नाडीपरिक्षा ।
वातं पित्तं कर्फ द्वन्दं सन्निपातं रसं त्वसृक् । साध्यासाध्यविवेकश्च सर्वं नाडी प्रकाशयेत् ॥
वात-पित्त-कफ, इनका द्वन्द (वात-पित्त, वात-कफ, पित्त-कफ) तथा सन्निपात (समस्त दोष), एवं रोगों का साध्यासाध्यविवेक (कौन रोग साध्य है, कौन नहीं), यह सब नाडी प्रकाश करती है। नाडीपरिक्षा केवल स्पन्दनसंख्या (pulse rate) गणन नहीं है। नाडीपरिक्षाके अभ्यास किए बिना केवल पुस्तक पढ- सुन कर अथवा संख्यागणन कर नाडीज्ञान प्राप्तकरना असम्भव है। उसकेलिए अभ्यास द्वारा स्पर्शज्ञान का विकाश करना चाहिए। प्रथम सुस्थपुरुषका नाडीपरिक्षा अभ्यास करने के पश्चात् रोगी का नाडीपरिक्षा करना चाहिए। सुलभ ग्रन्थों में से रावणकृत नाडीपरिक्षा इस विषय पर एक श्रेष्ठ ग्रन्थ है ।
उर्ध्वं प्राणमुन्नयति अपानं प्रत्यगस्यति ।मध्ये वामनमासीनं सर्वेदेवा उपासते ॥ .... तत्र नाड्यः समुत्पन्नाः सहस्राणि द्विसप्तति ।...
सततं प्राणवाहिन्यः सोमसूर्याग्निदेवताः । इडापिङ्गलासुषुम्नास्तिस्रो नाड्यः प्रकीर्तिताः ॥
शरीर के उर्द्ध्वभागमें रहनेवाला प्राणवायु उपरको जाता है। अपानवायु नीचे की दिशा में गति कराता है। परन्तु मध्यमें स्थित व्यानवायु ही इनको समतुलित करता है। तभी प्राणी जीवित रहते हैं। व्यानवायु के आधारभूता नाडियों के संख्या ७२,००० है। इनमें प्रतिनाडी शाखाओँ का सङ्कलन कर देने से इनके संख्या ७२,७२,१०,१०१ हो जाती है। इनमें १० अथवा १४ मूख्य मानीजाती है। उनमेंसे भी तीन – इडा-पिङ्गला-सुषुम्ना तथा इनमेंभी सुषुम्ना प्रधान मानीजाती है । यह नाडियाँ छिद्रयुक्त होते हैं। इनसे भुक्तपदार्थों का रस आकुञ्चन-प्रसारण द्वारा समग्र शरीरमें सञ्चरित होकर देहका पोषण करते हैं। जब किसीप्रकारके मिथ्या आहार-विहार से शरीरस्थ रस-रक्तादिका समूह ह्रास होकर विकारप्राप्त होते हैं, तो नाडियोँके गतिमें परिवर्तन होती है। जैसे सुदक्षवादक रागरागिणियोंको सुनकर वीणाके कौनसे तन्त्रियों द्वारा बजाया जारहा है यह जान जाता है, उसीप्रकार सुदक्षवैद्य नाडियोंके गतिसे उनके अवस्थाको जानकर रोगका निदान करता है। नाडीशास्त्र बहुत सूक्ष्म है। नीचे कतिपय उदाहरण दिए जा रहे हैं।
आदौ वातवहा नाडी मध्ये वहति पित्तला।अन्ते श्लेष्मविकारेण नाडीकेति त्रिधा मता ॥ वातेऽधिके भवेन्नाडी प्रव्यता तर्जनीतले ।
पित्ते व्यक्ताऽथ मध्यायां तृतीयाङ्गुलिगा कफे ॥
तर्जनीमध्यमामध्ये वातपित्ताधिके स्फुटा। तर्जन्यनामिकामध्ये व्यक्ता वातकफे भवेत् ॥
मध्यमानामिकामध्ये स्फुटा पित्त कफे भवेत् । अङ्गुलित्रितयेऽपि स्यात् प्रव्यक्ता सन्निपाततः ॥….
