श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 2701–2710
महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2701–2710
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युधिष्ठिरेण राजेन्द्र भ्रातृभिः सहितेन ह ॥ ७ ॥
श्रुत्वा स कटुका वाचो विषमस्थो नराधिपः ।
दीर्घमुष्णं च निःश्वस्य सलिलस्थः पुनः पुनः ॥ ८ ॥
सलिलान्तर्गतो राजा धुन्वन् हस्तौ पुनः पुनः ।
मनश्चकार युद्धाय राजानं चाभ्यभाषत ॥ ९ ॥
संजयने कहा— राजाधिराज! राजन्! उस समय भाइयोंसहित युधिष्ठिरने जब इस प्रकार फटकारा, तब जलमें खड़े हुए आपके पुत्रने उन कठोर वचनोंको सुनकर गरम- गरम लंबी साँस छोड़ी । राजा दुर्योधन विषम परिस्थितिमें पड़ गया था और पानीमें स्थित था; इसलिये बारंबार उच्छ्वास लेता रहा । उसने जलके भीतर ही अनेक बार दोनों हाथ हिलाकर मन- ही- मन युद्धका निश्चय किया और राजा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा— ॥ ७ -९ ॥
यूयं ससुहृदः पार्थाः सर्वे सरथवाहनाः ।
अहमेकः परिद्यूनो विरथो हतवाहनः ॥ १० ॥
‘ तुम सभी पाण्डव अपने हितैषी मित्रोंको साथ लेकर आये हो । तुम्हारे रथ और वाहन भी मौजूद हैं । मैं अकेला थका -माँदा, रथहीन और वाहनशून्य हूँ ॥ १० ॥
आत्तशस्त्रै रथोपेतैर्बहुभिः परिवारितः ।
कथमेकः पदातिः सन्नशस्त्रो योद्धुमुत्सहे ॥ ११ ॥
' तुम्हारी संख्या अधिक है । तुमने रथपर बैठकर नाना प्रकारके अस्त्र- शस्त्र लेकर मुझे घेर रखा है । फिर तुम्हारे साथ मैं अकेला पैदल और अस्त्र- शस्त्रोंसे रहित होकर कैसे युद्ध कर सकता हूँ? ॥ ११ ॥
एकैकेन तु मां यूयं योधयध्वं युधिष्ठिर ।
न ह्येको बहुभिर्वीरैर्न्याय्यो योधयितुं युधि ॥ १२ ॥
' युधिष्ठिर! तुमलोग एक-एक करके मुझसे युद्ध करो । युद्धमें बहुत- से वीरोंके साथ किसी एकको लड़नेके लिये विवश करना न्यायोचित नहीं है ॥ १२ ॥
विशेषतो विकवचः श्रान्तश्चापत्समाश्रितः ।
भृशं विक्षतगात्रश्च श्रान्तवाहनसैनिकः ॥ १३ ॥
‘ विशेषतः उस दशामें जिसके शरीरपर कवच नहीं हो, जो थका - माँदा, आपत्तिमेंपड़ा और अत्यन्त घायल हो तथा जिसके वाहन और सैनिक भी थक गये हों, उसे युद्धके लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं है ॥ १३ ॥
न मे त्वत्तो भयं राजन् न च पार्थाद् वृकोदरात् ।
फाल्गुनाद् वासुदेवाद् वा पञ्चालेभ्योऽथवा पुनः ॥ १४ ॥
यमाभ्यां युयुधानाद् वा ये चान्ये तव सैनिकाः ।
एकः सर्वानहं क्रुद्धो वारयिष्ये युधि स्थितः ॥ १५ ॥
