श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 2261–2270
महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2261–2270
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स्प्रष्टुं राजसहस्राणि तेजसाप्रतिमानि वै ।
समरे नाभ्यवर्तन्त वेलामिव महार्णवः ॥ २२ ॥
सोऽयं राज्ञो विराटस्य कन्यानां नर्तको युवा ।
आस्ते वेषप्रतिच्छन्नः कन्यानां परिचारकः ॥ २३ ॥
जैसे महासागर तट सीमाको नहीं लाँघ पाता, उसी प्रकार सहस्रों अप्रतिम तेजवाले राजा जिस वीरको वशीभूत करनेके लिये आगे न बढ़ सके, वही तरुण अर्जुन इस समय राजा विराटकी कन्याओंको नाचना सिखा रहा है और हीजड़ेके वेषमें छिपकर उन कन्याओंकी सेवा करता है ॥ २२-२३ ॥
यस्य स्म रथघोषेण समकम्पत मेदिनी ।
सपर्वतवना भीम सहस्थावरजङ्गमा ॥ २४ ॥
यस्मिन् जाते महाभागे कुन्त्याः शोको व्यनश्यत ।
स शोचयति मामद्य भीमसेन तवानुजः ॥ २५ ॥
भीमसेन! जिसके रथकी घर्घराहटसे पर्वत, वन और चराचर प्राणियोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वी काँप उठती थी, जिस महान् भाग्यशाली पुत्रके उत्पन्न होनेपर माता कुन्तीका सारा शोक नष्ट हो गया था, वही तुम्हारा छोटा भाई अर्जुन आज अपनी दुरवस्थाके कारण मुझे शोकमग्न किये देता है ॥ २४-२५ ॥
भूषितं तमलंकारैः कुण्डलैः परिहाटकैः ।
कम्बुपाणिनमायान्तं दृष्ट्वा सीदति मे मनः ॥ २६ ॥
अर्जुनको स्त्रीजनोचित आभूषणों तथा सुवर्णमय कुण्डलोंसे विभूषित हो हाथोंमें शंखकी चूड़ियाँ धारण किये आते देख मेरा हृदय दुःखित हो जाता है ॥ २६ ॥
यस्य नास्ति समो वीर्ये कश्चिदुर्व्यां धनुर्धरः ।
सोऽद्य कन्यापरिवृतो गायन्नास्ते धनंजयः ॥ २७ ॥
इस भूतलपर जिसके बल पराक्रमकी समानता करनेवाला कोई धनुर्धर वीर नहीं है, वही धनंजय आज राजकन्याओंके बीचमें बैठकर गीत गाया करता है ॥ २७ ॥
धर्मे शौर्ये च सत्ये च जीवलोकस्य सम्मतम् ।
स्त्रीवेषविकृतं पार्थं दृष्ट्वा सीदति मे मनः ॥ २८ ॥
धर्म, शूरवीरता और सत्यभाषणमें जो सम्पूर्ण जीव - जगत्के लिये एक आदर्श था, उसी अर्जुनको अब स्त्रीवेषमें विकृत हुआ देखकर मेरा हृदय शोकमें डूब जाता है ॥ २८ ॥
यदा ह्येनं परिवृतं कन्याभिर्देवरूपिणम् ।
प्रभिन्नमिव मातङ्गं परिकीर्णं करेणुभिः ॥ २ ९ ॥
मत्स्यमर्थपतिं पार्थं विराटं समुपस्थितम् ।
पश्यामि तूर्यमध्यस्थं दिशो नश्यन्ति मे तदा ॥ ३० ॥
