श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ४ — पृष्ठ 951–960

महाभारत — खण्ड ४ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 951–960

पृष्ठ 951

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भरतनन्दन! युद्धमें भीमसेनका वह पराक्रम देखकर आपके योद्धाओं तथा चारणोंने भी प्रसन्न होकर उनका अभिनन्दन किया ॥ १४ ॥

भूरिश्रवाः कृपो द्रौणिर्मद्रराजो जयद्रथः ।

उत्तमौजा युधामन्युः सात्यकिः केशवार्जुनौ ॥ १५ ॥

कुरुपाण्डवप्रवरा दश राजन् महारथाः ।

साधु साध्विति वेगेन सिंहनादमथानदन् ॥ १६ ॥

राजन्! भूरिश्रवा, कृपाचार्य, अश्वत्थामा, मद्रराज शल्य, जयद्रथ, उत्तमौजा, युधामन्यु, सात्यकि, श्रीकृष्ण तथा अर्जुन-ये कौरव और पाण्डव पक्षके दस श्रेष्ठ महारथी ' साधु-साधु' कहकर वेगपूर्वक सिंहनाद करने लगे ॥

तस्मिन् समुत्थिते शब्दे तुमुले लोमहर्षणे ।

अभ्यभाषत पुत्रस्ते राजन् दुर्योधनस्त्वरन् ॥ १७ ॥

राज्ञः सराजपुत्रांश्च सोदर्यांश्च विशेषतः ।

कर्णं गच्छत भद्रं वः परीप्सन्तो वृकोदरात् ॥ १८ ॥

महाराज! उस रोमांचकारी भयंकर शब्दके प्रकट होनेपर आपके पुत्र राजा दुर्योधनने बड़ी उतावलीके साथ राजाओं, राजकुमारों और विशेषतः अपने भाइयोंसे कहा — ' तुम्हारा कल्याण हो, तुम सब लोग भीमसेनसे कर्णकी रक्षा करनेके लिये जाओ ॥ १७-१८ ॥

पुरा निघ्नन्ति राधेयं भीमचापच्युताः शराः ।

ते यतध्वं महेष्वासाः सूतपुत्रस्य रक्षणे ॥ १ ९ ॥

' कहीं ऐसा न हो कि भीमसेनके धनुषसे छूटे हुए बाण राधानन्दन कर्णको पहले ही मार डालें । अतः महाधनुर्धर वीरो! तुम सब लोग सूतपुत्रकी रक्षाका प्रयत्न करो ' ॥ १ ९ ॥

दुर्योधनसमादिष्टाः सोदर्याः सप्त भारत ।

भीमसेनमभिद्रुत्य संरब्धाः पर्यवारयन् ॥ २० ॥

भारत! दुर्योधनकी आज्ञा पाकर उसके सात भाइयोंने कुपित हो भीमसेनपर आक्रमण करके उन्हें चारों ओरसे घेर लिया ॥ २० ॥

ते समासाद्य कौन्तेयमावृण्वन् शरवृष्टिभिः ।

पर्वतं वारिधाराभिः प्रावृषीव बलाहकाः ॥ २१ ॥

जैसे वर्षा -ऋतुमें मेघ पर्वतपर जलकी धाराएँ बरसाते हैं, उसी प्रकार उन कौरवोंने कुन्तीकुमारके समीप जाकर उन्हें अपने बाणोंकी वर्षासे आच्छादित कर दिया ॥ २१ ॥

तेऽपीडयन् भीमसेनं क्रुद्धाः सप्त महारथाः ।

प्रजासंहरणे राजन् सोमं सप्त ग्रहा इव ॥ २२ ॥

राजन्! उन सात महारथियोंने कुपित हो भीमसेनको उसी प्रकार पीड़ा दी, जैसे सात ग्रह प्रजाओंके संहारकालमें सोमको पीड़ा देते हैं ॥ २२ ॥

ततो वेगेन कौन्तेयः पीडयित्वा शरासनम् ।

पृष्ठ 952

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मुष्टिना पाण्डवो राजन् दृढेन सुपरिष्कृतम् ॥ २३ ॥

