श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1451–1460
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1451–1460
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ततश्चतुर्दिशं सैन्यैर्द्वपदस्याभिसंवृतः ।
निर्दहन् क्षत्रियव्रातान् द्रोणः पर्यचरद् रणे ॥ २३ ॥
तदनन्तर द्रुपदकी सेनाओंद्वारा चारों ओरसे घिरे हुए द्रोणाचार्य क्षत्रियसमूहोंको दग्ध करते हुए रणभूमिमें विचरने लगे ॥ २३ ॥
हत्वा विंशतिसाहस्रान् क्षत्रियानरिमर्दनः ।
दशायुतानि करिणामवधीद् विशिखैः शितैः ॥ २४ ॥
शत्रुमर्दन द्रोणने वहाँ बीस हजार क्षत्रियोंका संहार करके अपने तीखे बाणोंद्वारा एक लाख हाथियोंका वध कर डाला ॥ २४ ॥
सोऽतिष्ठदाहवे यत्तो विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ।
क्षत्रियाणामभावाय ब्राह्ममस्त्रं समास्थितः ॥ २५ ॥
फिर वे क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये ब्रह्मास्त्रका सहारा ले बड़ी सावधानीके साथ युद्धभूमिमें खड़े हो गये और धूमरहित प्रज्वलित अग्निके समान प्रकाशित होने लगे ॥ २५ ॥
पाञ्चाल्यं विरथं भीमो हतसर्वायुधं बली ।
सुविषण्णं महात्मानं त्वरमाणः समभ्ययात् ॥ २६ ॥
ततः स्वरथमारोप्य पाञ्चाल्यमरिमर्दनः ।
अब्रवीदभिसम्प्रेक्ष्य द्रोणमस्यन्तमन्तिकात् ॥ २७ ॥
पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न रथहीन हो गये थे । उनके सारे अस्त्र- शस्त्र नष्ट हो चुके थे और वे भारी विषादमें डूब गये थे । उस अवस्थामें शत्रुमर्दन बलवान् भीमसेन उन महामनस्वी पांचालवीरके पास तुरंत आ पहुँचे और उन्हें अपने रथपर बिठाकर द्रोणाचार्यको निकटसे बाण चलाते देख इस प्रकार बोले-— ॥ २६-२७ ॥
न त्वदन्य इहाचार्यं योद्धुमुत्सहते पुमान् ।
त्वरस्व प्राग् वधायैव त्वयि भारः समाहितः ॥ २८ ॥
'धृष्टद्युम्न! यहाँ तुम्हारे सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो आचार्यके साथ
जूझनेका साहस कर सके । अतः तुम पहले उनके वधके लिये ही शीघ्रतापूर्वक प्रयत्न करो ।
तुमपर ही इसका सारा भार रखा गया है ' ॥
स तथोक्तो महाबाहुः सर्वभारसहं धनुः ।
अभिपत्याददे क्षिप्रमायुधप्रवरं दृढम् ॥ २ ९ ॥
भीमसेनके ऐसा कहनेपर महाबाहु धृष्टद्युम्नने उछलकर शीघ्रतापूर्वक सारा भार सहन करनेमें समर्थ सुदृढ़ एवं श्रेष्ठ आयुध धनुषको उठा लिया ॥ २ ९ ॥
संरब्धश्च शरानस्यन् द्रोणं दुर्वारणं रणे ।
विवारयिषुराचार्यं शरवर्षैरवाकिरत् ॥ ३० ॥