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हथिनियोंसे घिरे हुए गण्डस्थलसे मधुकी धारा बहानेवाले गजराजकी भाँति जब वाद्ययन्त्रोंके बीचमें बैठे हुए देवरूपधारी कुन्तीनन्दन अर्जुनको ( नृत्यशालामें) कन्याओंसे घिरकर धनपति मत्स्यराज विराटकी सेवामें उपस्थित देखती हूँ, उस समय मेरी आँखोंमें अँधेरा छा जाता है; मुझे दिशाएँ नहीं सूझती हैं ॥ २ ९ -३० ॥
नूनमार्या न जानाति कृच्छ्रं प्राप्तं धनंजयम् ।
अजातशत्रुं कौरव्यं मग्नं दुर्द्यूतदेविनम् ॥ ३१ ॥
निश्चय ही मेरी सास कुन्ती नहीं जानती होंगी कि मेरा पुत्र धनंजय ऐसे संकटमें पड़ा है और खोटे जूएके खेलमें आसक्त कुरुवंशशिरोमणि अजातशत्रु युधिष्ठिर भी शोकमें डूबे हुए हैं ॥ ३१ ॥
(ऐन्द्रवारुणवायव्यब्राह्माग्नेयैश्च वैष्णवैः ।
अग्नीन् संतर्पयन् पार्थः सर्वाश्चैकरथोऽजयत् ॥
दिव्यैरस्त्रैरचिन्त्यात्मा सर्वशत्रुनिबर्हणः ॥
दिव्यं गान्धर्वमस्त्रं च वायव्यमथ वैष्णवम् ।
ब्राह्मं पाशुपतं चैव स्थूणाकर्णं च दर्शयन् ॥
पौलोमान् कालकेयांश्च इन्द्रशत्रून् महासुरान् ।
निवातकवचैः सार्धं घोरानेकरथोऽजयत् ।
सोऽन्तःपुरगतः पार्थः कूपेऽग्निरिव संवृतः ॥
जिन कुन्तीकुमार अर्जुनने ऐन्द्र, वारुण, वायव्य, ब्राह्म, आग्नेय और वैष्णव अस्त्रोंद्वारा अग्निदेवको तृप्त करते हुए एकमात्र रथकी सहायतासे सब देवताओंको जीत लिया, जिनका आत्मबल अचिन्त्य है, जो अपने दिव्यास्त्रोंद्वारा समस्त शत्रुओंका नाश करनेमें समर्थ हैं, जिन्होंने एकमात्र रथपर आरूढ़ हो दिव्य गान्धर्व, वायव्य, वैष्णव, ब्राह्म, पाशुपत तथा स्थूणाकर्ण नामक अस्त्रोंका प्रदर्शन करते हुए युद्धमें निवातकवचोंसहित भयंकर पौलोम और कालकेय आदि महान् असुरोंको, जो इन्द्रसे शत्रुता रखनेवाले थे, परास्त कर दिया था, वे ही अर्जुन आज अन्तःपुरमें उसी प्रकार छिपे बैठे हैं, जैसे प्रज्वलित अग्नि कुएँमें ढक दी गयी हो । कन्यापुरगतं दृष्ट्वा गोष्ठेष्विव महर्षभम् । स्त्रीवेषविकृतं पार्थं कुन्तीं गच्छति मे मनः II ) जैसे बड़ा भारी साँड़ गोशालाओंमें आबद्ध हो, उसी प्रकार स्त्रियोंके वेषसे विकृत अर्जुनको कन्याओंके अन्तःपुरमें देखकर मेरा मन बार- बार कुन्तीदेवीकी याद करता है ।
तथा दृष्ट्वा यवीयांसं सहदेवं गवां पतिम् ।
गोषु गोवेषमायान्तं पाण्डुभूतास्मि भारत ॥ ३२ ॥
भारत! इसी प्रकार तुम्हारे छोटे भाई सहदेवको, जो गौओंका पालक बनाया गया है, जब मैं गौओंके बीच ग्वालेके वेशमें आते देखती हूँ, तो मेरा रक्त सूख जाता है और सारा
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शरीर पीला पड़ जाता है ॥ ३२ ॥