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' राजन्! मुझे न तो तुमसे, न कुन्तीके बेटे भीमसेनसे, न अर्जुनसे, न श्रीकृष्णसे अथवा पांचालोंसे ही कोई भय है । नकुल सहदेव, सात्यकि तथा अन्य जो-जो तुम्हारे सैनिक हैं, उनसे भी मैं नहीं डरता । युद्धमें क्रोधपूर्वक स्थित होनेपर मैं अकेला ही तुम सब लोगोंको आगे बढ़नेसे रोक दूँगा ॥ १४-१५ ॥
धर्ममूला सतां कीर्तिर्मनुष्याणां जनाधिप ।
धर्मं चैवेह कीर्तिं च पालयन् प्रबवीम्यहम् ॥ १६ ॥
‘ नरेश्वर! साधु पुरुषोंकी कीर्तिका मूल कारण धर्म ही है । मैं यहाँ उस धर्म और कीर्तिका पालन करता हुआ ही यह बात कह रहा हूँ ॥ १६ ॥
अहमुत्थाय सर्वान् वै प्रतियोत्स्यामि संयुगे ।
अनुगम्यागतान् सर्वानृतून् संवत्सरो यथा ॥ १७ ॥
‘ मैं उठकर रणभूमिमें एक -एक करके आये हुए तुम सब लोगोंके साथ युद्ध करूँगा, ठीक उसी तरह, जैसे संवत्सर बारी- बारीसे आये हुए सम्पूर्ण ऋतुओंको ग्रहण करता है ॥ १७ ॥
अद्य वः सरथान् साश्वानशस्त्रो विरथोऽपि सन् ।
नक्षत्राणीव सर्वाणि सविता रात्रिसंक्षये ॥ १८ ॥
तेजसा नाशयिष्यामि स्थिरीभवत पाण्डवाः । ‘ पाण्डवो! स्थिर होकर खड़े रहो । आज मैं अस्त्र- शस्त्र एवं रथसे हीन होकर भी घोड़ों और रथोंपर चढ़कर आये हुए तुम सब लोगोंको उसी तरह अपने तेजसे नष्ट कर दूँगा, जैसे रात्रिके अन्तमें सूर्यदेव सम्पूर्ण नक्षत्रोंको अपने तेजसे अदृश्य कर देते हैं ॥ १८६३ ॥
अद्यानृण्यं गमिष्यामि क्षत्रियाणां यशस्विनाम् ॥ १ ९ ॥
बाह्लीकद्रोणभीष्माणां कर्णस्य च महात्मनः ।
जयद्रथस्य शूरस्य भगदत्तस्य चोभयोः ॥ २० ॥
मद्रराजस्य शल्यस्य भूरिश्रवस एव च ।
पुत्राणां भरतश्रेष्ठ शकुनेः सौबलस्य च ॥ २१ ॥
मित्राणां सुहृदां चैव बान्धवानां तथैव च ।
आनृण्यमद्य गच्छामि हत्वा त्वां भ्रातृभिः सह ॥ २२ ॥
एतावदुक्त्वा वचनं विरराम जनाधिपः ‘ भरतश्रेष्ठ! आज मैं भाइयोंसहित तुम्हारा वध करके उन यशस्वी क्षत्रियोंके ऋणसे उऋण हो जाऊँगा । बाह्लीक, द्रोण, भीष्म, महामना कर्ण, शूरवीर जयद्रथ, भगदत्त, मद्रराजशल्य, भूरिश्रवा, सुबलकुमार शकुनि तथा पुत्रों, मित्रों, सुहृदों एवं बन्धु - बान्धवोंके
ऋणसे भी उऋण हो जाऊँगा । ' राजा दुर्योधन इतना कहकर चुप हो गया ॥ १ ९ –२२३ ॥
युधिष्ठिर उवाच
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दिष्ट्या त्वमपि जानीषे क्षत्रधर्मं सुयोधन ॥ २३ ॥
दिष्ट्या ते वर्तते बुद्धिर्युद्धायैव महाभुज ।
दिष्ट्या शूरोऽसि कौरव्य दिष्ट्या जानासि संगरम् ॥ २४ ॥
युधिष्ठिर बोले — सुयोधन! सौभाग्यकी बात है कि तुम भी क्षत्रिय धर्मको जानते हो ।
महाबाहो! यह जानकर प्रसन्नता हुई कि अभी तुम्हारा विचार युद्ध करनेका ही है ।
कुरुनन्दन! तुम शूरवीर हो और युद्ध करना जानते हो – यह हर्ष और सौभाग्यकी बात है ॥
यस्त्वमेको हि नः सर्वान् संगरे योद्धुमिच्छसि ।
