Author name: Dwaipayan Pradhan

What is Veda – वेद क्या है? Know from modern physics view

Veda is not the four printed volumes of that name. They are not related to any specific religion. It is the universal book of knowledge of mankind from which all science can be derived. By knowledge – ज्ञानम् is meant the perception of commonalities (called SAADHARMYA – साधर्म्य) of everything in the universe (कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवतीति – what is that knowledge by knowing which, everything becomes known) – to determine the common cause of everything (like the protons and electrons – देवाः – to quark-gluon plasma and beyond -प्रकृतिलयाः – and who or what created these and how, and how do they combine).

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उपनिषत् के पुरुष का स्वरूप

उक्थका सम्बन्ध विश्वके त्रिवृत् करण से है । विश्वमें उक्थ, अर्क, अशीति तीन विभाग है । इन्हे आत्मा, प्राण और पशु भी कहते हैं । जो केन्द्रमें है, जिसके सत्तासे विश्वका अथवा किसी विश्वसन्तान का सत्ता है, उसे उक्थ कहते हैं । उक्थसे निकलने वाले रश्मीयां अर्क कहलाती है । वाहर के भाग अशीति है,

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ॐ कार, प्रणव और उद्गीथ। ॐ प्रेति चेति चेति।

ॐ “कार”है। “कृ॒ञ् कर॑णे” अथवा “कृ॒ञ् हिं॒साया॑म्” धातु से “भावे घञ्”प्रत्यय से उत्पन्न “कारः”शब्द वधः अथवा निश्चयात्मक है। इसीलिये प्रत्येक अक्षरको, जो स्वयं को निश्चितरूपसे अन्य अक्षरों से भिन्न कर के (अपमर्दन कर के) दिखाता है, उसे “कार”कहते हैं – जैसे अकार, ककार, यकार आदि। “शिक्षा”नामक वेदाङ्ग ग्रन्थों में इसके विषय में विशेष चर्चा किया

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जाति का वैज्ञानिक आधार

किसी विदेशी सज्जनने मुझे लेखा कि जातिप्रथा केवल भारतमें ही है तथा यह एक घृणित प्रथा है। उत्तरमें मैंने उनको विश्व इतिहास लेख कर भुल प्रमाणित किया और कहा कि मनु प्रणीत जाति प्रथा विज्ञानसम्मत है। यह genetic mutation के उपर आधारित निहित कौशल (potential for excellence in a field) जानने के पन्था है। नीचे

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वेद में अवतार ३ – कूर्म अवतार

शतपथब्राह्मणम् – 7-5-1-1 में कहा गया है – “कूर्ममुपदधाति । रसो वै कूर्मः । रसमेवैतदुपदधाति । यो वै स एषां लोकानामप्सु प्रविद्धानां पराङ्रसोऽत्यक्षरत् स एष कूर्मः । तमेवैतदुपदधाति । यावानु वै रसः तावानात्मा । स एष इम एव लोकाः ।“ विश्व में परिव्याप्त रसः (quark-gluon plasma) ही विश्व का मूल प्रतिष्ठा है (यावानु वै रसः

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