Personal integrity vs Public Morality
जारी है अगर बुलबुल-ए-नादाँ का कुसुर ।है खन्द-ए-वजाँ गुल-ए-खन्दाँ का कुसुर ।क्युँ मेरी निगाहोँ पर है सारा इलजाम?कुछ भी नहिँ हुस्न-ए-आम उरिया की कुसुर? अगर फुलोँके चारोँ और चहचहाति बुलबुलको दोष देते हो, तो मैं कहता हुँ कि उस थोडीसि दिखाती-थोडीसि छिपाती अधखिली कलि का भी दोष है। सारा इलजाम मेरे ही नजर पर क्योँ […]
Personal integrity vs Public Morality Read More »