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फिर क्रोधमें भरकर बाण चलाते हुए उन्होंने रणभूमिमें कठिनतासे रोके जानेवाले द्रोणाचार्यको रोक देनेकी इच्छासे उन्हें बाणोंकी वर्षाद्वारा ढक दिया ॥ ३० ॥
तौ न्यवारयतां श्रेष्ठौ संरब्धौ रणशोभिनौ ।
उदीरयेतां ब्रह्माणि दिव्यान्यस्त्राण्यनेकशः ॥ ३१ ॥
संग्रामभूमिमें शोभा पानेवाले वे दोनों श्रेष्ठ वीर कुपित हो नाना प्रकारके दिव्यास्त्र एवं ब्रह्मास्त्र प्रकट करते हुए एक- दूसरेको आगे बढ़नेसे रोकने लगे ॥ ३१ ॥
स महास्त्रैर्महाराज द्रोणमाच्छादयद् रणे ।
निहत्य सर्वाण्यस्त्राणि भारद्वाजस्य पार्षतः ॥ ३२ ॥
महाराज! धृष्टद्युम्नने रणभूमिमें द्रोणाचार्यके सभी अस्त्रोंको नष्ट करके उन्हें अपने महान् अस्त्रोंद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ ३२ ॥
सवसातीञ्शिबींश्चैव बाह्लीकान् कौरवानपि ।
रक्षिष्यमाणान् संग्रामे द्रोणं व्यधमदच्युतः ॥ ३३ ॥
कभी विचलित न होनेवाले पांचालवीरने संग्राममें द्रोणाचार्यकी रक्षा करनेवाले बसाति, शिबि, बाह्लीक और कौरवयोद्धाओंका भी संहार कर डाला ॥ ३३ ॥
धृष्टद्युम्नस्तथा राजन् गभस्तिभिरिवांशुमान् ।
बभौ प्रच्छादयन्नाशाः शरजालैः समन्ततः ॥ ३४ ॥
राजन्! अपने बाणोंके समूहसे सम्पूर्ण दिशाओंको सब ओरसे आच्छादित करते हुए धृष्टद्युम्न किरणोंद्वारा अंशुमाली सूर्यके समान प्रकाशित हो रहे थे ॥ ३४ ॥
तस्य द्रोणो धनुश्छित्त्वा विद्ध्वा चैनं शिलीमुखैः ।
मर्माण्यभ्यहनद् भूयः स व्यथां परमामगात् ॥ ३५ ॥
तदनन्तर द्रोणाचार्यने धृष्टद्युम्नका धनुष काटकर उन्हें बाणोंद्वारा घायल कर दिया और पुनः उनके मर्मस्थानोंको गहरी चोट पहुँचायी; इससे उन्हें बड़ी व्यथा हुई ॥ ३५ ॥
ततो भीमो दृढक्रोधो द्रोणस्याश्लिष्य तं रथम् ।
शनकैरिव राजेन्द्र द्रोणं वचनमब्रवीत् ॥ ३६ ॥
राजेन्द्र! तब अपने क्रोधको दृढ़तापूर्वक बनाये रखनेवाले भीमसेन द्रोणाचार्यके उस रथसे सटकर उनसे धीरे- धीरे इस प्रकार बोले— ॥ ३६ ॥
यदि नाम न युध्येरन् शिक्षिता ब्रह्मबन्धवः ।
स्वकर्मभिरसंतुष्टा न स्म क्षत्रं क्षयं व्रजेत् ॥ ३७ ॥
' यदि शिक्षित ब्राह्मण अपने कर्मोंसे असंतुष्ट हो परधर्मका आश्रय ले युद्ध न करते तो क्षत्रियोंका यह संहार न होता ॥ ३७ ॥
अहिंसां सर्वभूतेषु धर्मं ज्यायस्तरं विदुः ।
तस्य च ब्राह्मणो मूलं भवांश्च ब्रह्मवित्तमः ॥ ३८ ॥
