श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 2011–2020

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2011–2020

पृष्ठ 2011

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राजन्! तब धृष्टद्युम्नने गदा हाथमें लेकर पुनः बड़े वेगसे महाधनुर्धर कृतवर्मापर शीघ्र ही आघात किया । सोऽतिविद्धो बलवता न्यपतन्मूर्च्छया हतः । श्रुतर्वा रथमारोप्य अपोवाह रणाजिरात् ॥ ) उस बलवान् वीरके गहरे आघातसे अत्यन्त पीड़ित एवं मूर्छित हो कृतवर्मा गिर पड़ा । तब श्रुतर्वा उसे अपने रथपर बिठाकर रणभूमिसे दूर हटा ले गया ।

धृष्टद्युम्नस्तु बलवाञ्जित्वा शत्रुं महाबलम् ।

कौरवान् समरे तूर्णं वारयामास सायकैः ॥ ४१ ॥

इस प्रकार बलवान् धृष्टद्युम्नने उस महाबली शत्रुको जीतकर बाणोंकी वर्षा करके समरांगणमें समस्त कौरवोंको तुरंत आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ ४१ ॥

ततस्ते तावका योधा धृष्टद्युम्नमुपाद्रवन् ।

सिंहनादरवं कृत्वा ततो युद्धमवर्तत ॥ ४२ ॥

तब आपके समस्त योद्धा सिंहनाद करके धृष्टद्युम्नपर टूट पड़े । फिर वहाँ घोर युद्ध होने लगा ॥ ४२ ॥

इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि संकुलयुद्धे चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें संकुलयुद्धविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥

( दाक्षिणात्य अधिक पाठके ४ श्लोक मिलाकर कुल ४६ श्लोक हैं ) Papa

पृष्ठ 2012

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पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः अश्वत्थामाका घोर युद्ध, सात्यकिके सारथिका वध एवं युधिष्ठिरका अश्वत्थामाको छोड़कर दूसरी ओर चले जाना संजय उवाच

द्रौणिर्युधिष्ठिरं दृष्ट्वा शैनेयेनाभिरक्षितम् ।

द्रौपदेयैस्तथा शूरैरभ्यवर्तत हृष्टवत् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं — राजन्! सात्यकि तथा शूरवीर द्रौपदीपुत्रोंद्वारा सुरक्षित युधिष्ठिरको देखकर अश्वत्थामा बड़े हर्षके साथ उनका सामना करनेके लिये गया ॥ १ ॥

किरन्निषुगणान् घोरान् स्वर्णपुङ्खाञ्शिलाशितान् ।

दर्शयन् विविधान् मार्गान् शिक्षाश्च लघुहस्तवत् ॥ २ ॥

ततः खं पूरयामास शरैर्दिव्यास्त्रमन्त्रितैः ।

युधिष्ठिरं च समरे परिवार्य महास्त्रवित् । ३ ॥

वह बड़े - बड़े अस्त्रोंका ज्ञाता था; इसलिये शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले योद्धाके समान सानपर चढ़ाकर तेज किये हुए सुवर्णमय पंखोंसे युक्त भयंकर शरसमूहोंकी वर्षा करता और नाना प्रकारके मार्ग एवं शिक्षाका प्रदर्शन करता हुआ दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंद्वारा समरांगणमें युधिष्ठिरको अवरुद्ध करके आकाशको उन बाणोंसे भरने लगा ॥ २-३ ॥

द्रौणायनिशरच्छन्नं न प्राज्ञायत किञ्चन ।

बाणभूतमभूत् सर्वमायोधनशिरो महत् ॥ ४ ॥

द्रोणपुत्रके बाणोंसे आच्छन्न हो जानेके कारण वहाँ कुछ भी ज्ञात नहीं होता था ।

युद्धका वह सारा विशाल मैदान बाणमय हो रहा था ॥ ४ ॥

बाणजालं दिविच्छन्नं स्वर्णजालविभूषितम् ।

शुशुभे भरतश्रेष्ठ वितानमिव धिष्ठितम् ॥ ५ ॥

भरतश्रेष्ठ! स्वर्णजाल - विभूषित वह बाणोंका जाल आकाशमें फैलकर वहाँ तने हुए वितान ( चँदोवे ) -के समान सुशोभित होता था ॥ ५ ॥

