श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 11–20

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 11–20

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१२४- शर्यातिके यज्ञमें च्यवनका इन्द्रपर कोप करके वज्रको स्तम्भित करना और उसे मारनेके लिये मदासुरको उत्पन्न करना १२५- अश्विनीकुमारोंका यज्ञमें भाग स्वीकार कर लेनेपर इन्द्रका संकटमुक्त होना तथा लोमशजीके द्वारा अन्यान्य तीर्थोंके महत्त्वका वर्णन १२६- राजा मान्धाताकी उत्पत्ति और संक्षिप्त चरित्र १२७- सोमक और जन्तुका उपाख्यान १२८- सोमकको सौ पुत्रोंकी प्राप्ति तथा सोमक और पुरोहितका समानरूपसे नरक और पुण्यलोकोंका उपभोग करना १२९ - कुरुक्षेत्रके द्वारभूत प्लक्षप्रस्रवण नामक यमुना - तीर्थ एवं सरस्वतीतीर्थकी महिमा १३०- विभिन्न तीर्थोंकी महिमा और राजा उशीनरकी कथाका आरम्भ १३१- राजा उशीनरद्वारा बाजको अपने शरीरका मांस देकर शरणमें आये हुए कबूतरके प्राणोंकी रक्षा करना १३२- अष्टावक्रके जन्मका वृत्तान्त और उनका राजा जनकके दरबारमें जाना १३३- अष्टावक्रका द्वारपाल तथा राजा जनकसे वार्तालाप १३४- बन्दी और अष्टावक्रका शास्त्रार्थ, बन्दीकी पराजय तथा समंगामें स्नानसे अष्टावक्रके अंगोंका सीधा होना १३५- कर्दमिलक्षेत्र आदि तीर्थोंकी महिमा, रैभ्य एवं भरद्वाजपुत्र यवक्रीत मुनिकी कथा तथा ऋषियोंका अनिष्ट करनेके कारण मेधावीकी मृत्यु १३६- यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्यु १३७- भरद्वाजका पुत्रशोकसे विलाप करना, रैभ्यमुनिको शाप देना एवं स्वयं अग्निमें प्रवेश करना १३८- अर्वावसुकी तपस्याके प्रभावसे परावसुका ब्रह्महत्यासे मुक्त होना और रैभ्य, भरद्वाज तथा यवक्रीत आदिका पुनर्जीवित होना १३९- पाण्डवोंकी उत्तराखण्ड - यात्रा और लोमशजी द्वारा उसकी दुर्गमताका कथन १४०- भीमसेनका उत्साह तथा पाण्डवोंका कुलिन्दराज सुबाहुके राज्यमें होते हुए गन्धमादन और हिमालय पर्वतको प्रस्थान १४१- युधिष्ठिरका भीमसेनसे अर्जुनको न देखनेके कारण मानसिक चिन्ता प्रकट करना एवं उनके गुणोंका स्मरण करते हुए गन्धमादन पर्वतपर जानेका दृढ़ निश्चय करना १४२- पाण्डवोंद्वारा गंगाजीकी वन्दना, लोमशजीका नरकासुरके वध और भगवान् वाराहद्वारा वसुधाके उद्धारकी कथा कहना १४३- गन्धमादनकी यात्राके समय पाण्डवोंका आँधी - पानीसे सामना

