श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड २ — पृष्ठ 351–360

महाभारत — खण्ड २ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 351–360

पृष्ठ 351

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उर्वश्युवाच

तव पित्राभ्यनुज्ञातां स्वयं च गृहमागताम् ।

यस्मान्मां नाभिनन्देथाः कामबाणवशंगताम् ॥ ४ ९ ॥

तस्मात् त्वं नर्तनः पार्थ स्त्रीमध्ये मानवर्जितः ।

अपुमानिति विख्यातः षण्ढवद् विचरिष्यसि ॥ ५० ॥

उर्वशी बोली- अर्जुन! तुम्हारे पिता इन्द्रके कहने से मैं स्वयं तुम्हारे घरपर आयी और कामबाणसे घायल हो रही हूँ, फिर भी तुम मेरा आदर नहीं करते । अतः तुम्हें स्त्रियोंके बीचमें सम्मानरहित होकर नर्तक बनकर रहना पड़ेगा। तुम नपुंसक कहलाओगे और तुम्हारा सारा आचार- व्यवहार हिजड़ोंके ही समान होगा ॥ ४ ९-५० ॥

एवं दत्त्वार्जुने शापं स्फुरदोष्ठी श्वसन्त्यथ ।

पुनः प्रत्यागता क्षिप्रमुर्वशी गृहमात्मनः ॥ ५१ ॥

फड़कते हुए ओठोंसे इस प्रकार शाप देकर उर्वशी लंबी साँसें खींचती हुई पुनः शीघ्र ही अपने घरको लौट गयी ॥ ५१ ॥

ततोऽर्जुनस्त्वरमाणश्चित्रसेनमरिंदमः ।

सम्प्राप्य रजनीवृत्तं तदुर्वश्या यथातथम् ॥ ५२ ॥

निवेदयामास तदा चित्रसेनाय पाण्डवः ।

तत्र चैवं यथावृत्तं शापं चैव पुनः पुनः ॥ ५३ ॥

पृष्ठ 352

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तदनन्तर शत्रुदमन पाण्डुकुमार अर्जुन बड़ी उतावलीके साथ चित्रसेनके समीप गये तथा रातमें उर्वशीके साथ जो घटना जिस प्रकार घटित हुई, वह सब उन्होंने उस समय चित्रसेनको ज्यों - की - त्यों कह सुनायी । साथ ही उसके शाप देनेकी बात भी उन्होंने बार- बार दुहरायी ॥ ५२-५३ ॥

अवेदयच्च शक्रस्य चित्रसेनोऽपि सर्वशः ।

तत आनाय्य तनयं विविक्ते हरिवाहनः ॥ ५४ ॥

सान्त्वयित्वा शुभैर्वाक्यैः स्मयमानोऽभ्यभाषत ।

सुपुत्राद्य पृथा तात त्वया पुत्रेण सत्तम ॥ ५५ ॥

चित्रसेनने भी सारी घटना देवराज इन्द्रसे निवेदन की । तब इन्द्रने अपने पुत्र अर्जुनको बुलाकर एकान्तमें कल्याणमय वचनोंद्वारा सान्त्वना देते हुए मुसकराकर उनसे कहा ——तात! तुम सत्पुरुषोंके शिरोमणि हो, तुम जैसे पुत्रको पाकर कुन्ती वास्तवमें श्रेष्ठ पुत्रवाली है ' ॥

ऋषयोऽपि हि धैर्येण जिता वै ते महाभुज ।

यत् तु दत्तवती शापमुर्वशी तव मानद ॥ ५६ ॥

स चापि तेऽर्थकृत् तात साधकश्च भविष्यति ॥ ५७ ॥

अज्ञातवासो वस्तव्यो भवद्भिर्भूतलेऽनघ ।

वर्षे त्रयोदशे वीर तत्र त्वं क्षपयिष्यसि ॥ ५८ ॥

‘ महाबाहो! तुमने अपने धैर्य ( इन्द्रियसंयम ) के द्वारा ऋषियोंको भी पराजित कर दिया है । मानद! उर्वशीने जो तुम्हें शाप दिया है, वह तुम्हारे अभीष्ट अर्थका साधक होगा । अनघ! तुम्हें भूतलपर तेरहवें वर्ष में अज्ञातवास करना है । वीर! उर्वशीके दिये हुए शापको तुम उसी वर्षमें पूर्ण कर दोगे ' ॥ ५६–५८ ॥