तेनच्छन्नं नभो राजन् बाणजालेन भास्वता ।

अभ्रच्छायेव संजज्ञे बाणरुद्धे नभस्तले ॥ ६ ॥

राजन्! उन प्रकाशमान बाणसमूहोंसे सारा आकाशमण्डल ढक गया था । बाणोंसे रुँधे हुए आकाशमें मेघोंकी छाया - सी बन गयी थी ॥ ६ ॥

तत्राश्चर्यमपश्याम बाणभूते तथाविधे ।

पृष्ठ 2013

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न स्म सम्पतते भूतं किंचिदेवान्तरिक्षगम् ॥ ७ ॥

इस प्रकार आकाशके बाणमय हो जानेपर हमलोगोंने वहाँ यह आश्चर्यकी बात देखी कि आकाशचारी कोई भी प्राणी उधरसे उड़कर नीचे नहीं आ सकता था ॥

सात्यकिर्यतमानस्तु धर्मराजश्च पाण्डवः ।

तथेतराणि सैन्यानि न स्म चक्रुः पराक्रमम् ॥ ८ ॥

उस समय प्रयत्नशील सात्यकि, धर्मराज पाण्डुपुत्र युधिष्ठिर तथा अन्यान्य सैनिक कोई पराक्रम न कर सके ॥ ८ ॥

लाघवं द्रोणपुत्रस्य दृष्ट्वा तत्र महारथाः ।

व्यस्मयन्त महाराज न चैनं प्रत्युदीक्षितुम् ॥ ९ ॥

शेकुस्ते सर्वराजानस्तपन्तमिव भास्करम् । महाराज! द्रोणपुत्रकी वह फुर्ती देखकर वहाँ खड़े हुए सभी महारथी नरेश आश्चर्यचकित हो उठे और तपते हुए सूर्यके समान तेजस्वी अश्वत्थामाकी ओर आँख उठाकर देख भी न सके ॥ ९ ३ ॥ वध्यमाने ततः सैन्ये द्रौपदेया महारथाः ॥ १० ॥

सात्यकिर्धर्मराजश्च पञ्चालाश्चापि संगताः ।

त्यक्त्वा मृत्युभयं घोरं द्रौणायनिमुपाद्रवन् ॥ ११ ॥

तदनन्तर जब पाण्डव- सेना मारी जाने लगी, तब महारथी द्रौपदीपुत्र और सात्यकि तथा धर्मराज युधिष्ठिर और पांचाल सैनिक संगठित हो घोर मृत्युभयको छोड़कर द्रोणकुमारपर टूट पड़े ॥ १०-११ ॥

सात्यकिः सप्तविंशत्या द्रौणिं विद्ध्वा शिलीमुखैः ।

पुनर्विव्याध नाराचैः सप्तभिः स्वर्णभूषितैः ॥ १२ ॥

सात्यकिने सत्ताईस बाणोंसे अश्वत्थामाको घायल करके पुनः सात स्वर्णभूषित नाराचोंद्वारा उसे बींध डाला ॥ १२ ॥

युधिष्ठिरस्त्रिसप्तत्या प्रतिविन्ध्यश्च सप्तभिः ।

श्रुतकर्मा त्रिभिर्बाणैः श्रुतकीर्तिश्च सप्तभिः ॥ १३ ॥

सुतसोमस्तु नवभिः शतानीकश्च सप्तभिः ।

अन्ये च बहवः शूरा विव्यधुस्तं समन्ततः ॥ १४ ॥

युधिष्ठिरने तिहत्तर, प्रतिविन्ध्यने सात, श्रुतकर्माने तीन, श्रुतकीर्तिने सात, सुतसोमने नौ और शतानीकने उसे सात बाण मारे तथा दूसरे बहुत - से शूरवीरोंने भी अश्वत्थामाको चारों ओरसे घायल कर दिया ॥ १३-१४ ॥

स तु क्रुद्धस्ततो राजन्नाशीविष इव श्वसन् ।

सात्यकिं पञ्चविंशत्या प्रत्यविध्यच्छिलीमुखैः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2014

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राजन्! तब क्रोधमें भरकर विषधर सर्पके समान फुफकारते हुए अश्वत्थामाने सात्यकिको पचीस बाणोंसे घायल करके बदला चुकाया ॥ १५ ॥

