आयुर्वेदः – आयुका वेद – सम्पूर्ण रोगमुक्तपद्धति – भाग ३

रसचिकित्सा ।

व्यासतस्तु ज्वरादीनां व्याधीनां दोषभेदतः । 
द्विषष्टिधा कल्पनोक्ता स्थूलसंख्या त्वतः परम् ॥
एकैकशस्त्रयो द्वन्दैर्नव सर्वे त्रयोदश । 
क्षीणाधिकसमैश्चान्यैर्दश द्वौ च प्रकीर्तिताः ।

आधुनिक विज्ञान में गणित का स्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण है। अतः कुछ गणित का चर्चा करते हैं। भारतीय गणितमें चित्त्युत्तर एक प्रस्तार शैली है, जिसे आधुनिक काल में recursive matrix or Pascal’s Triangles नाम से जाना जाता है। भरत इसे कुछ परिवर्तन के साथ मेरुप्रस्तार नाम से व्यवहार किया। इसका उपयोग छन्दशास्त्र, नाट्यशास्त्र तथा आयुर्वेद में मिलता है। षड् रसों का मिश्रण से चित्त्युत्तर प्रस्तार मे ६२ प्रकार के मिश्रितरस बन जाते हैं। उसीप्रकार तीन दोषों का बृद्धि ह्रास भेद से ६ भेद हो जाते हैं, जिनका मिश्रण से चित्त्युत्तर प्रस्तार मे ६२ प्रकार के रोग बन जाते हैं। अन्य समस्त अवान्तर रोग इन ६२ प्रकार के रोगों के अन्तर्गत आ जाते हैं। इन ६२ रसों से उन ६२ रोगों का चिकित्सा किया जा सकता है।

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वात-पित्त-कफ के पृथक् पृथक् विकार (वातवृद्ध, पित्तवृद्ध, कफवृद्ध) तीन प्रकार के होते हैं ।

द्वन्दज (द्विदोषज) विकार ९ प्रकार के होते हैं (वात-पित्त समवृद्ध, वात-कफ समवृद्ध, पित्त-कफ समवृद्ध, वातवृद्ध-पित्तवृद्धतर, पित्तवृद्ध वातवृद्धतर, कफवृद्ध पित्तवृद्धतर, पित्तवृद्ध-कफवृद्धतर, वातवृद्ध-कफवृद्धतर, कफवृद्ध-वातवृद्धतर) ।

सम्पूर्णदोषों (सन्निपातज विकार) १३ प्रकार के होते हैं। इनमें दो दोषों के अधिकता से कफवृद्ध वातपित्तदोनों अधिकवृद्ध, पित्तवृद्ध-वातकफदोनों अधिकवृद्ध, वातवृद्ध-पित्तकफदोनों अधिकवृद्ध यह ३ विकार होते हैं। सन्निपातमें एक दोष के अधिकता से पित्तकफदोनोंवृद्ध-वात अधिकवृद्ध, वातकफदोनोंवृद्ध पित्त अधिकवृद्ध, वातपित्तदोनोंवृद्ध-कफअधिकवृद्ध यह ३ विकार होते हैं। तीनों दोषों के हीन-मध्य-अधिक भेद से सन्निपात ६ प्रकार के होते हैं – वातवृद्ध पित्तवृद्धतर-कफवृद्धतम, वातवृद्ध-कफवृद्धतर-पित्तवृद्धतम, पित्तवृद्ध-कफवृद्धतर-वातवृद्धतम, पित्तवृद्ध-वातवृद्धतर-कफवृद्धतम, कफवृद्ध-वातवृद्धतर पित्तवृद्धतम, कफवृद्ध-पित्तवृद्धतर-वातवृद्धतम वात-पित्त-कफ तीनों समवृद्ध होने से एकप्रकार का विकार होते हैं। सब मिलाकर वृद्ध (बढे हुए) दोष २५ प्रकार के होते हैं ।

उसीप्रकार क्षीण दोष भी २५ प्रकार के होते हैं। कुल मिलाकर ५० प्रकार के वृद्ध और क्षीण दोष होते हैं। दो दोष क्षीण-एक दोष वृद्ध, तथा एक दोष क्षीण-दो दोष वृद्ध (भेद से विकार ६ प्रकार के होते हैं- कफपित्तक्षीण-वातवृद्ध, वातपित्तक्षीण-कफवृद्ध, वातपित्तक्षीण-कफवृद्ध, वातक्षीण-कफपित्तवृद्ध, पित्तक्षीण वातकफवृद्ध, कफक्षीण वातपित्तवृद्ध । एक दोष क्षीण-एक दोष वृद्ध तथा एक सम के भेदसे विकार ६ प्रकार के होते हैं – कफक्षीण-पित्तसम-वातवृद्ध, पित्तक्षीण कफसम-वातवृद्ध, वातक्षीण-कफसम-पित्तवृद्ध, कफक्षीण-वातसम-पित्तवृद्ध, वातक्षीण-पित्तसम-कफवृद्ध, पित्तक्षीण वातसम-कफवृद्ध । इसप्रकार सब मिलाकर दोष (रोग) ६२ प्रकार के होते हैं। इसके अतिरिक्त वात-पित्त-कफ के प्रकृतिस्थ होनेपर एक भेद और होता है, जो आरोग्य है (कुल ६३ भेद) । वात पित्त-कफ के क्षीणता-वृद्धता तथा समता के भेदसे रोगों का असंख्य विकल्प हो जाते हैं, जो उन ६२ भेद के अन्तर्गत होते हैं।