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१४४- द्रौपदीकी मूर्छा, पाण्डवोंके उपचारसे उसका सचेत होना तथा भीमसेनके स्मरण करनेपर घटोत्कचका आगमन १४५- घटोत्कच और उसके साथियोंकी सहायतासे पाण्डवोंका गन्धमादन पर्वत एवं बदरिकाश्रममें प्रवेश तथा बदरीवृक्ष, नर-नारायणाश्रम और गंगाका वर्णन १४६- भीमसेनका सौगन्धिक कमल लानेके लिये जाना और कदलीवनमें उनकी हनुमान्जीसे भेंट १४७- श्रीहनुमान् और भीमसेनका संवाद १४८- हनुमान्जीका भीमसेनको संक्षेपसे श्रीरामका चरित्र सुनाना १४९- हनुमान्जीके द्वारा चारों युगोंके धर्मोंका वर्णन १५०- श्रीहनुमान्जीके द्वारा भीमसेनको अपने विशाल रूपका प्रदर्शन और चारों वर्णोंके धर्मोंका प्रतिपादन १५१- श्रीहनुमान्जीका भीमसेनको आश्वासन और विदा देकर अन्तर्धान होना १५२- भीमसेनका सौगन्धिक वनमें पहुँचना १५३- क्रोधवश नामक राक्षसोंका भीमसेनसे सरोवरके निकट आनेका कारण पूछना १५४- भीमसेनके द्वारा क्रोधवश नामक राक्षसोंकी पराजय और द्रौपदीके लिये सौगन्धिक कमलोंका संग्रह करना १५५- भयंकर उत्पात देखकर युधिष्ठिर आदिकी चिन्ता और सबका गन्धमादनपर्वतपर सौगन्धिकवनमें भीमसेनके पास पहुँचना १५६- पाण्डवोंका आकाशवाणीके आदेशसे पुन: नर- नारायणाश्रममें लौटना (जटासुरवधपर्व). १५७- जटासुरके द्वारा द्रौपदीसहित युधिष्ठिर, नकुल, सहदेवका हरण तथा भीमसेनद्वारा जटासुर का वध (यक्षयुद्धपर्व ) १५८- नर- नारायण- आश्रमसे वृषपर्वाके यहाँ होते हुए राजर्षि आर्ष्टिषेणके आश्रमपर जाना १५ ९- प्रश्नके रूपमें आर्ष्टिषेणका युधिष्ठिरके प्रति उपदेश १६०- पाण्डवोंका आर्ष्टिषेणके आश्रमपर निवास, द्रौपदीके अनुरोधसे भीमसेनका पर्वतके शिखरपर जाना और यक्षों तथा राक्षसोंसे युद्ध करके मणिमान्का वध करना १६१- कुबेरका गन्धमादन पर्वतपर आगमन और युधिष्ठिरसे उनकी भेंट १६२- कुबेरका युधिष्ठिर आदिको उपदेश और सान्त्वना देकर अपने भवनको प्रस्थान

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१६३- धौम्यका युधिष्ठिरको मेरु पर्वत तथा उसके शिखरोंपर स्थित ब्रह्मा, विष्णु आदिके स्थानोंका लक्ष्य कराना और सूर्य -चन्द्रमाकी गति एवं प्रभावका वर्णन १६४- पाण्डवोंकी अर्जुनके लिये उत्कण्ठा और अर्जुनका आगमन ( निवातकवचयुद्धपर्व). १६५- अर्जुनका गन्धमादन पर्वतपर आकर अपने भाइयोंसे मिलना १६६- इन्द्रका पाण्डवोंके पास आना और युधिष्ठिरको सान्त्वना देकर स्वर्गको लौटना १६७- अर्जुनके द्वारा अपनी तपस्या- यात्राके वृत्तान्तका वर्णन, भगवान् शिवके साथ संग्राम और पाशुपतास्त्र- प्राप्तिकी कथा १६८- अर्जुन॒द्वारा स्वर्गलोकमें अपनी अस्त्रशिक्षा और निवातकवच दानवोंके साथ युद्धकी तैयारीका कथन १६९- अर्जुनका पातालमें प्रवेश और निवातकवचोंके साथ युद्धारम्भ १७०- अर्जुन और निवातकवचोंका युद्ध १७१- दानवोंके मायामय युद्धका वर्णन १७२- निवातकवचोंका संहार १७३- अर्जुन॒द्वारा हिरण्यपुरवासी पौलोम तथा कालकेयोंका वध और इन्द्रद्वारा अर्जुनका अभिनन्दन १७४- अर्जुनके मुखसे यात्राका वृत्तान्त सुनकर युधिष्ठिरद्वारा उनका अभिनन्दन और दिव्यास्त्र- दर्शनकी इच्छा प्रकट करना १७५- नारद आदिका अर्जुनको दिव्यास्त्रोंके प्रदर्शनसे रोकना (आजगरपर्व). १७६- भीमसनेकी युधिष्ठिरसे बातचीत और पाण्डवोंका गन्धमादनसे प्रस्थान १७७- पाण्डवोंका गन्धमादनसे बदरिकाश्रम, _सुबाहुनगर और विशाखयूप वनमें होते हुए सरस्वती-तटवर्ती द्वैतवनमें प्रवेश १७८- महाबली भीमसेनका हिंसक पशुओंको मारना और अजगरद्वारा पकड़ा जाना १७९- भीमसेन और सर्परूपधारी नहुषकी बातचीत, भीमसेनकी चिन्ता तथा युधिष्ठिरद्वारा भीमकी खोज १८०- युधिष्ठिरका भीमसेनके पास पहुँचना और सर्परूपधारी नहुषके प्रश्नोंका उत्तर देना १८१- युधिष्ठिरद्वारा अपने प्रश्नोंका उचित उत्तर पाकर संतुष्ट हुए सर्परूपधारी नहुषका भीमसेनको छोड़ देना तथा युधिष्ठिरके साथ वार्तालाप करनेके प्रभावसे सर्पयोनिसे मुक्त होकर स्वर्ग जाना

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( मार्कण्डेयसमास्यापर्व ) १८२- वर्षा और शरद् ऋतुका वर्णन एवं युधिष्ठिर आदिका पुनः द्वैतवनसे काम्यकवनमें प्रवेश १८३- काम्यकवनमें पाण्डवोंके पास भगवान् श्रीकृष्ण, मुनिवर मार्कण्डेय तथा नारदजीका आगमन एवं युधिष्ठिरके पूछनेपर मार्कण्डेयजीके द्वारा कर्मफल- भोगका विवेचन १८४- तपस्वी तथा स्वधर्मपरायण ब्राह्मणोंका माहात्म्य १८५: ब्राह्मणकी महिमाके विषयमें अत्रिमुनि तथा राजा पृथुकी प्रशंसा १८६- तार्क्ष्यमुनि और सरस्वतीका संवाद १८७- वैवस्वत मनुका चरित्र तथा मत्स्यावतारकी कथा १८८- चारों युगोंकी वर्ष-संख्या एवं कलियुगके प्रभावका वर्णन, प्रलयकालका दृश्य और मार्कण्डेयजीको बालमुकुन्दजीके दर्शन, मार्कण्डेयजीका भगवान्‌के उदरमें प्रवेश कर ब्रह्माण्डदर्शन करना और फिर बाहर निकलकर उनसे वार्तालाप करना १८९- भगवान् बालमुकुन्दका मार्कण्डेयको अपने स्वरूपका परिचय देना तथा मार्कण्डेयद्वारा श्रीकृष्णकी महिमाका प्रतिपादन और पाण्डवोंका श्रीकृष्णकी शरणमें जाना १९०- युगान्तकालिक कलियुगके समयके बर्तावका तथा कल्कि अवतारका वर्णन १ ९१- भगवान् कल्किके द्वारा सत्ययुगकी स्थापना और मार्कण्डेयजीका युधिष्ठिरके लिये धर्मोपदेश १९ २- इक्ष्वाकुवंशी परीक्षितका मण्डूकराजकी कन्यासे विवाह, शल और दलके चरित्र तथा वामदेव मुनिकी महत्ता १९३- इन्द्र और बक मुनिका संवाद १ ९४- क्षत्रिय राजाओंका महत्त्व- सुहोत्र और शिबिकी प्रशंसा १ ९५: राजा ययातिद्वारा ब्राह्मणको सहस्र गौओंका दान १९ ६: