श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 1991–2000

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1991–2000

पृष्ठ 1991

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यस्य यद्धि रणे व्यङ्गं पितृतो मातृतोऽपि वा ॥ ७७ ॥

कर्मतः शीलतो वापि स तच्छ्रावयते युधि । रणभूमिमें जिसकी जो कुछ पिता- माता, कर्म अथवा शील- स्वभावके कारण विशेषता थी, वह युद्धस्थलमें उसको सुनाता था ॥ ७७ ॥

तान् दृष्ट्वा समरे शूरांस्तर्जमानान् परस्परम् ॥ ७८ ॥

अभवन्मे मती राजन् नैषामस्तीति जीवितम् । राजन्! समरांगणमें एक- दूसरेको डाँट बताते हुए उन शूरवीरोंको देखकर मेरे मनमें यह विचार उठता था कि अब इनका जीवन नहीं रहेगा ॥ ७८३ ॥

तेषां दृष्ट्वा तु क्रुद्धानां वपूंष्यमिततेजसाम् ॥ ७९ ॥

अभवन्मे भयं तीव्रं कथमेतद् भविष्यति । क्रोधमें भरे हुए उन अमिततेजस्वी वीरोंके शरीर देखकर मुझे बड़ा भारी भय होता था कि यह युद्ध कैसा होगा? ॥ ७ ९ ३ ॥

ततस्ते पाण्डवा राजन् कौरवाश्च महारथाः ।

ततक्षुः सायकैस्तीक्ष्णैर्निघ्नन्तो हि परस्परम् ॥ ८० ॥

राजन्! तदनन्तर पाण्डव और कौरव महारथी तीखे बाणोंसे प्रहार करते हुए एक-दूसरेको क्षत- विक्षत करने लगे ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे एकपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५१ ॥

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पृष्ठ 1992

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द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः - दोनों सेनाओंका घोर युद्ध और कौरव सेनाका व्यथित होना संजय उवाच

क्षत्रियास्ते महाराज परस्परवधैषिणः ।

अन्योन्यं समरे जघ्नुः कृतवैराः परस्परम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - महाराज! एक- दूसरेके वधकी इच्छावाले वे क्षत्रिय परस्पर वैरभाव रखकर समरांगणमें एक- दूसरेको मारने लगे ॥ १ ॥

रथौघाश्च हयौघाश्च नरौघाश्च समन्ततः ।

गजौघाश्च महाराज संसक्ताश्च परस्परम् ॥ २ ॥

राजेन्द्र! रथसमूह, अश्वसमूह, हाथियोंके झुंड और पैदल मनुष्योंके समुदाय सब ओर एक- दूसरेसे उलझे हुए थे ॥ २ ॥

गदानां परिघाणां च कणपानां च क्षिप्यताम् ।

प्रासानां भिन्दिपालानां भुशुण्डीनां च सर्वशः ॥ ३ ॥

सम्पातं चानुपश्याम संग्रामे भृशदारुणे ।

शलभा इव सम्पेतुः समन्ताच्छरवृष्टयः ॥ ४ ॥

उस अत्यन्त दारुण संग्राममें हमलोग निरन्तर चलाये जानेवाले परिघों, गदाओं, कणपों, प्रासों, भिन्दिपालों और भुशुण्डियोंकी धारा- सी गिरती देख रहे थे । सब ओर टिड्डी-दलोंके समान बाणोंकी वर्षा हो रही थी ॥ ३-४ ॥

नागान् नागाः समासाद्य व्यधमन्त परस्परम् ।

हया हयांश्च समरे रथिनो रथिनस्तथा ॥ ५ ॥

पत्तयः पत्तिसंघांश्च हयसंघांश्च पत्तयः ।

पत्तयो रथमातङ्गान् रथा हस्त्यश्वमेव च ॥ ६ ॥

नागाश्च समरे त्र्यङ्गं ममृदुः शीघ्रगा नृप । हाथी हाथियोंसे भिड़कर एक- दूसरेको संताप देने लगे । उस समरांगणमें घोड़े घोड़ों, रथी रथियों एवं पैदल पैदलसमूहों, अश्वसमुदायों तथा रथों और हाथियोंका भी मर्दन कर रहे थे । नरेश्वर! इसी प्रकार रथी हाथी और घोड़ोंका तथा शीघ्रगामी हाथी उस युद्धस्थलमें हाथी सेनाके अन्य तीन अंगोंको रौंदने लगे ॥ ५-६३ ॥ वध्यतां तत्र शूराणां क्रोशतां च परस्परम् ॥७ ॥