भूलताभुजगप्राया स्वच्छा स्वास्थ्यमयी शिरा। सुखितस्य स्थिरा ज्ञेया तथा बलवती मता ॥
प्रातः स्निग्धमयी नाडी मध्याह्नेऽप्युष्णतान्विता । सायाह्ने धावमाना च चिराद्रोगविवर्जिता ॥ स्थिरा श्लेष्मवती ज्ञेया मिश्रिते मिश्रिता भवेत् ॥ सर्पजलौकादिगतिं वदन्ति विबुधाः प्रभञ्जने नाडीम् ।
वातावक्रगता नाडी चपला पित्तवाहिनी।
पित्तेन काकलावकभेकादिगतिं विदुः सुधियः ॥ राजहंसमयुराणां पारावतकपोतयोः ।
कुक्कुटस्य गतिं धत्ते धमनी कफसंसृता ॥… आदि ॥
दुःख का विषय है कि इतना उन्नत रोगनिर्णय पद्धति को हमारे आयुर्वेद पाठ्यक्रम (syllabus) से बाहर रखागया है तथा stethoscope पकड़ा दिया गया है। ताकि विभिन्न परिक्षा (mechanical diagnostic tools) के नाम से रोगी का प्राण के साथ-साथ धन का भी हरण किया जा सके।
रसविज्ञान ।
रसदोषविभागज्ञः प्रकोपोपशमं प्रति । भिषभिषक्त्वं लभते विपर्ययमथान्यथा ॥
रस और दोषके विभागों को जाननेवाला वैद्य रोगों के प्रकोप तथा उपशम के प्रति भिषक्त्व (वैद्यत्व) को प्राप्त करता है ।
पृथिवी आदि पञ्चभूतों में चव्य (चबा कर खाने वाला), चोष्य (चुष कर खाने वाला), लेह्य (चाट कर खाने वाला), पेय (पीने वाला), भक्ष (सब मिलकर खाना), भोज्य (अलग अलग-course by course- खाने वाला) भेद से तथा मधुर-कषाय-तिक्त-अम्ल-क्षार-कटु भेद से छह प्रकार वाला, शीत-उष्ण भेद से दो प्रकार के वीर्य वाला अथवा शीत उष्म-स्निग्ध-रुक्ष-विशद – पिच्छिल-मृदु-तीक्ष्ण भेद से आठ प्रकार के वीर्य वाला, अथवा पूर्वोक्त विंशति गुणों वाला, आहार का भोजन करने पर, , इससे सम्यक् परिपाक होने से जो तेजोभूत परम सूक्ष्म सार निर्मल श्रेष्ठ अंश रहता है, उसे रस कहते हैं। सम्पूर्ण शरीरावयव में दोष-धातु मल-आशय में प्रसारित यह रस, द्रव के समान अनुशरणशील, स्नेहन, जीवनदायी, तर्पण, धारण, अवष्टम्भन आदि भेदों से सौम्य माना जाता है।
पञ्चभूतों में से भोगाधिष्ठान शरीर पाथिवभूत प्रधान है। आकाश निष्क्रिय है। अतः अन्य तीन भुत परष्पर विकारसृष्टि करते हैं। दो भुतोंके मिलनसे गति उत्पन्न हो कर जो विकार होता है, उसे रस कहते हैं (रसँ आस्वादनस्य ) | इनमें जल, अग्नि एवं वायु पृथ्वीके साथ मिलकर तीन प्रकारके रस सृष्टि करते हैं। अग्नि एवं वायु, जलके साथ मिलकर दो प्रकारके रस सृष्टि करते हैं। अग्नि वायु के साथ मिलकर एक प्रकारके रस सृष्टि करता है। सब मिलाकर रस ६ प्रकारके हैँ ।
इनमें पृथ्वी तथा जलके सम्मिश्रणमें मधुररस का सृष्टि होता है। पृथ्वी तथा अग्निके सम्मिश्रणमें अम्लरस का सृष्टि होता है। पृथ्वी तथा वायुके सम्मिश्रण में कषायरस का सृष्टि होता है। अग्नि तथा जलके सम्मिश्रणमें लवणरस का सृष्टि होता है। अग्नि तथा वायुके सम्मिश्रणमें कटुरस का सृष्टि होता है। वायु तथा जलके सम्मिश्रणमें तिक्तरस का सृष्टि होता है। परन्तु रस द्रव्यश्रित होने से, द्रव्यमात्र ही पञ्चभौतिक होने से, तथा तिक्तरसमें जल का न्यूनता तथा अवकाश (आकाश) का आधिक्य होने से वायु तथा आकाशके सम्मिश्रणमें तिक्तरस का सृष्टि कहा जाता है।
प्रश्न हो सकता है कि आयुर्वेदमें प्रोटिन, भिटामिन आदि का उल्लेख क्यों नहीं है ?
