Essays of gurudeva

विचारशून्यता

ॐ इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमा॑हु॒रथो॑ दि॒व्यः स सु॑प॒र्णो ग॒रुत्मा॑न् ।एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः ॥ ऋग्वेदः १-१६४-४६ ॥ वही एक आदित्य (सूर्य) के महिमाओं को जाननेवाले इन्द्र (सबका ईन्धन), मित्र (विपरीत – द्वन्द – के माध्यम से हितसाधन करनेवाला), वरुण (सङ्कुचित कर सबका संहति करनेवाला), सुपर्ण (अन्तरिक्षमें गतिशील रश्मी – cosmic rays), अग्नि (सवका प्रेरक), […]

विचारशून्यता Read More »

पदार्थधर्मसंग्रह का विज्ञान – Corrections to the Standard Model

पदार्थधर्मसंग्रह का विज्ञान – मानक प्रतिरूप का त्रुटी दर्शन तथा संशोधन । – श्रीवासुदेव मिश्र। आधुनिक विज्ञानमें क्वांटम क्रोमो-डायनेमिक्स (Quantum Chromo-Dynamics or QCD), मानक प्रतिरूप (Standard Model) का एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और जटिल सिद्धान्त है । मानक प्रतिरूप आधुनिक विज्ञानका श्रेष्ठतम कृतियों में से एक माना जाता है, जो कि सत्य नहीं है ।

पदार्थधर्मसंग्रह का विज्ञान – Corrections to the Standard Model Read More »

स्वर्ग क्या है ? What is swarga?

स्वर्ग क्या है ? WHAT ARE HEAVEN AND HELL? – Shri Basudeba Mishra What is heaven – SWARGAH (स्वर्गः)? There is no proof that heaven is a material place where God resides. In fact, the term God (देवाः – दिव्यत्येनेनेति, दिवुँ क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिग॒तिषु॑) is not understood properly. It is not a Superman or Super being, as

स्वर्ग क्या है ? What is swarga? Read More »

गुरुतत्त्वम् ।

– श्रीवासुदेव मिश्र। ॐ सहनाववतु सह नौ भुनक्तु सह वीर्यं करवावहै ।तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै ।। ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।। गुरु शब्द गॄ नि॒गर॑णे, गॄ वि॒ज्ञाने॑ तथा गॄ शब्दे॑ धातु से निष्पन्न होता है । गिरत्यज्ञानं – अज्ञान का नाश कर, गृणात्युपदिशति धर्म्मं – धर्म-अधर्म को परिभाषित कर विज्ञान (विशिष्ट ज्ञान) का उपदेश करना, तथा गीर्य्यते स्तूयते वा कर्म्माणि – नाम-रूप-कर्म-बान्धवः (स्नेहेन बध्नाति यः – interaction partner)

गुरुतत्त्वम् । Read More »

काण्व भोजनविधिः

शुक्लयजुर्वेदीय काण्व नित्यविधि का अङ्ग। श्रीशुक्लयजुर्वेदकण्वशाखीयः नित्यविधिः( आचारमार्तण्ड : )श्रीमत्पूज्य मज्ञेश्वराध्वरिसुरिसूनवः श्रीचिदम्बर सोमयाजिनः( बडली ) इत्येतैः परिष्कृत्य सुसंस्कृतः । ॥ अन्नसमर्पणविधिः ॥  पात्राघो भागे मण्डलं कृत्वा तदुपारि भोजनपात्रं निघाय तत्र मध्ये ओदनं वामे भक्ष्यभोज्य दक्षिणे घृतपा यसं पुरतः शाकादीन् इति परिवेषणं कारयित्त्वा ॐ तत्स॑वि॒तुर्वरे॑ण्यं॒० इत्यन्नं प्रोक्ष्य नानापात्रस्थमन्नं तस्मै तस्मै सम्प्रददे इति सङ्कल्प्य प्रजापत इत्यस्य हिरण्यगर्भ

काण्व भोजनविधिः Read More »

Vyasa Sewaka
Namaskara! Ask me anything about this website's content.