श्रुतकीर्तिं च नवभिः सुतसोमं च पञ्चभिः ।

अष्टभिः श्रुतकर्माणं प्रतिविन्ध्यं त्रिभिः शरैः ॥ १६ ॥

शतानीकं च नवभिर्धर्मपुत्रं च पञ्चभिः ।

तथेतरांस्ततः शूरान् द्वाभ्यां द्वाभ्यामताडयत् ॥ १७ ॥

श्रुतकीर्तेस्तथा चापं चिच्छेद निशितैः शरैः । फिर श्रुतकीर्तिको नौ, सुतसोमको पाँच, श्रुतकर्माको आठ, प्रतिविन्ध्यको तीन, शतानीकको नौ, धर्मपुत्र युधिष्ठिरको पाँच तथा अन्य शूरवीरोंको दो -दो बाणोंसे पीट दिया । इसके सिवा उसने पैने बाणोंद्वारा श्रुतकीर्तिके धनुषको भी काट दिया ॥ १६-१७ ॥ अथान्यद् धनुरादाय श्रुतिकीर्तिर्महारथः ॥ १८ ॥

द्रौणायनिं त्रिभिर्विद्ध्वा विव्याधान्यैः शितैः शरैः । तब महारथी श्रुतकीर्तिने दूसरा धनुष लेकर द्रोणकुमारको पहले तीन बाणोंसे घायल करके फिर दूसरे - दूसरे पैने बाणोंद्वारा बींध डाला ॥ १८३ ॥

ततो द्रौणिर्महाराज शरवर्षेण मारिष ॥ १ ९ ॥ छादयामास तत् सैन्यं समन्ताद् भरतर्षभ । मान्यवर भरतभूषण महाराज! तत्पश्चात् द्रोणकुमारने अपने बाणोंकी वर्षासे युधिष्ठिरकी उस सेनाको सब ओरसे ढक दिया ॥ १ ९ ॥ ततः पुनरमेयात्मा धर्मराजस्य कार्मुकम् ॥ २० ॥

द्रौणिश्चिच्छेद विहसन् विव्याध च शरैस्त्रिभिः । उसके बाद अमेय आत्मबलसे सम्पन्न द्रोणकुमारने धर्मराजके धनुषको काट डाला और हँसते - हँसते तीन बाणोंद्वारा पुनः उन्हें घायल कर दिया ॥ २० ॥

ततो धर्मसुतो राजन् प्रगृह्यान्यन्महद् धनुः ॥ २१ ॥

द्रौणिं विव्याध सप्तत्या बाह्वोरुरसि चार्पयत् । राजन्! तब धर्मपुत्र युधिष्ठिरने दूसरा विशाल धनुष हाथमें लेकर अश्वत्थामाको बींध दिया एवं उसकी दोनों भुजाओं और छातीमें सत्तर बाण मारे ॥ २१३ ॥

सात्यकिस्तु ततः क्रुद्धो द्रौणेः प्रहरतो रणे ॥ २२ ॥

अर्धचन्द्रेण तीक्ष्णेन धनुश्छित्त्वानदद् भृशम् । इसके बाद कुपित हुए सात्यकिने रणभूमिमें प्रहार करनेवाले अश्वत्थामाके धनुषको तीखे अर्धचन्द्रसे काटकर बड़े जोरसे गर्जना की ॥ २२३ ॥

छिन्नधन्वा ततो द्रौणिः शक्त्या शक्तिमतां वरः ॥ २३ ॥

सारथिं पातयामास शैनेयस्य रथाद् द्रुतम् ।

पृष्ठ 2015

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धनुष कट जानेपर शक्तिशालियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामाने शक्ति चलाकर शिनिपौत्र सात्यकिके सारथिको शीघ्र ही रथसे नीचे गिरा दिया ॥ २३३ ॥

अथान्यद् धनुरादाय द्रोणपुत्रः प्रतापवान् ॥ २४ ॥

शैनेयं शरवर्षेणच्छादयामास भारत । भारत! तत्पश्चात् प्रतापी द्रोणपुत्रने दूसरा धनुष लेकर सात्यकिको शरसमूहोंकी वर्षाद्वारा आच्छादित कर दिया ॥ २४३ ॥

तस्याश्वाः प्रद्रुताः संख्ये पतिते रथसारथौ ॥ २५ ॥

तत्र तत्रैव धावन्तः समदृश्यन्त भारत । भरतनन्दन! उनके रथका सारथि धराशायी हो चुका था, इसलिये उनके घोड़े युद्धस्थलमें बेलगाम भागने लगे । वे विभिन्न स्थानोंमें भागते हुए ही दिखायी दे रहे थे ॥ २५ ३ ॥ युधिष्ठिरपुरोगास्तु द्रौणिं शस्त्रभृतां वरम् ॥ २६ ॥

