विचारशून्यता
ॐ इन्द्रं॑ मि॒त्रं वरु॑णम॒ग्निमा॑हु॒रथो॑ दि॒व्यः स सु॑प॒र्णो ग॒रुत्मा॑न् ।एकं॒ सद्विप्रा॑ बहु॒धा व॑दन्त्य॒ग्निं य॒मं मा॑त॒रिश्वा॑नमाहुः ॥ ऋग्वेदः १-१६४-४६ ॥ वही एक आदित्य (सूर्य) के महिमाओं को जाननेवाले इन्द्र (सबका ईन्धन), मित्र (विपरीत – द्वन्द – के माध्यम से हितसाधन करनेवाला), वरुण (सङ्कुचित कर सबका संहति करनेवाला), सुपर्ण (अन्तरिक्षमें गतिशील रश्मी – cosmic rays), अग्नि (सवका प्रेरक), […]