पृष्ठ 1993

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घोरमायोधनं जज्ञे पशूनां वैशसं यथा । वहाँ मारे जाते और एक - दूसरेको कोसते हुए शूरवीरोंके आर्तनादसे वह युद्धस्थल वैसा ही भयंकर जान पड़ता था, मानो वहाँ पशुओंका वध किया जा रहा हो ॥ रुधिरेण समास्तीर्णा भाति भारत मेदिनी ॥ ८ ॥

शक्रगोपगणाकीर्णा प्रावृषीव यथा धरा । भारत! खूनसे ढकी हुई यह पृथ्वी वर्षाकालमें वीरबहूटी नामक लाल रंगके कीड़ोंसे व्याप्त हुई भूमिके समान शोभा पाती थी ॥ ८३ ॥

यथा वा वाससी शुक्ले महारञ्जनरञ्जिते ॥ ९ ॥

बिभृयाद् युवती श्यामा तद्वदासीद् वसुंधरा ।

मांसशोणितचित्रेव शातकुम्भमयीव च ॥ १० ॥

अथवा जैसे कोई श्यामवर्णा युवती श्वेत रंगके वस्त्रोंको हल्दीके गाढ़े रंगमें रँगकर पहन ले, वैसी ही वह रणभूमि प्रतीत होती थी । मांस और रक्तसे चित्रित सी जान पड़नेवाली वह भूमि सुवर्णमयी - सी प्रतीत होती थी ॥ ९ -१० ॥

भिन्नानां चोत्तमाङ्गानां बाहूनां चोरुभिः सह ।

कुण्डलानां प्रवृद्धानां भूषणानां च भारत ॥ ११ ॥

निष्काणामथ शूराणां शरीराणां च धन्विनाम् ।

चर्मणां सपताकानां संघास्तत्रापतन् भुवि ॥ १२ ॥

भारत! वहाँ भूतलपर कटे हुए मस्तकों, भुजाओं, जाँघों, बड़े - बड़े कुण्डलों, अन्यान्य आभूषणों, निष्कों, धनुर्धर शूरवीरोंके शरीरों, ढालों और पताकाओंके ढेर के ढेर पड़े थे ॥ ११-१२ ॥

गजा गजान् समासाद्य विषाणैरार्दयन् नृप ।

विषाणाभिहतास्तत्र भ्राजन्ते द्विरदास्तथा ॥ १३ ॥

रुधिरेणावसिक्ताङ्गा गैरिकप्रस्रवा इव ।

यथा भ्राजन्ति स्यन्दन्तः पर्वता धातुमण्डिताः ॥ १४ ॥

नरेश्वर! हाथी हाथियोंसे भिड़कर अपने दाँतोंसे परस्पर पीड़ा दे रहे थे । दाँतोंकी चोटसे घायल हो खूनसे भीगे शरीरवाले हाथी गेरूके रंगसे मिले हुए जलका स्रोत बहानेवाले झरनोंसे युक्त धातुमण्डित पर्वतोंके समान शोभा पाते थे ॥

तोमरान् सादिभिर्मुक्तान् प्रतीपानास्थितान् बहून् ।

हस्तैर्विचेरुस्ते नागा बभञ्जुश्चापरे तथा ॥ १५ ॥

कितने ही हाथी घुड़सवारोंके छोड़े हुए तोमरों तथा अनेक विपक्षियोंको भी सूँड़ोंसे पकड़कर रणभूमिमें विचरते थे तथा दूसरे उनको टुकड़े - टुकड़े कर डालते थे ॥

नाराचैश्छिन्नवर्माणो भ्राजन्ति स्म गजोत्तमाः ।

हिमागमे यथा राजन् व्यभ्रा इव महीधराः ॥ १६ ॥

पृष्ठ 1994

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राजन्! नाराचोंसे कवच छिन्न- भिन्न होनेके कारण गजराजोंकी वैसी ही शोभा हो रही थी, जैसे हेमन्त - ऋतुमें बिना बादलोंके पर्वत शोभित होते हैं ॥ १६ ॥

