माया के स्वरूप और भेद – भाग ४
जब केवल निजस्वरूपमें अवस्थित सिसृक्षा (सर्जनेच्छा) रूप उपाधिविशिष्ट (जो किसीमें अन्वित हो कर यावत्कालस्थायी हो – जब तक एक रहता है, तब तक अन्य भी रहे – तो उसे विशेषण कहते हैं । इन दोनोंमें से एक रहनेसे, अन्य नहीं रहनेसे, उसे उपाधि कहते हैं । मुमूक्षा आनेपर सिसृक्षा नहीं रहती) परम्ब्रह्मका “बहुस्यां प्रजायेय” इति […]
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