एक एकेन संगम्य यत् ते सम्मतमायुधम् ॥ २५ ॥
तत् त्वमादाय युध्यस्व प्रेक्षकास्ते वयं स्थिताः । तुम रणभूमिमें अकेले ही एक -एकके साथ भिड़कर हम सब लोगोंसे युद्ध करना चाहते हो तो ऐसा ही सही । जो हथियार तुम्हें पसंद हो, उसीको लेकर हमलोगोंमेंसे एक -एकके साथ युद्ध करो । हम सब लोग दर्शक बनकर खड़े रहेंगे ॥ २५ ॥
स्वयमिष्टं च ते कामं वीर भूयो ददाम्यहम् ॥ २६ ॥
हत्वैकं भवतो राज्यं हतो वा स्वर्गमाप्नुहि । वीर! मैं स्वयं ही पुनः तुम्हें यह अभीष्ट वर देता हूँ कि ' हममेंसे एकका भी वध कर देनेपर सारा राज्य तुम्हारा हो जायगा अथवा यदि तुम्हीं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त करोगे' ॥ २६ ॥
दुर्योधन उवाच एकश्चेद् योद्धुमाक्रन्दे शूरोऽद्य मम दीयताम् ॥ २७ ॥
आयुधानामियं चापि वृता त्वत्सम्मते गदा । दुर्योधन बोला- राजन्! यदि ऐसी बात है तो इस महासमरमें मेरे साथ लड़नेके लिये आज किसी भी एक शूरवीरको दे दो और तुम्हारी सम्मतिके अनुसार हथियारोंमें मैंने एकमात्र इस गदाका ही वरण किया है ॥ २७ ॥
हन्तैकं भवतामेकः शक्यं मां योऽभिमन्यते ॥ २८ ॥
पदातिर्गदया संख्ये स युध्यतु मया सह । मैं हर्षके साथ कह रहा हूँ कि ' तुममेंसे कोई भी एक वीर जो मुझ अकेलेको जीत सकनेका अभिमान रखता हो, वह रणभूमिमें पैदल ही गदाद्वारा मेरे साथ युद्ध करे ' ॥ वृत्तानि रथयुद्धानि विचित्राणि पदे पदे ॥ २ ९ ॥ इदमेकं गदायुद्धं भवत्वद्याद्भुतं महत् । रथके विचित्र युद्ध तो पग- पगपर हुए हैं । आज यह एक अत्यन्त अद्भुत गदायुद्ध भी हो जाय ॥ २ ९ ॥ अस्त्राणामपि पर्यायं कर्तुमिच्छन्ति मानवाः ॥ ३० ॥
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युद्धानामपि पर्यायो भवत्वनुमते तव । मनुष्य बारी - बारीसे एक-एक अस्त्रका प्रयोग करना चाहते हैं; परंतु आज तुम्हारी अनुमतिसे युद्ध भी क्रमशः एक-एक योद्धाके साथ ही हो ॥ ३० ॥
गदया त्वां महाबाहो विजेष्यामि सहानुजम् ॥ ३१ ॥
पञ्चालान् सृञ्जयांश्चैव चे चान्ये तव सैनिकाः ।
न हि मे सम्भ्रमो जातु शक्रादपि युधिष्ठिर ॥ ३२ ॥
महाबाहो! मैं गदाके द्वारा भाइयोंसहित तुमको, पांचालों और सृजयोंको तथा जो तुम्हारे दूसरे सैनिक हैं, उनको भी जीत लूँगा । युधिष्ठिर! मुझे इन्द्रसे भी कभी घबराहट नहीं होती ॥ ३१-३२ ॥ युधिष्ठिर उवाच
उत्तिष्ठोत्तिष्ठ गान्धारे मां योधय सुयोधन ।
एक एकेन संगम्य संयुगे गदया बली ॥ ३३ ॥
पुरुषो भव गान्धारे युध्यस्व सुसमाहितः ।
अद्य ते जीवितं नास्ति यदीन्द्रोऽपि तवाश्रयः ॥ ३४ ॥