सेदुक और वृषदर्भका चरित्र १९७- इन्द्र और अग्निद्वारा राजा शिबिकी परीक्षा १ ९८- देवर्षि नारदद्वारा शिबिकी महत्ताका प्रतिपादन १९९- राजा इन्द्रद्युम्न तथा अन्य चिरजीवी प्राणियोंकी कथा २००- निन्दित दान, निन्दित जन्म, योग्य दानपात्र, श्राद्धमें ग्राह्य और अग्राह्य ब्राह्मण, दानपात्रके लक्षण, अतिथि- सत्कार, विविध दानोंका महत्त्व, वाणीकी शुद्धि, गायत्री -जप, चित्त- शुद्धि तथा इन्द्रिय- निग्रह आदि विविध विषयोंका वर्णन

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२०१- उत्तंककी तपस्यासे प्रसन्न होकर भगवान्‌का उन्हें वरदान देना तथा इक्ष्वाकुवंशी राजा कुवलाश्वका धुन्धुमार नाम पड़नेका कारण बताना २०२- उत्तंकका राजा बृहदश्वसे धुन्धुका वध करनेके लिये आग्रह २०३- ब्रह्माजीकी उत्पत्ति और भगवान् विष्णुके द्वारा मधु - कैटभका वध २०४- धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, _कुवलाश्वद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वको वर देना २०५: पतिव्रता स्त्री तथा पिता - माताकी सेवाका माहात्म्य २०६- कौशिक ब्राह्मण और पतिव्रताके उपाख्यानके अन्तर्गत ब्राह्मणोंके धर्मका वर्णन २०७- कौशिकका धर्मव्याधके पास जाना, धर्मव्याधके द्वारा पतिव्रतासे प्रेषित जान लेनेपर कौशिकको आश्चर्य होना, धर्मव्याधके द्वारा वर्णधर्मका वर्णन, जनकराज्यकी प्रशंसा और शिष्टाचारका वर्णन २०८- धर्मव्याधद्वारा हिंसा और अहिंसाका विवेचन २० ९- धर्मकी सूक्ष्मता, शुभाशुभ कर्म और उनके फल तथा ब्रह्मकी प्राप्तिके उपायोंका वर्णन २१०- विषयसेवनसे हानि, सत्संगसे लाभ और ब्राह्मी विद्याका वर्णन २११ - पंचमहाभूतोंके गुणोंका और इन्द्रियनिग्रहका वर्णन २१२- तीनों गुणोंके स्वरूप और फलका वर्णन २१३- प्राणवायुकी स्थितिका वर्णन तथा परमात्म - साक्षात्कारके उपाय २१४- माता- पिताकी सेवाका दिग्दर्शन २१५- धर्मव्याधका कौशिक ब्राह्मणको माता-पिताकी सेवाका उपदेश देकर अपने पूर्वजन्मकी कथा कहते हुए व्याध होनेका कारण बताना २१६- कौशिक- धर्मव्याध - संवादका उपसंहार तथा कौशिकका अपने घरको प्रस्थान २१७- अग्निका अंगिराको अपना प्रथम पुत्र स्वीकार करना तथा अंगिरासे बृहस्पतिकी उत्पत्ति २१८- अंगिराकी संततिका वर्णन २१९- बृहस्पतिकी संततिका वर्णन २२०- पांचजन्य अग्निकी उत्पत्ति तथा उसकी संततिका वर्णन २२१- अग्निस्वरूप तप और भानु ( मनुकी ) संततिका वर्णन २२२- सह नामक अग्निका जलमें प्रवेश और अथर्वा अंगिराद्वारा पुनः उनका प्राकट्य २२३- इन्द्रके द्वारा केशीके हाथसे देवसेनाका उद्धार २२४- इन्द्रका देवसेनाके साथ ब्रह्माजीके पास तथा ब्रह्मर्षियोंके आश्रमपर जाना, अग्निका मोह और वनगमन

