श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1431–1440
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1431–1440
पृष्ठ 1431
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
राजन्! कुन्तीपुत्र अर्जुनको यह बात अच्छी नहीं लगी, किंतु अन्य सब लोगोंने इस युक्तिको पसंद कर लिया । केवल कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर बड़ी कठिनाईसे इस बातपर राजी हुए ॥ १३३ ॥
ततो भीमो महाबाहुरनीके स्वे महागजम् ॥ १४ ॥
जघान गदया राजन्नश्वत्थामानमित्युत ।
परप्रमथनं घोरं मालवस्येन्द्रवर्मणः ॥ १५ ॥
राजन्! तब महाबाहु भीमसेनने अपनी ही सेनाके एक विशाल हाथीको गदासे मार डाला । उसका नाम था अश्वत्थामा । शत्रुओंको मथ डालनेवाला वह भयंकर गजराज मालवाके राजा इन्द्रवर्माका था ॥ १४-१५ ॥
भीमसेनस्तु सव्रीडमुपेत्य द्रोणमाहवे ।
अश्वत्थामा हत इति शब्दमुच्चैश्चकार ह ॥ १६ ॥
उसे मारकर भीमसेन लजाते - लजाते युद्धस्थलमें द्रोणाचार्यके पास गये और बड़े जोरसे बोले — ‘ अश्वत्थामा मारा गया ॥ १६ ॥
अश्वत्थामेति हि गजः ख्यातो नाम्ना हतोऽभवत् ।
कृत्वा मनसि तं भीमो मिथ्या व्याहृतवांस्तदा ॥ १७ ॥
पृष्ठ 1432
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
‘ अश्वत्थामा ’ नामसे विख्यात हाथी मारा गया था, उसीको मनमें रखकर भीमसेनने उस समय वह झूठी बात कही थी ॥ १७ ॥
भीमसेनवचः श्रुत्वा द्रोणस्तत् परमाप्रियम् ।
मनसा सन्नगात्रोऽभूद् यथा सैकतमम्भसि ॥ १८ ॥
भीमसेनका वह अत्यन्त अप्रिय वचन सुनकर द्रोणाचार्य मन-ह-ही-मन शोकसे व्याकुल हो सन्न रह गये । जैसे पानी पड़ते ही बालू गल जाता है, उसी प्रकार उस दुःखद संवादसे उनका सारा शरीर शिथिल हो गया ॥ शङ्कमानः स तन्मिथ्या वीर्यज्ञः स्वसुतस्य वै I हतः स इति च श्रुत्वा नैव धैर्यादकम्पत ॥ १ ९ ॥ फिर उनके मनमें यह संदेह हुआ कि सम्भव है, यह बात झूठी हो; क्योंकि वे अपने पुत्रके बल - पराक्रमको जानते थे; अतः उसके मारे जानेकी बात सुनकर भी धैर्यसे विचलित न हुए ॥ १ ९ ॥
स लब्ध्वा चेतनां द्रोणः क्षणेनैव समाश्वसत् ।
अनुचिन्त्यात्मनः पुत्रमविषह्यमरातिभिः ॥ २० ॥
उनके मनमें बारंबार यह विचार आया कि मेरा पुत्र तो शत्रुओंके लिये असह्य है; अतः क्षणभरमें ही सचेत होकर उन्होंने अपने - आपको सँभाल लिया ॥ २० ॥
स पार्षतमभिद्रुत्य जिघांसुर्मृत्युमात्मनः ।
अवाकिरत् सहस्रेण तीक्ष्णानां कङ्कपत्रिणाम् ॥ २१ ॥
तत्पश्चात् अपनी मृत्युस्वरूप धृष्टद्युम्नको मार डालनेकी इच्छासे वे उसपर टूट पड़े और कंकपत्रयुक्त सहस्रों तीखे बाणोंद्वारा उन्हें आच्छादित करने लगे ॥ २१ ॥
