श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ३ — पृष्ठ 921–930

महाभारत — खण्ड ३ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 921–930

पृष्ठ 921

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त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः कर्णके द्वारा पाण्डवोंकी विजय और कौरवोंकी पराजय सूचित करनेवाले लक्षणों एवं अपने स्वप्नका वर्णन संजय उवाच

केशवस्य तु तद् वाक्यं कर्णः श्रुत्वा हितं शुभम् ।

अब्रवीदभिसम्पूज्य कृष्णं तं मधुसूदनम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! भगवान् केशवका वह हितकर एवं कल्याणकारी वचन सुनकर कर्ण मधुसूदन श्रीकृष्णके प्रति सम्मानका भाव प्रदर्शित करते हुए इस प्रकार बोला - ॥ १ ॥

जानन् मां किं महाबाहो सम्मोहयितुमिच्छसि ।

योऽयं पृथिव्याः कार्त्स्न्येन विनाशः समुपस्थितः ॥ २ ॥

निमित्तं तत्र शकुनिरहं दुःशासनस्तथा ।

दुर्योधनश्च नृपतिर्धृतराष्ट्रसुतोऽभवत् ॥ ३ ॥

‘ महाबाहो! आप सब कुछ जानते हुए भी मुझे मोहमें क्यों डालना चाहते हैं? यह जो इस भूतलका पूर्णरूपसे विनाश उपस्थित हुआ है, उसमें मैं, शकुनि, दुःशासन तथा धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन निमित्तमात्र हुए हैं ॥ २-३ ॥

असंशयमिदं कृष्ण महद् युद्धमुपस्थितम् ।

पाण्डवानां कुरूणां च घोरं रुधिरकर्दमम् ॥ ४ ॥

' श्रीकृष्ण! इसमें संदेह नहीं कि कौरवों और पाण्डवोंका यह बड़ा भयंकर युद्ध उपस्थित हुआ है, जो रक्तकी कीच मचा देनेवाला है ॥ ४ ॥

राजानो राजपुत्राश्च दुर्योधनवशानुगाः ।

रणे शस्त्राग्निना दग्धाः प्राप्स्यन्ति यमसादनम् ॥ ५ ॥

' दुर्योधनके वशमें रहनेवाले जो राजा और राजकुमार हैं, वे रणभूमिमें अस्त्र--शस्त्रोंकी: आगसे जलकर निश्चय ही यमलोकमें जा पहुँचेंगे ॥ ५ ॥

स्वप्ना हि बहवो घोरा दृश्यन्ते मधुसूदन ।

निमित्तानि च घोराणि तथोत्पाताः सुदारुणाः ॥ ६ ॥

' मधुसूदन! मुझे बहुत- से भयंकर स्वप्न दिखायी देते हैं । घोर अपशकुन तथा अत्यन्त दारुण उत्पात दृष्टिगोचर होते हैं ॥ ६ ॥

पराजयं धार्तराष्ट्रे विजयं च युधिष्ठिरे ।

शंसन्त इव वार्ष्णेय विविधा रोमहर्षणाः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 922

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‘ वृष्णिनन्दन! वे रोंगटे खड़े कर देनेवाले विविध उत्पात मानो दुर्योधनकी पराजय और युधिष्ठिरकी विजय घोषित करते हैं ॥ ७ ॥

प्राजापत्यं हि नक्षत्रं ग्रहस्तीक्ष्णो महाद्युतिः ।

शनैश्चरः पीडयति पीडयन् प्राणिनोऽधिकम् ॥ ८ ॥

' महातेजस्वी एवं तीक्ष्ण ग्रह शनैश्चर प्रजापति - सम्बन्धी रोहिणीनक्षत्रको पीड़ित करते हुए जगत्के प्राणियोंको अधिक - से - अधिक पीड़ा दे रहे हैं ॥ ८ ॥

