श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 931–940

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 931–940

पृष्ठ 931

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चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन और कर्णका युद्ध, धृतराष्ट्रपुत्र दुर्मुखका वध तथा कर्णका पलायन संजय उवाच

सर्वथा विरथः कर्णः पुनर्भीमेन निर्जितः ।

रथमन्यं समास्थाय पुनर्विव्याध पाण्डवम् ॥ १ ॥

संजय कहते हैं— राजन्! सब प्रकारसे रथहीन एवं भीमसेनके द्वारा पुनः पराजित हुए कर्णने दूसरे रथपर बैठकर पाण्डुकुमार भीमसेनको पुनः बींध डाला ॥

महागजाविवासाद्य विषाणाग्रैः परस्परम् ।

शरैः पूर्णायतोत्सृष्टैरन्योन्यमभिजघ्नतुः ॥ २ ॥

जैसे दो विशाल गजराज अपने दाँतोंके अग्रभागोंद्वारा एक- दूसरे से भिड़ गये हों, उसी प्रकार कर्ण और भीमसेन धनुषको पूर्णतः खींचकर छोड़े गये बाणोंद्वारा एक- दूसरेको चोट पहुँचाने लगे ॥ २ ॥

अथ कर्णः शरव्रातैर्भीमसेनं समार्पयत् ।

ननाद च महानादं पुनर्विव्याध चोरसि ॥ ३ ॥

तदनन्तर कर्णने अपने बाणसमूहोंद्वारा भीमसेनको घायल कर दिया । उसने बड़े जोरसे गर्जना की और पुनः भीमसेनकी छातीमें चोट पहुँचायी ॥ ३ ॥

तं भीमो दशभिर्बाणैः प्रत्यविध्यदजिह्मगैः ।

पुनर्विव्याध सप्तत्या शराणां नतपर्वणाम् ॥ ४ ॥

तब भीमने सीधे जानेवाले दस बाणोंसे कर्णको मारकर बदला चुकाया । तत्पश्चात् झुकी हुई गाँठवाले सत्तर बाणोंद्वारा पुनः कर्णको बींध डाला ॥ ४ ॥

कर्णं तु नवभिर्भीमो भित्त्वा राजन् स्तनान्तरे ।

ध्वजमेकेन विव्याध सायकेन शितेन ह ॥ ५ ॥

राजन्! भीमसेनने कर्णकी छातीमें नौ बाणोंद्वारा गहरी चोट पहुँचाकर एक तीखे बाणसे उसकी ध्वजाको भी छेद दिया ॥ ५ ॥

सायकानां ततः पार्थस्त्रिषष्ट्या प्रत्यविध्यत ।

तोत्रैरिव महानागं कशाभिरिव वाजिनम् ॥ ६ ॥

तदनन्तर जैसे विशाल गजराजको अंकुशोंसे और घोड़ेको कोड़ोंसे पीटा जाय, उसी प्रकार कुन्तीकुमार भीमने तिरसठ बाणोंद्वारा कर्णको घायल कर दिया ॥ ६ ॥

सोऽतिविद्धो महाराज पाण्डवेन यशस्विना ।

पृष्ठ 932

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सृक्किणी लेलिहन् वीरः क्रोधरक्तान्तलोचनः ॥ ७ ॥

महाराज! यशस्वी पाण्डुपुत्रके द्वारा अत्यन्त घायल होकर वीर कर्ण क्रोधसे लाल आँखें करके अपने दोनों जबड़ोंको चाटने लगा ॥ ७ ॥

ततः शरं महाराज सर्वकायावदारणम् ।

प्राहिणोद् भीमसेनाय बलायेन्द्र इवाशनिम् ॥ ८ ॥

राजन्! तदनन्तर जैसे इन्द्रने बलासुरपर वज्र चलाया था, उसी प्रकार उसने भीमसेनपर समस्त शरीरको विदीर्ण कर देनेवाले बाणका प्रहार किया ॥ ८ ॥

स निर्भिद्य रणे पार्थं सूतपुत्रधनुश्च्युतः ।

अगच्छद् दारयन् भूमिं चित्रपुङ्खः शिलीमुखः ॥ ९ ॥

रणक्षेत्रमें सूतपुत्रके धनुषसे छूटा हुआ वह विचित्र पंखोंवाला बाण भीमसेनको विदीर्ण करके पृथ्वीको चीरता हुआ उसके भीतर समा गया ॥ ९ ॥