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२२५- स्वाहाका मुनिपत्नियोंके रूपोंमें अग्निके साथ समागम, स्कन्दकी उत्पत्ति तथा उनके द्वारा क्रौंच आदि पर्वतोंका विदारण २२६- विश्वामित्रका स्कन्दके जातकर्मादि तेरह संस्कार करना और विश्वामित्रके समझानेपर भी ऋषियोंका अपनी पत्नियोंको स्वीकार न करना तथा अग्निदेव आदिके द्वारा बालक स्कन्दकी रक्षा करना २२७- पराजित होकर शरणमें आये हुए इन्द्रसहित देवताओंको स्कन्दका अभयदान २२८- स्कन्दके पार्षदोंका वर्णन २२ ९- स्कन्दका इन्द्रके साथ वार्तालाप, देवसेनापतिके पदपर अभिषेक तथा देवसेनाके साथ उनका विवाह २३०- कृत्तिकाओंको नक्षत्रमण्डलमें स्थानकी प्राप्ति तथा मनुष्योंको कष्ट देनेवाले विविध ग्रहोंका वर्णन २३१- स्कन्दद्वारा स्वाहादेवीका सत्कार, रुद्रदेवके साथ स्कन्द और देवताओंकी भ॒द्रवट-यात्रा, देवासुर संग्राम, महिषासुर- वध तथा स्कन्दकी प्रशंसा २३२- कार्तिकेयके प्रसिद्ध नामोंका वर्णन तथा उनका स्तवन (द्रौपदीसत्यभामासंवादपर्व ) २३३- द्रौपदीका सत्यभामाको सती स्त्रीके कर्तव्यकी शिक्षा देना २३४- पतिदेवको अनुकूल करनेका उपाय – पतिकी अनन्यभावसे सेवा २३५- सत्यभामाका द्रौपदीको आश्वासन देकर श्रीकृष्णके साथ द्वारकाको प्रस्थान (घोषयात्रापर्व ) २३६- पाण्डवोंका समाचार सुनकर धृतराष्ट्रका खेद और चिन्तापूर्ण उद्गार २३७- शकुनि और कर्णका दुर्योधनकी प्रशंसा करते हुए उसे वनमें पाण्डवोंके पास चलनेके लिये उभाड़ना २३८- दुर्योधनके द्वारा कर्ण और शकुनिकी मन्त्रणा स्वीकार करना तथा कर्ण आदिका घोषयात्राको निमित्त बनाकर द्वैतवनमें जानेके लिये धृतराष्ट्रसे आज्ञा लेने जाना २३९- कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान २४०- दुर्योधनका सेनासहित वनमें जाकर गौओंकी देखभाल करना और उसके सैनिकों एवं गन्धर्वोंमें परस्पर कटु संवाद २४१- कौरवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध और कर्णकी पराजय २४२- गन्धर्वोंद्वारा दुर्योधन आदिकी पराजय और उनका अपहरण

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२४३- युधिष्ठिरका भीमसेनको गन्धर्वोंके हाथसे कौरवोंको छुड़ानेका आदेश और इसके लिये अर्जुनकी प्रतिज्ञा २४४- पाण्डवोंका गन्धर्वोंके साथ युद्ध २४५- पाण्डवोंके द्वारा गन्धर्वोंकी पराजय २४६- चित्रसेन, अर्जुन तथा युधिष्ठिरका संवाद और दुर्योधनका छुटकारा २४७- सेनासहित दुर्योधनका मार्गमें ठहरना और कर्णके द्वारा उसका अभिनन्दन २४८- दुर्योधनका कर्णको अपनी पराजयका समाचार