सहदेवस्य वृत्तानि चिन्तयन्ती पुनः पुनः ।
न निद्रामभिगच्छामि भीमसेन कुतो रतिम् ॥ ३३ ॥
भीमसेन! सहदेवकी दुर्दशाका बार- बार चिन्तन करनेके कारण मुझे कभी नींदतक नहीं आती; फिर सुख कहाँसे मिल सकता है? ॥ ३३ ॥
न विन्दामि महाबाहो सहदेवस्य दुष्कृतम् ।
यस्मिन्नेवंविधं दुःखं प्राप्नुयात् सत्यविक्रमः ॥ ३४ ॥
महाबाहो! जहाँतक मैं जानती हूँ, सहदेवने कभी कोई पाप नहीं किया है, जिससे इस सत्यपराक्रमी वीरको ऐसा दुःख उठाना पड़े ॥ ३४ ॥
दूयामि भरतश्रेष्ठ दृष्ट्वा ते भ्रातरं प्रियम् ।
गोषु गोवृषसंकाशं मत्स्येनाभिनिवेशितम् ॥ ३५ ॥
भरतश्रेष्ठ! साँड़के समान हृष्ट- पुष्ट तुम्हारे प्रिय भ्राता सहदेवको राजा विराटके द्वारा गौओंकी सेवामें लगाया गया देख मुझे बड़ा दुःख होता है ॥ ३५ ॥
संरब्धं रक्तनेपथ्यं गोपालानां पुरोगमम् ।
विराटमभिनन्दन्तमथ मे भवति ज्वरः ॥ ३६ ॥
गेरू आदिसे लाल रंगका शृंगार धारण किये ग्वालोंके अगुआ बने हुए सहदेवको उद्विग्न होनेपर भी जब मैं राजा विराटका अभिनन्दन करते देखती हूँ, तब मुझे बुखार चढ़ आता है ॥ ३६ ॥
सहदेवं हि मे वीर नित्यमार्या प्रशंसति ।
महाभिजनसम्पन्नः शीलवान् वृत्तवानिति ॥ ३७ ॥
वीर! आर्या कुन्ती मुझसे सहदेवकी सदा प्रशंसा किया करती थीं कि यह महान् कुलमें उत्पन्न, शीलवान् और सदाचारी है ॥ ३७ ॥
ह्रीनिषेवो मधुरवाग्धार्मिकश्च प्रियश्च मे ।
स तेऽरण्येषु वोढव्यो याज्ञसेनि क्षपास्वपि ॥ ३८ ॥
सुकुमारश्च शूरश्च राजानं चाप्यनुव्रतः ।
ज्येष्ठापचायिनं वीरं स्वयं पाञ्चालि भोजयेः ॥ ३ ९ ॥
इत्युवाच हि मां कुन्ती रुदती पुत्रगृद्धिनी ।
प्रव्रजन्तं महारण्यं तं परिष्वज्य तिष्ठती ॥ ४० ॥
मुझे स्मरण है, जब सहदेव महान् वनमें आने लगे, उस समय पुत्रवत्सला माता कुन्ती उन्हें हृदयसे लगाकर खड़ी हो गयीं और रोती हुई मुझसे यों कहने लगीं —‘याज्ञसेनी! सहदेव बड़ा लज्जाशील, मधुरभाषी और धार्मिक है । यह मुझे अत्यन्त प्रिय है । इसे वनमें रात्रिके समय तुम स्वयं सँभालकर ( हाथ पकड़कर) ले जाना, क्योंकि यह सुकुमार है ( सम्भव है, थकावटके कारण चल न सके ) । मेरा सहदेव शूरवीर, राजा युधिष्ठिरका भक्त,
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अपने बड़े भाईका पुजारी और वीर है । पाञ्चालराजकुमारी! तुम इसे अपने हाथों भोजन कराना ॥ ३८–४० ॥
तं दृष्ट्वा व्यापृतं गोषु वत्सचर्मक्षपाशयम् ।
सहदेवं युधां श्रेष्ठं किं नु जीवामि पाण्डव ॥ ४१ ॥