तेन नर्तनवेषेण अपुंस्त्वेन तथैव च ।

वर्षमेकं विहृत्यैव ततः पुंस्त्वमवाप्स्यसि ॥ ५ ९ ॥

‘ नर्तक वेष और नपुंसक भावसे एक वर्षतक इच्छानुसार विचरण करके तुम फिर अपना पुरुषत्व प्राप्त कर लोगे ' ॥ ५ ९ ॥

एवमुक्तस्तु शक्रेण फाल्गुनः परवीरहा ।

मुदं परमिकां लेभे न च शापं व्यचिन्तयत् ॥ ६० ॥

इन्द्रके ऐसा कहनेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले अर्जुनको बड़ी प्रसन्नता हुई । फिर तो उन्हें शापकी चिन्ता छूट गयी ॥ ६० ॥

चित्रसेनेन सहितो गन्धर्वेण यशस्विना ।

रेमे स स्वर्गभवने पाण्डुपुत्रो धनंजयः ॥ ६१ ॥

पाण्डुपुत्र धनंजय महायशस्वी गन्धर्व चित्रसेनके साथ स्वर्गलोकमें सुखपूर्वक रहने लगे ॥ ६१ ॥

पृष्ठ 353

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इदं यः शृणुयाद् वृत्तं नित्यं पाण्डुसुतस्य वै ।

न तस्य कामः कामेषु पापकेषु प्रवर्तते ॥ ६२ ॥

जो मनुष्य पाण्डुनन्दन अर्जुनके इस चरित्रको प्रतिदिन सुनता है, उसके मनमें पापपूर्ण विषयभोगोंकी इच्छा नहीं होती ॥ ६२ ॥

इदममरवरात्मजस्य घोरं

शुचि चरितं विनिशम्य फाल्गुनस्य ।

व्यपगतमददम्भरागदोषा- स्त्रिदिवगता विरमन्ति मानवेन्द्राः ॥ ६३ ॥

देवराज इन्द्रके पुत्र अर्जुनके इस अत्यन्त दुष्कर पवित्र चरित्रको सुनकर मद, दम्भ तथा विषयासक्ति आदि दोषोंसे रहित श्रेष्ठ मानव स्वर्गलोकमें जाकर वहाँ सुखपूर्वक निवास करते हैं ॥ ६३ ॥

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि उर्वशीशापो नाम षट्चत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें उर्वशीशाप नामक छियालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ४६ ॥

पृष्ठ 354

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सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः लोमश मुनिका स्वर्गमें इन्द्र और अर्जुनसे मिलकर उनका संदेश ले काम्यकवनमें आना वैशम्पायन उवाच

कदाचिदटमानस्तु महर्षिरुत लोमशः ।

जगाम शक्रभवनं पुरन्दरदिदृक्षया ॥ १ ॥

स समेत्य नमस्कृत्य देवराजं महामुनिः ।

ददर्शार्धासनगतं पाण्डवं वासवस्य हि ॥ २ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! एक समयकी बात है, महर्षि लोमश इधर - उधर घूमते हुए इन्द्रसे मिलनेकी इच्छा लेकर स्वर्गलोकमें गये । उन महामुनिने देवराज इन्द्रसे मिलकर उन्हें नमस्कार किया और देखा, पाण्डुनन्दन अर्जुन इन्द्रके आधे सिंहासनपर बैठे हैं ॥