शरैः कनकपुङ्खैश्च चित्रा रेजुर्गजोत्तमाः ।

उल्काभिः सम्प्रदीप्ताग्राः पर्वता इव भारत ॥ १७ ॥

भरतनन्दन! विचित्र प्रकारसे सजे हुए उत्तम हाथी सुवर्णमय पंखवाले बाणोंके लगनेसे उल्काओंद्वारा उद्दीप्त शिखरोंवाले पर्वतोंके समान शोभा पा रहे थे ॥ १७ ॥

केचिदभ्याहता नागैर्नागा नगनिभोपमाः ।

विनेशुः समरे तस्मिन् पक्षवन्त इवाद्रयः ॥ १८ ॥

उस संग्राममें पर्वतोंके समान प्रतीत होनेवाले कितने ही हाथी हाथियोंसे घायल हो पंखधारी शैलसमूहोंके समान नष्ट हो गये ॥ १८ ॥

अपरे प्राद्रवन् नागाः शल्यार्ता व्रणपीडिताः ।

प्रतिमानैश्च कुम्भैश्च पेतुरुर्व्यां महाहवे ॥ १ ९ ॥

दूसरे बहुत - से हाथी बाणोंसे व्यथित और घावोंसे पीड़ित हो भाग चले और कितने ही उस महासमरमें दोनों दाँतों और कुम्भस्थलोंको धरतीपर टेककर धराशायी हो गये ॥

विनेदुः सिंहवच्चान्ये नदन्तो भैरवान् रवान् ।

बभ्रमुर्बहवो राजंश्चक्रुशुश्चापरे गजाः ॥ २० ॥

राजन्! दूसरे अनेक गजराज भयंकर गर्जना करते हुए सिंहके समान दहाड़ रहे थे और दूसरे बहुतेरे हाथी इधर- उधर चक्कर काटते और चीखते - चिल्लाते थे ॥ २० ॥

हयाश्च निहता बाणैर्हेमभाण्डविभूषिताः ।

निषेदुश्चैव मम्लुश्च बभ्रमुश्च दिशो दश ॥ २१ ॥

सोनेके आभूषणोंसे विभूषित बहुसंख्यक घोड़े बाणोंद्वारा घायल होकर बैठ जाते, मलिन हो जाते और दसों दिशाओंमें भागने लगते थे ॥ २१ ॥

अपरे कृष्यमाणाश्च विचेष्टन्तो महीतले ।

भावान् बहुविधांश्चक्रुस्ताडिताः शरतोमरैः ॥ २२ ॥

बाणों और तोमरोंद्वारा ताड़ित होकर कितने ही अश्व धरतीपर लोट जाते और हाथियोंद्वारा खींचे जानेपर छटपटाते हुए नाना प्रकारके भाव व्यक्त करते थे ॥ २२ ॥

रास्तु निहता भूमौ कूजन्तस्तत्र मारिष ।

दृष्ट्वा च बान्धवानन्ये पितॄनन्ये पितामहान् ॥ २३ ॥

आर्य! वहाँ घायल होकर पृथ्वीपर पड़े हुए कितने ही मनुष्य अपने बान्धव -जनोंको देखकर कराह उठते थे । कितने ही अपने बाप-दादोंको देखकर कुछ अस्फुट स्वरमें बोलने लगते थे ॥ २३ ॥

धावमानान् परांश्चान्यान् दृष्ट्वान्ये तत्र भारत ।

गोत्रनामानि ख्यातानि शशंसुरितरेतरम् ॥ २४ ॥

पृष्ठ 1995

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भरतनन्दन! दूसरे बहुत- से मनुष्य अन्यान्य लोगोंको दौड़ते देख एक- दूसरेसे अपने प्रसिद्ध नाम और गोत्र बताने लगते थे ॥ २४ ॥

तेषां छिन्ना महाराज भुजाः कनकभूषणाः ।

उद्वेष्टन्ते विचेष्टन्ते पतन्ते चोत्पतन्ति च ॥ २५ ॥

निपतन्ति तथैवान्ये स्फुरन्ति च सहस्रशः । महाराज! मनुष्योंकी कटी हुई सहस्रों सुवर्णभूषित भुजाएँ कभी टेढ़ी होकर किसी शरीरसे लिपट जातीं, कभी छटपटातीं, गिरतीं, ऊपरको उछलतीं, नीचे आ जातीं और तड़पने लगती थीं ॥ २५३ ॥

