Essays of gurudeva

ॐ कार, प्रणव और उद्गीथ। ॐ प्रेति चेति चेति।

ॐ “कार”है। “कृ॒ञ् कर॑णे” अथवा “कृ॒ञ् हिं॒साया॑म्” धातु से “भावे घञ्”प्रत्यय से उत्पन्न “कारः”शब्द वधः अथवा निश्चयात्मक है। इसीलिये प्रत्येक अक्षरको, जो स्वयं को निश्चितरूपसे अन्य अक्षरों से भिन्न कर के (अपमर्दन कर के) दिखाता है, उसे “कार”कहते हैं – जैसे अकार, ककार, यकार आदि। “शिक्षा”नामक वेदाङ्ग ग्रन्थों में इसके विषय में विशेष चर्चा किया […]

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जाति का वैज्ञानिक आधार

किसी विदेशी सज्जनने मुझे लेखा कि जातिप्रथा केवल भारतमें ही है तथा यह एक घृणित प्रथा है। उत्तरमें मैंने उनको विश्व इतिहास लेख कर भुल प्रमाणित किया और कहा कि मनु प्रणीत जाति प्रथा विज्ञानसम्मत है। यह genetic mutation के उपर आधारित निहित कौशल (potential for excellence in a field) जानने के पन्था है। नीचे

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वेद में अवतार ३ – कूर्म अवतार

शतपथब्राह्मणम् – 7-5-1-1 में कहा गया है – “कूर्ममुपदधाति । रसो वै कूर्मः । रसमेवैतदुपदधाति । यो वै स एषां लोकानामप्सु प्रविद्धानां पराङ्रसोऽत्यक्षरत् स एष कूर्मः । तमेवैतदुपदधाति । यावानु वै रसः तावानात्मा । स एष इम एव लोकाः ।“ विश्व में परिव्याप्त रसः (quark-gluon plasma) ही विश्व का मूल प्रतिष्ठा है (यावानु वै रसः

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वेद स्तुति (नाम-रूप-कर्म) मीमांसा – 3

षट्त्रिंशत्तत्त्वानि विश्वम्। (पर्शुरामकल्पसूत्रम्)। यह विश्व छत्तिश तत्त्वों का समाहार है। यह तत्त्व क्या हैं?

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वेद स्तुति (नाम-रूप-कर्म) मीमांसा – 2

रूपँ रूपक्रि॒याया॑म्, रुपँऽ वि॒मोह॑ने अथवा रु॒ङ् गतिरोष॒णयोः॑ धातु से रूप शब्द निष्पन्न हुआ है। अनेक अवयव द्रव्यगत अनेक रूपों का एक रूप कार्य होता है (रूपाणां रूपम् – रूपयुक्त द्रव्यों के समूह का एक रूप होता है)। अनेकद्रव्य समवेतत्व रूपविशेष होने पर (अनेकद्रव्यवत्व, उद्भूतत्व, रूपवत्व के रहने पर) रूप का प्रत्यक्ष होता है (अनेकद्रव्यसमवायाद् रूपविशेषाच्च

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