पाण्डुनन्दन! योद्धाओंमें श्रेष्ठ उसी सहदेवको जब मैं गौओंकी सेवामें तत्पर और बछड़ोंके चमड़ेपर रातमें सोते देखती हूँ, तब किसलिये जीवन धारण करूँ'? ॥ ४१ ॥
यस्त्रिभिर्नित्यसम्पन्नो रूपेणास्त्रेण मेधया ।
सोऽश्वबन्धो विराटस्य पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ ४२ ॥
इसी प्रकार जो सुन्दर रूप, अस्त्रबल और मेधाशक्ति– इन तीनोंसे सदा सम्पन्न रहता है, वह वीरवर नकुल आज विराटके यहाँ घोड़े बाँधता है । देखो, कालकी कैसी विपरीत गति है? ॥ ४२ ॥
अभ्यकीर्यन्त वृन्दानि दामग्रन्थिमुदीक्ष्य तम् ।
विनयन्तं जवेनाश्वान् महाराजस्य पश्यतः ॥ ४३ ॥
जिसे देखकर शत्रुओंके समुदाय बिखर जाते- भाग खड़े होते हैं, वही अब ग्रन्थिक बनकर घोड़ोंकी रास खोलता और बाँधता है तथा महाराजके सामने अश्वोंको वेगसे चलनेकी शिक्षा देता है ॥ ४३ ॥
अपश्यमेनं श्रीमन्तं मत्स्यं भ्राजिष्णुमुत्तमम् ।
विराटमुपतिष्ठन्तं दर्शयन्तं च वाजिनः ॥ ४४ ॥
मैंने शोभासम्पन्न, तेजस्वी तथा उत्तम रूपवाले नकुलको अपनी आँखों देखा है । वह मत्स्यनरेश विराटको भाँति- भाँतिके घोड़े दिखाता और उनकी सेवामें खड़ा रहता है ॥ ४४ ॥
किं नु मां मन्यसे पार्थ सुखिनीति परंतप ।
एवं दुःखशताविष्टा युधिष्ठिरनिमित्ततः ॥ ४५ ॥
कुन्तीनन्दन! शत्रुदमन! क्या तुम समझते हो, यह सब देखकर मैं सुखी हूँ। राजा युधिष्ठिरके कारण ऐसे सैकड़ों दुःख मुझे सदा घेरे रहते हैं ॥ ४५ ॥
अतः प्रतिविशिष्टानि दुःखान्यन्यानि भारत ।
वर्तन्ते मयि कौन्तेय वक्ष्यामि शृणु तान्यपि ॥ ४६ ॥
भारत! कुन्तीकुमार! इनसे भी भारी दूसरे दुःख मुझपर आ पड़े हैं, उनका भी वर्णन करती हूँ, सुनो ॥
युष्मासु ध्रियमाणेषु दुःखानि विविधान्युत ।
शोषयन्ति शरीरं मे किं नु दुःखमतः परम् ॥ ४७ ॥
तुम सबके जीते - जी नाना प्रकारके कष्ट मेरे शरीरको सुखा रहे हैं, इससे बढ़कर दुःख और क्या हो सकता है? ॥ ४७ ॥
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इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदी भीमसंवादे एकोनविंशोऽध्यायः ॥ १ ९ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदीभीमसेनसंवादविषयक उन्नीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके ५ श्लोक मिलाकर कुल ५२ श्लोक हैं । )
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विंशोऽध्यायः द्रौपदीद्वारा भीमसेनसे अपना दुःख निवेदन करना द्रौपद्युवाच
अहं सैरन्ध्रिवेषेण चरन्ती राजवेश्मनि ।
