Essays of gurudeva

माया के स्वरूप और भेद – भाग ६

ब्रह्म ह वा इदमग्र असीत् स्ययंभ्वेकमेव । ….. तस्य श्रान्तस्य तप्तस्य संतप्तस्य ललाटे स्नेहो यदार्द्रमाजायत । तेनानन्दत्तद्ब्रवीन्महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति । तद्यदब्रवीन्महद्वै यक्षं सुवेदमविदामह इति तस्मात्सुवेदो ऽभवत्तं वा एतं सुवेदं सन्तं स्वेदइत्याचक्षते परोक्षेण … । गोपथब्राह्मणम् । उस स्ययम्भू ब्रह्मने जब सृष्टिकाम हुआ, तो क्रिया की उत्पत्ति हुई । क्रियासे ताप सृष्टि हुआ । अग्नेरापः […]

माया के स्वरूप और भेद – भाग ६ Read More »

माया के स्वरूप और भेद – भाग ५

स्वायम्भूवा लोकपितामहेन उत्पादकत्वात् रजसोऽतिरेकात् ।कालस्य योगात् नियमाबद्धेन क्षेत्रज्ञयुक्तान् कुरुते विकारान् ॥ ब्रह्माण्ड के प्रत्येक वस्तु एक अन्य का सापेक्ष (relative) है (इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यैसर्वाणि भूतानि मधु …. मधुब्राह्मण । everything is interconnected and interdependent) । कार्य-कारण सम्बन्ध अनादि है । प्रत्येक कार्य का कारण भिन्न है । परन्तु इन वैचित्र्य के मध्यमें

माया के स्वरूप और भेद – भाग ५ Read More »

माया के स्वरूप और भेद – भाग ४

जब केवल निजस्वरूपमें अवस्थित सिसृक्षा (सर्जनेच्छा) रूप उपाधिविशिष्ट (जो किसीमें अन्वित हो कर यावत्कालस्थायी हो – जब तक एक रहता है, तब तक अन्य भी रहे – तो उसे विशेषण कहते हैं । इन दोनोंमें से एक रहनेसे, अन्य नहीं रहनेसे, उसे उपाधि कहते हैं । मुमूक्षा आनेपर सिसृक्षा नहीं रहती) परम्ब्रह्मका “बहुस्यां प्रजायेय” इति

माया के स्वरूप और भेद – भाग ४ Read More »

न तस्य प्रतिमाऽअस्ति ।

न तस्य प्रतिमाऽअस्ति ।
जाकिर नायक जैसे पाखण्डी तथा कुछ आर्यसमाजी इस वेदमन्त्र का कदर्थ करते हुए, इसे मूर्तिपूजा का विरोधी प्रचार कर रहे हैँ । वह लोग इस मन्त्र का आंशिक वर्णन कर रहे हैँ तथा तस्य का अर्थ ब्रह्म कह रहे हैँ । जाकिर नायक इसे अल्लाह मान कर बूतपरस्ती के विरुद्ध कह रहा है । उन्हे न शास्त्र का ज्ञान है न मूर्तितत्त्व का ।

न तस्य प्रतिमाऽअस्ति । Read More »

Vyasa Sewaka
Namaskara! Ask me anything about this website's content.