तं विंशतिसहस्राणि पञ्चालानां नरर्षभाः ।
तथा चरन्तं संग्रामे सर्वतोऽवाकिरञ्छरैः ॥ २२ ॥
इस प्रकार संग्राममें विचरते हुए द्रोणाचार्यपर बीस हजार नरश्रेष्ठ पांचालवीर सब ओरसे बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ २२ ॥
शरैस्तैराचितं द्रोणं नापश्याम महारथम् ।
भास्करं जलदै रुद्धं वर्षास्विव विशाम्पते ॥ २३ ॥
प्रजानाथ! जैसे वर्षाकालमें मेघोंकी घटासे आच्छादित हुए सूर्य नहीं दिखायी देते हैं, उसी प्रकार उन बाणोंके ढेरसे दबे हुए महारथी द्रोणको हमलोग नहीं देख पाते थे ॥ २३ ॥
विधूय तान् बाणगणाम् पञ्चालानां महारथः ।
प्रादुश्चक्रे ततो द्रोणो ब्राह्ममस्त्रं परंतपः ॥ २४ ॥
वधाय तेषां शूराणां पञ्चालानाममर्षितः । तब शत्रुओंको संताप देनेवाले महारथी द्रोणाचार्यने पांचालोंके उन बाणसमूहोंको नष्ट करके शूरवीर पांचालोंके वधके लिये अमर्षयुक्त होकर ब्रह्मास्त्र प्रकट किया ॥ २४३ ॥
पृष्ठ 1433
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
ततो व्यरोचत द्रोणो विनिघ्नन् सर्वसैनिकान् ॥ २५ ॥
शिरांस्यपातयच्चापि पञ्चालानां महामृधे ।
तथैव परिघाकारान् बाहून् कनकभूषणान् ॥ २६ ॥
तदनन्तर सम्पूर्ण सैनिकोंका विनाश करते हुए द्रोणाचार्यकी बड़ी शोभा होने लगी । उन्होंने उस महासमरमें पांचालवीरोंके मस्तक और सुवर्णभूषित परिघ - जैसी मोटी भुजाएँ काट गिरायीं ॥ २५-२६ ॥
ते वध्यमानाः समरे भारद्वाजेन पार्थिवाः ।
मेदिन्यामन्वकीर्यन्त वातनुन्ना इव द्रुमाः ॥ २७ ॥
समरांगणमें द्रोणाचार्यके द्वारा मारे जानेवाले वे पांचालनरेश आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंके समान धरतीपर बिछ गये ॥ २७ ॥
कुञ्जराणां च पततां हयौघानां च भारत ।
अगम्यरूपा पृथिवी मांसशोणितकर्दमा ॥ २८ ॥
भरतनन्दन! धराशायी होते हुए हाथियों और अश्वसमूहोंके मांस तथा रक्तसे कीच जम जानेके कारण वहाँकी भूमिपर चलना- फिरना असम्भव हो गया ॥ २८ ॥
हत्वा विंशतिसाहस्रान् पञ्चालानां रथव्रजान् ।
अतिष्ठदाहवे द्रोणो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ २ ९ ॥
उस समय पांचालोंके बीस हजार रथियोंका संहार करके द्रोणाचार्य युद्धस्थलमें धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान खड़े थे ॥ २९ ॥
तथैव च पुनः क्रुद्धो भारद्वाजः प्रतापवान् ।
वसुदानस्य भल्लेन शिरः कायादपाहरत् ॥ ३० ॥
प्रतापी भरद्वाजनन्दनने पुनः पूर्ववत् कुपित होकर एक भल्लके द्वारा वसुदानका मस्तक धड़से अलग कर दिया ॥
पुनः पञ्चशतान् मत्स्यान् षट्सहस्रांश्च सृजयान् ।
हस्तिनामयुतं हत्वा जघानाश्वायुतं पुनः ॥ ३१ ॥