शौचदास्मि सुदेष्णाया अक्षधूर्तस्य कारणात् ॥ १ ॥
द्रौपदी कहती है- परंतप! तुम्हारे जूएमें चतुर चालाक भाईके कारण आज मैं राजमहलमें सैरन्ध्रीका वेश धारण करके टहल बजाती और रानी सुदेष्णाको स्नानकी वस्तुएँ जुटाकर देती हूँ ॥ १ ॥
विक्रियां पश्य मे तीव्रां राजपुत्र्याः परंतप ।
आत्मकालमुदीक्षन्ती सर्वं दुःखं किलान्तवत् ॥ २ ॥
राजपुत्री होकर भी मुझे कैसा भारी हीन कार्य करना पड़ता है, यह अपनी आँखों देख लो; परंतु सब लोग अपने अभ्युदयका अवसर देखते रहते हैं; क्योंकि यदि दुःख आता है तो उसका अन्त भी होता ही है ॥ २ ॥
अनित्या किल मर्त्यानामर्थसिद्धिर्जयाजयौ ।
इति कृत्वा प्रतीक्षामि भर्तृणामुदयं पुनः ॥ ३ ॥
मनुष्योंकी अर्थ - सिद्धि या जय- पराजय अनित्य हैं। वे सदा स्थिर नहीं रहते । यही सोचकर मैं अपने पतियोंके पुनः अभ्युदयकी प्रतीक्षा करती हूँ ॥ ३ ॥
चक्रवत्परिवर्तन्ते ह्यर्थाश्च व्यसनानि च ।
इति कृत्वा प्रतीक्षामि भर्तृणामुदयं पुनः ॥ ४ ॥
धन और व्यसन ( सम्पत्ति और विपत्ति) सदा गाड़ीके पहियेकी तरह घूमा करते हैं; ऐसा विचारकर मैं पतियोंके पुनः अभ्युदयकालकी प्रतीक्षा करती हूँ ॥॥ ४ ॥
य एव हेतुर्भवति पुरुषस्य जयावहः ।
पराजये च हेतुश्च स इति प्रतिपालये ।
किं मां न प्रतिजानीषे भीमसेन मृतामिव ॥ ५ ॥
जो काल मनुष्यके लिये विजयदायक होता है, वही उसकी पराजयका भी कारण बन जाता है । ऐसा विचारकर मैं अपने पक्षकी विजयके अवसरकी राह देखती हूँ । भीमसेन! क्या तुम नहीं जानते कि इन दुःखोंके आघातसे मैं मरी हुई- सी हो गयी हूँ ॥ ५ ॥
दत्त्वा याचन्ति पुरुषा हत्वा वध्यन्ति चापरे ।
पातयित्वा च पात्यन्ते परैरिति च मे श्रुतम् ॥ ६ ॥
मैंने सुना है, जो मनुष्य दान करते हैं, वे ही कभी याचनाके लिये विवश हो जाते हैं । दूसरे बहुत - से मनुष्य ऐसे हैं, जो दूसरोंको मारकर स्वयं भी दूसरोंके द्वारा मारे जाते हैं तथा
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जो दूसरोंको नीचे गिराते हैं, वे स्वयं भी दूसरे प्रतिपक्षियोंद्वारा नीचे गिराये जाते हैं ॥ ६ ॥
न दैवस्यातिभारोऽस्ति न चैवास्यातिवर्तनम् ।
इति चाप्यागमं भूयो देवस्य प्रतिपालये ॥ ७ ॥
अतः दैवके लिये कुछ भी दुष्कर नहीं है । दैवके विधानको लाँघ जाना भी असम्भव है । इसलिये मैं दैवकी प्रधानता बतानेवाले शास्त्र-वचनोंका पालन करती -उन्हें आदर देती हूँ ॥ ७ ॥
स्थितं पूर्वं जलं यत्र पुनस्तत्रैव गच्छति ।