मनुष्यसमतां ज्ञात्वा सप्त संधाय सायकान् ।

तेभ्यो व्यसृजदायस्तः सूर्यरश्मिनिभान् प्रभुः ॥ २४ ॥

महाराज! तब कुन्तीकुमार पाण्डुपुत्र भीमने अत्यन्त स्वच्छ धनुषको सुदृढ़ मुट्ठीसे वेगपूर्वक दबाकर उन सातों भाइयोंको साधारण मनुष्य जानकर उनके लिये धनुषपर सात बाणोंका संधान किया । सूर्यकिरणोंके समान उन चमकीले बाणोंको शक्तिशाली भीमने परिश्रमपूर्वक आपके उन पुत्रोंपर छोड़ दिया ॥ २३-२४ ॥

निरस्यन्निव देहेभ्यस्तनयानामसूंस्तव ।

भीमसेनो महाराज पूर्ववैरमनुस्मरन् ॥ २५ ॥

नरेश्वर! पहलेके वैरका बारंबार स्मरण करके भीमसेनने आपके पुत्रोंके प्राणोंको उनके शरीरोंसे निकालते हुए- से उन बाणोंका प्रहार किया था ॥ २५ ॥

ते क्षिप्ता भीमसेनेन शरा भारत भारतान् ।

विदार्य खं समुत्पेतुः स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः ॥ २६ ॥

भारत! भीमसेनके चलाये हुए वे बाण सुवर्णमय पंखोंसे सुशोभित तथा शिलापर तेज किये गये थे । वे आपके पुत्रोंको विदीर्ण करके आकाशमें उड़ चले ॥ २६ ॥

तेषां विदार्य चेतांसि शरा हेमविभूषिताः ।

व्यराजन्त महाराज सुपर्णा इव खेचराः ॥ २७ ॥

महाराज! वे स्वर्णविभूषित बाण उन सातों भाइयोंके वक्षःस्थलको विदीर्ण करके आकाशमें विचरनेवाले गरुड़पक्षियोंके समान शोभा पाने लगे ॥ २७ ॥

शोणितादिग्धवाजाग्राः सप्त हेमपरिष्कृताः ।

पुत्राणां तव राजेन्द्र पीत्वा शोणितमुद्गताः ॥ २८ ॥

राजेन्द्र! वे सुवर्णभूषित सातों बाण आपके पुत्रोंका रक्त पीकर लाल हो ऊपरको उछले थे । उनके पंख और अग्रभागोंपर अधिक रक्त जम गया था ॥ २८ ॥

ते शरैर्भिन्नमर्माणो रथेभ्यः प्रापतन् क्षितौ ।

गिरिसानुरुहा भग्ना द्विपेनेव महाद्रुमाः ॥ २ ९ ॥

उन बाणोंसे मर्मस्थल विदीर्ण हो जानेके कारण वे सातों वीर रथोंसे पृथ्वीपर गिर पड़े, मानो किसी हाथीने पर्वतके शिखरपर खड़े हुए विशाल वृक्षोंको तोड़ गिराया हो ॥ २ ९ ॥

शत्रुंजयः शत्रुसहश्चित्रश्चित्रायुधो दृढः ।

चित्रसेनो विकर्णश्च सप्तैते विनिपातिताः ॥ ३० ॥

शत्रुंजय, शत्रुसह, चित्र ( चित्रवाण ), चित्रायुध ( अग्रायुध ), दृढ़ (दृढवर्मा), चित्रसेन (उग्रसेन ) और विकर्ण – इन सातों भाइयोंको भीमसेनने मार गिराया ॥

पुत्राणां तव सर्वेषां निहतानां वृकोदरः ।

शोचत्यतिभृशं दुःखाद् विकर्णं पाण्डवः प्रियम् ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 953

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राजन्! वहाँ मारे गये आपके सभी पुत्रोंमेंसे विकर्ण पाण्डवोंको अधिक प्रिय था ।