वेगांश्चान्ये रणे चक्रुः पञ्चास्या इव पन्नगाः ॥ २६ ॥

ते भुजा भोगिभोगाभाश्चन्दनाक्ता विशाम्पते ।

लोहितार्द्रा भृशं रेजुस्तपनीयध्वजा इव ॥ २७ ॥

प्रजानाथ! सर्पोंके शरीरोंके समान प्रतीत होनेवाली कितनी ही चन्दनचर्चित भुजाएँ रणभूमिमें पाँच मुँहवाले सर्पोंके समान महान् वेग प्रकट करतीं तथा रक्तरंजित होनेके कारण सुवर्णमयी ध्वजाओंके समान अधिकाधिक शोभा पाती थीं ॥ २६-२७ ॥

वर्तमाने तथा घोरे संकुले सर्वतोदिशम् ।

अविज्ञाताः स्म युध्यन्ते विनिघ्नन्तः परस्परम् ॥ २८ ॥

उस घोर घमासान युद्धके चालू होनेपर सम्पूर्ण योद्धा एक- दूसरेपर चोट करते हुए बिना जाने - पहचाने ही युद्ध करते थे ॥ २८ ॥

भौमेन रजसाऽऽकीर्णे शस्त्रसम्पातसंकुले ।

नैव स्वे न परे राजन् व्यज्ञायन्त तमोवृताः ॥ २ ९ ॥

राजन्! शस्त्रोंकी धारावाहिक वृष्टिसे व्याप्त तथा धरतीकी धूलसे आच्छादित हुए उस प्रदेशमें अपने और शत्रुपक्षके सैनिक अन्धकारसे आच्छादित होनेके कारण पहचानमें नहीं आते थे ॥ २ ९ ॥

तथा तदभवद् युद्धं घोररूपं भयानकम् ।

लोहितोदा महानद्यः प्रसस्रुस्तत्र चासकृत् ॥ ३० ॥

वह युद्ध ऐसा घोर एवं भयानक हो रहा था कि वहाँ बारंबार खूनकी बड़ी -बड़ी नदियाँ बह चलती थीं ॥ ३० ॥

शीर्षपाषाणसंछन्नाः केशशैवलशाद्वलाः ।

अस्थिमीनसमाकीर्णा धनुःशरगदोडुपाः ॥ ३१ ॥

योद्धाओंके कटे हुए मस्तक शिलाखण्डोंके समान उन नदियोंको आच्छादित किये रहते थे । उनके केश ही सेवार और घासके समान प्रतीत होते थे, हड्डियाँ ही उनमें मछलियोंके समान व्याप्त हो रही थीं, धनुष, बाण और गदाएँ नौकाके समान जान पड़ती थीं ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 1996

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मांसशोणितपङ्किन्यो घोररूपाः सुदारुणाः ।

नदीः प्रवर्तयामासुः शोणितौघविवर्धिनीः ॥ ३२ ॥

उनके भीतर मांस और रक्तकी ही कीचड़ जमी थी । रक्तके प्रवाहको बढ़ानेवाली उन घोर एवं भयंकर नदियोंको वहाँ योद्धाओंने प्रवाहित किया था ॥ ३२ ॥

भीरुवित्रासकारिण्यः शूराणां हर्षवर्धनाः ।

ता नद्यो घोररूपास्तु नयन्त्यो यमसादनम् ॥ ३३ ॥

वे भयानक रूपवाली नदियाँ कायरोंको डराने और शूरवीरोंका हर्ष बढ़ानेवाली थीं तथा प्राणियोंको यमलोक पहुँचाती थीं ॥ ३३ ॥

अवगाढान् मज्जयन्त्यः क्षत्रस्याजनयन् भयम् ।

क्रव्यादानां नरव्याघ्र नर्दतां तत्र तत्र ह ॥ ३४ ॥

घोरमायोधनं जज्ञे प्रेतराजपुरोपमम् । जो उनमें प्रवेश करते, उन्हें वे डुबो देती थीं और क्षत्रियोंके मनमें भय उत्पन्न करती थीं । नरव्याघ्र! वहाँ गरजते हुए मांसभक्षी जन्तुओंके शब्दसे वह युद्धस्थल प्रेतराजकी नगरीके समान भयानक जान पड़ता था ॥ ३४३ ॥

