Author name: Dwaipayan Pradhan

अभिधान रहस्य – VEDIC NOMENCLATURE

by Basudeba Mishra What is the necessity of nomenclature? It is necessary because we perceive objects only after identifying it with a “speech form” – वाक्, whose means of expression is equivalent to the written or spoken words. Such speech form can be of two types: व्युत्पन्न – expressed and understood and अव्युत्पन्न – unexpressed, […]

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ON OBJECTIVE REALITY

by Basudeba Mishra There are no paradoxes – but only ignorance. Ref: arxiv.org/abs/1902.05080: Experimental Rejection of Observer-Independence in the Quantum World. Like most of the terms, there is no precise definition of reality in quantum physics. “Quantum Reality” examines what “reality” means to a physicist including case histories of a reality that failed (the luminiferous

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नवदुर्गा रहस्य – 4

नवदुर्गा रहस्य 1, नवदुर्गा रहस्य 2, नवदुर्गा रहस्य 3 by Basudeba Mishra ॐ अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्र्चराम्यहमादित्यैरुत विश्र्वदेवैः।अहं मित्रावरुणोभा बिभर्म्यहमिन्द्राग्नी अहमश्र्विनोभा ॥अहंसोममाहनसं बिभर्म्यहं त्वष्टारमुत पूषणं भगम्।अहं दधामि द्रविणं हविष्मते सुप्राव्ये यजमानाय सुन्वते ॥ अव्ययपुरुष के रस भाग, जो दिग्-देश-काल से अपरिच्छिन्न है, सत्ता-चेतना-आनन्द (सच्चिदानन्द) रूपी सदा अपरिवर्त्तनीय धर्म से तथा बलभाग, जो दिग्-देश-काल से परिच्छिन्न है, नाम-रूप-क्रिया

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नवदुर्गा रहस्य – 3

by Basudeba Mishra नवदुर्गा रहस्य 1, नवदुर्गा रहस्य 2, नवदुर्गा रहस्य 4 शक्तिभेद के कारण आत्मा के तीन व्यूह होते हैँ । अव्यय पुरुष में रस के साथ बल का विभूति संसर्ग से ज्ञानार्थक मन, योग संसर्ग से क्रियात्मक प्राण तथा बन्ध संसर्ग से अर्थात्मक वाक् वनता है । सम्पूर्ण ज्ञान का आयतन स्थान मन

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नवदुर्गा रहस्य – 2

by Basudeba Mishra नवदुर्गा रहस्य 1, नवदुर्गा रहस्य 3, नवदुर्गा रहस्य 4 न तस्य कार्यं करणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते । परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञानबलक्रिया च ॥ श्वेताश्वेतर उपनिषत् ६-८ ॥ अक्षरात्सम्भवतीह विश्वम् ॥ मुण्डकोपनिषत् १-१-७ ॥ शुद्ध रूपसे रस (रसो वै सः – तैत्तिरीयोपनिषत् – २-७) और बल (नायमात्मा बलहीनेन लभ्यो –

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