कृत्वा चाङ्गारको वक्रं ज्येष्ठायां मधुसूदन ।

अनुराधां प्रार्थयते मैत्रं संगमयन्निव ॥ ९ ॥

' मधुसूदन! मंगल ग्रह ज्येष्ठाके निकटसे वक्रगतिका आश्रय ले अनुराधा नक्षत्रपर आना चाहते हैं । जो राज्यस्थ राजाके मित्रमण्डलका विनाश- सा सूचित कर रहे हैं ॥

नूनं महद्भयं कृष्ण कुरूणां समुपस्थितम् ।

विशेषेण हि वार्ष्णेय चित्रां पीडयते ग्रहः ॥ १० ॥

'वृष्णिनन्दन श्रीकृष्ण! निश्चय ही कौरवोंपर महान् भय उपस्थित हुआ है । विशेषतः ' महापात' नामक ग्रह चित्राको पीड़ा दे रहा है ( जो राजाओंके विनाशका सूचक है ) ॥ १० ॥

सोमस्य लक्ष्म व्यावृत्तं राहुरर्कमुपैति च ।

दिवश्चोल्काः पतन्त्येताः सनिर्घाताः सकम्पनाः ॥ ११ ॥

‘ चन्द्रमाका कलंक ( काला चिह्न ) मिट-सा गया है, राहु सूर्यके समीप जा रहा है । आकाशसे ये उल्काएँ गिर रही हैं, वज्रपातके - से शब्द हो रहे हैं और धरती डोलती- सी जान पड़ती है ॥ ११ ॥

निष्टनन्ति च मातङ्गा मुञ्चन्त्यश्रूणि वाजिनः ।

पानीयं यवसं चापि नाभिनन्दन्ति माधव ॥ १२ ॥

‘ माधव! गजराज परस्पर टकराते और विकृत शब्द करते हैं । घोड़े नेत्रोंसे आँसू बहा रहे हैं । वे घास और पानी भी प्रसन्नतापूर्वक नहीं ग्रहण करते हैं ॥ १२ ॥

प्रादुर्भूतेषु चैतेषु भयमाहुरुपस्थितम् ।

निमित्तेषु महाबाहो दारुणं प्राणिनाशनम् ॥ १३ ॥

‘ महाबाहो! कहते हैं, इन निमित्तों (उत्पातसूचक लक्षणों) के प्रकट होनेपर प्राणियोंके विनाश करनेवाले दारुण भयकी उपस्थिति होती है ॥ १३ ॥

अल्पे भुक्ते पुरीषं च प्रभूतमिह दृश्यते ।

वाजिनां वारणानां च मनुष्याणां च केशव ॥ १४ ॥

‘ केशव! हाथी, घोड़े तथा मनुष्य भोजन तो थोड़ा ही करते है; परंतु उनके पेटसे मल अधिक निकलता देखा जाता है ॥ १४ ॥

धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु सर्वेषु मधुसूदन ।

पृष्ठ 923

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पराभवस्य तल्लिङ्गमिति प्राहुर्मनीषिणः ॥ १५ ॥

'मधुसूदन! दुर्योधनकी समस्त सेनाओंमें ये बातें पायी जाती हैं। मनीषी पुरुष इन्हें पराजयका लक्षण कहते हैं ॥ १५ ॥

प्रहृष्टं वाहनं कृष्ण पाण्डवानां प्रचक्षते ।

प्रदक्षिणा मृगाश्चैव तत् तेषां जयलक्षणम् ॥ १६ ॥

‘ श्रीकृष्ण! पाण्डवोंके वाहन प्रसन्न बताये जाते हैं और मृग उनके दाहिनेसे जाते देखे जाते हैं; यह लक्षण उनकी विजयका सूचक है ॥ १६ ॥