पाण्डुनन्दन भीमसेन उसके लिये अत्यन्त दुःखी होकर शोक करने लगे ॥ ३१ ॥

प्रतिज्ञेयं मया वृत्ता निहन्तव्यास्तु संयुगे ।

विकर्ण तेनासि हतः प्रतिज्ञा रक्षिता मया ॥ ३२ ॥

वे बोले — ‘ विकर्ण! मैंने यह प्रतिज्ञा कर रखी थी कि युद्धस्थलमें धृतराष्ट्रके सभी पुत्रोंको मार डालूँगा । इसीलिये तुम मेरे हाथसे मारे गये हो । ऐसा करके मैंने अपनी प्रतिज्ञाका पालन किया है ॥ ३२ ॥

त्वमागाः समरं वीर क्षात्रधर्ममनुस्मरन् ।

ततो विनिहतः संख्ये युद्धधर्मो हि निष्ठुरः ॥ ३३ ॥

'वीर! तुमक्षत्रिय- धर्मका विचार करके समरभूमिमें आ गये । इसीलिये इस युद्धमें मारे गये; क्योंकि युद्धधर्म कठोर होता है ॥ ३३ ॥

विशेषतो हि नृपतेस्तथास्माकं हिते रतः ।

न्यायतोऽन्यायतो वापि हतः शेते महाद्युतिः ॥ ३४ ॥

अगाधबुद्धिर्गाङ्गेयः क्षितौ सुरगुरोः समः ।

त्याजितः समरे प्राणांस्तस्माद् युद्धं हि निष्ठुरम् ॥ ३५ ॥

‘ जो विशेषतः राजा युधिष्ठिरके और हमारे हितमें तत्पर रहते थे, वे बृहस्पतिके समान अगाध बुद्धिवाले महातेजस्वी गंगानन्दन भीष्म भी न्याय अथवा अन्यायसे मारे जाकर समरभूमिमें सो रहे हैं और प्राणत्यागकी परिस्थितिमें डाल दिये गये हैं । इसीसे कहना पड़ता है कि युद्ध अत्यन्त निष्ठुर कर्म है ' ॥ ३४-३५ ॥ संजय उवाच

तान् निहत्य महाबाहू राधेयस्यैव पश्यतः ।

सिंहनादरवं घोरमसृजत् पाण्डुनन्दनः ॥ ३६ ॥

संजय कहते हैं - राजन्! राधानन्दन कर्णके देखते - देखते उन सातों भाइयोंको मारकर पाण्डुनन्दन महाबाहु भीमने भयंकर सिंहनाद किया ॥ ३६ ॥

स रवस्तस्य शूरस्य धर्मराजस्य भारत ।

आचख्याविव तद् युद्धं विजयं चात्मनो महत् ॥ ३७ ॥

भारत! उस सिंहनादने धर्मराज युधिष्ठिरको शूरवीर भीमके उस युद्धकी तथा अपनी महान् विजयकी मानो सूचना दे दी ॥ ३७ ॥

तं श्रुत्वा तु महानादं भीमसेनस्य धन्विनः ।

बभूव परमा प्रीतिर्धर्मराजस्य धीमतः ॥ ३८ ॥

धनुर्धर भीमसेनके उस महानादको सुनकर बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ३८ ॥

पृष्ठ 954

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ततो हृष्टमना राजन् वादित्राणां महास्वनैः ।

सिंहनादरवं भ्रातुः प्रतिजग्राह पाण्डवः ॥ ३ ९ ॥

राजन्! तब प्रसन्नचित्त होकर युधिष्ठिरने वाद्योंकी गम्भीर ध्वनिके द्वारा भाईके उस सिंहनादको स्वागतपूर्वक ग्रहण किया ॥ ३ ९ ॥

हर्षेण महता युक्तः कृतसंज्ञो वृकोदरे ।

अभ्ययात् समरे द्रोणं सर्वशस्त्रभृतां वरः ॥ ४० ॥

इस प्रकार भीमसेनको अपनी प्रसन्नताका संकेत करके सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ राजा युधिष्ठिरने बड़े हर्षके साथ रणभूमिमें द्रोणाचार्यपर आक्रमण किया ॥ ३ ९ ॥