ततः शक्राभ्यनुज्ञात आसने विष्टरोत्तरे ।

निषसाद द्विजश्रेष्ठः पूज्यमानो महर्षिभिः ॥ ३ ॥

तदनन्तर इन्द्रकी आज्ञासे एक उत्तम सिंहासनपर, जहाँ ऊपर कुशका आसन बिछा हुआ था, महर्षियोंसे पूजित द्विजवर लोमशजी बैठे ॥ ३ ॥

तस्य दृष्ट्वाभवद् बुद्धिः पार्थमिन्द्रासने स्थितम् । कथं नु क्षत्रियः पार्थः शक्रासनमवाप्तवान् ॥ नु ४ ॥ इन्द्रके सिंहासनपर बैठे हुए कुन्तीकुमार अर्जुनको देखकर लोमशजीके मनमें यह विचार हुआ कि ‘ क्षत्रिय होकर भी कुन्तीकुमारने इन्द्रका आसन कैसे प्राप्त कर लिया? ॥ ४ ॥

किं त्वस्य सुकृतं कर्म के लोका वै विनिर्जिताः ।

स एवमनुसम्प्राप्तः स्थानं देवनमस्कृतम् ॥ ५ ॥

‘ इनका पुण्य- कर्म क्या है? इन्होंने किन -किन लोकोंपर विजय पायी है? किस पुण्यके प्रभावसे इन्होंने यह देववन्दित स्थान प्राप्त किया है? ' ॥ ५ ॥

तस्य विज्ञाय संकल्पं शक्रो वृत्रनिषूदनः ।

लोमशं प्रहसन् वाक्यमिदमाह शचीपतिः ॥ ६ ॥

लोमश मुनिके संकल्पको जानकर वृत्रहन्ता शचीपति इन्द्रने हँसते हुए उनसे कहा ॥ ६ ॥

ब्रह्मर्षे श्रूयतां यत् ते मनसैतद् विवक्षितम् ।

पृष्ठ 355

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नायं केवलमर्त्यो वै मानुषत्वमुपागतः ॥ ७ ॥

‘ ब्रह्मर्षे! आपके मनमें जो प्रश्न उठा है ' उसका समाधान कर रहा हूँ, सुनिये । ये अर्जुन मानवयोनिमें उत्पन्न हुए केवल मरणधर्मा मनुष्य नहीं हैं ॥ ७ ॥

महर्षे मम पुत्रोऽयं कुन्त्यां जातो महाभुजः ।

अस्त्रहेतोरिह प्राप्तः कस्माच्चित् कारणान्तरात् ॥ ८ ॥

अहो नैनं भवान् वेत्ति पुराणमृषिसत्तमम् ।

शृणु मे वदतो ब्रह्मन् योऽयं यच्चास्य कारणम् ॥ ९ ॥

‘ महर्षे! ये महाबाहु धनंजय कुन्तीके गर्भसे उत्पन्न हुए मेरे पुत्र हैं और कुछ कारणवश अस्त्रविद्या सीखनेके लिये यहाँ आये हैं । आश्चर्य है कि आप इन पुरातन ऋषिप्रवरको नहीं जानते हैं । ब्रह्मन्! इनका जो स्वरूप है और इनके अवतार-ग्रहणका जो कारण है, वह सब मैं बता रहा हूँ। आप मेरे मुँहसे यह सब सुनिये ॥ ८ - ९ ॥

नरनारायणीयौ तौ पुराणावृषिसत्तमौ ।

ताविमावनुजानीहि हृषीकेशधनंजयौ ॥ १० ॥

' नर- नारायण नामसे प्रसिद्ध जो पुरातन मुनीश्वर हैं ' वे ही श्रीकृष्ण और अर्जुनके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं, यह बात आप जान लें ॥ १० ॥

विख्यात त्रिषु लोकेषु नरनारायणावृषी ।

कार्यार्थमवतीर्णौ तौ पृथ्वीं पुण्यप्रतिश्रयाम् ॥ ११ ॥

‘ तीनों लोकोंमें विख्यात नर-नारायण ऋषि ही देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये पुण्यके आधाररूप भूतलपर अवतीर्ण हुए हैं ॥ ११ ॥