ततो भीमो 'महाबाहुः क्रोधसंरक्तलोचनः: 1 वज्रकल्पां चतुष्किष्कुं गुर्वीं रुक्माङ्गदां गदाम् ॥ १० ॥

प्राहिणोत् सूतपुत्राय षडस्रामविचारयन् । तब क्रोधसे लाल नेत्रोंवाले महाबाहु भीमसेनने चार बित्तेकी बनी हुई वज्रके समान भयंकर तथा सुवर्णमय भुजबंदसे विभूषित छः कोणोंवाली भारी गदा उठाकर उसे बिना विचारे सूतपुत्र कर्णपर चला दिया ॥ तया जघानाधिरथेः सदश्वान् साधुवाहिनः ॥ ११ ॥

गदया भारतः क्रुद्धो वज्रेणेन्द्र इवासुरान् । जैसे कुपित हुए इन्द्रने वज्रसे असुरोंका वध किया था, उसी प्रकार क्रोधमें भरे भरतवंशी भीमने अपनी उस गदासे अधिरथपुत्र कर्णके उन उत्तम घोड़ोंको मार डाला, जो अच्छी तरह सवारीका काम देते थे ॥ ११ ॥

ततो भीमो महाबाहुः क्षुराभ्यां भरतर्षभ ॥ १२ ॥

ध्वजमाधिरथेश्छित्त्वा सूतमभ्यहनच्छरैः । भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात् महाबाहु भीमसेनने दो छुरोंसे कर्णकी ध्वजा काटकर अपने बाणोंद्वारा उसके सारथिको भी मार डाला ॥ १२३ ॥

हताश्वसूतमुत्सृज्य सरथं पतितध्वजम् ॥ १३ ॥

विस्फारयन् धनुः कर्णस्तस्थौ भारत दुर्मनाः । भारत! घोड़े और सारथिके मारे जाने तथा ध्वजाके गिर जानेपर कर्ण उस रथको छोड़कर धनुषकी टंकार करता हुआ दुःखी मनसे वहाँ खड़ा हो गया ॥ १३३ ॥

तत्राद्भुतमपश्याम राधेयस्य पराक्रमम् ॥ १४ ॥

विरथो रथिनां श्रेष्ठो वारयामास यद् रिपुम् ।

पृष्ठ 933

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वहाँ हमलोगोंने राधानन्दन कर्णका अद्भुत पराक्रम देखा । रथियोंमें श्रेष्ठ उस वीरने रथहीन होनेपर भी अपने शत्रुको आगे नहीं बढ़ने दिया ॥ १४३ ॥

विरथं तं नरश्रेष्ठं दृष्ट्वाऽऽधिरथिमाहवे ॥ १५ ॥

दुर्योधनस्ततो राजन्नभ्यभाषत दुर्मुखम् ।

एष दुर्मुख राधेयो भीमेन विरथीकृतः ॥ १६ ॥

तं रथेन नरश्रेष्ठं सम्पादय महारथम् । राजन्! नरश्रेष्ठ कर्णको युद्धस्थलमें रथहीन खड़ा देख दुर्योधनने अपने भाई दुर्मुखसे कहा— ' दुर्मुख! यह राधानन्दन कर्ण भीमसेनके द्वारा रथसे वंचित कर दिया गया है । इस महारथी नरश्रेष्ठ वीरको रथसे सम्पन्न करो ' ॥ १५-१६३ ॥ ततो दुर्योधनवचः श्रुत्वा भारत दुर्मुखः ॥ १७ ॥