अभ्यवर्षन्त वेगेन विसृजन्तः शितान् शरान् । युधिष्ठिर आदि पाण्डव महारथी शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामापर बड़े वेगसे पैने बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ आगच्छमानांस्तान् दृष्ट्वा क्रुद्धरूपान् परंतपः ॥ २७ ॥

प्रहसन् प्रतिजग्राह द्रोणपुत्रो महारणे । शत्रुओंको संताप देनेवाले द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने उस महासमरमें उन पाण्डव महारथियोंको क्रोधपूर्वक आक्रमण करते देख हँसते हुए उनका सामना किया ॥ ततः शरशतज्वालः सेनाकक्षं महारथः ॥ २८ ॥

द्रौणिर्ददाह समरे कक्षमग्निर्यथा वने । जैसे आग वनमें सूखे काठ और घास-फूँसको जला देती है, उसी प्रकार महारथी अश्वत्थामाने समरांगणमें सैकड़ों बाणरूपी ज्वालाओंसे प्रज्वलित हो पाण्डवसेनारूपी सूखे काठ एवं घास - फूँसको जलाना आरम्भ किया ॥ २८३ ॥

तद् बलं पाण्डुपुत्रस्य द्रोणपुत्रप्रतापितम् ॥ २ ९ ॥ चुक्षुभे भरतश्रेष्ठ तिमिनेव नदीमुखम् । भरतश्रेष्ठ! जैसे तिमिनामक मत्स्य नदीके प्रवाहको विक्षुब्ध कर देता है, उसी प्रकार द्रोणपुत्रके द्वारा संतप्त की हुई पाण्डव- सेनामें हलचल मच गयी ॥ २ ९ ३ ॥ दृष्ट्वा चैव महाराज द्रोणपुत्रपराक्रमम् ॥ ३० ॥

निहतान् मेनिरे सर्वान् पाण्डून् द्रोणसुतेन वै । महाराज! द्रोणपुत्रका पराक्रम देखकर सब लोगोंने यही समझा कि द्रोणकुमार अश्वत्थामाके द्वारा सारे पाण्डव मार डाले जायँगे ॥ ३०३ ॥

पृष्ठ 2016

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युधिष्ठिरस्तु त्वरितो द्रोणशिष्यो महारथः ॥ ३१ ॥

अब्रवीद् द्रोणपुत्राय रोषामर्षसमन्वितः । तदनन्तर रोष और अमर्षमें भरे हुए द्रोणशिष्य महारथी युधिष्ठिरने द्रोणपुत्र अश्वत्थामासे कहा ॥ (युधिष्ठिर उवाच

जानामि त्वां युधि श्रेष्ठं वीर्यवन्तं महाबलम् ।

कृतास्त्रं कृतिनं चैव तथा लघुपराक्रमम् ॥

युधिष्ठिर बोले- द्रोणकुमार! मैं जानता हूँ कि तुम युद्धमें पराक्रमी, महाबली, अस्त्रवेत्ता, विद्वान् और शीघ्रतापूर्वक पुरुषार्थ प्रकट करनेवाले श्रेष्ठ वीर हो ।

बलमेतद् भवान् सर्वं पार्षते यदि दर्शयेत् ।

ततस्त्वां बलवन्तं च कृतविद्यं च विद्महे ॥

परंतु यदि तुम अपना यह सारा बल द्रुपदपुत्रपर दिखा सको तो हम समझेंगे कि तुम बलवान् तथा अस्त्र - विद्याके विद्वान् हो । न हि वै पार्षतं दृष्ट्वा समरे शत्रुसूदनम् । भवेत् तव बलं किंचिद् ब्रवीमि त्वा न तु द्विजम् II ) शत्रुसूदन धृष्टद्युम्नको समरभूमिमें देखकर तुम्हारा बल कुछ भी काम न करेगा ।

( तुम्हारे कर्मको देखते हुए ) मैं तुम्हें ब्राह्मण नहीं कहूँगा ।

नैव नाम तव प्रीतिर्नैव नाम कृतज्ञता ॥ ३२ ॥

यतस्त्वं पुरुषव्याघ्र मामेवाद्य जिघांससि । पुरुषसिंह! तुम जो आज मुझे ही मार डालना चाहते हो, यह न तो तुम्हारा प्रेम है और न कृतज्ञता ॥ ३२ ॥