उत्थितान्यगणेयानि कबन्धानि समन्ततः ॥ ३५ ॥

नृत्यन्ति वै भूतगणाः सुतृप्ता मांसशोणितैः ।

पीत्वा च शोणितं तत्र वसां पीत्वा च भारत ॥ ३६ ॥

वहाँ चारों ओर उठे हुए अगणित कबन्ध और रक्त- मांससे तृप्त हुए भूतगण नृत्य कर रहे थे । भारत! ये सब - के - सब रक्त तथा वसा पीकर छके हुए थे ॥ ३५-३६ ॥

मेदोमज्जावसामत्तास्तृप्ता मांसस्य चैव ह ।

धावमानाः स्म दृश्यन्ते काकगृध्रबकास्तथा ॥ ३७ ॥

मेदा, वसा, मज्जा और मांससे तृप्त एवं मतवाले कौए, गीध और बक सब ओर उड़ते दिखायी देते थे ॥

शूरास्तु समरे राजन् भयं त्यक्त्वा सुदुस्त्यजम् ।

योधव्रतसमाख्याताश्चक्रुः कर्माण्यभीतवत् ॥ ३८ ॥

राजन्! उस समरमें योद्धाओंके व्रतका पालन करनेमें विख्यात शूरवीर जिसका त्याग करना अत्यन्त कठिन है, उस भयको छोड़कर निर्भयके समान पराक्रम प्रकट करते थे ॥

शरशक्तिसमाकीर्णे क्रव्यादगणसंकुले ।

व्यचरन्त रणे शूराः ख्यापयन्तः स्वपौरुषम् ॥ ३ ९ ॥

बाण और शक्तियोंसे व्याप्त तथा मांसभक्षी जन्तुओंसे भरे हुए उस रणक्षेत्रमें शूरवीर अपने पुरुषार्थकी ख्याति बढ़ाते हुए विचर रहे थे ॥ ३ ९ ॥

अन्योन्यं श्रावयन्ति स्म नामगोत्राणि भारत ।

पितृनामानि च रणे गोत्रनामानि वा विभो ॥ ४० ॥

पृष्ठ 1997

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श्रावयाणाश्च बहवस्तत्र योद्धा विशाम्पते ।

अन्योन्यमवमृद्नन्तः शक्तितोमरपट्टिशैः ॥ ४१ ॥

भारत! प्रभो! रणभूमिमें कितने ही योद्धा एक- दूसरेको अपने और पिताके नाम तथा गोत्र सुनाते थे । प्रजानाथ! नाम और गोत्र सुनाते हुए बहुतेरे योद्धा शक्ति, तोमर और पट्टिशोंद्वारा एक- दूसरेको धूलमें मिला रहे थे ॥

वर्तमाने तथा युद्धे घोररूपे सुदारुणे ।

व्यषीदत् कौरवी सेना भिन्ना नौरिव सागरे ॥ ४२ ॥

इस प्रकार वह दारुण एवं भयंकर युद्ध चल ही रहा था कि समुद्रमें टूटी हुई नौकाके समान कौरव - सेना छिन्न- भिन्न हो गयी और विषाद करने लगी ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक बावनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५२ ॥

पृष्ठ 1998

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त्रिपञ्चाशत्तमोऽध्यायः अर्जुनद्वारा दस हजार संशप्तक योद्धाओं और उनकी सेनाका संहार संजय उवाच

वर्तमाने तथा युद्धे क्षत्रियाणां निमज्जने ।

गाण्डीवस्य महाघोषः श्रूयते युधि मारिष ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — आर्य! जब क्षत्रियोंका संहार करनेवाला वह भयानक युद्ध चल रहा था, उसी समय दूसरी ओर बड़े जोर-जोरसे गाण्डीव धनुषकी टंकार सुनायी देती थी ॥ १ ॥

संशप्तकानां कदनमकरोद् यत्र पाण्डवः ।

कोसलानां तथा राजन् नारायणबलस्य च ॥ २ ॥

राजन्! वहाँ पाण्डुनन्दन अर्जुन संशप्तकोंका, कोसलदेशीय योद्धाओंका तथा नारायणी - सेनाका संहार कर रहे थे ॥ २ ॥