इसके बाद मत्स्यदेशके पचास योद्धाओंका सृजयवंशके छः हजार सैनिकोंका तथा दस हजार हाथियोंका संहार करके उन्होंने पुनः दस हजार घुड़सवारोंकी सेनाका सफाया कर दिया ॥ ३१ ॥
क्षत्रियाणामभावाय दृष्ट्वा द्रोणमवस्थितम् ।
ऋषयोऽभ्यागतास्तूर्णं हव्यवाहपुरोगमाः ॥ ३२ ॥
इस प्रकार द्रोणाचार्यको क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये उद्यत देख तुरंत ही अग्निदेवको आगे करके बहुत - से महर्षि वहाँ आये ॥ ३२ ॥
विश्वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतमः ।
वसिष्ठः कश्यपोऽत्रिश्च ब्रह्मलोकं निनीषवः ॥ ३३ ॥
पृष्ठ 1434
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
विश्वामित्र, जमदग्नि, भरद्वाज, गौतम, वसिष्ठ, कश्यप और अत्रि – ये सब लोग उन्हें ब्रह्मलोक ले जानेकी इच्छासे वहाँ पधारे थे ॥ ३३ ॥
सिकताः पृश्नयो गर्गा वालखिल्या मरीचिपाः ।
भृगवोऽङ्गिरसश्चैव सूक्ष्माश्चान्ये महर्षयः ॥ ३४ ॥
साथ ही सिकत, पृश्नि, गर्ग, सूर्यकी किरणोंका पान करनेवाले वालखिल्य, भृगु, अंगिरा तथा अन्य सूक्ष्मरूपधारी महर्षि भी वहाँ आये थे ॥ ३४ ॥
त एनमब्रुवन् सर्वे द्रोणमाहवशोभिनम् ।
अधर्मतः कृतं युद्धं समयो निधनस्य ते ॥ ३५ ॥
न्यस्यायुधं रणे द्रोण समीक्षास्मानवस्थितान् ।
नातः क्रूरतरं कर्म पुनः कर्तुमिहार्हसि ॥ ३६ ॥
उन सबने संग्राममें शोभा पानेवाले द्रोणाचार्य से इस प्रकार कहा - ' द्रोण! तुम हथियार नीचे डालकर यहाँ खड़े हुए हमलोगोंकी ओर देखो । अबतक तुमने अधर्मसे युद्ध किया है, अब तुम्हारी मृत्युका समय आ गया है, इसलिये अब फिर यह क्रूरतापूर्ण कर्म न करो ॥
वेदवेदाङ्गविदुषः सत्यधर्मरतस्य ते ।
ब्राह्मणस्य विशेषेण तवैतन्नोपपद्यते ॥ ३७ ॥
' तुम वेद और वेदांगोंके विद्वान् हो, विशेषतः सत्य और धर्ममें तत्पर रहनेवाले ब्राह्मण हो, तुम्हारे लिये यह क्रूर कर्म शोभा नहीं देता ॥ ३७ ॥
त्यजायुधममोघेषो तिष्ठ वर्त्मनि शाश्वते ।
परिपूर्णश्च कालस्ते वस्तुं लोकेऽद्य मानुषे ॥ ३८ ॥
‘ अमोघ बाणवाले द्रोणाचार्य! अस्त्र- शस्त्रोंका परित्याग कर दो और अपने सनातन मार्गपर स्थित हो जाओ । आज इस मनुष्यलोकमें तुम्हारे रहनेका समय पूरा हो गया ॥ ३८ ॥
ब्रह्मास्त्रेण त्वया दग्धा अनस्त्रज्ञा नरा भुवि ।
यदेतदीदृशं विप्र कृतं कर्म न साधु तत् ॥ ३९ ॥
‘ इस भूतलपर जो लोग ब्रह्मास्त्र नहीं जानते थे, उन्हें भी तुमने ब्रह्मास्त्रसे ही दग्ध किया है । ब्रह्मन्! तुमने जो ऐसा कर्म किया है, यह कदापि उत्तम नहीं है ॥ ३ ९ ॥
न्यस्यायुधं रणे विप्र द्रोण मा त्वं चिरं कृथाः ।
मा पापिष्ठतरं कर्म करिष्यसि पुनर्द्विज ॥ ४० ॥