यन्न शक्यं सुरैर्द्रष्टुमृषिभिर्वा महात्मभिः ।

तदाश्रमपदं पुण्यं बदरीनाम विश्रुतम् ॥ १२ ॥

स निवासोऽभवद् विप्र विष्णोर्जिष्णोस्तथैव च ।

यतः प्रववृते गङ्गा सिद्धचारणसेविता ॥ १३ ॥

'देवता अथवा महात्मा महर्षि भी जिसे देखनेमें समर्थ नहीं, वह बदरी नामसे विख्यात पुण्यतीर्थ इनका आश्रम है; वही पूर्वकालमें इन श्रीकृष्ण और अर्जुनका (नारायण और नरका ) निवासस्थान था । जहाँसे सिद्ध -चारणसेवित गंगाका प्राकट्य हुआ है ॥ १२-१३ ॥

तौ मन्नियोगाद् ब्रह्मर्षे क्षितौ जातौ महाद्युती ।

भूमेर्भारावतरणं महावीर्यौ करिष्यतः ॥ १४ ॥

‘ ब्रह्मर्षे! ये दोनों महातेजस्वी नर और नारायण मेरे अनुरोधसे पृथ्वीपर उत्पन्न हुए हैं। इनकी शक्ति महान् है, ये दोनों इस पृथ्वीका भार उतारेंगे ॥ १४ ॥

उद्वृत्ता ह्यसुराः केचिन्निवातकवचा इति ।

विप्रियेषु स्थितास्माकं वरदानेन मोहिताः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 356

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‘ इन दिनों निवातकवच नामसे प्रसिद्ध कुछ असुरगण बड़े उद्दण्ड हो रहे हैं, वे वरदानसे मोहित होकर हमारा अनिष्ट करनेमें लगे हुए हैं ॥ १५ ॥

तर्कयन्ते सुरान् हन्तुं बलदर्पसमन्विताः ।

देवान् न गणयन्त्येते तथा दत्तवरा हि ते ॥ १६ ॥

'उनमें बल तो है ही, बली होनेका अभिमान भी है । वे देवताओंको मार डालनेका विचार करते हैं । देवताओंको तो वे लोग कुछ गिनते ही नहीं; क्योंकि उन्हें वैसा ही वरदान प्राप्त हो चुका है ॥ १६ ॥

पातालवासिनो रौद्रा दनोः पुत्रा महाबलाः ।

सर्वदेवनिकाया हि नालं योधयितुं हि तान् ॥ १७ ॥

योऽसौ भूमिगतः श्रीमान् विष्णुर्मधुनिषूदनः ।

कपिलो नाम देवोऽसौ भगवानजितो हरिः ॥ १८ ॥

‘ वे महाबली भयंकर दानव पातालमें निवास करते हैं । सम्पूर्ण देवता मिलकर भी उनके साथ युद्ध नहीं कर सकते । इस समय भूतलपर जिनका अवतार हुआ है वे श्रीमान् मधुसूदन विष्णु ही कपिल नामसे प्रसिद्ध देवता हुए हैं । वे ही भगवान् अपराजित हरि हैं ॥ १७-१८ ॥

येन पूर्वं महात्मानः खनमाना रसातलम् ।

दर्शनादेव निहताः सगरस्यात्मजा विभो ॥ १ ९ ॥

‘ महर्षे! पूर्वकालमें रसातलको खोदनेवाले सगरके महामना पुत्र उन्हीं कपिलकी दृष्टिमात्र पड़नेसे भस्म हो गये थे ॥ १ ९ ॥