युधिष्ठिर बोले – गान्धारीनन्दन! सुयोधन! उठो- उठो और मेरे साथ युद्ध करो । बलवान् तो तुम हो ही । युद्धमें गदाके द्वारा अकेले किसी एक वीरके साथ ही भिड़कर अपने पुरुषत्वका परिचय दो। एकाग्रचित्त होकर युद्ध करो। यदि इन्द्र भी तुम्हारे आश्रयदाता हो जायँ तो भी आज तुम्हारे प्राण नहीं बच सकते ॥ ३३-३४ ॥ संजय उवाच
एतत् स नरशार्दूलो नामृष्यत तवात्मजः ।
सलिलान्तर्गतः श्वभ्रे महानाग इव श्वसन् ॥ ३५ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! युधिष्ठिरके इस कथनको जलमें स्थित हुआ आपका पुत्र पुरुषसिंह दुर्योधन नहीं सह सका । वह बिलमें बैठे हुए विशाल सर्पके समान लंबी साँस खींचने लगा ॥ ३५ ॥
तथासौ वाक्प्रतोदेन तुद्यमानः पुनः पुनः ।
वचो न ममृषे राजन्नुत्तमाश्वः कशामिव ॥ ३६ ॥
राजन्! जैसे अच्छा घोड़ा कोड़ेकी मार नहीं सह सकता है, उसी प्रकार वचनरूपी चाबुकसे बार- बार पीड़ित किया जाता हुआ दुर्योधन युधिष्ठिरकी उस बातको सहन न कर सका ॥ ३६ ॥
संक्षोभ्य सलिलं वेगाद् गदामादाय वीर्यवान् ।
अद्रिसारमयीं गुर्वीं काञ्चनाङ्गदभूषणाम् ॥ ३७ ॥
अन्तर्जलात् समुत्तस्थौ नागेन्द्र इव निःश्वसन् ।
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वह पराक्रमी वीर बड़े वेगसे सोनेके अंगदसे विभूषित एवं लोहेकी बनी हुई भारी गदा हाथमें लेकर पानीको चीरता हुआ उसके भीतरसे उठ खड़ा हुआ और सर्पराजके समान लंबी साँस खींचने लगा ॥ ३७३ ॥
स भित्त्वा स्तम्भितं तोयं स्कन्धे कृत्वाऽऽयसीं गदाम् ॥ ३८ ॥
उदतिष्ठत पुत्रस्ते प्रतपन् रश्मिवानिव । कंधेपर लोहेकी गदा रखकर बँधे हुए जलका भेदन करके आपका वह पुत्र प्रतापी सूर्यके समान ऊपर उठा ॥ ३८३ ॥
ततः शैक्यायसीं गुर्वी जातरूपपरिष्कृताम् ॥ ३ ९ ॥ गदां परामृशद् धीमान् धार्तराष्ट्रो महाबलः । इसके बाद महाबली बुद्धिमान् दुर्योधनने लोहेकी बनी हुई वह सुवर्णभूषित भारी गदा हाथमें ली ॥ ३ ९ ॥ गदाहस्तं तु तं दृष्ट्वा सशृङ्गमिव पर्वतम् ॥ ४० ॥
प्रजानामिव संक्रुद्धं शूलपाणिमिव स्थितम् । हाथमें गदा लिये हुए दुर्योधनको पाण्डवोंने इस प्रकार देखा, मानो कोई शृंगयुक्त पर्वत हो अथवा प्रजापर कुपित होकर हाथमें त्रिशूल लिये हुए रुद्रदेव खड़े हों ॥ सगदो भारतो भाति प्रतपन् भास्करो यथा ॥ ४१ ॥
तमुत्तीर्ण महाबाहुं गदाहस्तमरिंदमम् ।
मेनिरे सर्वभूतानि दण्डपाणिमिवान्तकम् ॥ ४२ ॥
वह गदाधारी भरतवंशी वीर तपते हुए सूर्यके समान प्रकाशित हो रहा था । शत्रुओंका दमन करनेवाले महाबाहु दुर्योधनको हाथमें गदा लिये जलसे निकला हुआ देख समस्त प्राणी ऐसा मानने लगे, मानो दण्डधारी यमराज प्रकट हो गये हों ॥ ४१-४२ ॥
वज्रहस्तं यथा शक्रं शूलहस्तं यथा हरम् ।
ददृशुः सर्वपञ्चालाः पुत्रं तव जनाधिप ॥ ४३ ॥
नरेश्वर! सम्पूर्ण पांचालोंने आपके पुत्रको वज्रधारी इन्द्र और त्रिशूलधारी रुद्रके समान देखा ॥ ४३ ॥