बताना २४ ९- दुर्योधनका कर्णसे अपनी ग्लानिका वर्णन करते हुए आमरण अनशनका निश्चय, दुःशासनको राजा बननेका आदेश, _दुःशासनका दुःख और कर्णका दुर्योधनको समझाना २५०- कर्णके समझानेपर भी दुर्योधनका आमरण अनशन करनेका ही निश्चय २५१- शकुनिके समझानेपर भी दुर्योधनको प्रायोपवेशनसे विचलित होते न देखकर दैत्योंका कृत्याद्वारा उसे रसातलमें बुलाना २५२- दानवोंका दुर्योधनको समझाना और कर्णके अनुरोध करनेपर दुर्योधनका अनशन त्याग करके हस्तिनापुरको प्रस्थान २५३- भीष्मका कर्णकी निन्दा करते हुए दुर्योधनको पाण्डवोंसे संधि करनेका परामर्श देना, कर्णके क्षोभपूर्ण वचन और दिग्विजयके लिये प्रस्थान २५४- कर्णके द्वारा सारी पृथ्वीपर दिग्विजय और हस्तिनापुरमें उसका सत्कार २५५: कर्ण और पुरोहितकी सलाहसे दुर्योधनकी वैष्णवयज्ञके लिये तैयारी २५६- दुर्योधनके यज्ञका आरम्भ एवं समाप्ति २५७- दुर्योधनके यज्ञके विषयमें लोगोंका मत, कर्णद्वारा अर्जुनके वधकी प्रतिज्ञा, युधिष्ठिरकी चिन्ता तथा दुर्योधनकी शासननीति (मृगस्वप्नोद्भवपर्व) २५८- पाण्डवोंका काम्यकवनमें गमन ( व्रीहिद्रौणिकपर्व ) २५ ९- युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन २६०- दुर्वासाद्वारा महर्षि मुद्गलके दानधर्म एवं धैर्यकी परीक्षा तथा मुद्गलका देवदूतसे कुछ प्रश्न करना २६१- देवदूतद्वारा स्वर्गलोकके गुण- दोषोंका तथा दोषरहित विष्णुधामका वर्णन सुनकर मुद्गलका देवदूतको लौटा देना एवं व्यासजीका युधिष्ठिरको समझाकर अपने

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आश्रमको लौट जाना (द्रौपदीहरणपर्व ). २६२- दुर्योधनका महर्षि दुर्वासाको आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें युधिष्ठिरके पास भेजकर प्रसन्न होना २६३- दुर्वासाका पाण्डवोंके आश्रमपर असमयमें आतिथ्यके लिये जाना, द्रौपदीके द्वारा स्मरण किये जानेपर भगवान्‌का प्रकट होना तथा पाण्डवोंको दुर्वासाके भयसे मुक्त करना और उनको आश्वासन देकर द्वारका जाना २६४- जयद्रथका द्रौपदीको देखकर मोहित होना और उसके पास कोटिकास्यको भेजना २६५- कोटिकास्यका द्रौपदीसे जयद्रथ और उसके साथियोंका परिचय देते हुए उसका भी परिचय पूछना २६६- द्रौपदीका कोटिकास्यको उत्तर २६७- जयद्रथ और द्रौपदीका संवाद २६८- द्रौपदीका जयद्रथको फटकारना और जयद्रथ द्वारा उसका अपहरण २६९- पाण्डवोंका आश्रमपर लौटना और धात्रेयिकासे द्रौपदीहरणका वृत्तान्त जानकर जयद्रथका पीछा करना २७०- द्रौपदीद्वारा जयद्रथके सामने पाण्डवोंके पराक्रमका वर्णन २७१- पाण्डवोंद्वारा जयद्रथकी सेनाका संहार, जयद्रथका पलायन, द्रौपदी तथा