' विप्रवर द्रोण! रणभूमिमें अपना अस्त्र- शस्त्र रख दो, इस कार्यमें विलम्ब न करो ।
ब्रह्मन्! अब फिर ऐसा अत्यन्त पापपूर्ण कर्म न करना' ॥ ४० ॥
इति तेषां वचः श्रुत्वा भीमसेनवचश्च तत् ।
धृष्टद्युम्नं च सम्प्रेक्ष्य रणे स विमनाऽभवत् ॥ ४१ ॥
पृष्ठ 1435
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
उन ऋषियोंकी यह बात सुनकर, भीमसेनके कथनपर विचार कर और रणभूमिमें धृष्टद्युम्नको सामने देखकर आचार्य द्रोणका मन उदास हो गया ॥ ४१ ॥
संदिह्यमानो व्यथितः कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम् ।
अहतं वा हतं वेति पप्रच्छ सुतमात्मनः ॥ ४२ ॥
वे संदेहमें पड़े हुए थे, अतः उन्होंने व्यथित होकर अपने पुत्रके मारे जाने या नहीं मारे जानेका समाचार कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरसे पूछा ॥ ४२ ॥
स्थिरा बुद्धिर्हि द्रोणस्य न पार्थो वक्ष्यतेऽनृतम् ।
त्रयाणामपि लोकानामैश्वर्यार्थे कथञ्चन ॥ ४३ ॥
द्रोणाचार्य मनमें यह दृढ़ विश्वास था कि कुन्तीपुत्र युधिष्ठिर तीनों लोकोंके राज्यके लिये भी किसी प्रकार झूठ नहीं बोलेंगे ॥ ४३ ॥
तस्मात् तं परिपप्रच्छ नान्यं कञ्चिद् द्विजर्षभः ।
तस्मिंस्तस्य हि सत्याशा बाल्यात् प्रभृति पाण्डवे ॥ ४४ ॥
अतः उन द्विजश्रेष्ठने उन्हींसे वह बात पूछी, दूसरे किसीसे नहीं, क्योंकि बचपनसे ही पाण्डुपुत्रकी सचाईमें आचार्यका विश्वास था ॥ ४४ ॥
ततो निष्पाण्डवामुर्वी करिष्यन्तं युधां प्रतिम् ।
द्रोणं ज्ञात्वा धर्मराजं गोविन्दो व्यथितोऽब्रवीत् ॥ ४५ ॥
उस समय योद्धाओंमें श्रेष्ठ द्रोण इस पृथ्वीको पाण्डवरहित कर डालनेके लिये उद्यत थे । उनका यह विचार जानकर भगवान् श्रीकृष्णने व्यथित हो धर्मराज युधिष्ठिरसे कहा ॥ ४५ ॥
यद्यर्धदिवसं द्रोणो युध्यते मन्युमास्थितः ।
सत्यं ब्रवीमि ते सेना विनाशं समुपैष्यति ॥ ४६ ॥
‘ राजन्! यदि क्रोधमें भरे हुए द्रोणाचार्य आधे दिन भी युद्ध करते रहें तो मैं सच कहता हूँ, तुम्हारी सेनाका सर्वनाश हो जायगा ॥ ४६ ॥
स भवांस्त्रातु नो द्रोणात् सत्याज्ज्यायोऽनृतं वचः ।
अनृतं जीवितस्यार्थे वदन्न स्पृश्यतेऽनृतैः ॥ ४७ ॥
‘ अतः तुम द्रोणसे हमलोगोंको बचाओ; इस अवसरपर असत्यभाषणका महत्त्व सत्यसे भी बढ़कर है । किसीकी प्राणरक्षाके लिये यदि कदाचित् असत्य बोलना पड़े तो उस बोलनेवालेको झूठका पाप नहीं लगता' ॥ ४७ ॥
तयोः संवदतोरेवं भीमसेनोऽब्रवीदिदम् ॥ ४८ ॥
श्रुत्वैवं तु महाराज वधोपायं महात्मनः ।
गाहमानस्य ते सेनां मालवस्येन्द्रवर्मणः ॥ ४ ९ ॥
अश्वत्थामेति विख्यातो गजः शक्रगजोपमः ।
निहतो युधि विक्रम्य ततोऽहं द्रोणमब्रुवम् ॥ ५० ॥
पृष्ठ 1436