एकत्रिंशन्महाराज पुत्रांस्तव निपातितान् ।

हतान् दुर्योधनो दृष्ट्वा क्षत्तुः सस्मार तद् वचः ॥ ४१ ॥

महाराज! आपके इकतीस (दुःशलको लेकर बत्तीस ) पुत्रोंको मारा गया देखकर दुर्योधनको विदुरजीकी कही हुई बात याद आ गयी ॥ ४१ ॥

तदिदं समनुप्राप्तं क्षत्तुर्निःश्रेयसं वचः ।

इति संचिन्त्य ते पुत्रो नोत्तरं प्रत्यपद्यत ॥ ४२ ॥

विदुरजीने जो कल्याणकारी वचन कहा था, उसके अनुसार ही यह संकट प्राप्त हुआ है । ऐसा सोचकर आपके पुत्रसे कोई उत्तर देते न बना ॥ ४२ ॥

यद् द्यूतकाले दुर्बुद्धिरब्रवीत् तनयस्तव ।

सभामानाय्य पाञ्चालीं कर्णेन सहितोऽल्पधीः ॥ ४३ ॥

यच्च कर्णोऽब्रवीत् कृष्णां सभायां परुषं वचः ।

प्रमुखे पाण्डुपुत्राणां तव चैव विशाम्पते ॥ ४४ ॥

शृण्वतस्तव राजेन्द्र कौरवाणां च सर्वशः ।

विनष्टाः पाण्डवाः कृष्णे शाश्वतं नरकं गताः ॥ ४५ ॥

पतिमन्यं वृणीष्वेति तस्येदं फलमागतम् । द्यूतके समय कर्णके साथ आपके मन्दमति पुत्र दुर्बुद्धि दुर्योधनने पांचालराजकुमारी द्रौपदीको सभामें बुलाकर उसके प्रति जो दुर्वचन कहा था तथा प्रजानाथ! महाराज! पाण्डवों और आपके सामने समस्त कौरवोंके सुनते हुए कर्णने सभामें द्रौपदीके प्रति जो यह कठोर वचन कहा था कि ' कृष्णे! पाण्डव नष्ट हो गये । सदाके लिये नरकमें पड़ गये । तू दूसरा पति कर ले ', उसी अन्यायका आज यह फल प्राप्त हुआ है ॥ ४३-४५३ ॥

यच्च षण्ढतिलादीनि परुषाणि तवात्मजैः ।

श्रावितास्ते महात्मानः पाण्डवाः कोपयिष्णुभिः ॥ ४६ ॥

तं भीमसेनः क्रोधाग्निं त्रयोदश समाः स्थितम् ।

उद्गिरंस्तव पुत्राणामन्तं गच्छति पाण्डवः ॥ ४७ ॥

पृष्ठ 955

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आपके पुत्रोंने जो पाण्डवोंको कुपित करनेके लिये षण्ढतिल ( सारहीन तिल या नपुंसक ) आदि कठोर बातें उन महामनस्वी पाण्डवोंको सुनायी थीं, उसके कारण पाण्डुपुत्र भीमसेनके हृदयमें तेरह वर्षोंतक जो क्रोधाग्नि धधकती रही है उसीको निकालते हुए भीमसेन आपके पुत्रोंका अन्त कर रहे हैं ॥ ४६-४७ ॥

विलपंश्च बहु क्षत्ता शमं नालभत त्वयि ।

सपुत्रो भरतश्रेष्ठ तस्य भुङ्क्ष्व फलोदयम् ॥ ४८ ॥

भरतश्रेष्ठ! विदुरजीने आपके समीप बहुत विलाप किया, परंतु उन्हें शान्तिकी भिक्षा नहीं प्राप्त हुई । आपके उसी अन्यायका यह फल प्रकट हुआ है। अब आप पुत्रोंसहित इसे भोगिये ॥ ४८ ॥

त्वया वृद्धेन धीरेण कार्यतत्त्वार्थदर्शिना ।

न कृतं सुहृदां वाक्यं दैवमत्र परायणम् ॥ ४ ९ ॥

आप वृद्ध हैं, धीर हैं, कार्यके तत्त्व और प्रयोजनको देखते और समझते हैं, तो भी

आपने हितैषी सुहृदोंकी बातें नहीं मानीं । इसमें दैव ही प्रधान कारण है ॥ ४ ९ ॥

तन्मा शुचो नरव्याघ्र तवैवापनयो महान् ।

विनाशहेतुः पुत्राणां भवानेव मतो मम ॥ ५० ॥

अतः नरश्रेष्ठ! आप शोक न कीजिये । इसमें आपका ही महान् अन्याय कारण है । मैं तो आपको ही आपके पुत्रोंके विनाशका मुख्य हेतु मानता हूँ ॥ ५० ॥