इति पर्यायमिच्छन्ती प्रतीक्षे उदयं पुनः ॥ ८ ॥
पानी जहाँ पहले स्थिर होता है, वह फिर भी वहीं ठहरता है । इस क्रमको चाहती हुई मैं पुनः अभ्युदयकालकी प्रतीक्षा करती हूँ ॥ ८ ॥
दैवेन किल यस्यार्थः सुनीतोऽपि विपद्यते ।
दैवस्य चागमे यत्नस्तेन कार्यो विजानता ॥ ९ ॥
उत्तम नीतिद्वारा सुरक्षित पदार्थ भी यदि दैव प्रतिकूल हो तो उसके द्वारा नष्ट हो जाता है; अतः विज्ञ पुरुषको दैवको अनुकूल बनानेका ही प्रयत्न करना चाहिये ॥ ९ ॥
यत् तु मेमे वचनस्यास्य कथितस्य प्रयोजनम् ।
पृच्छ मां दुःखितां तत्त्वं पृष्टा चात्र ब्रवीमि ते ॥ १० ॥
मैंने इस समय जो ये बातें कही हैं, इनका क्या प्रयोजन है? यह मुझ दुखियासे पूछो ।
तुम्हारे पूछनेपर यहाँ मैं यथार्थ बात बताती हूँ, सुनो ॥ १० ॥
महिषी पाण्डुपुत्राणां दुहिता द्रुपदस्य च ।
इमामवस्थां सम्प्राप्ता मदन्या का जिजीविषेत् ॥ ११ ॥
मैं पाण्डवोंकी पटरानी और द्रुपदकी पुत्री होकर भी ऐसी दुर्दशामें पड़ी हूँ । मेरे सिवा दूसरी कौन स्त्री ऐसी अवस्थामें जीना चाहेगी? ॥ ११ ॥
कुरून् परिभवेत् सर्वान् पञ्चालानपि भारत ।
पाण्डवेयांश्च सम्प्राप्तो मम क्लेशो ह्यरिंदम ॥ १२ ॥
भारत! शत्रुदमन! मुझपर पड़ा हुआ यह क्लेश समस्त कौरवों, पाञ्चालों और पाण्डवोंके लिये अपमानकी बात है ॥ १२ ॥
भ्रातृभिः श्वशुरैः पुत्रैर्बहुभिः परिवारिता ।
एवं समुदिता नारी का त्वन्या दुःखिता भवेत् ॥ १३ ॥
जिसके बहुत - से भाई, श्वशुर और पुत्र हों, जो इन सबसे घिरी हुई हो तथा भलीभाँति अभ्युदयशील हो, ऐसी परिस्थितिमें मेरे सिवा दूसरी कौन स्त्री दुःख भोगनेके लिये विवश हुई होगी? ॥ १३ ॥
नूनं हि बालया धातुर्मया वै विप्रियं कृतम् ।
यस्य प्रसादाद् दुर्नीतं प्राप्तास्मि भरतर्षभ ॥ १४ ॥
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भरतश्रेष्ठ! जान पड़ता है, बचपनमें मैंने विधाताका निश्चय ही महान् अपराध किया है, जिसके फलस्वरूप मैं आज इस दुर्दशामें पड़ गयी हूँ ॥ १४ ॥
वर्णावकाशमपि मे पश्य पाण्डव यादृशम् ।
तादृशो मे न तत्रासीद् दुःखे परमके तदा ॥ १५ ॥
पाण्डुनन्दन! देखो, मेरे शरीरकी कान्ति कैसी फीकी पड़ गयी है! यहाँ नगरमें मेरी जो अवस्था है, वह उन दिनों अत्यन्त दुःखपूर्ण वनवासके समय भी नहीं थी ॥ १६ ॥
त्वमेव भीम जानीषे यन्मे पार्थ सुखं पुरा ।
साहं दासीत्वमापन्ना न शान्तिमवशा लभे ॥ १६ ॥
नादैविकमहं मन्ये यत्र पार्थो धनंजयः ।
भीमधन्वा महाबाहुरास्ते छन्न इवानलः ॥ १७ ॥