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
अश्वत्थामा हतो ब्रह्मन्निवर्तस्वाहवादिति ।
नूनं नाश्रद्दधद् वाक्यमेष मे पुरुषर्षभः ॥ ५१ ॥
वे दोनों इस प्रकार बातें कर ही रहे थे कि भीमसेन बोल उठे — ' महाराज! महामना द्रोणके वधका ऐसा उपाय सुनकर मैंने आपकी सेनामें विचरनेवाले मालवनरेश इन्द्रवर्माके अश्वत्थामानामसे विख्यात गजराजको, जो ऐरावतके समान शक्तिशाली था, युद्धमें पराक्रम करके मार डाला । फिर द्रोणाचार्यके पास जाकर कहा - 'ब्रह्मन्! अश्वत्थामा मारा गया, अब युद्धसे निवृत्त हो जाइये । ' परंतु इन पुरुषप्रवर द्रोणने निश्चय ही मेरी बातपर विश्वास नहीं किया है ॥ ४८—५१ ॥
स त्वं गोविन्दवाक्यानि मानयस्व जयैषिणः ।
द्रोणाय निहतं शंस राजन् शारद्वतीसुतम् ॥ ५२ ॥
‘ नरेश्वर! अतः आप विजय चाहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णकी बात मान लीजिये और द्रोणाचार्यसे कह दीजिये कि ' अश्वत्थामा मारा गया' ॥ ५२ ॥
त्वयोक्तो नैव युध्येत जातु राजन् द्विजर्षभः ।
सत्यवान् हि त्रिलोकेऽस्मिन् भवान् ख्यातो जनाधिप ॥ ५३ ॥
‘ राजन्! जनेश्वर! आपके कह देनेपर द्विजश्रेष्ठ द्रोण कदापि युद्ध नहीं करेंगे; क्योंकि आप तीनों लोकोंमें सत्यवादीके रूपमें विख्यात हैं ' ॥ ५३ ॥
तस्य तद् वचनं श्रुत्वा कृष्णवाक्यप्रचोदितः ।
भावित्वाच्च महाराज वक्तुं समुपचक्रमे । ५४ ॥
‘ महाराज! भीमकी यह बात सुनकर श्रीकृष्णके आदेशसे प्रेरित हो भावीवश राजा युधिष्ठिर वह झूठी बात कहनेको तैयार हो गये ॥ ५४ ॥
तमतथ्यभये मग्नो जये सक्तो युधिष्ठिरः । ( अश्वत्थामा हत इति शब्दमुच्चैश्चचार ह । ) अव्यक्तमब्रवीद् राजन् हतः कुञ्जर इत्युत ॥ ५५ ॥
एक ओर तो वे असत्यके भयमें डूबे हुए थे और दूसरी ओर विजयकी प्राप्तिके लिये भी आसक्तिपूर्वक प्रयत्नशील थे; अतः राजन्! उन्होंने ' अश्वत्थामा मारा गया ' यह बात तो उच्च स्वरसे कही, परंतु 'हाथीका वध हुआ है, ' यह बात धीरेसे कही ॥ ५५ ॥
तस्य पूर्वं रथः पृथ्व्याश्चतुरङ्गुलमुच्छ्रितः ।
बभूवैवं च तेनोक्ते तस्य वाहाः स्पृशन्महीम् ॥ ५६ ॥
इसके पहले युधिष्ठिरका रथ पृथ्वीसे चार अंगुल ऊँचे रहा करता था, किंतु उस दिन उनके इस प्रकार असत्य बोलते ही उनके रथके घोड़े धरतीका स्पर्श करके चलने लगे ॥ ५६ ॥
युधिष्ठिरात् तु तद् वाक्यं श्रुत्वा द्रोणो महारथः ।
पुत्रव्यसनसंतप्तो निराशो जीवितेऽभवत् ॥ ५७ ॥
पृष्ठ 1437
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
युधिष्ठिरके मुँह से यह वचन सुनकर महारथी द्रोणाचार्य पुत्रशोकसे संतप्त हो अपने जीवनसे निराश हो गये ॥ ५७ ॥
आगस्कृतमिवात्मानं पाण्डवानां महात्मनाम् ।