अपसव्या मृगाः सर्वे धार्तराष्ट्रस्य केशव ।

वाचश्चाप्यशरीरिण्यस्तत् पराभवलक्षणम् ॥ १७ ॥

‘ केशव! सभी मृग दुर्योधनके बाँयेंसे निकलते हैं और उसे प्रायः ऐसी वाणी सुनायी देती है, जिसके बोलनेवालेका शरीर नहीं दिखायी देता । यह उसकी पराजयका चिह्न है ॥ १७ ॥

मयूराः पुण्यशकुना हंससारसचातकाः ।

जीवंजीवकसङघाश्चाप्यनुगच्छन्ति पाण्डवान् ॥ १८ ॥

' मोर, शुभ शकुन सूचित करनेवाले मुर्गे, हंस, सारस, चातक तथा चकोरोंके समुदाय पाण्डवोंका अनुसरण करते हैं ॥ १८ ॥

गृध्राः कङ्का बकाः श्येना यातुधानास्तथा वृकाः ।

मक्षिकाणां च सङ्घाता अनुधावन्ति कौरवान् ॥ १ ९ ॥

‘ इसी प्रकार गीध, कंक, बक, श्येन ( बाज), राक्षस, भेड़िये तथा मक्खियोंके समूह कौरवोंके पीछे दौड़ते हैं ॥ १ ९ ॥

धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु भेरीणां नास्ति निःस्वनः ।

अनाहताः पाण्डवानां नदन्ति पटहाः किल ॥ २० ॥

' दुर्योधनकी सेनाओंमें बजानेपर भी भेरियोंके शब्द प्रकट नहीं होते हैं और पाण्डवोंके डंके बिना बजाये ही बज उठते हैं ॥ २० ॥

उदपानाश्च नर्दन्ति यथा गोवृषभास्तथा ।

धार्तराष्ट्रस्य सैन्येषु तत् पराभवलक्षणम् ॥ २१ ॥

'दुर्योधनकी सेनाओंमें कुएँ आदि जलाशय गाय- बैलोंके समान शब्द करते हैं । यह उसकी पराजयका लक्षण है ॥ २१ ॥

मांसशोणितवर्षं च वृष्टं देवेन माधव ।

तथा गन्धर्वनगरं भानुमत् समुपस्थितम् ॥ २२ ॥

सप्राकारं सपरिखं सवप्रं चारुतोरणम् ।

कृष्णश्च परिघस्तत्र भानुमावृत्य तिष्ठति ॥ २३ ॥

पृष्ठ 924

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‘ माधव! बादल आकाशसे मांस और रक्तकी वर्षा करते हैं । अन्तरिक्षमें चहारदिवारी, खाईं, वप्र और सुन्दर फाटकोंसहित सूर्ययुक्त गन्धर्वनगर प्रकट दिखायी देता है । वहाँ सूर्यको चारों ओरसे घेरकर एक काला परिघ प्रकट होता है ॥ २२-२३ ॥

उदयास्तमने संध्ये वेदयन्ती महद्भयम् ।

शिवा च वाशते घोरं तत् पराभवलक्षणम् ॥ २४ ॥

‘ सूर्योदय और सूर्यास्त दोनों संध्याओंके समय एक गीदड़ी महान् भयकी सूचना देती

हुई भयंकर आवाजमें रोती है । यह भी कौरवोंकी पराजयका लक्षण है ॥ २४ ॥

एकपक्षाक्षिचरणाः पक्षिणो मधुसूदन ।

उत्सृजन्ति महद् घोरं तत् पराभवलक्षणम् ॥ २५ ॥

‘ मधुसूदन! एक पाँख, एक आँख और एक पैरवाले पक्षी अत्यन्त भयंकर शब्द करते हैं । यह भी कौरवपक्षकी पराजयका ही लक्षण है ॥ २५ ॥

कृष्णग्रीवाश्च शकुना रक्तपादा भयानकाः ।

संध्यामभिमुखा यान्ति तत् पराभवलक्षणम् ॥ २६ ॥

‘ संध्याकालमें काली ग्रीवा और लाल पैरवाले भयानक पक्षी सामने आ जाते हैं, वह भी पराजयका ही चिह्न है ॥ २६ ॥