तेन कार्यं महत् कार्यमस्माकं द्विजसत्तम ।

पार्थेन च महायुद्धे समेताभ्यां न संशयः ॥ २० ॥

‘द्विजश्रेष्ठ! वे भगवान् श्रीहरि हमारा महान् कार्य सिद्ध कर सकते हैं । कुन्तीकुमार अर्जुनसे भी हमारा कार्य सिद्ध हो सकता है। यदि श्रीकृष्ण और अर्जुन किसी महायुद्धमें एक- दूसरेसे मिल जायँ तो वे दोनों एक साथ होकर महान् -से - महान् कार्य सिद्ध कर सकते हैं ' इसमें संशय नहीं है ॥ २० ॥

सोऽसुरान् दर्शनादेव शक्तो हन्तुं सहानुगान् ।

निवातकवचान् सर्वान् नागानिव महाहदे ॥ २१ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण तो दृष्टिनिक्षेपमात्रसे ही महान् कुण्डमें निवास करनेवाले नागोंकी भाँति समस्त ‘ निवातकवच' नामक दानवोंको उनके अनुयायियोंसहित मार डालनेमें समर्थ ॥ २१ ॥

किं तु नाल्पेन कार्येण प्रबोध्यो मधुसूदनः ।

तेजसः सुमहाराशिः प्रबुद्धः प्रदहेज्जगत् ॥ २२ ॥

पृष्ठ 357

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' परंतु किसी छोटे कार्यके लिये भगवान् मधुसूदनको सूचना देनी उचित नहीं जान पड़ती । वे तेजके महान् राशि हैं; यदि प्रज्वलित हों तो सम्पूर्ण जगत्को भस्म कर सकते हैं ॥ २२ ॥

अयं तेषां समस्तानां शक्तः प्रतिसमासने ।

तान् निहत्य रणे शूरः पुनर्यास्यति मानुषान् ॥ २३ ॥

‘ ये शूरवीर अर्जुन अकेले ही उन समस्त निवात- कवचोंका संहार करनेमें समर्थ हैं । उन सबको युद्धमें मारकर ये फिर मनुष्यलोकको लौट जायँगे ॥ २३ ॥

भवानस्मन्नियोगेन यातु तावन्महीतलम् ।

काम्यके द्रक्ष्यसे वीरं निवसन्तं युधिष्ठिरम् ॥ २४ ॥

' मुने! आप मेरे अनुरोधसे कृपया भूलोकमें जाइये और काम्यकवनमें निवास करनेवाले युधिष्ठिरसे मिलिये ॥ २४ ॥

स वाच्यो मम संदेशाद् धर्मात्मा सत्यसंगरः ।

नोत्कण्ठा फाल्गुने कार्या कृतास्त्रः शीघ्रमेष्यति ॥ २५ ॥

' वे बड़े धर्मात्मा और सत्यप्रतिज्ञ हैं । उनसे मेरा यह संदेश कहियेगा — ' राजन्! आप अर्जुनके वापस लौटनेके विषयमें उत्कण्ठित न हों । वे अस्त्रविद्या सीखकर शीघ्र ही लौट आयेंगे ॥ २५ ॥

नाशुद्धबाहुवीर्येण नाकृतास्त्रेण वा रणे ।

भीष्मद्रोणादयो युद्धे शक्याः प्रतिसमासितुम् ॥ २६ ॥

‘ जिसका बाहुबल पूर्ण अस्त्रशिक्षाके अभावसे त्रुटिपूर्ण हो तथा जिसने अस्त्रविद्याका पूर्ण ज्ञान न प्राप्त किया हो, वह युद्धमें भीष्म द्रोण आदिका सामना नहीं कर सकता ॥ २६ ॥

गृहीतास्त्रो गुडाकेशो महाबाहुर्महामनाः ।

नृत्यवादित्रगीतानां दिव्यानां पारमीयिवान् ॥ २७ ॥

'महाबाहु महामना अर्जुन अस्त्रविद्याकी पूरी शिक्षा पा चुके हैं । वे दिव्य नृत्य, वाद्य एवं गीतकी कलामें भी पारंगत हो गये हैं ॥ २७ ॥