हतो विकर्णो राजेन्द्र चित्रसेनश्च वीर्यवान् ।

प्रवराश्चात्मजानां ते सुताश्चान्ये महारथाः ॥ ५१ ॥

राजेन्द्र! विकर्ण मारा गया । पराक्रमी चित्रसेनको भी प्राणोंका त्याग करना पड़ा ।

आपके पुत्रोंमें जो प्रमुख थे, वे तथा अन्य महारथी भी कालके गालमें चले गये ॥

यानन्यान् ददृशे भीमश्चक्षुर्विषयमागतान् ।

पुत्रांस्तव महाराज त्वरया तान् जघान ह ॥ ५२ ॥

महाराज! भीमसेनने अपने नेत्रोंके सामने आये हुए जिन-जिन पुत्रोंको देखा, उन सबको तुरंत ही मार डाला ॥ ५२ ॥

त्वत्कृते ह्यहमद्राक्षं दह्यमानां वरूथिनीम् ।

सहस्रशः शरैर्मुक्तैः पाण्डवेन वृषेण च ॥ ५३ ॥

आपके ही कारण मैंने भीमसेन और कर्णके छोड़े हुए हजारों बाणोंसे राजाओंकी विशाल सेना दग्ध होती देखी है ॥ ५३ ॥

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमयुद्धे सप्तत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३७ ॥

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इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीमसेनयुद्धविषयक एक सौ सैंतीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १३७ ॥

* किसी - किसी प्रतिमें शत्रुंजय और शत्रुसह – इन दो नामोंके स्थानमें क्रमशः ' दृढसन्ध और ' जरासन्ध' नाम मिलते |

पृष्ठ 957

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अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः भीमसेन और कर्णका भयंकर युद्ध धृतराष्ट्रउवाच

महानपनयः सूत ममैवात्र विशेषतः ।

स इदानीमनुप्राप्तो मन्ये संजय शोचतः ॥ १ ॥

धृतराष्ट्र बोले- सूत संजय! इसमें विशेषतः मेरा ही अन्याय है - यह मैं स्वीकार करता हूँ । इस समय शोकमें डूबे हुए मुझको मेरे उसी अन्यायका फल प्राप्त हुआ है ॥ १ ॥

यद् गतं तद् गतमिति ममासीन्मनसि स्थितम् ।

इदानीमत्र किं कार्यं प्रकरिष्यामि संजय ॥ २ ॥

संजय! अबतक मेरे मनमें यह बात थी कि जो बीत गया, सो बीत गया । उसके लिये चिन्ता करना व्यर्थ है । परंतु अब यहाँ इस समय मेरा क्या कर्तव्य है, उसे बताओ । मैं उसका पालन अवश्य करूँगा ॥ २ ॥

यथा ह्येष क्षयो वृत्तो ममापनयसम्भवः ।

वीराणां तन्ममाचक्ष्व स्थिरीभूतोऽस्मि संजय ॥ ३ ॥

सूत! मेरे अन्यायसे वीरोंका जो यह विनाश हुआ है, वह सब कह सुनाओ । मैं धैर्य धारण करके बैठा हूँ ॥ ३ ॥

संजय उवाच

कर्णभीमौ महाराज पराक्रान्तौ महाबलौ ।

बाणवर्षाण्यसृजतां वृष्टिमन्ताविवाम्बुदौ ॥ ४ ॥

संजयने कहा — महाराज! जलकी वर्षा करनेवाले दो बादलोंके समान महाबली, महापराक्रमी कर्ण और भीमसेन परस्पर बाणोंकी वर्षा करने लगे ॥ ४ ॥