ब्राह्मणान् प्रथमं द्वेष्टि गुरूंश्च मधुसूदन ।

भृत्यान् भक्तिमतश्चापि तत् पराभवलक्षणम् ॥ २७ ॥

'मधुसूदन! दुर्योधन पहले ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है; फिर गुरुजनोंसे तथा अपने प्रति भक्ति रखनेवाले भृत्योंसे भी द्रोह करने लगता है, यह उसकी पराजयका ही लक्षण है ॥ २७ ॥

पूर्वा दिग् लोहिताकारा शस्त्रवर्णा च दक्षिणा ।

आमपात्रप्रतीकाशा पश्चिमा मधुसूदन ।

उत्तरा शङ्खवर्णाभा दिशां वर्णा उदाहृताः ॥ २८ ॥

' श्रीकृष्ण! पूर्व दिशा लाल, दक्षिण दिशा शस्त्रोंके समान रंगवाली ( काली ), पश्चिम दिशा मिट्टीके कच्चे बर्तनोंकी भाँति मटमैली तथा उत्तर दिशा शंखके समान श्वेत दिखायी देती है । इस प्रकार ये दिशाओंके पृथक्- पृथक् वर्ण बताये गये हैं ॥ २८ ॥

प्रदीप्ताश्च दिशः सर्वा धार्तराष्ट्रस्य माधव ।

महद् भयं वेदयन्ति तस्मिन्नुत्पातदर्शने ॥ २ ९ ॥

‘ माधव! दुर्योधनको इन उत्पातोंका दर्शन तो होता ही है । उसके लिये सारी दिशाएँ भी प्रज्वलित - सी होकर महान् भयकी सूचना दे रही हैं ॥ २ ९ ॥

सहस्रपादं प्रासादं स्वप्नान्ते स्म युधिष्ठिरः ।

अधिरोहन् मया दृष्टः सह भ्रातृभिरच्युत ॥ ३० ॥

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' अच्युत! मैंने स्वप्नके अन्तिम भागमें युधिष्ठिरको एक हजार खंभोंवाले महलपर भाइयोंसहित चढ़ते देखा है ॥ ३० ॥

श्वेतोष्णीषाश्च दृश्यन्ते सर्वे वै शुक्लवाससः ।

आसनानि च शुभ्राणि सर्वेषामुपलक्षये ॥ ३१ ॥

‘ उन सबके सिरपर सफेद पगड़ी और अंगोंमेंश्वेत वस्त्र शोभित दिखायी दिये हैं । मैंने उन सबके आसनोंको भीश्वेत वर्णका ही देखा है ॥ ३१ ॥

तव चापि मया कृष्ण स्वप्नान्ते रुधिराविला ।

अन्त्रेण पृथिवी दृष्टा परिक्षिप्ता जनार्दन ॥ ३२ ॥

' जनार्दन! श्रीकृष्ण! मैंने स्वप्नके अन्तमें आपकी इस पृथ्वीको भी रक्तसे मलिन और आँतसे लिपटी हुई देखा है ॥ ३२ ॥

अस्थिसंचयमारूढश्चामितौजा युधिष्ठिरः ।

सुवर्णपात्र्यां संहृष्टो भुक्तवान् घृतपायसम् ॥ ३३ ॥

‘ मैंने स्वप्नमें देखा, अमिततेजस्वी युधिष्ठिर सफेद हड्डियोंके ढेरपर बैठे हुए हैं और सोनेके पात्रमें रखी हुई घृतमिश्रित खीरको बड़ी प्रसन्नताके साथ खा रहे हैं ॥ ३३ ॥