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‘ प्राणियोंकी हिंसा न करनेको ही सबसे श्रेष्ठ धर्म माना गया है । उसकी जड़ है ब्राह्मण और आप तो उन ब्राह्मणोंमें भी सबसे उत्तम ब्रह्मवेत्ता हैं ॥ ३८ ॥
श्वपाकवन्म्लेच्छगणान् हत्वा चान्यान् पृथग्विधान् ।
अज्ञानान्मूढवद् ब्रह्मन् पुत्रदारधनेप्सया ॥ ३ ९ ॥
'ब्रह्मन्! ब्रह्मवेत्ता होकर भी आपने स्त्री, धन और पुत्रकी लिप्सासे मूर्ख चाण्डालोंके समान कितने ही म्लेच्छों तथा अन्य नाना प्रकारके क्षत्रियसमूहोंका संहार कर डाला है ॥ ३ ९ ॥
एकस्यार्थे बहून् हत्वा पुत्रस्याधर्मविद्यया ।
स्वकर्मस्थान् विकर्मस्थो न व्यपत्रपसे कथम् ॥ ४० ॥
‘ आप अपने एक पुत्रकी जीविकाके लिये विपरीत कर्मका आश्रय ले इस पाप - विद्याके द्वारा स्वधर्मपरायण बहुसंख्यक क्षत्रियोंका वध करके लज्जित कैसे नहीं हो रहे हैं? ॥ ४० ॥
यस्यार्थे शस्त्रमादाय यमपेक्ष्य च जीवसि ।
स चाद्य पतितः शेते पृष्ठे नावेदितस्तव ॥ ४१ ॥
धर्मराजस्य तद् वाक्यं नाभिशङ्कितुमर्हसि । ‘जिसके लिये आपने शस्त्र उठाया, जिसके जीवनकी अभिलाषा रखकर आप जी रहे हैं, वह तो आज पीछे समरभूमिमें गिरकर चिरनिद्रामें सो रहा है और आपको इसकी सूचनातक नहीं दी गयी । धर्मराज युधिष्ठिरके उस कथनपर तो आपको संदेह या अविश्वास नहीं करना चाहिये ' ॥ ४१६ ॥
एवमुक्तस्ततो द्रोणो भीमेनोत्सृज्य तद् धनुः ॥ ४२ ॥
सर्वाण्यस्त्राणि धर्मात्मा हातुकामोऽभ्यभाषत । भीमसेनके ऐसा कहनेपर धर्मात्मा द्रोणाचार्य वह धनुष फेंककर अन्य सब अस्त्र-शस्त्रोंको भी त्याग देनेकी इच्छासे इस प्रकार बोले— ॥ ४२ ॥
कर्ण कर्ण महेष्वास कृप दुर्योधनेति च ॥ ४३ ॥
संग्रामे क्रियतां यत्नो ब्रवीम्येष पुनः पुनः ।
पाण्डवेभ्यः शिवं वोऽस्तु शस्त्रमभ्युत्सृजाम्यहम् ॥ ४४ ॥
‘ कर्ण! कर्ण! महाधनुर्धर कृपाचार्य! और दुर्योधन! अब तुमलोग स्वयं ही युद्धमें विजय पानेके लिये प्रयत्न करो, यही मैं तुमसे बारंबार कहता हूँ । पाण्डवोंसे तुम लोगोंका कल्याण हो । अब मैं अस्त्र- शस्त्रोंका त्याग कर रहा हूँ' ॥ ४३-४४ ॥
इति तत्र महाराज प्राक्रोशद् द्रौणिमेव च ।
उत्सृज्य च रणे शस्त्रं रथोपस्थे निविश्य च ॥ ४५ ॥
अभयं सर्वभूतानां प्रददौ योगमीयिवान् ।
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महाराज! यह कहकर उन्होंने वहाँ अश्वत्थामाका नाम ले - लेकर पुकारा । फिर सारे अस्त्र- शस्त्रोंको रणभूमिमें फेंककर वे रथके पिछले भागमें जा बैठे । फिर उन्होंने सम्पूर्ण भूतोंको अभयदान दे दिया और समाधि लगा ली ॥ ४५३ ॥