ब्राह्मणेन तपः कार्यं दानमध्ययनं तथा ॥ ३३ ॥

क्षत्रियेण धनुर्नाम्यं स भवान् ब्राह्मणब्रुवः । ब्राह्मणको तप, दान और वेदाध्ययन करना चाहिये । धनुष झुकाना तो क्षत्रियका काम है; अतः तुम नाममात्रके ब्राह्मण हो ॥ ३३ ॥

मिषतस्ते महाबाहो युधि जेष्यामि कौरवान् ॥ ३४ ॥

कुरुष्व समरे कर्म ब्रह्मबन्धुरसि ध्रुवम् । महाबाहो! आज मैं तुम्हारे देखते -देखते युद्धमें कौरवोंको जीतूंगा । तुम समरमें पराक्रम प्रकट करो । निश्चय ही तुम एक स्वधर्मभ्रष्ट ब्राह्मण हो ॥ ३४३ ॥

एवमुक्तो महाराज द्रोणपुत्रः स्मयन्निव ॥ ३५ ॥

युक्तं तत्त्वं च संचिन्त्य नोत्तरं किंचिदब्रवीत् ।

पृष्ठ 2017

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महाराज! उनके ऐसा कहनेपर द्रोणपुत्र मुसकराने- सा लगा । इनका कथन युक्तियुक्त तथा यथार्थ है, ऐसा सोचकर उसने कुछ उत्तर नहीं दिया ॥ ३५३ ॥

अनुक्त्वा च ततः किंचिच्छरवर्षेण पाण्डवम् ॥ ३६ ॥

छादयामास समरे क्रुद्धोऽन्तक इव प्रजाः । उसने कोई जवाब न देकर समरांगणमें कुपित हो बाणोंकी वर्षासे पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरको उसी प्रकार ढक दिया, जैसे प्रलयकालमें क्रुद्ध यमराज सारी प्रजाको अदृश्य कर देता है ॥ ३६३ ॥

स च्छाद्यमानस्तु तदा द्रोणपुत्रेण मारिष ॥ ३७ ॥

पार्थोऽपयातः शीघ्रं वै विहाय महतीं चमूम् । आर्य! द्रोनपुत्रके बाणोंसे आच्छादित हो कुन्तीकुमार युधिष्ठिर उस समय अपनी विशाल सेनाको छोड़कर शीघ्र ही वहाँसे पलायन कर गये ॥ ३७३ ॥

अपयाते ततस्तस्मिन् धर्मपुत्रे युधिष्ठिरे ॥ ३८ ॥

द्रणेपुत्रस्ततो राजन् प्रत्यगात् स महामनाः । राजन्! तत्पश्चात् धर्मपुत्र युधिष्ठिरके हट जानेपर फिर महामना द्रोणपुत्र अश्वत्थामा दूसरी ओर चला गया ॥

ततो युधिष्ठिरो राजंस्त्यक्त्वा द्रौणिं महाहवे ।

प्रययौ तावकं सैन्यं युक्तः क्रूराय कर्मणे ॥ ३ ९ ॥

नरेश्वर! फिर उस महायुद्धमें अश्वत्थामाको छोड़कर युधिष्ठिर पुनः क्रूरतापूर्ण कर्म करनेके लिये आपकी सेनाकी ओर बढ़े ॥ ३ ९ ॥ इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि पार्थापयाने पञ्चपञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५५ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें युधिष्ठिरका पलायनविषयक पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५५ ॥

(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ३ श्लोक मिलाकर कुल ४२ श्लोक हैं )

पृष्ठ 2018

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षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः नकुल - सहदेवके साथ दुर्योधनका युद्ध, धृष्टद्युम्नसे दुर्योधनकी पराजय, कर्णद्वारा पांचाल - सेनासहित योद्धाओंका संहार, भीमसेनद्वारा कौरव योद्धाओंका सेनासहित विनाश, अर्जुनद्वारा संशप्तकोंका वध तथा अश्वत्थामाका अर्जुनके साथ घोर युद्ध करके पराजित होना संजय उवाच

भीमसेनं सपाञ्चाल्यं चेदिकेकयसंवृतम् ।

वैकर्तनः स्वयं रुद्ध्वा वारयामास सायकैः ॥ १ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! पांचालों, चेदियों और केकयोंसे घिरे हुए भीमसेनको स्वयं वैकर्तन कर्णने बाणोंद्वारा अवरुद्ध करके उन्हें आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥

ततस्तु चेदिकारूषान् सृञ्जयांश्च महारथान् ।

कर्णो जघान समरे भीमसेनस्य पश्यतः ॥ २ ॥

तदनन्तर समरांगणमें कर्णने भीमसेनके देखते-देखते चेदि, कारूष और संजय महारथियोंका संहार आरम्भ कर दिया ॥ २ ॥

भीमसेनस्ततः कर्णं विहाय रथसत्तमम् ।

प्रययौ कौरवं सैन्यं कक्षमग्निरिव ज्वलन् ॥ ३ ॥

तब भीमसेनने भी रथियोंमें श्रेष्ठ कर्णको छोड़कर जैसे आग घास-फूँसको जलाती है, उसी प्रकार कौरव - सेनाको दग्ध करनेके लिये उसपर आक्रमण किया ॥ ३ ॥

सूतपुत्रोऽपि समरे पञ्चालान् केकयांस्तथा ।

सृञ्जयांश्च महेष्वासान् निजघान सहस्रशः ॥ ४ ॥

सूतपुत्र कर्णने समरांगणमें सहस्रों पांचाल, केकय तथा संजय योद्धाओंको, जो महाधनुर्धर थे, मार डाला ॥ ४ ॥

संशप्तकेषु पार्थश्च कौरवेषु वृकोदरः ।

पञ्चालेषु तथा कर्णः क्षयं चक्रुर्महारथाः ॥ ५ ॥

अर्जुन संशप्तकोंकी, भीमसेन कौरवोंकी तथा कर्ण पांचालोंकी सेनामें घुसकर युद्ध करते थे! इन तीनों महारथियोंने बहुत - से शत्रुओंका संहार कर डाला ॥ ५ ॥

ते क्षत्रिया दह्यमानास्त्रिभिस्तैः पावकोपमैः ।

पृष्ठ 2019

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जग्मुर्विनाशं समरे राजन् दुर्मन्त्रिते तव ॥ ६ ॥

अग्निके समान तेजस्वी इन तीनों वीरोंद्वारा दग्ध होते हुए क्षत्रिय समरांगणमें विनाशको प्राप्त हो रहे थे । राजन्! यह सब आपकी कुमन्त्रणाका फल है ॥ ६ ॥

ततो दुर्योधनः क्रुद्धो नकुलं नवभिः शरैः ।

विव्याध भरतश्रेष्ठ चतुरश्चास्य वाजिनः ॥ ७ ॥

भरतश्रेष्ठ! तब दुर्योधनने कुपित होकर नौ बाणोंसे नकुल तथा उनके चारों घोड़ोंको घायल कर दिया ॥ ७ ॥

ततः पुनरमेयात्मा तव पुत्रो जनाधिप ।

क्षुरेण सहदेवस्य ध्वजं चिच्छेद काञ्चनम् ॥ ८ ॥

जनेश्वर! इसके बाद अमेय आत्मबलसे सम्पन्न आपके पुत्रने एक क्षुरके द्वारा सहदेवकी सुवर्णमयी ध्वजा काट डाली ॥ ८ ॥

नकुलस्तु ततः क्रुद्धस्तव पुत्रं च सप्तभिः ।

जघान समरे राजन् सहदेवश्च पञ्चभिः ॥ ९ ॥

राजन्! तत्पश्चात् समरभूमिमें आपके पुत्रको क्रोधमें भरे हुए नकुलने सात और सहदेवने पाँच बाण मारे ॥ ९ ॥

तावुभौ भरतश्रेष्ठी ज्येष्ठौ सर्वधनुष्मताम् ।

विव्याधोरसि संक्रुद्धः पञ्चभिः पञ्चभिः शरैः ॥ १० ॥

वे दोनों श्रेष्ठ वीर समस्त धनुर्धारियोंमें प्रधान थे । दुर्योधनने कुपित होकर उन दोनोंकी छातीमें पाँच - पाँच बाण मारे ॥ १० ॥

ततोऽपराभ्यां भल्लाभ्यां धनुषी समकृन्तत ।

यमयोः सहसा राजन् विव्याध च त्रिसप्तभिः ॥ ११ ॥

राजन्! फिर सहसा उसने दो भल्लोंसे नकुल और सहदेवके धनुष काट डाले तथा उन दोनोंको भी इक्कीस बाणोंसे घायल कर दिया ॥ ११ ॥