भीमसेन! तुम्हीं जानते हो, पहले मुझे कितना सुख था । यहाँ आकर जबसे मैं दासीभावको प्राप्त हुई हूँ, तभीसे परतन्त्र होनेके कारण मुझे तनिक भी शान्ति नहीं मिलती है । इसे मैं दैवकी ही लीला मानती हूँ। जहाँ प्रचण्ड धनुष धारण करनेवाले महाबाहु अर्जुन भी राखसे ढकी हुई अग्निकी भाँति रनिवासमें छिपकर रहते हैं ॥ १६-१७ ॥
अशक्या वेदितुं पार्थ प्राणिनां वै गतिर्नरैः ।
विनिपातमिमं मन्ये युष्माकं ह्यविचिन्तितम् ॥ १८ ॥
कुन्तीनन्दन! दैवाधीन प्राणियोंकी कब क्या गति होगी, इसे जानना मनुष्योंके लिये सर्वथा असम्भव है । मैं तो समझती हूँ, तुमलोगोंकी जो यह अवनति हुई है, इसकी किसीके मनमें कल्पनातक नहीं थी ॥ १८ ॥
यस्या मम मुखप्रेक्षा यूयमिन्द्रसमाः सदा ।
सा प्रेक्षे मुखमन्यासामवराणां वरा सती ॥ १ ९ ॥
एक दिन वह था कि इन्द्रके समान पराक्रमी तुम सब भाई सदा मेरा मुँह निहारा करते थे । आज वही मैं श्रेष्ठ होकर भी अपनेसे निकृष्ट दूसरी स्त्रियोंका मुँह जोहती रहती हूँ ॥ १ ९ ॥
पश्य पाण्डव मेऽवस्थां यथा नार्हामि वै तथा ।
युष्मासु ध्रियमाणेषु पश्य कालस्य पर्ययम् ॥ २० ॥
यस्याः सागरपर्यन्ता पृथिवी वशवर्तिनी ।
आसीत् साद्य सुदेष्णाया भीताहं वशवर्तिनी ॥ २१ ॥
पाण्डुनन्दन! देखो, तुम सबके जीते जी मैं ऐसी बुरी हालतमें पड़ी हूँ, जो मेरे लिये कदापि उचित नहीं है । समयके इस उलट - फेरको तो देखो; एक दिन समुद्रके पासतककी सारी पृथ्वी जिसके अधीन थी, वही मैं आज सुदेष्णाके वशमें होकर उससे डरती रहती हूँ ॥ २०-२१ ॥ यस्याः पुरःसरा आसन् पृष्ठतश्चानुगामिनः ।
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साहमद्य सुदेष्णायाः पुरः पश्चाच्च गामिनी ॥ २२ ॥
जिसके आगे और पीछे बहुत - से सेवक रहा करते थे, वही मैं अब रानी सुदेष्णाके आगे और पीछे चलती हूँ ॥ २२ ॥
इदं तु दुःखं कौन्तेय ममासह्यं निबोध तत् ।
या न जातु स्वयं पिंषे गात्रोद्वर्तनमात्मनः ।
अन्यत्र कुन्त्या भद्रं ते सा पिनष्म्यद्य चन्दनम् ॥ २३ ॥
पश्य कौन्तेय पाणी मे नैवाभूतां हि यौ पुरा । कुन्तीकुमार! इसके सिवा मेरे एक और असह्य दुःखको तो देखो। पहले मैं माता कुन्तीको छोड़कर ( और किसीके लिये तो क्या ) स्वयं अपने लिये भी कभी उबटन नहीं पीसती थी; किंतु वही मैं आज दूसरोंके लिये चन्दन घिसती हूँ । पार्थ! देखो, ये मेरे दोनों हाथ, जिनमें घट्टे पड़ गये हैं, पहले ये ऐसे नहीं थे ॥ २३ ॥
इत्यस्य दर्शयामास किणवन्तौ करावुभौ ॥ २४ ॥