तस्य तच्छिद्रमाज्ञाय धृष्टद्युम्नः प्रतापवान् ॥ ४६ ॥
सशरं तद् धनुर्घोरं संन्यस्याथ रथे ततः ।
खड्गी रथादवप्लुत्य सहसा द्रोणमभ्ययात् ॥ ४७ ॥
उनपर प्रहार करनेका वह अच्छा अवसर हाथ लगा जान प्रतापी धृष्टद्युम्न बाणसहित अपने भयंकर धनुषको रथपर ही रखकर तलवार हाथमें ले उस रथसे उछलकर सहसा द्रोणाचार्यके पास जा पहुँचा ॥ ४६-४७ ॥
हाहाकृतानि भूतानि मानुषाणीतराणि च ।
द्रोणं तथागतं दृष्ट्वा धृष्टद्युम्नवशं गतम् ॥ ४८ ॥
उस अवस्थामें द्रोणाचार्यको धृष्टद्युम्नके अधीन हुआ देख मनुष्य तथा अन्य प्राणी भी हाहाकार कर उठे ॥
हाहाकारं भृशं चक्रुरहो धिगिति चाब्रुवन् ।
द्रोणोऽपि शस्त्राण्युत्सृज्य परमं सांख्यमास्थितः ॥ ४ ९ ॥
वहाँ सबने भारी हाहाकार मचाया और सभी कहने लगे, ' अहो! धिक्कार है, धिक्कार है ' । इधर आचार्य द्रोण भी शस्त्रोंका परित्याग करके परम ज्ञानस्वरूपमें स्थित हो गये ॥ ४ ९ ॥
तथोक्त्वा योगमास्थाय ज्योतिर्भूतो महातपाः ।
पुराणं पुरुषं विष्णुं जगाम मनसा परम् ॥ ५० ॥
वे महातपस्वी द्रोण पूर्वोक्त बात कहकर योगका आश्रय ले ज्योतिःस्वरूप परब्रह्मसे अभिन्नताका अनुभव करते हुए मन- ही - मन सर्वोत्कृष्ट पुराणपुरुष भगवान् विष्णुका ध्यान करने लगे ॥ ५० ॥
मुखं किंचित् समुन्नाम्य विष्टभ्य उरमग्रतः ।
निमीलिताक्षः सत्त्वस्थो निक्षिप्य हृदि धारणाम् ॥ ५१ ॥
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ओमित्येकाक्षरं ब्रह्म ज्योतिर्भूतो महातपाः ।
स्मरित्वा देवदेवेशमक्षरं परमं प्रभुम् ॥ ५२ ॥
दिवमाक्रामदाचार्यः साक्षात् सद्भिर्दुराक्रमाम् । उन्होंने मुँहको कुछ ऊपर उठाकर छातीको आगेकी ओर स्थिर किया । फिर विशुद्ध सत्त्वमें स्थित हो नेत्र बंद करके हृदयमें धारणाको दृढ़तापूर्वक धारण किया । साथ ही ‘ ओम्’ इस एकाक्षर ब्रह्मका जप करते हुए वे महातपस्वी आचार्य द्रोण प्रणवके अर्थभूत देवदेवेश्वर अविनाशी परम प्रभु परमात्माका चिन्तन करते - करते ज्योतिःस्वरूप हो साक्षात् उस ब्रह्मलोकको चले गये, जहाँ पहुँचना बड़े - बड़े संतोंके लिये भी दुर्लभ है ॥ ५१-५२३ ॥ द्वौ सूर्याविति नो बुद्धिरासीत् तस्मिंस्तथागते ॥ ५३ ॥
आचार्य द्रोणके उस प्रकार उत्क्रमण करनेपर हमें ऐसा भान होने लगा, मानो आकाशमें दो सूर्य उदित हो गये हों ॥ ५३ ॥
एकाग्रमिव चासीच्च ज्योतिर्भिः पूरितं नभः ।
समपद्यत चार्काभे भारद्वाजदिवाकरे ॥ ५४ ॥