भवानपि विविक्तानि तीर्थानि मनुजेश्वर ।

भ्रातृभिः सहितः सर्वैर्द्रष्टुमर्हत्यरिंदम ॥ २८ ॥

तीर्थेष्वाप्लुत्य पुण्येषु विपाप्मा विगतज्वरः ।

राज्यं भोक्ष्यसि राजेन्द्र सुखी विगतकल्मषः ॥ २ ९ ॥

'मनुजेश्वर! शत्रुदमन! आप भी अपने सभी भाइयोंके साथ पवित्र तीर्थोंका दर्शन कीजिये । राजेन्द्र! पुण्यतीर्थोंमें स्नान करके पाप-तापसे रहित हो सुखी एवं निष्कलंक जीवन बिताते हुए आप राज्यभोग करेंगे ' ॥ भवांश्चैनं द्विजश्रेष्ठ पर्यटन्तं महीतलम् ।

पृष्ठ 358

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त्रातुमर्हति विप्राग्रय तपोबलसमन्वितः ॥ ३० ॥

' द्विजश्रेष्ठ! आप भी भूतलपर विचरनेवाले राजा युधिष्ठिरकी रक्षा करते रहें; क्योंकि आप तपोबलसे सम्पन्न हैं ॥ ३० ॥

गिरिदुर्गेषु च सदा देशेषु विषमेषु च ।

वसन्ति राक्षसा रौद्रास्तेभ्यो रक्षां विधास्यति ॥ ३१ ॥

‘ पर्वतोंके दुर्गम स्थानोंमें तथा ऊँची- नीची भूमियोंमें भयंकर राक्षस निवास करते हैं; उनसे आप भाइयोंसहित युधिष्ठिरकी रक्षा कीजियेगा' ॥ ३१ ॥

एवमुक्तो महेन्द्रेण बीभत्सुरपि लोमशम् ।

उवाच प्रयतो वाक्यं रक्षेथाः पाण्डुनन्दनम् ॥ ३२ ॥

महेन्द्रके ऐसा कहनेपर अर्जुनने भी विनीत होकर लोमश मुनिसे कहा — ' मुने! पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरकी भाइयोंसहित रक्षा कीजिये ॥ ३२ ॥

यथा गुप्तस्त्वया राजा चरेत् तीर्थानि सत्तम ।

दानं दद्याद् यथा चैव तथा कुरु महामुने ॥ ३३ ॥

‘ साधुशिरोमणे! महामुने! आपसे सुरक्षित रहकर राजा युधिष्ठिर तीर्थोंमें भ्रमण करें और दान दें - ऐसी कृपा कीजिये ' ॥ ३३ ॥

वैशम्पायन उवाच

तथेति सम्प्रतिज्ञाय लोमशः सुमहातपाः ।

काम्यकं वनमुद्दिश्य समुपायान्महीतलम् ॥ ३४ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! ' बहुत अच्छा' कहकर महातपस्वी लोमशजीने उनका अनुरोध मान लिया और काम्यकवनमें जानेके लिये भूलोककी ओर प्रस्थान किया ॥ ३४ ॥

ददर्श तत्र कौन्तेयं धर्मराजमरिंदमम् ।

तापसैर्भ्रातृभिश्चैव सर्वतः परिवारितम् ॥ ३५ ॥

वहाँ पहुँचकर उन्होंने शत्रुदमन कुन्तीकुमार धर्मराज युधिष्ठिरको भाइयों तथा तपस्वी मुनियोंसे घिरा हुआ देखा ॥ इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि लोमशगमने सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः ॥ ४७ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें लोमशगमनविषयक सैंतालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 359

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अष्टचत्वारिंशोऽध्यायः दुःखित धृतराष्ट्रका संजयके सम्मुख अपने पुत्रोंके लिये चिन्ता करना जनमेजय उवाच

