताप सृष्टि हुआ । अग्नेरापः […]

माया के स्वरूप और भेद – भाग ६ Read More »

माया के स्वरूप और भेद – भाग ५

स्वायम्भूवा लोकपितामहेन उत्पादकत्वात् रजसोऽतिरेकात् ।कालस्य योगात् नियमाबद्धेन क्षेत्रज्ञयुक्तान् कुरुते विकारान् ॥ ब्रह्माण्ड के प्रत्येक वस्तु एक अन्य का सापेक्ष (relative) है (इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यैसर्वाणि भूतानि मधु …. मधुब्राह्मण । everything is interconnected and interdependent) । कार्य-कारण सम्बन्ध अनादि है । प्रत्येक कार्य का कारण भिन्न है । परन्तु इन वैचित्र्य के मध्यमें

माया के स्वरूप और भेद – भाग ५ Read More »

माया के स्वरूप और भेद – भाग ४

जब केवल निजस्वरूपमें अवस्थित सिसृक्षा (सर्जनेच्छा) रूप उपाधिविशिष्ट (जो किसीमें अन्वित हो कर यावत्कालस्थायी हो – जब तक एक रहता है, तब तक अन्य भी रहे – तो उसे विशेषण कहते हैं । इन दोनोंमें से एक रहनेसे, अन्य नहीं रहनेसे, उसे उपाधि कहते हैं । मुमूक्षा आनेपर सिसृक्षा नहीं रहती) परम्ब्रह्मका “बहुस्यां प्रजायेय” इति

माया के स्वरूप और भेद – भाग ४ Read More »

माया के स्वरूप और भेद – भाग ३

प्राणस्य ही क्रियाशक्तिर्बुद्धेर्विज्ञानशक्तिता । द्रव्यस्फुरणविज्ञानमिन्द्रियाणामनुग्रह । रस का एक प्रदेश को त्याग कर अन्य प्रदेशमें जानेवाला बल ही क्रिया है । क्रिया परिच्छिन्न वस्तुमें कम्प अर्थात स्थानच्युति करती है । परन्तु रस विभु होने से अवयवरहित है । सर्वत्र उसका उपस्थिति है । अतः उसमें स्थानच्युति सम्भव नहीं है । वह अच्युत है । क्रिया भी

माया के स्वरूप और भेद – भाग ३ Read More »

माया के स्वरूप और भेद – भाग २

रस-बल के संसर्ग से विविध विशेष (विशेषताएं – भेद) उदित होते हैं । निर्विशेष सविशेष होता है । यह विशेष रूप कहाँ से आते हैं, कहाँ जाते हैं, यह न जानने के कारण इसे माया कहा जाता है । माया शब्द का अर्थ जिससे परिमित (परिच्छेद) कर के किसीका मान निर्धारण किया जाता है (मा॒ङ् माने॑) ।

माया के स्वरूप और भेद – भाग २ Read More »