सूर्यके समान तेजस्वी द्रोणाचार्यरूपी दिवाकरके उदित होनेपर सारा आकाश तेजसे परिपूर्ण हो उस ज्योतिके साथ एकाग्र- सा हो रहा था ॥ ५४ ॥
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निमेषमात्रेण च तज्ज्योतिरन्तरधीयत ।
आसीत् किलकिलाशब्दः प्रहृष्टानां दिवौकसाम् ॥ ५५ ॥
ब्रह्मलोकगते द्रोणे धृष्टद्युम्ने च मोहिते । पलक मारते- मारते वह ज्योति आकाशमें जाकर अदृश्य हो गयी । द्रोणाचार्यके ब्रह्मलोक चले जाने और धृष्टद्युम्नके अपमानसे मोहित हो जानेपर हर्षोल्लाससे भरे हुए देवताओंका कोलाहल सुनायी देने लगा ॥ ५५३ ॥
वयमेव तदाद्राक्ष्म पञ्च मानुषयोनयः ॥ ५६ ॥
योगयुक्तं महात्मानं गच्छन्तं परमां गतिम् ।
अहं धनंजयः पार्थो कृपः शारद्वतस्तथा ॥ ५७ ॥
वासुदेवश्च वार्ष्णेयो धर्मपुत्रश्च पाण्डवः । उस समय मैं, कुन्तीपुत्र अर्जुन, शरद्वान्के पुत्र कृपाचार्य, वृष्णिवंशी भगवान् श्रीकृष्ण तथा धर्मपुत्र पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर–इन पाँच मनुष्योंने ही योगयुक्त महात्मा द्रोणको परम धामकी ओर जाते देखा था ॥ अन्ये तु सर्वे नापश्यन् भारद्वाजस्य धीमतः ॥ ५८ ॥
महिमानं महाराज योगयुक्तस्य गच्छतः । महाराज! अन्य सब लोगोंने योगयुक्त हो ऊर्ध्वगतिको जाते हुए बुद्धिमान् द्रोणाचार्यकी महिमाका साक्षात्कार नहीं किया ॥ ५८३ ॥
ब्रह्मलोकं महद् दिव्यं देवगुह्यं हि तत् परम् ॥ ५ ९ ॥
गतिं परमिकां प्राप्तमजानन्तो नृयोनयः ।
नापश्यन् गच्छमानं हि तं सार्धमृषिपुङ्गवैः ॥ ६० ॥
आचार्यं योगमास्थाय ब्रह्मलोकमरिंदमम् । ब्रह्मलोक महान्, दिव्य, देवगुह्य, उत्कृष्ट तथा परम गतिस्वरूप है । शत्रुदमन आचार्य द्रोण योगका आश्रय लेकर श्रेष्ठ महर्षियोंके साथ उसी ब्रह्मलोकको प्राप्त हुए हैं । अज्ञानी मनुष्योंने उन्हें वहाँ जाते समय नहीं देखा था ॥ वितुन्नाङ्गं शरव्रातैर्न्यस्तायुधमसृक्क्षरम् ॥ ६१ ॥
धिक्कृतः पार्षतस्तं तु सर्वभूतैः परामृशत् । उनका सारा शरीर बाणसमूहोंसे क्षत - विक्षत हो गया था । उससे रक्तकी धारा बह रही थी और वे अपना अस्त्र- शस्त्र नीचे डाल चुके थे । उस दशामें धृष्टद्युम्नने उनके शरीरका स्पर्श किया । उस समय सारे प्राणी उन्हें धिक्कार रहे थे ॥ ६१३ ॥
तस्य मूर्धानमालम्ब्य गतसत्त्वस्य देहिनः ॥ ६२ ॥
किंचिदब्रुवतः कायाद् विचकर्तासिना शिरः ।
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देहधारी द्रोणके शरीरसे प्राण निकल गये थे, अतः वे कुछ भी बोल नहीं रहे थे । इस अवस्थामें उनके मस्तकका बाल पकड़कर धृष्टद्युम्नने तलवारसे उनके सिरको धड़से काट लिया ॥ ६२३ ॥