नकुल- सहदेवके साथ युधिष्ठिरका आश्रमपर लौटना तथा भीम और अर्जुनका वनमें जयद्रथका पीछा करना (जयद्रथविमोक्षणपर्व ) २७२- भीमद्वारा बंदी होकर जयद्रथका युधिष्ठिरके सामने उपस्थित होना, उनकी आज्ञासे छूटकर उसका गंगाद्वारमें तप करके भगवान् शिवसे वरदान पाना तथा भगवान् शिवद्वारा अर्जुनके सहायक भगवान् श्रीकृष्णकी महिमाका वर्णन ( रामोपाख्यानपर्व ) २७३- अपनी दुरवस्थासे दुःखी हुए युधिष्ठिरका मार्कण्डेय मुनिसे प्रश्न करना २७४- श्रीराम आदिका जन्म तथा कुबेरकी उत्पत्ति और उन्हें ऐश्वर्यकी प्राप्ति २७५- रावण, _कुम्भकर्ण, विभीषण, खर और शूर्पणखाकी उत्पत्ति, तपस्या और वर- प्राप्ति तथा कुबेरका रावणको शाप देना २७६- देवताओंका ब्रह्माजीके पास जाकर रावणके अत्याचार से बचानेके लिये प्रार्थना करना तथा ब्रह्माजीकी आज्ञासे देवताओंका रीछ और वानरयोनिमें संतान उत्पन्न

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करना एवं दुन्दुभी गन्धर्वीका मन्थरा बनकर आना २७७- श्रीरामके राज्याभिषेककी तैयारी, रामवनगमन, भरतकी चित्रकूटयात्रा, रामके द्वारा खर- दूषण आदि राक्षसोंका नाश तथा रावणका मारीचके पास जाना २७८- मृगरूपधारी मारीचका वध तथा सीताका अपहरण २७९- रावणद्वारा जटायुका वध, श्रीरामद्वारा उसका अन्त्येष्टि- संस्कार, कबन्धका वध तथा उसके दिव्यस्वरूपसे वार्तालाप २८०- राम और सुग्रीवकी मित्रता, वाली और सुग्रीवका युद्ध, श्रीरामके द्वारा वालीका वध तथा लंकाकी अशोकवाटिकामें राक्षसियोंद्वारा डरायी हुई सीताको त्रिजटाका आश्वासन २८१- रावण और सीताका संवाद २८२- श्रीरामका सुग्रीवपर कोप, सुग्रीवका सीताकी खोजमें वानरोंको भेजना तथा श्रीहनुमान्जीका लौटकर अपनी लंकायात्राका वृत्तान्त निवेदन करना २८३- वानर- सेनाका संगठन, सेतुका निर्माण, विभीषणका अभिषेक और लंकाकी सीमामें सेनाका प्रवेश तथा अंगदको रावणके पास दूत बनाकर भेजना २८४- अंगदका रावणके पास जाकर रामका संदेश सुनाकर लौटना तथा राक्षसों और वानरोंका घोर संग्राम २८५- श्रीराम और रावणकी सेनाओंका द्वन्द्वयुद्ध २८६- प्रहस्त और धूम्राक्षके वधसे दुःखी हुए रावणका कुम्भकर्णको जगाना और उसे युद्धमें भेजना २८७- कुम्भकर्ण, वज्रवेग और प्रमाथीका वध २८८- इन्द्रजित्का मायामय युद्ध तथा श्रीराम और लक्ष्मणकी मूर्च्छा २८९- श्रीराम- लक्ष्मणका सचेत होकर कुबेरके भेजे हुए अभिमन्त्रित जलसे प्रमुख वानरोंसहित अपने नेत्र धोना, लक्ष्मणद्वारा इन्द्रजितका वध एवं सीताको मारनेके लिये उद्यत हुए रावणका अविन्ध्यके द्वारा निवारण करना २ ९०- राम और रावणका युद्ध तथा रावणका वध २ ९१- श्रीरामका