तमुत्तीर्णं तु सम्प्रेक्ष्य समहृष्यन्त सर्वशः ।
पञ्चालाः पाण्डवेयाश्च तेऽन्योन्यस्य तलान् ददुः ॥ ४४ ॥
उसे जलसे बाहर निकला देख समस्त पांचाल और पाण्डव हर्षसे खिल उठे और एक-दूसरेसे हाथ मिलाने लगे ॥ ४४ ॥
अवहासं तु तं मत्वा पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
उद्वृत्य नयने क्रुद्धो दिधक्षुरिव पाण्डवान् ॥ ४५ ॥
महाराज! उनके इस हाथ मिलानेको दुर्योधनने अपना उपहास समझा; अतः क्रोधपूर्वक आँखें घुमाकर पाण्डवोंकी ओर इस प्रकार देखा, मानो उन्हें जलाकर भस्म कर
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देना चाहता हो ॥ ४५ ॥
त्रिशिखां भ्रुकुटीं कृत्वा संदष्टदशनच्छदः ।
प्रत्युवाच ततस्तान् वै पाण्डवान् सह केशवान् ॥ ४६ ॥
उसने अपनी भौंहोंको तीन जगहसे टेढ़ी करके दाँतोंसे ओठको दबाया और श्रीकृष्णसहित पाण्डवोंसे इस प्रकार कहा ॥ ४६ ॥
दुर्योधन उवाच
अस्यावहासस्य फलं प्रतिभोक्ष्यथ पाण्डवाः ।
गमिष्यथ हताः सद्यः सपञ्चाला यमक्षयम् ॥ ४७ ॥
दुर्योधन बोला- पांचालो और पाण्डवो! इस उपहासका फल तुम्हें अभी भोगना पड़ेगा; मेरे हाथसे मारे जाकर तुम तत्काल यमलोकमें पहुँच जाओगे ॥ ४७ ॥
संजय उवाच
उत्थितश्च जलात् तस्मात् पुत्रो दुर्योधनस्तव ।
अतिष्ठत गदापाणी रुधिरेण समुक्षितः ॥ ४८ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! आपका पुत्र दुर्योधन उस जलसे निकलकर हाथमें गदा लिये खड़ा हो गया । वह रक्तसे भीगा हुआ था ॥ ४८ ॥
तस्य शोणितदिग्धस्य सलिलेन समुक्षितम् ।
शरीरं स्म तदा भाति स्रवन्निव महीधरः ॥ ४९ ॥
उस समय खूनसे लथपथ हुए दुर्योधनका शरीर पानीसे भीगकर जलका स्रोत बहानेवाले पर्वतके समान प्रतीत होता था ॥ ४ ९ ॥
तमुद्यतगदं वीरं मेनिरे तत्र पाण्डवाः ।
वैवस्वतमिव क्रुद्धं शूलपाणिमिव स्थितम् ॥ ५० ॥
वहाँ हाथमें गदा उठाये हुए वीर दुर्योधनको पाण्डवोंने क्रोधमें भरे हुए यमराज तथा हाथमें त्रिशूल लेकर खड़े हुए रुद्रके समान समझा ॥ ५० ॥
स मेघनिनदो हर्षान्नर्दन्निव च गोवृषः ।
आजुहाव ततः पार्थान् गदया युधि वीर्यवान् ॥ ५१ ॥
उस पराक्रमी वीरने हँकड़ते हुए साँड़के समान मेघके तुल्य गम्भीर गर्जना करते हुए बड़े हर्षके साथ गदायुद्धके लिये पाण्डवोंको ललकारा ॥ ५१ ॥
दुर्योधन उवाच
एकैकेन च मां यूयामासीदत युधिष्ठिर ।
न ह्येको बहुभिर्न्याय्यो वीरो योधयितुं युधि ॥ ५२ ॥
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दुर्योधन बोला- युधिष्ठिर! तुमलोग एक-एक करके मेरे साथ युद्धके लिये आते जाओ । रणभूमिमें किसी एक वीरको बहुसंख्यक वीरोंके साथ युद्धके लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं है ॥ ५२ ॥