त्वरमाणोऽभ्ययात् कर्णं भीमं चावारयच्छरैः ।

दुर्मुखं प्रेक्ष्य संग्रामे सूतपुत्रपदानुगम् ॥ १८ ॥

वायुपुत्रः प्रहृष्टोऽभूत् सृक्किणी परिसंलिहन । भरतनन्दन! दुर्योधनकी यह बात सुनकर दुर्मुख बड़ी उतावलीके साथ कर्णके समीप आ पहुँचा और भीमसेनको अपने बाणोंद्वारा रोका । संग्राममें सूतपुत्रके चरणोंका अनुसरण करनेवाले दुर्मुखको देखकर वायुपुत्र भीमसेन बड़े प्रसन्न हुए । वे अपने दोनों गलफर चाटने लगे || ततः कर्णं महाराज वारयित्वा शिलीमुखैः ॥ १ ९ ॥ दुर्मुखाय रथं तूर्णं प्रेषयामास पाण्डवः । महाराज! तदनन्तर कर्णको अपने बाणोंद्वारा रोककर पाण्डुकुमार भीम तुरंत ही अपने रथको दुर्मुखके पास ले गये ॥ १ ९ ३ ॥ तस्मिन् क्षणे महाराज नवभिर्नतपर्वभिः ॥ २० ॥

सुमुखैर्दुर्मुखं भीमः शरैर्निन्ये यमक्षयम् । राजन्! फिर झुकी हुई गाँठवाले नौ सुमुख बाणोंद्वारा भीमसेनने दुर्मुखको उसी क्षण यमलोक पहुँचा दिया ॥ २० ॥

ततस्तमेवाधिरथिः स्यन्दनं दुर्मुखे हते ॥ २१ ॥

आस्थितः प्रबभौ राजन् दीप्यमान इवांशुमान् । नरेश्वर! दुर्मुखके मारे जानेपर कर्ण उसी रथपर बैठकर देदीप्यमान सूर्यके समान प्रकाशित होने लगा ॥ शयानं भिन्नमर्माणं दुर्मुखं शोणितोक्षितम् ॥ २२ ॥

दृष्ट्वा कर्णोऽश्रुपूर्णाक्षो मुहूर्तं नाभ्यवर्तत ।

तं गतासुमतिक्रम्य कृत्वा कर्णः प्रदक्षिणम् ॥ २३ ॥

दीर्घमुष्णं श्वसन् वीरो न किंचित् प्रत्यपद्यत ।

पृष्ठ 934

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दुर्मुखका मर्मस्थान विदीर्ण हो गया था । वह खून से लथपथ हो पृथ्वीपर पड़ा था । उसे उस दशामें देखकर कर्णके नेत्रोंमें आँसू भर आया । वह दो घड़ीतक विपक्षीका सामना न कर सका । जब उसके प्राणपखेरू उड़ गये, तब कर्ण उस शवकी परिक्रमा करके आगे बढ़ा । वह वीर गरम - गरम लंबी साँस खींचता हुआ किसी कर्तव्यका निश्चय न कर सका ॥ २२-२३ ॥ तस्मिंस्तु विवरे राजन् नाराचान् गार्ध्रवाससः ॥ २४ ॥

प्राहिणोत् सूतपुत्राय भीमसेनश्चतुर्दश । राजन्! इसी अवसरमें भीमसेनने सूतपुत्रपर गीधकी पाँखवाले चौदह नाराच चलाये ॥ २४३ ॥

ते तस्य कवचं भित्त्वा स्वर्णचित्रं महौजसः ॥ २५ ॥

हेमपुङ्खा महाराज व्यशोभन्त दिशो दश । महाराज! वे महातेजस्वी सुनहरी पाँखवाले बाण उसके सुवर्णजटित कवचको छिन्न-भिन्न करके दसों दिशाओंको सुशोभित करने लगे ॥ २५३ ॥

अपिबन् सूतपुत्रस्य शोणितं रक्तभोजनाः ॥ २६ ॥

क्रुद्धा इव मनुष्येन्द्र भुजङ्गाः कालचोदिताः । नरेन्द्र! वे रक्तका आहार करनेवाले बाण क्रोधभरे कालप्रेरित भुजंगोंके समान सूतपुत्र कर्णका खून पीने लगे ॥ प्रसर्पमाणा मेदिन्यां ते व्यरोचन्त मार्गणाः ॥ २७ ॥

अर्धप्रविष्टाः संरब्धा बिलानीव महोरगाः । जैसे क्रोधमें भरे हुए महान् सर्प बिलोंमें प्रवेश करते समय आधे ही घुस पाये हों, उसी प्रकार वे बाण पृथ्वीमें घुसते हुए शोभा पा रहे थे ॥ २७ ॥