तावन्ये धनुषी श्रेष्ठे शक्रचापनिभे शुभे ।

प्रगृह्य रेजतुः शूरौ देवपुत्रसमौ युधि ॥ १२ ॥

फिर वे दोनों वीर इन्द्रधनुषके समान सुन्दर दूसरे श्रेष्ठ धनुष लेकर युद्धस्थलमें देवकुमारोंके समान सुशोभित होने लगे ॥ १२ ॥

ततस्तौ रभसौ युद्धे भ्रातरौ भ्रातरं युधि ।

शरैर्ववृषतुर्घोरैर्महामेघौ यथाचलम् ॥ १३ ॥

तत्पश्चात् जैसे दो महामेघ किसी पर्वतपर जलकी वर्षा करते हों, उसी प्रकार दोनों वेगशाली बन्धु नकुल और सहदेव भाई दुर्योधनपर युद्धमें भयंकर बाणोंकी वृष्टि करने लगे ॥ १३ ॥

ततः क्रुद्धो महाराज तव पुत्रो महारथः ।

पृष्ठ 2020

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पाण्डुपुत्रौ महेष्वासौ वारयामास पत्रिभिः ॥ १४ ॥

महाराज! तब आपके महारथी पुत्रने कुपित होकर उन दोनों महाधनुर्धर पाण्डुपुत्रोंको बाणोंद्वारा आगे बढ़नेसे रोक दिया ॥ १४ ॥

धनुर्मण्डलमेवास्य दृश्यते युधि भारत ।

सायकाश्चैव दृश्यन्ते निश्चरन्तः समन्ततः ॥ १५ ॥

आच्छादयन् दिशः सर्वाः सूर्यस्येवांशवो यथा । भारत! उस समय केवल उसका मण्डलाकार धनुष ही दिखायी देता था और उससे चारों ओर छूटनेवाले बाण सूर्यकी किरणोंके समान सम्पूर्ण दिशाओंको ढके हुए दृष्टिगोचर होते थे ॥ १५३ ॥

बाणभूते ततस्तस्मिन् संछन्ने च नभस्तले ॥ १६ ॥

यमाभ्यां ददृशे रूपं कालान्तकयमोपमम् । उस समय जब आकाश आच्छादित होकर बाणमय हो रहा था, तब नकुल और सहदेवने आपके पुत्रका स्वरूप काल, अन्तक एवं यमराजके समान भयंकर देखा ॥ पराक्रमं तु तं दृष्ट्वा तव सूनोर्महारथाः ॥ १७ ॥

मृत्योरुपान्तिकं प्राप्तौ माद्रीपुत्रौ स्म मेनिरे । आपके पुत्रका वह पराक्रम देखकर सब महारथी ऐसा मानने लगे कि माद्रीके दोनों पुत्र मृत्युके निकट पहुँच गये ॥ १७३ ॥

ततः सेनापती राजन् पाण्डवस्य महारथः ॥ १८ ॥

पार्षतः प्रययौ तत्र यत्र राजा सुयोधनः । राजन्! तब पाण्डव- सेनापति द्रुपदपुत्र महारथी धृष्टद्युम्न जहाँ राजा दुर्योधन था, वहाँ जा पहुँचे ॥ १८३ ॥

माद्रीपुत्रौ ततः शूरौ व्यतिक्रम्य महारथौ ॥ १ ९ ॥ धृष्टद्युम्नस्तव सुतं वारयामास सायकैः । महारथी शूरवीर माद्रीकुमार नकुल सहदेवको लाँघकर धृष्टद्युम्नने अपने बाणोंकी मारसे आपके पुत्रको रोक दिया ॥ १ ९ ३ ॥ तमविध्यदमेयात्मा तव पुत्रो ह्यमर्षणः ॥ २० ॥

पाञ्चाल्यं पञ्चविंशत्या प्रहसन् पुरुषर्षभः । तब अमेय आत्मबलसे सम्पन्न आपके अमर्षशील पुत्र पुरुषरत्न दुर्योधनने हँसते हुए पचीस बाण मारकर धृष्टद्युम्नको घायल कर दिया ॥ २० ॥

ततः पुनरमेयात्मा तव पुत्रो ह्यमर्षणः ॥ २१ ॥

विद्ध्वा ननाद पाञ्चाल्यं षष्ट्या पञ्चभिरेव च ।