न्यस्तवर्मा विशेषेण श्रान्तश्चाप्सु परिप्लुतः ।
भृशं विक्षतगात्रश्च हतवाहनसैनिकः ॥ ५३ ॥
विशेषतः उस वीरको जिसने अपना कवच उतार दिया हो, जो थककर जलमें गोता लगाकर विश्राम कर रहा हो, जिसके सारे अंग अत्यन्त घायल हो गये हों तथा जिसके वाहन और सैनिक मार डाले गये हों, किसी समूहके साथ युद्धके लिये बाध्य करना कदापि उचित नहीं है ॥ ५३ ॥
अवश्यमेव योद्धव्यं सर्वैरेव मया सह ।
युक्तं त्वयुक्तमित्येतद् वेत्सि त्वं चैव सर्वदा ॥ ५४ ॥
मुझे तो तुम सब लोगोंके साथ अवश्य युद्ध करना है; परंतु इसमें क्या उचित है और क्या अनुचित; इसे तुम सदा अच्छी तरह जानते हो ॥ ५४ ॥
युधिष्ठिर उवाच
मा भूदियं तव प्रज्ञा कथमेवं सुयोधन ।
यदाभिमन्युं बहवो जघ्नुर्युधि महारथाः ॥ ५५ ॥
- युधिष्ठिरने कहा – सुयोधन! जब तुम बहुत- से महारथियोंने मिलकर युद्धमें अभिमन्युको मारा था, उस समय तुम्हारे मनमें ऐसा विचार क्यों नहीं उत्पन्न हुआ? ॥ ५५ ॥
क्षत्रधर्मं भृशं क्रूरं निरपेक्षं सुनिर्घृणम् ।
अन्यथा तु कथं हन्युरभिमन्युं तथा गतम् ॥ ५६ ॥
सर्वे भवन्तो धर्मज्ञाः सर्वे शूरास्तनुत्यजः । वास्तवमें क्षत्रियधर्म बड़ा ही क्रूर, किसीकी भी अपेक्षा न रखनेवाला तथा अत्यन्त निर्दय है; अन्यथा तुम सब लोग धर्मज्ञ, शूरवीर तथा युद्धमें शरीरका विसर्जन करनेको उद्यत रहनेवाले होकर भी उस असहाय अवस्थामें अभिमन्युका वध कैसे कर सकते थे ॥ ५६३ || न्यायेन युध्यतां प्रोक्ता शक्रलोकगतिः परा ॥ ५७ ॥
यद्येकस्तु न हन्तव्यो बहुभिर्धर्म एव तु ।
तदाभिमन्युं बहवो निजघ्नुस्त्वन्मते कथम् ॥ ५८ ॥
न्यायपूर्वक युद्ध करनेवाले वीरोंके लिये परम उत्तम इन्द्रलोककी प्राप्ति बतलायी गयी है । ' बहुत - से योद्धा मिलकर किसी एक वीरको न मारें यदि यही धर्म है तो तुम्हारी सम्मतिसे अनेक महारथियोंने अभिमन्युका वध कैसे किया? ॥ ५८ ॥
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सर्वो विमृशते जन्तुः कृच्छ्रस्थो धर्मदर्शनम् ।
पदस्थः पिहितं द्वारं परलोकस्य पश्यति ॥ ५ ९ ॥
प्रायः सभी प्राणी जब स्वयं संकटमें पड़ जाते हैं तो अपनी रक्षाके लिये धर्मशास्त्रकी दुहाई देने लगते हैं और जब अपने उच्च पदपर प्रतिष्ठित होते हैं, उस समय उन्हें परलोकका दरवाजा बंद दिखायी देता है ॥ ५ ९ ॥
आमुञ्च कवचं वीर मूर्धजान् यमयस्व च ।
यच्चान्यदपि ते नास्ति तदप्यादत्स्व भारत ॥ ६० ॥
वीर भरतनन्दन! तुम कवच धारण कर लो, अपने केशोंको अच्छी तरह बाँध लो तथा युद्धकी और कोई आवश्यक सामग्री जो तुम्हारे पास न हो, उसे भी ले लो ॥
इममेकं च ते कामं वीर भूयो ददाम्यहम् ।
पञ्चानां पाण्डवेयानां येन त्वं योद्धुमिच्छसि । ६१ ॥