ऐसा कहकर द्रौपदीने भीमसेनको अपने दोनों हाथ दिखाये, जिनमें चन्दन रगड़नेसे काले दाग पड़ गये थे ॥ २४ ॥
बिभेमि कुन्त्या या नाहं युष्माकं वा कदाचन ।
साद्याग्रतो विराटस्य भीता तिष्ठामि किङ्करी ॥ २५ ॥
(फिर वह सिसकती हुई बोली - ) ' नाथ! जो पहले कभी आर्या कुन्तीसे अथवा तुमलोगोंसे भी नहीं डरती थी, वही द्रौपदी आज दासी होकर राजा विराटके आगे भयभीत-सी खड़ी रहती है ' ॥ २५ ॥
किं नु वक्ष्यति सम्राण्मां वर्णकः सुकृतो न वा ।
नान्यपिष्टं हि मन्स्यस्य चन्दनं किल रोचते ॥ २६ ॥
उस समय मैं सोचती हूँ, ' न जाने सम्राट् मुझे क्या कहेंगे? यह उबटन अच्छा बना है या नहीं। ' मेरे सिवा दूसरेका पीसा हुआ चन्दन मत्स्यराजको अच्छा ही नहीं लगता ॥ २६ ॥
वैशम्पायन उवाच
सा कीर्तयन्ती दुःखानि भीमसेनस्य भामिनी ।
रुरोद शनकैः कृष्णा भीमसेनमुदीक्षती ॥ २७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - राजन्! भामिनी द्रौपदी इस प्रकार भीमसेनसे अपने दुःख बताकर उनके मुखकी ओर देखती हुई धीरे - धीरे रोने लगी ॥ २७ ॥
सा बाष्पकलया वाचा निःश्वसन्ती पुनः पुनः ।
हृदयं भीमसेनस्य घट्टयन्तीदमब्रवीत् ॥ २८ ॥
वह बार- बार लंबी साँसें लेती हुई आँसुओंसे गद्गद वाणीमें भीमसेनके हृदयको कम्पित करती हुई इस प्रकार बोली- ॥ २८ ॥
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नाल्पं कृतं मया भीम देवानां किल्बिषं पुरा ।
अभाग्या यत्र जीवामि कर्तव्ये सति पाण्डव ॥ २ ९ ॥
‘ पाण्डुनन्दन भीमसेन! मैंने पूर्वकालमें देवताओंका थोड़ा अपराध नहीं किया है, तभी तो मुझ अभागिनीको जहाँ मर जाना चाहिये, उस दशामें भी मैं जी रही हूँ' ॥ वैशम्पायन उवाच
ततस्तस्याः करौ सूक्ष्मौ किणबद्धौ वृकोदरः ।
मुखमानीय वै पत्न्या रुरोद परवीरहा ॥ ३० ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! तदनन्तर शत्रुहन्ता भीमसेन अपनी पत्नी द्रौपदीके दुबले - पतले हाथोंको, जिनमें घट्टे पड़ गये थे, अपने मुखपर लगाकर रो पड़े ॥ ३० ॥
तौ गृहीत्वा च कौन्तेयो बाष्पमुत्सृज्य वीर्यवान् ।
ततः परमदुःखार्त इदं वचनमब्रवीत् ॥ ३१ ॥
फिर पराक्रमी भीमने उन हाथोंको पकड़कर आँसू बहाते हुए अत्यन्त दुःखसे पीड़ित हो इस प्रकार कहा ॥ ३१ ॥
इति श्रीमहाभारते विराटपर्वणि कीचकवधपर्वणि द्रौपदीभीमसंवादे विंशोऽध्यायः ॥ २० ॥ इसप्रकार श्रीमहाभारत विराटपर्वके अन्तर्गत कीचकवधपर्वमें द्रौपदी- भीम- संवादविषयक बीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ २० ॥