तं प्रत्यविध्यद् राधेयो जाम्बूनदविभूषितैः ॥ २८ ॥

चतुर्दशभिरत्युग्रैर्नाराचैरविचारयन् । तब कर्णने कुछ विचार न करके अत्यन्त भयंकर एवं सुवर्णभूषित चौदह नाराचोंसे भीमसेनको भी घायल कर दिया ॥ २८३ ॥

ते भीमसेनस्य भुजं सव्यं निर्भिद्य पत्रिणः ॥ २ ९ ॥ प्राविशन् मेदिनीं भीमाः क्रीञ्चं पत्ररथा इव । वे पंखधारी भयानक बाण भीमसेनकी बायीं भुजा छेदकर पृथ्वीमें समा गये, मानो पक्षी क्रौंच पर्वतको जा रहे हों ॥ २ ९ ॥ ते व्यरोचन्त नाराचाः प्रविशन्तो वसुंधराम् ॥ ३० ॥

गच्छत्यस्तं दिनकरे दीप्यमाना इवांशवः ।

पृष्ठ 935

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वे नाराच इस पृथ्वीमें प्रवेश करते समय वैसी ही शोभा पा रहे थे, जैसे सूर्यके डूबते समय उनकी चमकीली किरणें प्रकाशित होती हैं ॥ ३० ॥

सनिर्भिन्नो रणे भीमो नाराचैर्मर्मभेदिभिः ॥ ३१ ॥

सुस्राव रुधिरं भूरि पर्वतः सलिलं यथा । मर्मभेदी नाराचोंसे रणक्षेत्रमें विदीर्ण हुए भीमसेन उसी प्रकार भूरि- भूरि रक्त बहाने लगे, जैसे पर्वत झरनेका जल गिराता है ॥ ३१ ॥

स भीमस्त्रिभिरायत्तः सूतपुत्रं पतत्त्रिभिः ॥ ३२ ॥

सुपर्णवेगैर्विव्याध सारथिं चास्य सप्तभिः । तब भीमसेनने भी प्रयत्नपूर्वक गरुडके समान वेगशाली तीन बाणोंद्वारा सूतपुत्र कर्णको तथा सात बाणोंसे उसके सारथिको भी घायल कर दिया ॥ ३२३ ॥

स विह्वलो महाराज कर्णो भीमशराहतः ॥ ३३ ॥

प्राद्रवज्जवनैरश्वै रणं हित्वा महाभयात् । महाराज! भीमके बाणोंसे आहत होकर कर्ण विह्वल हो उठा और महान् भयके कारण युद्ध छोड़कर शीघ्रगामी घोड़ोंकी सहायतासे भाग निकला ॥ ३३३ ॥

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भीमसेनस्तु विस्फार्य चापं हेमपरिष्कृतम् ॥ ३४ ॥

आहवेऽतिरथोऽतिष्ठज्ज्वलन्निव हुताशनः ॥ ३५ ॥

परंतु अतिरथी भीमसेन अपने सुवर्णभूषित धनुषको ताने हुए प्रज्वलित अग्निके समान युद्धस्थलमें ही खड़े रहे ॥ ३४-३५ ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि कर्णापयाने चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें कर्णका पलायनविषयक एक सौचौंतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३४ ॥

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पृष्ठ 937

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पञ्चत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्रका खेदपूर्वक भीमसेनके बलका वर्णन और अपने पुत्रोंकी निन्दा करना तथा भीमके द्वारा दुर्मर्षण आदि धृतराष्ट्रके पाँच पुत्रोंका वध धृतराष्ट्रउवाच

दैवमेव परं मन्ये धिक् पौरुषमनर्थकम् ।

यत्राधिरथिरायत्तो नातरत् पाण्डवं रणे ॥ १ ॥

धृतराष्ट्रने कहा — संजय! मैं तो दैवको ही बड़ा मानता हूँ। पुरुषार्थ तो व्यर्थ है । उसे धिक्कार है; क्योंकि उसमें स्थित हुआ अधिरथपुत्र कर्ण सब प्रकारसे प्रयत्न करके भी रणक्षेत्रमें पाण्डुनन्दन भीमसे पार न पा सका ॥ १ ॥

