माया के स्वरूप और भेद – भाग १
माया विभेदबुद्धि की जननी है । जैसे समुद्र तरङ्गें कभी एक अन्य से तथा कभी वेलाभूमि से स्पर्द्धा करते हुए रुन्धित (आवरित – रु॒धिँ॑र् आ॒वर॑णे) करते हैं, जिससे वह परिमित (सीमित) हो जाते हैं तथा भिन्न प्रतीत होते हैं, उसीप्रकार माया सबका शक्ति सङ्कुचित करते हुए वस्तुस्वरूप को उसीप्रकार आच्छादित कर भ्रमदृष्टि सृष्टि करता है, जिसप्रकार अस्त समय में जैसे सूर्य अपना रश्मि को संहृत कर अन्धकार को जन्म देते हैं । माया ब्रह्म का शक्ति होने से सर्वप्रथम ब्रह्म का स्वरूप जानना चाहिए ।
माया के स्वरूप और भेद – भाग १ Read More »