युधिष्ठिरो मया दृष्टो ग्रसमानो वसुन्धराम् ।

त्वया दत्तामिमां व्यक्तं भोक्ष्यते स वसुन्धराम् ॥ ३४ ॥

‘ मैंने यह भी देखा कि युधिष्ठिर इस पृथ्वीको अपना ग्रास बनाये जा रहे हैं; अतः यह निश्चित है कि आपकी दी हुई वसुन्धराका वे ही उपभोग करेंगे ॥ ३४ ॥

उच्चं पर्वतमारूढो भीमकर्मा वृकोदरः ।

गदापाणिर्नरव्याघ्रो ग्रसन्निव महीमिमाम् ॥ ३५ ॥

' भयंकर कर्म करनेवाले नरश्रेष्ठ भीमसेन भी हाथमें गदा लिये ऊँचे पर्वतपर आरूढ़ हो इस पृथ्वीको ग्रसते हुए - से स्वप्नमें दिखायी दिये हैं ॥ ३५ ॥

क्षपयिष्यति नः सर्वान् स सुव्यक्तं महारणे ।

विदितं मे हृषीकेश यतो धर्मस्ततो जयः ॥ ३६ ॥

अतः यह स्पष्टरूपसे जान पड़ता है कि वे इस महायुद्धमें हम सब लोगोंका संहार कर डालेंगे । हृषीकेश! मुझे यह भी विदित है कि जहाँ धर्म है उसी पक्षकी विजय होती है ॥ ३६ ॥

पाण्डुरं गजमारूढो गाण्डीवी स धनंजयः ।

त्वया सार्धं हृषीकेश श्रिया परमया ज्वलन् ॥ ३७ ॥

‘ श्रीकृष्ण! इसी प्रकार गाण्डीवधारी धनंजय भी आपके साथ श्वेत गजराजपर आरूढ़ हो अपनी परम कान्तिसे प्रकाशित होते हुए मुझे स्वप्नमें दृष्टिगोचर हुए हैं ॥ ३७ ॥

यूयं सर्वे वधिष्यध्वं तत्र मे नास्ति संशयः ।

पार्थिवान् समरे कृष्ण दुर्योधनपुरोगमान् ॥ ३८ ॥

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‘ अतः श्रीकृष्ण! आप सब लोग इस युद्धमें दुर्योधन आदि समस्त राजाओंका वध कर डालेंगे, इसमें मुझे संशय नहीं है ॥ ३८ ॥

नकुलः सहदेवश्च सात्यकिश्च महारथः ।

शुक्लकेयूरकण्ठत्राः शुक्लमाल्याम्बरावृताः ॥ ३ ९ ॥

अधिरूढा नरव्याघ्रा नरवाहनमुत्तमम् ।

त्रय एते मया दृष्टाः पाण्डुरच्छत्रवाससः ॥ ४० ॥

' नकुल, सहदेव तथा महारथी सात्यकि- ये तीन नरश्रेष्ठ मुझे स्वप्नमें श्वेत भुजबन्द, श्वेत कण्ठहार, श्वेत वस्त्र और श्वेत मालाओंसे विभूषित हो उत्तम नरयान ( पालकी ) पर चढ़े दिखायी दिये हैं । ये तीनों ही श्वेत छत्र और श्वेत वस्त्रोंसे सुशोभित थे ॥ ३ ९ -४० ॥

श्वेतोष्णीषाश्च दृश्यन्ते त्रय एते जनार्दन ।

धार्तराष्ट्रेषु सैन्येषु तान् विजानीहि केशव ॥ ४१ ॥

अश्वत्थामा कृपश्चैव कृतवर्मा च सात्वतः ।

रक्तोष्णीषाश्च दृश्यन्ते सर्वे माधव पार्थिवाः ॥ ४२ ॥

'जनार्दन! दुर्योधनकी सेनाओंमेंसे मुझे तीन ही व्यक्ति स्वप्नमें श्वेत पगड़ीसे सुशोभित दिखायी दिये हैं । केशव! आप उनके नाम मुझसे जान लें । वे हैं - अश्वत्थामा, कृपाचार्य और यादव कृतवर्मा । माधव! अन्य सब नरेश मुझे लाल पगड़ी धारण किये दिखायी दिये ॥ ४१-४२ ॥