कर्णः पार्थान् सगोविन्दान् जेतुमुत्सहते रणे ।

न च कर्णसमं योधं लोके पश्यामि कञ्चन ॥ २ ॥

‘ कर्ण युद्धस्थलमें कृष्णसहित समस्त कुन्तीकुमारोंको जीतनेका उत्साह रखता है । मैं संसारमें कर्णके समान दूसरे किसी योद्धाको नहीं देख रहा हूँ' ॥ २ ॥

इति दुर्योधनस्याहम श्रीषं जल्पतो मुहुः ।

कर्णो हि बलवान् शूरो दृढधन्वा जितक्लमः ॥ ३ ॥

इति मामब्रवीत् सूत मन्दो दुर्योधनः पुरा ।

वसुषेणसहायं मां नालं देवाऽपि संयुगे ॥ ४ ॥

किं`नु पाण्डुसुता राजन् गतसत्त्वा विचेतसः । इस प्रकार दुर्योधनके मुँहसे मैंने बारंबार सुना है । सूत! मूर्ख दुर्योधनने पहले मुझसे यह भी कहा था कि ‘ कर्ण बलवान्, शूरवीर, सुदृढ़ धनुर्धर और युद्धमें श्रम तथा थकावटपर विजय पानेवाला है । राजन्! कर्णके साथ रहनेपर समरभूमिमें मुझे देवता भी परास्त नहीं कर सकते; फिर शक्तिहीन और विवेकशून्य पाण्डव मेरा क्या कर सकते हैं?' ॥ ३-४ ॥ तत्र तं निर्जितं दृष्ट्वा भुजङ्गमिव निर्विषम् ॥ ५ ॥

युद्धात् कर्णमपक्रान्तं किंस्विद् दुर्योधनोऽब्रवीत् । परंतु रणक्षेत्रमें विषहीन सर्पके समान कर्णको पराजित और युद्धसे भागा हुआ देखकर दुर्योधनने क्या कहा था ॥ ५३ ॥

अहो दुर्मुखमेवैकं युद्धानामविशारदम् ॥ ६ ॥

प्रावेशयद्धतवहं पतङ्गमिव मोहितः ।

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अहो! दुर्योधनने मोहित होकर युद्धकी कलासे अनभिज्ञ दुर्मुखको अकेले ही पतंगकी भाँति आगमें झोंक दिया ॥ ६३ ॥

अश्वत्थामा मद्रराजः कृपः कर्णश्च संगताः ॥ ७ ॥

न शक्ताः प्रमुखे स्थातुं नूनं भीमस्य संजय । संजय! अश्वत्थामा, मद्रराज शल्य, कृपाचार्य और कर्ण– ये सब मिलकर भी निश्चय ही भीमके सामने नहीं ठहर सकते ॥ ७३ ॥

तेऽपि चास्य महाघोरं बलं नागायुतोपमम् ॥ ८ ॥

जानन्तो व्यवसायं च क्रूरं मारुततेजसः ।

किमर्थं क्रूरकर्माणं यमकालान्तकोपमम् ॥ ९ ॥

बलसंरम्भवीर्यज्ञाः कोपयिष्यन्ति संयुगे । वे भी वायुके तुल्य तेजस्वी भीमसेनके दस हजार हाथियोंके समान अत्यन्त घोर बलको तथा उनके क्रूरतापूर्ण निश्चयको जानते हैं; उनके बल, पराक्रम और क्रोधसे परिचित हैं । ऐसी दशामें वे यम, काल और अन्तकके समान क्रूर कर्म करनेवाले भीमसेनको युद्धमें अपने ऊपर कैसे कुपित करेंगे? ॥ ८ - ९ ॥ कर्णस्त्वेको महाबाहुः स्वबाहुबलदर्पितः ॥ १० ॥

भीमसेनमनादृत्य रणेऽयुध्यत सूतजः । अकेला सूतपुत्र महाबाहु कर्ण ही अपने बाहुबलके घमंडमें भरकर भीमसेनका तिरस्कार करके रणभूमिमें उनके साथ जूझता रहा ॥ १०३ ॥