हर्षेण महता युक्तो भारद्वाजे निपातिते ॥ ६३ ॥
सिंहनादरवं चक्रे भ्रामयन् खड्गमाहवे । इस प्रकार द्रोणाचार्यको मार गिरानेपर धृष्टद्युम्नको महान् हर्ष हुआ और वे रणभूमिमें तलवार घुमाते हुए जोर- जोरसे सिंहनाद करने लगे ॥ ६३३ ॥
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- द्रोणाचार्यका ध्यानावस्थामें देहत्याग एवं तेजस्वी - स्वरूपसे ऊर्ध्वलोक- गमन
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आकर्णपलितः श्यामो वयसाशीतिपञ्चकः ॥ ६४ ॥
त्वत्कृते व्यचरत् संख्ये स तु षोडशवर्षवत् । आचार्यके शरीरका रंग साँवला था । उनकी अवस्था चार सौ वर्षकी हो चुकी थी और उनके ऊपरसे लेकर कानतकके बाल सफेद हो गये थे, तो भी आपके हितके लिये वे संग्राममें सोलह वर्षकी उम्रवाले तरुणके समान विचरते थे ॥ ६४ ॥
उक्तवांश्च महाबाहुः कुन्तीपुत्रो धनंजयः ॥ ६५ ॥
जीवन्तमानयाचार्यं मा वधीद्रुपदात्मज ।
न हन्तव्यो न हन्तव्य इति ते सैनिकाश्च ह ॥ ६६ ॥
यद्यपि उस समय महाबाहु कुन्तीकुमार अर्जुनने बहुत कहा - ' ओ द्रुपदकुमार! तुम आचार्यको जीते - जी ले आओ । उनका वध न करना । ' आपके सैनिक भी बारंबार कहते ही रह गये कि ' न मारो, न मारो ' ॥ ६५-६६ ॥
उत्क्रोशन्नर्जुनश्चैव सानुक्रोशस्तमाव्रजत् ।
क्रोशमानेऽर्जुने चैव पार्थिवेषु च सर्वशः ॥ ६७ ॥
धृष्टद्युम्नोऽवधीद् द्रोणं रथतल्पे नरर्षभम् । अर्जुन तो दयावश चिल्लाते हुए धृष्टद्युम्नके पास आने लगे । परंतु उनके तथा अन्य सब राजाओंके पुकारते रहनेपर भी धृष्टद्युम्नने रथकी बैठकमें नरश्रेष्ठ द्रोणका वध कर ही डाला ॥ ६७ ॥
शोणितेन परिक्लिन्नो रथाद् भूमिमथापतत् ॥ ६८ ॥
लोहिताङ्ग इवादित्यो दुर्धर्षः समपद्यत । दुर्धर्ष द्रोणाचार्यका शरीर खूनसे लथपथ हो रथसे पृथ्वीपर गिर पड़ा, मानो लाल अंगकान्तिवाले सूर्य डूब गये हों ॥ ६८३ ॥
एवं तं निहतं संख्ये ददृशे सैनिको जनः ॥ ६९ ॥
धृष्टद्युम्नस्तु तद् राजन् भारद्वाजशिरोऽहरत् ।
तावकानां महेष्वासः प्रमुखे तत् समाक्षिपत् ॥ ७० ॥
इस प्रकार सब सैनिकोंने द्रोणाचार्यका मारा जाना अपनी आँखोंसे देखा । राजन्! महाधनुर्धर धृष्टद्युम्नने द्रोणाचार्यका वह सिर उठा लिया और उसे आपके पुत्रोंके सामने फेंक दिया ॥ ६ ९-७० ॥
ते तु दृष्ट्वा शिरो राजन् भारद्वाजस्य तावकाः ।