उष्ट्रप्रयुक्तमारूढौ भीष्मद्रोणौ महारथौ ।

मया सार्धं महाबाहो धार्तराष्ट्रेण वा विभो ॥ ४३ ॥

अगस्त्यशास्तां च दिशं प्रयाताः स्म जनार्दन ।

अचिरेणैव कालेन प्राप्स्यामो यमसादनम् ॥ ४४ ॥

‘महाबाहु जनार्दन! मैंने स्वप्नमें देखा, भीष्म और द्रोणाचार्य दोनों महारथी मेरे तथा दुर्योधनके साथ ऊँट जुते हुए रथपर आरूढ़ हो दक्षिण दिशाकी ओर जा रहे थे । विभो! इसका फल यह होगा कि हमलोग थोड़े ही दिनोंमें यमलोक पहुँच जायँगे ॥ ४३-४४ ॥

अहं चान्ये च राजानो यच्च तत् क्षत्रमण्डलम् ।

गाण्डीवाग्निं प्रवेक्ष्याम इति मे नास्ति संशयः ॥ ४५ ॥

' मैं ' अन्यान्य नरेश तथा वह सारा क्षत्रियसमाज सब - के - सब गाण्डीवकी अग्निमें प्रवेश कर जायँगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ४५ ॥

श्रीकृष्णउवाच

उपस्थितविनाशेयं नूनमद्य वसुन्धरा ।

यथा हि मे वचः कर्ण नोपैति हृदयं तव ॥ ४६ ॥

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श्रीकृष्ण बोले- कर्ण! निश्चय ही अब इस पृथ्वीका विनाशकाल उपस्थित हो गया है; इसीलिये मेरी बात तुम्हारे हृदयतक नहीं पहुँचती है ॥ ४६ ॥

सर्वेषां तात भूतानां विनाशे प्रत्युपस्थिते ।

अनयो नयसंकाशो हृदयान्नापसर्पति ॥ ४७ ॥

तात! जब समस्त प्राणियोंका विनाश निकट आ जाता है, तब अन्याय भी न्यायके समान प्रतीत होकर हृदयसे निकल नहीं पाता है ॥ ४७ ॥

कर्णउवाच

अपि त्वां कृष्ण पश्याम जीवन्तोऽस्मान्महारणात् ।

समुत्तीर्णा महाबाहो वीरक्षत्रविनाशनात् ॥ ४८ ॥

कर्ण बोला – महाबाहु श्रीकृष्ण! वीर क्षत्रियोंका विनाश करनेवाले इस महायुद्धसे पार होकर यदि हम जीवित बच गये तो पुनः आपका दर्शन करेंगे ॥ ४८ ॥

अथवा सङ्गमः कृष्ण स्वर्गे नो भविता ध्रुवम् ।

तत्रेदानीं समेष्यामः पुनः सार्धं त्वयानघ ॥ ४ ९ ॥

अथवा श्रीकृष्ण! अब हमलोग स्वर्गमें ही मिलेंगे, यह निश्चित है । अनघ! वहाँ आजकी ही भाँति पुनः आपसे हमारी भेंट होगी ॥ ४ ९ ॥ संजय उवाच

इत्युक्त्वा माधवं कर्णः परिष्वज्य च पीडितम् ।

विसर्जितः केशवेन रथोपस्थादवातरत् ॥ ५० ॥

संजय कहते हैं - ऐसा कहकर कर्ण भगवान् श्रीकृष्णका प्रगाढ़ आलिंगन करके उनसे विदा ले रथके पिछले भागसे उतर गया ॥ ५० ॥