योऽजयत् समरे कर्णं पुरंदर इवासुरम् ॥ ११ ॥

न स पाण्डुसुतो जेतुं शक्यः केनचिदाहवे । जिन्होंने समरांगणमें असुरोंपर विजय पानेवाले देवराज इन्द्रके समान कर्णको पराजित कर दिया, उन पाण्डुपुत्र भीमसेनको कोई भी युद्धमें जीत नहीं सकता ॥ द्रोणं यः सम्प्रमथ्यैकः प्रविष्टो मम वाहिनीम् ॥ १२ ॥

भीमो धनंजयान्वेषी कस्तमार्च्छज्जिजीविषुः । जो भीमसेन अकेले ही द्रोणाचार्यको मथकर धनंजयका पता लगानेके लिये मेरी सेनामें घुस आये, उनका सामना करनेके लिये जीवित रहनेकी इच्छावाला कौन पुरुष जा सकता है? ॥ १२३ ॥

को हि संजय भीमस्य स्थातुमुत्सहतेऽग्रतः ॥ १३ ॥

उद्यताशनिहस्तस्य महेन्द्रस्येव दानवः । संजय! जैसे हाथमें वज्र लिये हुए देवराज इन्द्रके सामने कोई दानव खड़ा नहीं हो सकता, उसी प्रकार भीमसेनके सम्मुख भला कौन ठहर सकता है? ॥ १३३ ॥

प्रेतराजपुरं प्राप्य निवर्तेतापि मानवः ॥ १४ ॥

पृष्ठ 939

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न भीमसेनं सम्प्राप्य निवर्तेत कदाचन । मनुष्य यमलोकमें भी जाकर लौट सकता है; परंतु युद्धमें भीमसेनके सामने जाकर कदापि जीवित नहीं लौट सकता ॥ १४३ ॥

पतङ्गा इव वह्निं ते प्राविशन्नल्पचेतसः ॥ १५ ॥

ये भीमसेनं संक्रुद्धमन्वधावन् विमोहिताः । मेरे जो मन्दबुद्धि पुत्र मोहित होकर क्रोधमें भरे हुए भीमसेनकी ओर दौड़े थे, वे पतंगोंके समान मानो आगमें ही कूद पड़े थे ॥ १५३ ॥

यत् तत् सभायां भीमेन मम पुत्रवधाश्रयम् ॥ १६ ॥

उक्तं संरम्भिणोग्रेण कुरूणां शृण्वतां तदा ।

तन्नूनमभिसंचिन्त्य दृष्ट्वा कर्णं च निर्जितम् ॥ १७ ॥

दुःशासनः सह भ्रात्रा भयाद् भीमादुपारमत् । क्रोधमें भरे हुए भयंकर भीमसेनने सभाभवनमें उस दिन समस्त कौरवोंके सुनते हुए मेरे पुत्रोंके वधके सम्बन्धमें जो प्रतिज्ञा की थी, उसका विचार करके और कर्णको पराजित देखकर अपने भाई दुर्योधनसहित दुःशासन निश्चय ही भयके मारे भीमसेनसे दूर हट गया होगा ॥ १६-१७३ ॥ यश्च संजय दुर्बुद्धिरब्रवीत् समितौ मुहुः ॥ १८ ॥

कर्णो दुःशासनोऽहं च जेष्यामो युधि पाण्डवान् । संजय! खोटी बुद्धिवाले दुर्योधनने सभामें बारंबार कहा था कि ' कर्ण, दुःशासन तथा मैं –तीनों मिलकर युद्धमें अवश्य पाण्डवोंको जीत लेंगे ' ॥ १८३ ॥

स नूनं विरथं दृष्ट्वा कर्णं भीमेन निर्जितम् ॥ १ ९ ॥ प्रत्याख्यानाच्च कृष्णस्य भृशं तप्यति पुत्रकः । परंतु अब कर्णको भीमसेनके द्वारा पराजित और रथहीन हुआ देख श्रीकृष्णकी बात न माननेके कारण मेरा वह पुत्र निश्चय ही बड़ा भारी पश्चात्ताप कर रहा होगा ॥ १ ९ ३ ॥ दृष्ट्वा भ्रातॄन् हतान् संख्ये भीमसेनेन दंशितान् ॥ २० ॥