पलायनकृतोत्साहा दुद्रुवुः सर्वतो दिशम् ॥ ७१ ॥
महाराज! द्रोणाचार्यके उस कटे हुए सिरको देखकर आपके सारे सैनिकोंने केवल भागनेमें ही उत्साह दिखाया और वे सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ ७१ ॥
द्रोणस्तु दिवमास्थाय नक्षत्रपथमाविशत् ।
अहमेव तदाद्राक्षं द्रोणस्य निधनं नृप ॥ ७२ ॥
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ऋषेः प्रसादात् कृष्णस्य सत्यवत्याः सुतस्य च । नरेश्वर! द्रोणाचार्य आकाशमें पहुँचकर नक्षत्रोंके पथमें प्रविष्ट हो गये । उस समय सत्यवतीनन्दन महर्षि श्रीकृष्णद्वैपायनके प्रसादसे मैंने भी द्रोणाचार्यकी वह दिव्य मृत्यु प्रत्यक्ष देख ली ॥ ७२ ॥
विधूमामिह संयान्तीमुल्कां प्रज्वलितामिव ॥ ७३ ॥
अपश्याम दिवं स्तब्ध्वा गच्छन्तं तं महाद्युतिम् । महातेजस्वी द्रोण जब आकाशको स्तब्ध करके ऊपरको जा रहे थे, उस समय हमलोगोंने यहाँसे उन्हें एक स्थानसे दूसरे स्थानको जाती हुई धूमरहित प्रज्वलित उल्काके समान देखा था ॥ ७३ ॥
हते द्रोणे निरुत्साहान् कुरून् पाण्डवसृञ्जयाः ॥ ७४ ॥
अभ्यद्रवन् महावेगास्ततः सैन्यं व्यदीर्यत । द्रोणाचार्यके मारे जानेपर कौरव- सैनिक युद्धका उत्साह खो बैठे, फिर पाण्डवों और सृजयोंने उनपर बड़े वेगसे आक्रमण कर दिया । इससे कौरव-सेनामें भगदड़ मच गयी ॥ ७४३ ॥
निहता हतभूयिष्ठाः संग्रामे निशितैः शरैः ॥ ७५ ॥
तावका निहते द्रोणे गतासव इवाभवन् । युद्धमें आपके बहुत योद्धा तीखे बाणोंद्वारा मारे गये थे और बहुत - से अधमरे हो रहे थे । द्रोणाचार्यके मारे जानेपर वे सभी निष्प्राण- से हो गये ॥ ७५३ ॥
पराजयमथावाप्य परत्र च महद् भयम् ॥ ७६ ॥
उभयेनैव ते हीना नाविन्दन् धृतिमात्मनः । इस लोकमें पराजय और परलोकमें महान् भय पाकर दोनों ही लोकोंसे वंचित हो वे अपने भीतर धैर्य न धारण कर सके ॥ ७६३ ॥
अन्विच्छन्तः शरीरं तु भारद्वाजस्य पार्थिवाः ॥ ७७ ॥
नान्वगच्छन् महाराज कबन्धायुतसंकुले । महाराज! हमारे पक्षके राजाओंने द्रोणाचार्यके शरीरको बहुत खोजा, परंतु हजारों लाशोंसे भरे हुए युद्धस्थलमें वे उसे पा न सके ॥ ७७ ॥
पाण्डवास्तु जयं लब्ध्वा परत्र च महद् यशः ॥ ७८ ॥
बाणशङ्खरवांश्चक्रुः सिंहनादांश्च पुष्कलान् । पाण्डव इस लोकमें विजय और परलोकमें महान् यश पाकर वे धनुषपर बाण रखकर उसकी टंकार करने, शंख बजाने और बारंबार सिंहनाद करने लगे ॥ भीमसेनस्ततो राजन् धृष्टद्युम्नश्च पार्षतः ॥ ७ ९ ॥ वरूथिन्यामनृत्येतां परिष्वज्य परस्परम् ।