सीताके प्रति संदेह, देवताओंद्वारा सीताकी शुद्धिका समर्थन, श्रीरामका दल - बलसहित लंकासे प्रस्थान एवं किष्किन्धा होते हुए अयोध्यामें पहुँचकर भरतसे मिलना तथा राज्यपर अभिषिक्त होना २ ९२- मार्कण्डेयजीके द्वारा राजा युधिष्ठिरको आश्वासन (पतिव्रतामाहात्म्यपर्व) २ ९३- राजा अश्वपतिको देवी सावित्रीके वरदानसे सावित्री नामक कन्याकी प्राप्ति तथा सावित्रीका पतिवरणके लिये विभिन्न देशोंमें भ्रमण

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२ ९४- सावित्रीका सत्यवान्‌के साथ विवाह करनेका दृढ़ निश्चय २ ९ ५: सत्यवान् और सावित्रीका विवाह तथा सावित्रीका अपनी सेवाओंद्वारा सबको संतुष्ट करना २ ९६- सावित्रीकी व्रतचर्या तथा सास - ससुर और पतिकी आज्ञा लेकर सत्यवान्के साथ उसका वनमें जाना २ ९७- सावित्री और यमका संवाद, यमराजका संतुष्ट होकर सावित्रीको अनेक वरदान देते हुए मरे हुए सत्यवान्‌को भी जीवित कर देना तथा सत्यवान् और सावित्रीका वार्तालाप एवं आश्रमकी ओर प्रस्थान २ ९८- पत्नीसहित राजा द्युमत्सेनकी सत्यवान्‌के लिये चिन्ता, ऋषियोंका उन्हें आश्वासन देना, सावित्री और सत्यवान्का आगमन तथा सावित्रीद्वारा विलम्बसे आनेके कारणपर प्रकाश डालते हुए वर- प्राप्तिका विवरण बताना २९९- शाल्वदेशकी प्रजाके अनुरोधसे महाराज द्युमत्सेनका राज्याभिषेक कराना तथा सावित्रीको सौ पुत्रों और सौ भाइयोंकी प्राप्ति (कुण्डलाहरणपर्व ) ३००- सूर्यका स्वप्नमें कर्णको दर्शन देकर उसे इन्द्रको कुण्डल और कवच न देनेके लिये सचेत करना तथा कर्णका आग्रहपूर्वक कुण्डल और कवच देनेका ही निश्चय रखना ३०१- सूर्यका कर्णको समझाते हुए उसे इन्द्रको कुण्डल न देनेका आदेश देना ३०२- सूर्य - कर्ण- संवाद, सूर्यकी आज्ञाके अनुसार कर्णका इन्द्रसे शक्ति लेकर ही उन्हें कुण्डल और कवच देनेका निश्चय ३०३- कुन्तिभोजके यहाँ ब्रह्मर्षि दुर्वासाका आगमन तथा राजाका उनकी सेवाके लिये पृथाको आवश्यक उपदेश देना ३०४- कुन्तीका पितासे वार्तालाप और ब्राह्मणकी परिचर्या ३०५- कुन्तीकी सेवासे संतुष्ट होकर तपस्वी ब्राह्मणका उसको मन्त्रका उपदेश देना ३०६- कुन्तीके द्वारा सूर्यदेवताका आवाहन तथा कुन्ती - सूर्य- संवाद ३०७- सूर्यद्वारा कुन्तीके उदरमें गर्भस्थापन ३०८- कर्णका जन्म, कुन्तीका उसे पिटारीमें रखकर जलमें बहा देना और विलाप करना ३० ९- अधिरथ सूत तथा उसकी पत्नी राधाको बालक कर्णकी प्राप्ति, राधाके द्वारा उसका पालन, _हस्तिनापुरमें उसकी शिक्षा -दीक्षा तथा कर्णके पास इन्द्रका आगमन ३१०- इन्द्रका कर्णको अमोघ शक्ति देकर बदलेमें उसके कवच-कुण्डल लेना (आरणेयपर्व )