रसानां तु विकल्पाः स्युरेकैकश्येन षट् स्मृताः । 
पूर्वः पूर्वः परैर्युक्तो द्विकाः पञ्चदशापरे ॥

अब रस का भी ६३ भेद करते हैं।

  1. एक-एक रस भेदसे मधुर-अम्ल-कटु-लवण-तिक्त-कषाय- यह ६ प्रकार के होते हैं।
  2. द्विक (दो रसोँ का संयोग) पुर्व पुर्व के रस पर रस में मिलने से १५ भेद हो जाते हैं – मधुर अम्ल, मधुर कटु, मधुर-लवण, मधुर-तिक्त, मधुर-कषाय, अम्ल-कटु, अम्ल-लवण, अम्ल-तिक्त, अम्ल-कषाय, कटु-लवण, कटु-तिक्त, कटु-कषाय, लवण तिक्त, लवण-कषाय, तिक्त-कषाय ।
  3. त्रिक (तीन-तीन रसों का संयोग) भेदसे रस मधुर अम्ल-कटु, मधुर अम्ल-लवण, मधुर अम्ल-तिक्त, मधुर-अम्ल-कषाय, मधुर-कटु-लवण, मधुर-कटु-तिक्त, मधुर-कटु-कषाय, मधुर-लवण-तिक्त, मधुर-लवण-कषाय, मधुर-तिक्त-कषाय, अम्ल-लवण-कटु, अम्ल-लवण-तिक्त, अम्ल-लवण-कषाय, अम्ल-कटु-तिक्त, अम्ल-कटु-कषाय, अम्ल-तिक्त-कषाय, लवण-कटु-तिक्त, लवण-कटु-कषाय, लवण-तिक्त-कषाय, कटु-तिक्त-कषाय यह २० प्रकार के होते हैं ।
  4. चतुष्क (चार-चार रसों का संयोग) भेद से रस मधुर-अम्ल-लवण-कटु, मधुर अम्ल-लवण- तिक्त, मधुर-अम्ल-लवण-कषाय, मधुर-अम्ल-कटु-तिक्त, मधुर अम्ल-कटु-कषाय, मधुर-अम्ल-तिक्त-कषाय, मधुर-लवण-तिक्त-कषाय, मधुर-कटु-तिक्त-कषाय, मधुर-लवण-तिक्त-कषाय, मधुर-कटु-तिक्त-कषाय, अम्ल लवण-कटु-तिक्त, अम्ल-लवण-कटु-कषाय, अम्ल-लवण-तिक्त-कषाय, अम्ल-कटु- तिक्त-कषाय, लवण कटु- तिक्त-कषाय यह १५ प्रकार के होते हैं ।
  5. पञ्चकान् (पञ्च-पञ्च रसौँ का संयोग) भेद से रस मधुर अम्ल-कटु-लवण- तिक्त, मधुर अम्ल-कटु-लवण-कषाय, मधुर अम्ल-लवण कटु-तिक्त-कषाय, मधुर-कटु-लवण-तिक्त-कषाय, अम्ल-कटु-लवण-तिक्त-कषाय यह ६ प्रकार के होते हैं। सब मिलाकर रस ६२ प्रकार के होते हैं ।
  6. षट्कम् एक प्रकार के मधुर-अम्ल-कटु-लवण-तिक्त-कषाय होता है। सब मिलाकर योग ६३ प्रकार के होते हैं।
एषा त्रिषष्टिर्व्याख्याताः रसानांरसचिन्तकैः । दोषभेदत्रिषष्ट्यां तु प्रयोक्तव्या विचक्षणैः ॥

दोष तीन हैं वात-पित्त-कफ रस छह है। एक एक रस एक एकदोष को बढ़ाता है तथा एक एक दोष को शान्त करता है। षड् रसों में से लवण और कषाय वात प्रकोपक- कफ शामक, मधुर और तिक्त कफ प्रकोपक- पित्त शामक कटु और अम्ल पित्त प्रकोपक- वात शामक हैं। वैद्य रसोँ के सम्यक् योग के द्वारा रोगी का चिकित्सा करें।

अशनकल्प ।

यथा बिषं यथा शस्त्रं यथाऽग्निरशनिर्यथा ।
तथौषधमविज्ञातं विज्ञातममृतोपमम् ॥ 
अन्नस्य नास्ति वा दोषो न भवति कदाचन । 
अमात्रयाभिसंयुक्तममृतं बिषमेव तत् ॥
सर्ववस्तुस्वरूपेण सुधा भवति वै ध्रुवम् । 
अन्योन्य द्रव्यसंसर्गात् बिषं भवति बै तृणम् ॥

