Essays of gurudeva

Personal integrity vs Public Morality

जारी है अगर बुलबुल-ए-नादाँ का कुसुर ।है खन्द-ए-वजाँ गुल-ए-खन्दाँ का कुसुर ।क्युँ मेरी निगाहोँ पर है सारा इलजाम?कुछ भी नहिँ हुस्न-ए-आम उरिया की कुसुर? अगर फुलोँके चारोँ और चहचहाति बुलबुलको दोष देते हो, तो मैं कहता हुँ कि उस थोडीसि दिखाती-थोडीसि छिपाती अधखिली कलि का भी दोष है। सारा इलजाम मेरे ही नजर पर क्योँ […]

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सुपर्ण क्या है? What is Suparna?

सुपर्ण (suparna) शब्द का अर्थ जानने के लिये सूक्ष्मतम गतिविज्ञान जानना होगा तथा आधुनिक पदार्थविज्ञान के गभीरतम अध्ययन करना होगा । गति भूतों से प्राण के द्वारा सम्भव है । अतः भूत तथा प्राण का वैज्ञानिक तत्त्व तथा उनका प्रक्रिया भी जानना होगा । सुपर्ण शब्द सु उपसर्ग पूर्वक पर्णँ हरितभा॒वे धातु से वना है

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माया के स्वरूप और भेद – भाग १

माया विभेदबुद्धि की जननी है । जैसे समुद्र तरङ्गें कभी एक अन्य से तथा कभी वेलाभूमि से स्पर्द्धा करते हुए रुन्धित (आवरित – रु॒धिँ॑र् आ॒वर॑णे) करते हैं, जिससे वह परिमित (सीमित) हो जाते हैं तथा भिन्न प्रतीत होते हैं, उसीप्रकार माया सबका शक्ति सङ्कुचित करते हुए वस्तुस्वरूप को उसीप्रकार आच्छादित कर भ्रमदृष्टि सृष्टि करता है, जिसप्रकार अस्त समय में जैसे सूर्य अपना रश्मि को संहृत कर अन्धकार को जन्म देते हैं । माया ब्रह्म का शक्ति होने से सर्वप्रथम ब्रह्म का स्वरूप जानना चाहिए ।

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Vyasa Sewaka
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