उत्तर है कि यह अवैज्ञानिक वर्गीकरण है। प्रोटिन, भिटामिन आदि हमारे खाद्यमें स्वतन्त्ररूप से नहीं पाएजाते। यह कार्बन, अक्सिजेन, हाइड्रोजेन, नाइट्रोजेन, फोसफोरस आदि अणुओंके विशेष मिश्रण है। यह भी एक तत्त्व नहीं है । २० एमिनो एसिड् (amino acid) के सम्मिश्रण से प्रोटिन बनता है। प्रत्येक एमिनो एसिड् में एक कार्बन, एक एमाइन ग्रुप (NH2), एक कार्बोक्सिल (COOH), एक हाइड्रोजेन अणु, २० एमिनो एसिडों का एक एक साइड चेन (R group) के साथ जुड़े होते हैं, जो एक आल्फा कार्बन से (Alpha Carbon is the carbon adjacent to the carbonyl. The functional group C =O is called a “carbonyl”) पोलिपेप्टाइड बाँण्डू से जुड़ा रहता है। एमिनो एसिड् घनता प्राप्त होते हुए एक एक कार्बोक्सिल ग्रुप से एक OH छोडता है तथा अन्य ग्रुप से एक हाइड्रोजेन छोडता है। दोनों मिलकर पानी बन जाते हैं।
उसी प्रकार भिटामिन भी १३ प्रकार के हैं, जो अलग अलग नामों से जाने जाते हैं और जिनका रासायनिक सङ्गठन भी भिन्न है। उदाहरण के लिए, Vitamin
A, retinol है, vitamin C ascorbic acid है, vitamin D calciferol है, आदि। प्रोटिन के अणु पिरियडिक टेविल में पाये जाते हैं। परन्तु भिटामिन
स्थूलभूतों (molecules) से बनते हैं। हमारे खाद्य में प्रोटिन, भिटामिन आदि अलग से अपने अस्तित्व बनाये नहीं रखते, परन्तु सम्मिलित अवस्था में रहते हैं ।
जैसे पानी पीते हुए हम नहीँ कहते है कि हम अक्सिजेन, हाइड्रोजेन पी रहे हैं (कारण उनका सम्मिलित रूप होते हुए भी पानी का गुण और कार्य अक्सिजेन,
हाइड्रोजेन के गुण और कार्य से सर्वथा भिन्न है), उसीप्रकार हम खाद्य खाते हुए नहीं कह सकते कि हम प्रोटिन, भिटामिन आदि खा रहे हैं ।
परन्तु रस के विषय में ऐसी विप्रतिपत्ति नहीं है। रस का आधार विज्ञान सम्मत है। उदाहरण के लिए मधुर रस को लिजिए। ग्लुकोज का रासायनिक सङ्गठन C6H1206 है, जिसे हम 6(C+H2O) लिख सकते हैं । यत् काठिन्यं तत् पृथिवी – यह सिद्धान्त से कार्बन पृथ्वीतत्त्व है, जो सारे अर्गानिक तत्त्वों का मूल है। उससे जल मिलकर मधुर रस बनता है यह प्रमाणित होता है। अन्य रसों के विषय में भी उसीप्रकार समझना चाहिए। अब हमारे शरीरमें देखिए ।
प्रमेह तथा मधुमेह (diabetes) सहज (hereditary) तथा अपथ्यनिमित्त (life style based) भेद से दो प्रकार के है। इनमें सहजप्रमेह से पीडित रोगी कृश, रूक्ष, अल्प खानेवाला, पिपासायुक्त तथा भ्रमणप्रिय होता है। अपथ्यनिमित्त प्रमेह से पीडित रोगी स्थूल, अधिक खानेवाला, स्निग्ध, शय्या आसन-स्वप्नशील होता है । जिन स्त्रीयों का मासिकधर्म नियनित होता है, उनको प्रमेह नहीं होता। निदान-दोष- दुष्य का परष्पर अनुबन्ध से रोगोत्पत्ति होता है। श्लेष्माजनक-मेद एवं मूत्र बृद्धिकर खाद्य का अतिरिक्त सेवन, शरीरमार्जन (स्नान, मल-मूत्र विसर्जन) एवं परिश्रम का त्याग प्रमेह का कारण है । अत्यधिक श्लेष्मा इसका मूल कारण है। श्लेष्मा घन होने से निकल जाता है। परन्तु पतला कफ शरीरके स्रोतवाही नाडियों में रहकर सान्द्रता के कारण उनमें गतिरोध सृष्टि करता है। जैसे पानी के नल दुषित जलप्रवाह से गुल्म (moss) सृष्टि हो कर पानी के साथ निकलते हैं, उसीप्रकार श्लेष्मा भी कठिनत्व प्राप्त (पार्थिव गुण युक्त) हो कर निकतला है । पृथ्वी तथा जल के सम्मिश्रणमें मधुररस का सृष्टि होता है। अतः मूत्र के साथ मधुर रस (sugar) निकलता है। मधुर रस (sugar) एक लक्षण है। रोग नहीं है । रोग तो प्रमेह तथा मधुमेह (diabetes) है। आधुनिक पद्धति में केवल उसी लक्षण का नियन्त्रण किया जाता है (Allopathy manages the symptoms – hence generates side effects ) रोग का चिकित्सा नहीं किया जाता। केवल आयुर्वेद ही रोग का चिकित्सा करता है (Ayurveda treats – the system – hence no side effect) ।
मधुरः कषायस्तिक्तोम्लकश्च क्षारः कटुः षड्सनामधेयम् । द्वयं द्वयं वाककफप्रकोपनं द्वयं तथा पित्तकरं वदन्ति ॥
– वासुदेव मिश्र
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