भीमनामाङ्किता बाणाः स्वर्णपुङ्खाः शिलाशिताः ।

विविशुः कर्णमासाद्य च्छिन्दन्त इव जीवितम् ॥ ५ ॥

जिनपर भीमसेनके नाम खुदे हुए थे, वे शिलापर तेज किये हुए स्वर्णमय पंखयुक्त बाण कर्णके पास पहुँचकर उसके जीवनका उच्छेद करते हुए - से उसके शरीरमें घुस गये ॥ ५ ॥

तथैव कर्णनिर्मुक्ताः शरा बर्हिणवाससः ।

छादयाञ्चक्रिरे वीरं शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ६ ॥

इसी प्रकार कर्णके छोड़े हुए मयूरपंखवाले सैकड़ों और हजारों बाणोंने वीर भीमसेनको आच्छादित कर दिया ॥ ६ ॥

पृष्ठ 958

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तयोः शरैर्महाराज सम्पतद्भिः समन्ततः ।

बभूव तत्र सैन्यानां संक्षोभः सागरोत्तरः ॥ ७ ॥

महाराज! चारों ओर गिरते हुए उन दोनोंके बाणोंसे वहाँकी सेनाओंमें समुद्रसे भी बढ़कर महान् क्षोभ होने लगा ॥ ७ ॥

भीमचापच्युतैर्बाणैस्तव सैन्यमरिंदम ।

अवध्यत चमूमध्ये घोरैराशीविषोपमैः ॥ ८ ।

शत्रुदमन! भीमसेनके धनुषसे छूटे हुए विषधर सर्पोंके समान भयंकर बाणोंद्वारा सेनाके मध्यभागमें आपके सैनिकोंका वध हो रहा था ॥ ८ ॥

वारणैः पतितै राजन् वाजिभिश्च नरैः सह ।

अदृश्यत मही कीर्णा वातभग्नैरिव द्रुमैः ॥ ९ ॥

राजन्! वहाँ गिरे हुए हाथियों, घोड़ों और पैदल मनुष्योंद्वारा ढकी हुई वह रणभूमि आँधीके उखाड़े हुए वृक्षोंसे आच्छादित- सी दिखायी देती थी ॥ ९ ॥

ते वध्यमानाः समरे भीमचापच्युतैः शरैः ।

प्राद्रवंस्तावका योधाः किमेतदिति चाब्रुवन् ॥ १० ॥

भीमसेनके धनुषसे छूटे हुए बाणोंद्वारा समरांगणमें मारे जाते हुए आपके सैनिक भाग चले और आपसमें कहने लगे, अरे! यह क्या हुआ ॥ १० ॥

ततो व्युदस्तं तत् सैन्यं सिन्धुसौवीरकौरवम् ।

प्रोत्सारितं महावेगैः कर्णपाण्डवयोः शरैः ॥ ११ ॥

इस प्रकार कर्ण और भीमसेनके महान् वेगशाली बाणोंद्वारा सिन्धु, सौवीर और कौरवदलकी वह सेना उखड़ गयी और वहाँसे भाग खड़ी हुई ॥ ११ ॥

शूरा हतभूयिष्ठा हताश्वरथवारणाः ।

उत्सृज्य भीमकर्णौ च सर्वतो व्यद्रवन् दिशः ॥ १२ ॥

वे शूरवीर सैनिक जिनमें बहुत -से लोग मारे गये थे तथा जिनके हाथी, घोड़े और रथ नष्ट हो चुके थे, भीमसेन और कर्णको छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भाग गये ॥ १२ ॥

नूनं पार्थार्थमेवास्मान् मोहयन्ति दिवौकसः ।

यत् कर्णभीमप्रभवैर्वध्यते नो बलं शरैः ॥ १३ ॥

' अवश्य ही कुन्तीकुमारोंके हितके लिये ही देवता हमें मोहमें डाल रहे हैं; क्योंकि कर्ण और भीमसेनके बाणोंसे वे हमारी सेनाका वध कर रहे हैं ' ॥ १३ ॥

एवं ब्रुवाणा योधास्ते तावका भयपीडिताः ।

शरपातं समुत्सृज्य स्थिता युद्धदिदृक्षवः ॥ १४ ॥

ऐसा कहते हुए आपके योद्धा भयसे पीड़ित हो बाण मारनेका कार्य छोड़कर युद्धके दर्शक बनकर खड़े हो गये ॥ १४ ॥