जब देवताओं ने अमृत हर लिए, असुरों ने ब्रह्माजी से अनुरोध किया कि हमें भी कुछ विकल्प दो। तो ब्रह्माजी ने अमृत के विकल्प रस व्यवस्था किया था। इस विषयमें राबणकृत अर्कप्रकाश ग्रन्थमें विस्तृत वर्णन है। जिसमें रस, गुण, वीर्य, विपाक तथा शक्ति होता है, उसे औषध कहते हैं। आहार का अष्ट विशेष आयतन है प्रकृति-करण-संयोग-राशि-देश-काल-उपयोगसंस्था उपभोक्ता (अथवा उपयोक्ता) ।

  • प्रकृति – गुरु-लघु आदि पूर्वोक्त विंशति गुण है।
  • करण – स्वाभाविक द्रव्यों का संस्कार तथा अन्य गुणों का आधान । अग्निसंयोग, शौच, मन्थन, देश, काल इत्यादि हेतु, भावना आदि हेतु, अधिक समय पात्रविशेष में रखने हेतु आदि ।
  • संयोग – एकत्रीकरण हेतु जात गुण- यथा विरुद्ध भोजन । मधु-मत्स्य- दुग्ध एकत्रभोजन नहीं करना चाहिए। नारङ्गी और गाजर, अनन्नास और दुध, पपीता और नीबू, अमरुद और केला, सन्तरा और दुध, केला और नीबू, मूली और दुध एकत्रभोजन नहीं करना चाहिए ।
  • राशि – सर्वग्रह (सर्वसम्मिलनात् एकपिण्डेन भोजनम्), परिग्रह ( भिन्न भिन्न ग्रहणात् देश – द्रव्यों का उत्पत्तिस्थल, प्रचार एवं सात्म्य स्थानीय उत्पाद ही स्वास्थ्यकर होता है। बहिरागत अस्वास्थ्यकर ।
  • काल – नित्यग (ऋतुसात्म्यापेक्षी- ऋतुफल ही स्वास्थ्यकर होता है, ऋतुबहिर्भूत अस्वास्थ्यकर) तथा आवस्थिक (विकारापेक्षी) ।
  • उपयोगसंस्था – जो भोजन के जीर्ण होने का लक्षण को अपेक्षा रखता है। उपयोक्ता – ओकसात्म्य (अभ्यासवशात् हितकर भोजन जिसके अधीन है।
आहाराः पञ्चधा प्रोक्ता देहपुष्टिकराः शुभाः ।
अन्नकाञ्जिकपिष्टतद्रोटिकासाररूपतः ॥

देह पुष्टिकर आहार पञ्चप्रकार के हैं – अन्न (सिद्ध), काञ्जिक (धान्याम्ल), पिष्ट (वाष्पसिद्ध), रोटि (अग्निसिद्ध), सार (चूर्णरूप – सत्तु) ।

आहारमात्रा– उदर का एकतृतीयांश खाद्य, एकतृतीयांश जल तथा एकतृतीयांश वायु द्वारा पूरण करना चाहिए।

अनुपानम् – खाने के पश्चात् आहार के विपरीत गुण वाला तथा धातु के अविरोधी, मात्रा, काल, व्याधि एवं भक्षान्न विचारपूर्वक अनुपान करना चाहिए । जल सबका अनुपान है ।

द्वादश अशन प्रविचार

शीतल आहार – तृष्णा, उष्ण, मद्यप, दाह, रक्तपित्त, बिष, मूर्च्छापीडित, स्त्रीप्रसङ्गमें क्षीण व्यक्तियों के लिए।

उष्ण आहार – कफ तथा वातरोगी, विरेचन कियाहुआ व्यक्ति, स्नेहपायी, क्लिन्नशरीरवाला व्यक्तियों के लिए।

स्निग्ध आहार – वातप्रधान, ऋक्षदेह, श्रमपीडित, व्यायामकारी व्यक्तियों के लिए । रुक्ष / द्रव आहार – मेदयुक्त, प्रमेहपीडित, कफयुक्तशरीरवाला व्यक्तियाँ के लिए । द्विकालीक आहार – समअग्नियुक्त व्यक्तियों के लिए | मात्राहीन / औषधयुक्त आहार – जो औषधसेवन करना नहीं चाहता हो, मन्दाग्निपुरुष, रोगीको खाद्यके साथ मिलाकर औषध देना हो तो ।

शुष्क आहार – शुष्क / क्लिन्न शरीर, पिपासार्त्त, दुर्वल, ब्रणयुक्त, प्रमेहपीडित व्यक्तियों के लिए ।

एककालिक आहार – दुर्बल अग्निको बढ़ाने के लिए।

दोषशामक आहार – ऋतु अनुकुल भोजन ।

वृत्त्यर्थ आहार – स्वस्थपुरुषका जीवनधारण करने के लिए आवश्यक भोजन ।

शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम् ॥