ततः स्वरथमास्थाय जाम्बूनदविभूषितम् ।

सहास्माभिर्निववृते राधेयो दीनमानसः ॥ ५१ ॥

तदनन्तर अपने सुवर्णभूषित रथपर आरूढ़ हो राधानन्दन कर्ण दीनचित्त होकर हमलोगोंके साथ लौट आया ॥ ५१ ॥

ततः शीघ्रतरं प्रायात् केशवः सहसात्यकिः ।

पुनरुच्चारयन् वाणीं याहि याहीति सारथिम् ॥ ५२ ॥

तदनन्तर सात्यकिसहित श्रीकृष्ण सारथिसे बार- बार ' चलो चलो' ऐसा कहते हुए अत्यन्त तीव्र गतिसे उपप्लव्य नगरकी ओर चल दिये ॥ ५२ ॥

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि कर्णोपनिवादे कृष्णकर्णसंवादे त्रिचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४३ ॥

पृष्ठ 928

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इसप्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें कर्णके द्वारा अपने उ निवेदनके प्रसंगमें भगवद्वाक्यविषयक एक सौ तैंतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥

पृष्ठ 929

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चतुश्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः विदुरकी बात सुनकर युद्धके भावी दुष्परिणामसे व्यथित हुई कुन्तीका बहुत सोच - विचारके बाद कर्णके पास जाना वैशम्पायन उवाच

असिद्धानुनये कृष्णे कुरुभ्यः पाण्डवान् गते ।

अभिगम्य पृथां क्षत्ता शनैः शोचन्निवाब्रवीत् ॥ १ ॥

वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! जब श्रीकृष्णका अनुनय असफल हो गया और वे कौरवोंके यहाँसे पाण्डवोंके पास चले गये, तब विदुरजी कुन्तीके पास जाकर शोकमग्न-से हो धीरे - धीरे इस प्रकार बोले- ॥ १ ॥

जानासि मे जीवपुत्र भावं नित्यमविग्रहे ।

क्रोशतो न च गृह्णीते वचनं मे सुयोधनः ॥ २ ॥

' चिरंजीवी पुत्रोंको जन्म देनेवाली देवि! तुम तो जानती ही हो कि मेरी इच्छा सदासे यही रही है कि कौरवों और पाण्डवोंमें युद्ध न हो । इसके लिये मैं पुकार- पुकारकर कहता रह गया; परंतु दुर्योधन मेरी बात मानता ही नहीं है ॥ २ ॥

उपपन्नो ह्यसौ राजा चेदिपाञ्चालकेकयैः ।

भीमार्जुनाभ्यां कृष्णेन युयुधानयमैरपि ॥ ३ ॥

' राजा युधिष्ठिर चेदि, पांचाल तथा केकयदेशके वीर सैनिकगण, भीमसेन, अर्जुन, श्रीकृष्ण, सात्यकि तथा नकुल सहदेव आदि श्रेष्ठ सहायकोंसे सम्पन्न हैं ॥ ३ ॥

उपप्लव्ये निविष्टोऽपि धर्ममेव युधिष्ठिरः ।

काङ्क्षते ज्ञाति सौहार्दाद् बलवान् दुर्बलो यथा ॥ ४ ॥

' वे युद्धके लिये उद्यत हो उपप्लव्य नगरमें छावनी डालकर बैठे हुए हैं, तथापि भाई-बन्धुओंके सौहार्दवश धर्मकी ही आकांक्षा रखते हैं । बलवान् होकर भी दुर्बलकी भाँति संधि करना चाहते हैं ॥ ४ ॥

राजा तु धृतराष्ट्रोऽयं वयोवृद्धो न शाम्यति ।

मत्तः पुत्रमदेनैव विधर्मे पथि वर्तते ॥ ५ ॥

‘ यह राजा धृतराष्ट्र बूढ़े हो जानेपर भी शान्त नहीं हो रहे हैं। पुत्रोंके मदसे उन्मत्त हो अधर्मके मार्गपर ही चलते हैं ॥ ५ ॥