संशप्तकास्तु समरे शरवृष्टीः समन्ततः ।

अपातयन् पार्थमूर्ध्नि जयगृद्धाः प्रमन्यवः ॥ ३ ॥

समरांगणमें विजयकी इच्छा रखनेवाले संशप्तकोंने अत्यन्त कुपित होकर अर्जुनके मस्तकपर चारों ओरसे बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ॥ ३ ॥

ता वृष्टीः सहसा राजंस्तरसा धारयन् प्रभुः ।

व्यगाहत रणे पार्थो विनिघ्नन् रथिनां वरान् ॥ ४ ॥

राजन्! उस बाण- वर्षाको सहसा वेगपूर्वक सहते और श्रेष्ठ रथियोंका संहार करते हुए शक्तिशाली अर्जुन रणभूमिमें विचरने लगे ॥ ४ ॥

विगाह्य तद् रथानीकं कङ्कपत्रैः शिलाशितैः ।

आससाद ततः पार्थः सुशर्माणं वरायुधम् ॥ ५ ॥

सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए कंकपत्रयुक्त बाणोंद्वारा प्रहार करते हुए कुन्तीपुत्र अर्जुन रथियोंकी सेनामें घुसकर श्रेष्ठ आयुध धारण करनेवाले सुशर्माके पास जा पहुँचे ॥ ५ ॥

स तस्य शरवर्षाणि ववर्ष रथिनां वरः ।

तथा संशप्तकाश्चैव पार्थं बाणैः समार्पयन् ॥ ६ ॥

रथियोंमें श्रेष्ठ सुशर्मा उनके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा तथा अन्य संशप्तकोंने भी अर्जुनको अनेक बाण मारे ॥

पृष्ठ 1999

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सुशर्मा तु ततः पार्थं विद्ध्वा दशभिराशुगैः ।

जनार्दनं त्रिभिर्बाणैरहनद् दक्षिणे भुजे ॥ ७ ॥

सुशर्माने दस बाणोंसे अर्जुनको घायल करके श्रीकृष्णकी दाहिनी भुजापर तीन बाण मारे ॥ ७ ॥

ततोऽपरेण भल्लेन केतुं विव्याध मारिष ।

स वानरवरो राजन् विश्वकर्मकृतो महान् ॥ ८ ॥

ननाद सुमहानादं भीषयाणो जगर्ज च । मान्यवर! तदनन्तर दूसरे भल्लसे उनकी ध्वजाको बींध डाला । राजन्! उस समय विश्वकर्माका बनाया हुआ वह महान् वानर सबको भयभीत करता हुआ बड़े जोर- जोरसे गर्जना करने लगा ॥ ८३ ॥

कपेस्तु निनदं श्रुत्वा संत्रस्ता तव वाहिनी ॥ ९ ॥

भयं विपुलमाधाय निश्चेष्टा समपद्यत । वानरकी वह गर्जना सुनकर आपकी सेना संत्रस्त हो उठी और मनमें महान् भय लेकर निश्चेष्ट हो गयी ॥ ततः सा शुशुभे सेना निश्चेष्टावस्थिता नृप ॥ १० ॥

नानापुष्पसमाकीर्णं यथा चैत्ररथं वनम् । नरेश्वर! फिर वहाँ निश्चेष्ट खड़ी हुई आपकी वह सेना भाँति- भाँतिके पुष्पोंसे भरे हुए चैत्ररथ नामक वनके समान शोभा पाने लगी ॥ १०३ ॥

प्रतिलभ्य ततः संज्ञां योधास्ते कुरुसत्तम ॥ ११ ॥

अर्जुनं सिषिचुर्बाणैः पर्वतं जलदा इव । कुरुश्रेष्ठ! तदनन्तर होशमें आकर आपके योद्धा अर्जुनपर उसी प्रकार बाणोंकी बौछार करने लगे, जैसे बादल पर्वतपर जलकी वर्षा करते हैं ॥ ११३ ॥

परिवव्रुस्ततः सर्वे पाण्डवस्य महारथम् ॥ १२ ॥

निगृह्य तं प्रचुक्रुशुर्वध्यमानाः शितैः शरैः । उन सबने मिलकर पाण्डुपुत्र अर्जुनके उस विशाल रथको घेर लिया । यद्यपि उनपर तीखे बाणोंकी मार पड़ रही थी, तो भी वे उस रथको पकड़कर जोर- जोरसे चिल्लाने लगे ॥ १२ ॥