ऋषिवाक्येन मन्वानः श्रुत्वा च निहतं सुतम् ॥ ५८ ॥
अपने पुत्रके मारे जानेकी बात सुनकर महर्षियोंके कथनानुसार वे अपने आपको महात्मा पाण्डवोंका अपराधी - सा मानने लगे ॥ ५८ ॥
विचेताः परमोद्विग्नो धृष्टद्युम्नमवेक्ष्य च ।
योद्धुं नाशक्नुवद् राजन् यथापूर्वमरिंदमः ॥ ५ ९ ॥
उनकी चेतनाशक्ति लुप्त होने लगी । वे अत्यन्त उद्विग्न हो उठे । राजन्! उस समय धृष्टद्युम्नको सामने देखकर भी शत्रुओंका दमन करनेवाले द्रोणाचार्य पूर्ववत् युद्ध न कर सके ॥ ५ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि युधिष्ठिरासत्यकथने नवत्यधिकशततमोऽध्यायः ॥ १ ९ ० ॥
पृष्ठ 1438
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें युधिष्ठिरका असत्यभाषणविषयक एक सौ नब्बेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १ ९० ॥ ( दाक्षिणात्य अधिक पाठका श्लोक मिलाकर कुल ५ ९ ३ श्लोक हैं । )
पृष्ठ 1439
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
एकनवत्यधिकशततमोऽध्यायः द्रोणाचार्य और धृष्टद्युम्नका युद्ध तथा सात्यकिकी शूरवीरता और प्रशंसा संजय उवाच
तं दृष्ट्वा परमोद्विग्नं शोकोपहतचेतसम् ।
पाञ्चालराजस्य सुतो धृष्टद्युम्नः समाद्रवत् ॥ १ ॥
य इष्ट्वा मनुजेन्द्रेण द्रुपदेन महामखे ।
लब्धो द्रोणविनाशाय समिद्धाद्धव्यवाहनात् ॥ २ ॥
संजय कहते हैं – राजन्! राजा द्रुपदने एक महान् यज्ञमें देवाराधन करके द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये प्रज्वलित अग्निसे जिस पुत्रको प्राप्त किया था, उस पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्नने जब देखा कि आचार्य द्रोण बड़े उद्विग्न हैं और उनका चित्त शोकसे व्याकुल है, तब उन्होंने उनपर धावा कर दिया ॥
स धनुर्जेत्रमादाय घोरं जलदनिःस्वनम् ।
दृढज्यमजरं दिव्यं शरं चाशीविषोपमम् ॥ ३ ॥
संदधे कार्मुके तस्मिंस्ततस्तमनलोपमम् ।
द्रोणं जिघांसुः पाञ्चाल्यो महाज्वालमिवानलम् ॥ ४ ॥
उन पांचालपुत्रने द्रोणाचार्यके वधकी इच्छा रखकर सुदृढ़ प्रत्यंचासे युक्त, मेघगर्जनाके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाले, कभी जीर्ण न होनेवाले, भयंकर तथा विजयशील दिव्य धनुष हाथमें लेकर उसके ऊपर विषधर सर्पके समान भयदायक और प्रचण्ड लपटोंवाले अग्निके तुल्य तेजस्वी एक बाण रखा ॥ ३-४ ॥
तस्य रूपं शरस्यासीद् धनुर्ज्यामण्डलान्तरे ।
द्योततो भास्करस्येव घनान्ते परिवेषिणः ॥ ५ ॥
धनुषकी प्रत्यंचा खींचनेसे जो मण्डलाकार घेरा बन गया था, उसके भीतर उस तेजस्वी बाणका रूप शरत्कालमें परिधिके भीतर प्रकाशित होनेवाले सूर्यके समान जान पड़ता था ॥ ५ ॥