जयद्रथस्य कर्णस्य तथा दुःशासनस्य च ।

सौबलस्य च दुर्बुद्ध्या मिथो भेदः प्रपत्स्यते ॥ ६ ॥

पृष्ठ 930

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‘ जयद्रथ, कर्ण, दुःशासन तथा शकुनिकी खोटी बुद्धिसे कौरव - पाण्डवोंमें परस्पर फूट होकर ही रहेगी ॥

अधर्मेण हि धर्मिष्ठं कृतं वैकार्यमीदृशम् ।

येषां तेषामयं धर्मः सानुबन्धो भविष्यति ॥ ७ ॥

‘ ( कौरवोंने चौदहवें वर्षमें पाण्डवोंको राज्य लौटा देनेकी प्रतिज्ञा करके भी उसका पालन नहीं किया । ) जिन्हें ऐसा अधर्मजनित कार्य भी, जो परस्पर बिगाड़ करनेवाला है, धर्मसंगत प्रतीत होता है, उनका यह विकृत धर्म सफल होकर ही रहेगा ( अधर्मका फल है दुःख और विनाश । वह उन्हें प्राप्त होगा ही) ॥ ७ ॥

क्रियमाणे बलाद् धर्मे कुरुभिः को न संज्वरेत् ।

असाम्ना केशवे याते समुद्योक्ष्यन्ति पाण्डवाः ॥ ८ ॥

‘ कौरवोंके द्वारा धर्म मानकर किये जानेवाले इस बलात् किसको चिन्ता नहीं होगी । भगवान् श्रीकृष्ण संधिके प्रयत्नमें असफल होकर गये हैं; अतः पाण्डव भी अब युद्धके लिये महान् उद्योग करेंगे ॥ ८ ॥

ततः कुरूणामनयो भविता वीरनाशनः ।

चिन्तयन् न लभे निद्रामहःसु च निशासु च ॥ ९ ॥

‘ इस प्रकार यह कौरवोंका अन्याय समस्त वीरोंका विनाश करनेवाला होगा । इन सब बातोंको सोचते हुए मुझे न तो दिनमें नींद आती है और न रातमें ही' ॥ ९ ॥

श्रुत्वा तु कुन्ती तद्वाक्यमर्थकामेन भाषितम् ।

सा निःश्वसन्ती दुःखार्ता मनसा विममर्श ह ॥ १० ॥

विदुरजीने उभय पक्षके हितकी इच्छासे ही यह बात कही थी। इसे सुनकर कुन्ती दुःखसे आतुर हो उठी और लम्बी साँस खींचती हुई मन- ही -मन इस प्रकार विचार करने लगी— ॥ १० ॥

धिगस्त्वर्थं यत्कृतेऽयं महान् ज्ञातिवधः कृतः ।

वर्त्स्यते सुहृदां चैव युद्धेऽस्मिन् वै पराभवः ॥ ११ ॥

' अहो! इस धनको धिक्कार है, जिसके लिये परस्पर बन्धु बान्धवोंका यह महान् संहार किया जानेवाला है । इस युद्धमें अपने सगे - सम्बन्धियोंका भी पराभव होगा ही ॥ ११ ॥

पाण्डवाश्चेदिपञ्चाला यादवाश्च समागताः ।

भारतैः सह योत्स्यन्ति किं नु दुःखमतः परम् ॥ १२ ॥

‘ पाण्डव, चेदि, पांचाल और यादव एकत्र होकर भरतवंशियोंके साथ युद्ध करेंगे, इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ॥ १२ ॥

पश्ये दोषं ध्रुवं युद्धे तथायुद्धे पराभवम् ।

अधनस्य मृतं श्रेयो न हि ज्ञातिक्षयो जयः ॥ १३ ॥