ते हयान् रथचक्रे च रथेषां चापि मारिष ॥ १३ ॥

निग्रहीतुमुपाक्रामन् क्रोधाविष्टाः समन्ततः । माननीय नरेश! क्रोधमें भरे हुए संशप्तकोंने सब ओरसे आक्रमण करके अर्जुनके रथके घोड़ों, दोनों पहियों तथा ईषादण्डको भी पकड़ना आरम्भ किया ॥ निगृह्य तं रथं तस्य योधास्ते तु सहस्रशः ॥ १४ ॥

निगृह्य बलवत् सर्वे सिंहनादमथानदन् ।

पृष्ठ 2000

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इस प्रकार वे सब हजारों योद्धा रथको जबरदस्ती पकड़कर सिंहनाद करने लगे ॥ १४ || अपरे जगृहश्चैव केशवस्य महाभुजौ ॥ १५ ॥

पार्थमन्ये महाराज रथस्थं जगृहुर्मुदा । महाराज! कई योद्धाओंने भगवान् श्रीकृष्णकी दोनों विशाल भुजाएँ पकड़ लीं । दूसरोंने रथपर बैठे हुए अर्जुनको भी प्रसन्नतापूर्वक पकड़ लिया ॥ १५३ ॥

केशवस्तु ततो बाहू विधुन्वन् रणमूर्धनि ॥ १६ ॥

पातयामास तान् सर्वान् दुष्टहस्तीव हस्तिपान् । तब जैसे दुष्ट हाथी महावतोंको नीचे गिरा देता है, उसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने अपनी दोनों बाँहें झटककर उन सब लोगोंको युद्धके मुहानेपर नीचे गिरा दिया ॥ १६३ ॥

ततः क्रुद्धो रणे पार्थः संवृतस्तैर्महारथैः ॥ १७ ॥

निगृहीतं रथं दृष्ट्वा केशवं चाप्यभिद्रुतम् । फिर उन महारथियोंसे घिरे हुए अर्जुन अपने रथको पकड़ा गया और श्रीकृष्णपर भी आक्रमण हुआ देख रणभूमिमें कुपित हो उठे ॥ १७३ ॥

रथारूढांस्तु सुबहून् पदातींश्चाप्यपातयत् ॥ १८ ॥

आसन्नांश्च तथा योधान् शरैरासन्नयोधिभिः ।

छादयामास समरे केशवं चेदमब्रवीत् ॥ १ ९ ॥

उन्होंने अपने रथपर चढ़े हुए बहुत - से पैदल सैनिकोंको धक्के देकर नीचे गिरा दिया और आस - पास खड़े हुए संशप्तक योद्धाओंको निकटसे युद्ध करनेमें उपयोगी बाणोंद्वारा ढक दिया एवं समरांगणमें भगवान् श्रीकृष्णसे इस प्रकार कहा- ॥ १८-१९ ॥

पश्य कृष्ण महाबाहो संशप्तकगणान् बहून् ।

कुर्वाणान् दारुणं कर्म वध्यमानान् सहस्रशः ॥ २० ॥

' महाबाहु श्रीकृष्ण! देखिये, ये क्रूरतापूर्ण कर्म करनेवाले बहुसंख्यक संशप्तक योद्धा किस प्रकार सहस्रोंकी संख्यामें मारे जा रहे हैं ॥ २० ॥

रथबन्धमिमं घोरं पृथिव्यां नास्ति कश्चन ।

यः सहेत पुमाँल्लोके मदन्यो यदुपुङ्गव ॥ २१ ॥

‘ यदुपुंगव! जगत्में इस भूतलपर मेरे सिवा दूसरा कोई ऐसा पुरुष नहीं है, जो इस भयानक रथबन्ध (रथकी पकड़ अथवा रथोंके घेरे) - का सामना कर सके ' ॥ २१ ॥

इत्येवमुक्त्वा बीभत्सुर्देवदत्तमथाधमत् ।

पाञ्चजन्यं च कृष्णोऽपि पूरयन्निव रोदसी ॥ २२ ॥

ऐसा कहकर अर्जुनने देवदत्त नामक शंख बजाया । फिर भगवान् श्रीकृष्णने भी पृथ्वी और आकाशको गुँजाते हुए - से पांचजन्य नामक शंखकी ध्वनि फैलायी ॥ २२ ॥

तं तु शङ्खस्वनं श्रुत्वा संशप्तकवरूथिनी ।