तं हत्वा वै भवान् राजा हतो वा स्वर्गमाप्नुहि ।
ऋते च जीविताद् वीर युद्धे किं कर्म ते प्रियम् ॥ ६२ ॥
वीर! मैं पुनः तुम्हें एक अभीष्ट वर देता हूँ— ' पाँचों पाण्डवोंमेंसे जिसके साथ युद्ध करना चाहो, उस एकका ही वध कर देनेपर तुम राजा हो सकते हो अथवा यदि स्वयं मारे गये तो स्वर्गलोक प्राप्त कर लोगे । शूरवीर! बताओ, युद्धमें जीवनकी रक्षाके सिवा तुम्हारा और कौन - सा प्रिय कार्य हम कर सकते हैं? ॥ ६१-६२ ॥ संजय उवाच
ततस्तव सुतो राजन् वर्म जग्राह काञ्चनम् ।
विचित्रं च शिरस्त्राणं जाम्बूनदपरिष्कृतम् ॥ ६३ ॥
संजय कहते हैं— राजन्! तदनन्तर आपके पुत्रने सुवर्णमय कवच तथा स्वर्णजटित विचित्र शिरस्त्राण धारण किया ॥ ६३ ॥
सोऽवबद्धशिरस्त्राणः शुभकाञ्चनवर्मभृत् ।
रराज राजन् पुत्रस्ते काञ्चनः शैलराडिव ॥ ६४ ॥
महाराज! शिरस्त्राण बाँधकर सुन्दर सुवर्णमय कवच धारण करके आपका पुत्र स्वर्णमय गिरिराज मेरुके समान शोभा पाने लगा ॥ ६४ ॥
संनद्धः सगदो राजन् सज्जः संग्राममूर्धनि ।
अब्रवीत् पाण्डवान् सर्वान् पुत्रो दुर्योधनस्तव ॥ ६५ ॥
नरेश्वर! युद्धके मुहानेपर सुसज्जित हो कवच बाँधे और गदा हाथमें लिये आपके पुत्र दुर्योधनने समस्त पाण्डवोंसे कहा— ॥ ६५ ॥
भ्रातॄणां भवतामेको युध्यतां गदया मया ।
सहदेवेन वा योत्स्ये भीमेन नकुलेन वा ॥ ६६ ॥
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अथवा फाल्गुनेनाद्य त्वया वा भरतर्षभ । ‘ भरतश्रेष्ठ! तुम्हारे भाइयोंमेंसे कोई एक मेरे साथ गदाद्वारा युद्ध करे । मैं सहदेव, नकुल, भीमसेन, अर्जुन अथवा स्वयं तुमसे भी युद्ध कर सकता हूँ ॥ ६६३ ॥
योत्स्येऽहं संगरं प्राप्य विजेष्ये च रणाजिरे ॥ ६७ ॥
अहमद्य गमिष्यामि वैरस्यान्तं सुदुर्गमम् ।
गदया पुरुषव्याघ्र हेमपट्टनिबद्धया ॥ ६८ ॥
‘ रणक्षेत्रमें पहुँचकर मैं तुममेंसे किसी एकके साथ युद्ध करूँगा और मेरा विश्वास है कि समरांगणमें विजय पाऊँगा । पुरुषसिंह! आज मैं सुवर्णपत्रजटित गदाके द्वारा वैरके उस पार पहुँच जाऊँगा, जहाँ जाना किसीके लिये भी अत्यन्त कठिन है ॥ ६७-६८ ॥
गदायुद्धे न मे कश्चित् सदृशोऽस्तीति चिन्तये ।
गदया वो हनिष्यामि सर्वानेव समागतान् ॥ ६ ९ ॥
‘ मैं इस बातको सदा याद रखता हूँ कि ' गदायुद्धमें मेरी समानता करनेवाला दूसरा कोई नहीं है । ' गदाके द्वारा सामने आनेपर मैं तुम सभी लोगोंको मार डालूँगा ॥ ६ ९ ॥ न मे समर्थाः सर्वे वै योद्धुं न्यायेन केचन ।
न युक्तमात्मना वक्तुमेवं गर्वोद्धतं वचः ।
अथवा सफलं ह्येतत् करिष्ये भवतां पुरः ॥ ७० ॥