पार्षतेन परामृष्टं ज्वलन्तमिव तद् धनुः ।
अन्तकालमनुप्राप्तं मेनिरे वीक्ष्य सैनिकाः ॥ ६ ॥
धृष्टद्युम्नके हाथमें आये हुए उस प्रज्वलित अग्निके सदृश तेजस्वी धनुषको देखकर सब सैनिक यह समझने लगे कि ' मेरा अन्तकाल आ पहुँचा है ' ॥ ६ ॥
तमिषं संहतं तेन भारद्वाजः प्रतापवान् ।
पृष्ठ 1440
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
दृष्ट्वामन्यत देहस्य कालपर्यायमागतम् ॥ ७ ॥
द्रुपदपुत्रके द्वारा उस बाणको धनुषपर रखा गया देख प्रतापी द्रोणने भी यह मान लिया कि ' अब इस शरीरका काल आ गया' ॥ ७ ॥
ततः प्रयत्नमातिष्ठदाचार्यस्तस्य वारणे ।
न चास्यास्त्राणि राजेन्द्र प्रादुरासन्महात्मनः ॥ ८ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर आचार्यने उस अस्त्रको रोकनेका प्रयत्न किया, परंतु उन महात्माके अन्तःकरणमें वे दिव्यास्त्र पूर्ववत् प्रकट न हो सके ॥ ८ ॥
तस्य त्वहानि चत्वारि क्षपा चैकास्यतो गता ।
तस्य चाह्नस्त्रिभागेन क्षयं जग्मुः पतत्त्रिणः ॥ ९ ॥
उनके निरन्तर बाण चलाते चार दिन और एक रातका समय बीत चुका था । उस दिनके पंद्रह भागोंमेंसे तीन ही भागमें उनके सारे बाण समाप्त हो गये ॥ ९ ॥
स शरक्षयमासाद्य पुत्रशोकेन चार्दितः ।
विविधानां च दिव्यानामस्त्राणामप्रसादतः ॥ १० ॥
उत्स्रष्टुकामः शस्त्राणि ऋषिवाक्यप्रचोदितः ।
तेजसा पूर्यमाणश्च युयुधे न यथा पुरा ॥ ११ ॥
बाणोंके समाप्त हो जानेसे पुत्रशोकसे पीड़ित हुए द्रोणाचार्य नाना प्रकारके दिव्यास्त्रोंके प्रकट न होनेसे महर्षियोंकी आज्ञा मानकर अब हथियार डाल देनेको उद्यत हो गये; इसीलिये तेजसे परिपूर्ण होनेपर भी वे पूर्ववत् युद्ध नहीं करते थे ॥ १०-११ ॥
भूयश्चान्यत् समादाय दिव्यमाङ्गिरसं धनुः ।
शरांश्च ब्रह्मदण्डाभान् धृष्टद्युम्नमयोधयत् ॥ १२ ॥
इसके बाद द्रोणाचार्यने पुनः आंगिरस नामक दिव्य धनुष तथा ब्रह्मदण्डके समान बाण हाथमें लेकर धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध आरम्भ कर दिया ॥ १२ ॥
ततस्तं शरवर्षेण महता समवाकिरत् ।
व्यशातयच्च संक्रुद्धो धृष्टद्युम्नममर्षणम् ॥ १३ ॥
उन्होंने अत्यन्त कुपित होकर अमर्षमें भरे हुए धृष्टद्युम्नको अपनी भारी बाणवर्षासे ढक दिया और उन्हें क्षत- विक्षत कर दिया ॥ १३ ॥
शरांश्च शतधा तस्य द्रोणश्चिच्छेद सायकैः ।
ध्वजं धनुश्च निशितैः सारथिं चाप्यपातयत् ॥ १४ ॥
इतना ही नहीं, द्रोणाचार्यने अपने तीखे बाणोंद्वारा धृष्टद्युम्नके बाण, ध्वज और धनुषके सैकड़ों टुकड़े कर डाले और सारथिको भी मार गिराया ॥ १४ ॥
धृष्टद्युम्नः प्रहस्यान्यत् पुनरादाय कार्मुकम् ।
शितेन चैनं बाणेन प्रत्यविध्यत् स्तनान्तरे ॥ १५ ॥