Essays of gurudeva

माया के स्वरूप और भेद – भाग ४

जब केवल निजस्वरूपमें अवस्थित सिसृक्षा (सर्जनेच्छा) रूप उपाधिविशिष्ट (जो किसीमें अन्वित हो कर यावत्कालस्थायी हो – जब तक एक रहता है, तब तक अन्य भी रहे – तो उसे विशेषण कहते हैं । इन दोनोंमें से एक रहनेसे, अन्य नहीं रहनेसे, उसे उपाधि कहते हैं । मुमूक्षा आनेपर सिसृक्षा नहीं रहती) परम्ब्रह्मका “बहुस्यां प्रजायेय” इति […]

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न तस्य प्रतिमाऽअस्ति ।

न तस्य प्रतिमाऽअस्ति ।
जाकिर नायक जैसे पाखण्डी तथा कुछ आर्यसमाजी इस वेदमन्त्र का कदर्थ करते हुए, इसे मूर्तिपूजा का विरोधी प्रचार कर रहे हैँ । वह लोग इस मन्त्र का आंशिक वर्णन कर रहे हैँ तथा तस्य का अर्थ ब्रह्म कह रहे हैँ । जाकिर नायक इसे अल्लाह मान कर बूतपरस्ती के विरुद्ध कह रहा है । उन्हे न शास्त्र का ज्ञान है न मूर्तितत्त्व का ।

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Personal integrity vs Public Morality

जारी है अगर बुलबुल-ए-नादाँ का कुसुर ।है खन्द-ए-वजाँ गुल-ए-खन्दाँ का कुसुर ।क्युँ मेरी निगाहोँ पर है सारा इलजाम?कुछ भी नहिँ हुस्न-ए-आम उरिया की कुसुर? अगर फुलोँके चारोँ और चहचहाति बुलबुलको दोष देते हो, तो मैं कहता हुँ कि उस थोडीसि दिखाती-थोडीसि छिपाती अधखिली कलि का भी दोष है। सारा इलजाम मेरे ही नजर पर क्योँ

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सुपर्ण क्या है? What is Suparna?

सुपर्ण (suparna) शब्द का अर्थ जानने के लिये सूक्ष्मतम गतिविज्ञान जानना होगा तथा आधुनिक पदार्थविज्ञान के गभीरतम अध्ययन करना होगा । गति भूतों से प्राण के द्वारा सम्भव है । अतः भूत तथा प्राण का वैज्ञानिक तत्त्व तथा उनका प्रक्रिया भी जानना होगा । सुपर्ण शब्द सु उपसर्ग पूर्वक पर्णँ हरितभा॒वे धातु से वना है

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