‘ तुम सभी लोग अथवा तुममेंसे कोई भी मेरे साथ न्यायपूर्वक युद्ध करनेमें समर्थ नहीं हो । मुझे स्वयं ही अपने विषयमें इस प्रकार गर्वसे उद्धत वचन नहीं कहना चाहिये, तथापि कहना पड़ा है अथवा कहनेकी क्या आवश्यकता? मैं तुम्हारे सामने ही यह सब सफल कर दिखाऊँगा ॥ ७० ॥
अस्मिन् मुहुर्ते सत्यं वा मिथ्या वै तद् भविष्यति ।
गृह्णातु च गदां यो वै योत्स्यतेऽद्य मया सह ॥ ७१ ॥
' मेरा वचन सत्य है या मिथ्या, यह इसी मुहूर्तमें स्पष्ट हो जायगा । आज मेरे साथ जो भी युद्ध करनेको उद्यत हो, वह गदा उठावे ' ॥ ७१ ॥
इति श्रीमहाभारते शल्यपर्वणि गदापर्वणि युधिष्ठिरदुर्योधनसंवादे द्वात्रिंशोऽध्यायः ॥ ३२ ॥ इस प्रकार श्रीमहाभारत शल्यपर्वके अन्तर्गत गदापर्वमें युधिष्ठिर और दुर्योधनका संवादविषयक बत्तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ३२ ॥
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त्रयस्त्रिंशोऽध्यायः श्रीकृष्णका युधिष्ठिरको फटकारना, भीमसेनकी प्रशंसा तथा भीम और दुर्योधनमें वाग्युद्ध संजय उवाच
एवं दुर्योधने राजन् गर्जमाने मुहुर्मुहुः ।
युधिष्ठिरस्य संक्रुद्धो वासुदेवोऽब्रवीदिदम् ॥ १ ॥
संजय कहते हैं — राजन्! जब यों कहकर दुर्योधन बारंबार गर्जना करने लगा, उस समय भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त कुपित होकर युधिष्ठिरसे बोले - ॥ १ ॥
यदि नाम ह्ययं युद्धे वरयेत् त्वां युधिष्ठिर ।
अर्जुनं नकुलं चैव सहदेवमथापि वा ॥ २ ॥
‘ युधिष्ठिर! यदि यह दुर्योधन युद्धमें तुमको, अर्जुनको अथवा नकुल या सहदेवको ही युद्धके लिये वरण कर ले, तब क्या होगा? ॥ २ ॥
किमिदं साहसं राजंस्त्वया व्याहृतमीदृशम् ।
एकमेव निहत्याजौ भव राजा कुरुष्विति ॥ ३ ॥
‘ राजन्! आपने क्यों ऐसी दुःसाहस पूर्ण बात कह डाली कि ' तुम हममेंसे एकको ही मारकर कौरवोंका राजा हो जाओ ' ॥ ३ ॥
न समर्थानहं मन्ये गदाहस्तस्य संयुगे ।
एतेन हि कृता योग्या वर्षाणीह त्रयोदश ॥। ४ ॥
आयसे पुरुषे राजन् भीमसेनजिघांसया । ‘ मैं नहीं मानता कि आपलोग युद्धमें गदाधारी दुर्योधनका सामना करनेमें समर्थ हैं । राजन्! इसने भीमसेनका वध करनेकी इच्छासे उनकी लोहेकी मूर्तिके साथ तेरह वर्षोंतक गदायुद्धका अभ्यास किया है ॥ ४३ ॥
कथं नाम भवेत् कार्यमस्माभिर्भरतर्षभ ॥ ५ ॥
साहसं कृतवांस्त्वं तु ह्यनुक्रोशान्नृपोत्तम । ‘ भरतभूषण! अब हमलोग अपना कार्य कैसे सिद्ध कर सकते हैं? नृपश्रेष्ठ! आपने दयावश यह दुःसाहसपूर्ण कार्य कर डाला है ॥ ५३ ॥
नान्यमस्यानुपश्यामि प्रतियोद्धारमाहवे ॥ ६ ॥
ऋते वृकोदरात् पार्थात् स च नातिकृतश्रमः । ' मैं कुन्तीपुत्र भीमसेनके सिवा, दूसरे किसीको ऐसा नहीं देखता, जो गदायुद्धमें दुर्योधनका सामना कर सके, परंतु भीमसेनने भी अधिक परिश्रम नहीं किया है ॥ ६३ ॥