अत्यद्भुतमिदं कर्म पार्थस्यामिततेजसः ।

धृतराष्ट्रो महाप्राज्ञः श्रुत्वा विप्र किमब्रवीत् ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा-ब्रह्मन्! अमित तेजस्वी कुन्तीकुमार अर्जुनका यह कर्म तो अत्यन्त अद्भुत है । परम बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने भी यह सब अवश्य सुना होगा । उसे सुनकर उन्होंने क्या कहा था? यह बतलाइये ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

शक्रलोकगतं पार्थं श्रुत्वा राजाम्बिकासुतः ।

द्वैपायनादृषिश्रेष्ठात् संजयं वाक्यमब्रवीत् ॥ २ ॥

वैशम्पायनजीने कहा-जनमेजय! अम्बिकानन्दन राजा धृतराष्ट्रने ऋषि द्वैपायन व्यासके मुखसे अर्जुनके इन्द्रलोकगमनका समाचार सुनकर संजयसे यह बात कही ॥ २ ॥

धृतराष्ट्रउवाच

श्रुतं मे सूत कार्त्स्न्येन कर्म पार्थस्य धीमतः ।

कच्चित् तवापि विदितं याथातथ्येन सारथे ॥ ३ ॥

धृतराष्ट्र बोले— सूत! मैंने परम बुद्धिमान् कुन्तीकुमार अर्जुनका सारा वृत्तान्त सुना है । सारथे! क्या तुम्हें भी इस विषयमें यथार्थ बातें ज्ञात हुई हैं? ॥ ३ ॥

प्रमत्तो ग्राम्यधर्मेषु मन्दात्मा पापनिश्चयः ।

मम पुत्रः सुदुर्बुद्धिः पृथिवीं घातयिष्यति ॥ ४ ।

मेरा मूढबुद्धि पुत्र तो विषयभोगोंमें फँसा हुआ है । उसका विचार सदा पापपूर्ण ही बना रहता है । प्रमादमें पड़ा हुआ वह अत्यन्त दुर्बुद्धि दुर्योधन एक दिन सारे भूमण्डलका नाश करा देगा ॥ ४ ॥

पृष्ठ 360

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यस्य नित्यमृता वाचः स्वैरेष्वपि महात्मनः ।

त्रैलोक्यमपि तस्य स्याद् योद्धा यस्य धनंजयः ॥ ५ ॥

जिन महात्माके मुखसे हँसीमें भी सदा सत्य ही बातें निकलती हैं और जिनकी ओरसे लड़नेवाले धनंजय - जैसे योद्धा हैं, उन धर्मराज युधिष्ठिरके लिये इस कौरव - राज्यको की तो बात ही क्या है, वे तीनों लोकोंपर अधिकार प्राप्त कर सकते हैं ॥ ५ ॥

अस्यतः कर्णिनाराचांस्तीक्ष्णाग्रांश्च शिलाशितान् ।

कोऽर्जुनस्याग्रतस्तिष्ठेदपि मृत्युर्जरातिगः ॥ ६ ॥

जो पत्थरपर रगड़कर तेज किये गये हैं, जिनके अग्रभाग बड़े तीखे हैं, उन कर्णि नामक नाराचोंका प्रहार करनेवाले अर्जुनके आगे कौन योद्धा ठहर सकता है? जराविजयी मृत्यु भी उनका सामना नहीं कर सकती ॥ ६ ॥

मम पुत्रा दुरात्मानः सर्वे मृत्युवशानुगाः ।

येषां युद्धं दुराधर्षैः पाण्डवैः प्रत्युपस्थितम् ॥ ७ ॥

मेरे सभी दुरात्मा पुत्र मृत्युके वशमें हो गये हैं; क्योंकि उनके सामने दुर्धर्ष वीर पाण्डवोंके साथ युद्ध करनेका अवसर उपस्थित हुआ है ॥ ७ ॥

तथैव च न पश्यामि युधि गाण्डीवधन्वनः ।

अनिशं चिन्तयानोऽपि य एनमुदियाद् रथी ॥ ८ ॥