आत्मापराधे सुमहन्नूनं तप्यति पुत्रकः । अपने कवचधारी भ्राताओंको युद्धमें भीमसेनके द्वारा मारा गया देख मेरे पुत्रको अपने अपराधके लिये अवश्य ही महान् अनुताप हो रहा होगा ॥ २०६३ ॥

को हि जीवितमन्विच्छन् प्रतीपं पाण्डवं व्रजेत् ॥ २१ ॥

भीमं भीमायुधं क्रुद्धं साक्षात् कालमिव स्थितम् । अपने जीवनकी इच्छा रखनेवाला कौन पुरुष क्रोधमें भरकर साक्षात् कालके समान खड़े हुए भयानक अस्त्र- शस्त्रधारी पाण्डुपुत्र भीमसेनके विरुद्ध युद्धमें जा सकता है ॥ २१ ¾ ॥

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वडवामुखमध्यस्थो मुच्येतापि हि मानवः ॥ २२ ॥

न भीममुखसम्प्राप्तो मुच्येदिति मतिर्मम । मेरा तो ऐसा विश्वास है कि बडवानलके मुखमें पड़ा हुआ मनुष्य शायद जीवित बच जाय; परंतु भीमसेनके सम्मुख युद्धके लिये आया हुआ कोई भी शूरमा जीवित नहीं छूट सकता ॥ २२ ॥

न पार्था न च पञ्चाला न च केशवसात्यकी ॥ २३ ॥

जानते युधि संरब्धा जीवितं परिरक्षितुम् ।

अहो मम सुतानां हि विपन्नं सूत जीवितम् ॥ २४ ॥

सूत! युद्धमें क्रुद्ध होनेपर पाण्डव, पांचाल, श्रीकृष्ण तथा सात्यकि— ये कोई भी शत्रुके जीवनकी रक्षा करना नहीं जानते हैं । अहो! मेरे पुत्रोंका जीवन भारी विपत्तिमें पड़ गया है ॥ २३-२४ ॥ संजय उवाच

यस्त्वं शोचसि कौरव्य वर्तमाने महाभये ।

त्वमस्य जगतो मूलं विनाशस्य न संशयः ॥ २५ ॥

संजयने कहा — कुरुनन्दन! यह महान् भय जब सिरपर आ गया है, तब आप शोक करने बैठे हैं, यह ठीक नहीं है । इसमें कोई संदेह नहीं कि इस जगत्के विनाशका मूल कारण आप ही हैं ॥ २५ ॥

स्वयं वैरं महत् कृत्वा पुत्राणां वचने स्थितः ।

उच्यमानो न गृह्णीषे मर्त्यः पथ्यमिवौषधम् ॥ २६ ॥

पुत्रोंकी हाँ में हाँ मिलाकर आपने स्वयं ही इस महान् वैरकी नींव डाली है और जब इसे मिटानेके लिये आपसे किसीने कोई बात कही, तब आपने उसे नहीं माना, ठीक उसी तरह, जैसे मरणासन्न मनुष्य हितकारक औषध नहीं ग्रहण करता है ॥ २६ ॥

स्वयं पीत्वा महाराज कालकूटं सुदुर्जरम् ।

तस्येदानीं फलं कृत्स्नमवाप्नुहि नरोत्तम ॥ २७ ॥

नरश्रेष्ठ! महाराज! जिसको पचाना अत्यन्त कठिन है, उस कालकूट विषको स्वयं पीकर अब उसके सारे परिणामोंको आप ही भोगिये ॥ २७ ॥

यत् तु कुत्सयसे योधान् युध्यमानान् महाबलान् ।

तत्र ते वर्तयिष्यामि यथा युद्धमवर्तत ॥ २८ ॥

युद्धमें लगे हुए महाबली योद्धाओंको जो आप कोस रहे हैं, वह व्यर्थ है । अब जिस प्रकार वहाँ युद्ध हुआ था, वह सब आपको बता रहा हूँ, सुनिये ॥ २८ ॥

दृष्ट्वा कर्णं तु पुत्रास्ते भीमसेनपराजितम् ।

नामृष्यन्त महेष्वासाः सोदर्याः पञ्च भारत ॥ २ ९ ॥