ततः प्रावर्तत नदी घोररूपा रणाजिरे ।

पृष्ठ 959

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शूराणां हर्षजननी भीरूणां भयवर्धिनी ॥ १५ ॥

तदनन्तर रणभूमिमें रक्तकी भयंकर नदी बह चली, जो शूरवीरोंको हर्ष देनेवाली और भीरु पुरुषोंका भय बढ़ानेवाली थी ॥ १५ ॥

वारणाश्वमनुष्याणां रुधिरौघसमुद्भवा ।

संवृता गतसत्त्वैश्च मनुष्यगजवाजिभिः ॥ १६ ॥

हाथी, घोड़े और मनुष्योंके रुधिरसमूहसे उस नदीका प्राकट्य हुआ था । वह प्राणशून्य मनुष्यों, हाथियों और घोड़ोंसे घिरी हुई थी ॥ १६ ॥

सानुकर्षपताकैश्च द्विपाश्वरथभूषणैः ।

स्यन्दनैरपविद्धैश्च भग्नचक्राक्षकूबरैः ॥ १७ ॥

जातरूपपरिष्कारैर्धनुर्भिः सुमहास्वनैः ।

सुवर्णपुङ्खैरिषुभिर्नाराचैश्च सहस्रशः ॥ १८ ॥

कर्णपाण्डवनिर्मुक्तैर्निर्मुक्तैरिव पन्नगैः ।

प्रासतोमरसंघातैः खड्गैश्च सपरश्वधैः ॥ १ ९ ॥

सुवर्णविकृतैश्चापि गदामुसलपट्टिशैः ।

ध्वजैश्च विविधाकारैः शक्तिभिः परिघैरपि ॥ २० ॥

शतघ्नीभिश्च चित्राभिर्बभौ भारत मेदिनी । भारत! उस समय अनुकर्ष, पताका, हाथी, घोड़े, रथ, आभूषण, टूटकर बिखरे हुए स्यन्दन (रथ ), टूक- टूक हुए पहिये, धुरी और कूबर, सुवर्णभूषित एवं महान् टंकार शब्द करनेवाले धनुष, सोनेके पंखवाले बाण, केंचुल छोड़कर निकले हुए सर्पोंके समान कर्ण और भीमसेनके छोड़े हुए सहस्रों नाराच, प्रास, तोमर, खड्ग, फरसे, सोनेकी गदा, मुसल, पट्टिश, भाँति - भाँतिके ध्वज, शक्ति, परिघ और विचित्र शतघ्नी आदिसे उस रणभूमिकी अद्भुत शोभा हो रही थी ॥ १७–२०३ ॥ कनकाङ्गदहारैश्च कुण्डलैर्मुकुटैस्तथा ॥ २१ ॥

वलयैरपविद्धैश्च तत्रैवाङ्गुलिवेष्टकैः ।

चूडामणिभिरुष्णीषैः स्वर्णसूत्रैश्च मारिष ॥ २२ ॥

तनुत्रैः सतलत्रैश्च हारैर्निष्कैश्च भारत ।

वस्त्रैश्छत्रैश्च विध्वस्तैश्चामरव्यजनैरपि ॥ २३ ॥

गजाश्वमनुजैर्भिन्नः शोणिताक्तैश्च पत्रिभिः ।

तैस्तैश्च विविधैर्भिन्नैस्तत्र तत्र वसुंधरा ॥ २४ ॥

पतितैरपविद्धैश्च विबभौ द्यौरिव ग्रहैः ।

पृष्ठ 960

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माननीय भरतनन्दन! इधर-उधर पड़े हुए सोनेके अंगद, हार, कुण्डल, मुकुट, वलय, अंगूठी, चूड़ामणि, उष्णीष, सुवर्णमय सूत्र, कवच, दस्ताने, हार, निष्क, वस्त्र, छत्र, टूटे हुए चँवर, व्यजन, विदीर्ण हुए हाथी, घोड़े, मनुष्य, खूनसे लथपथ हुए पंखयुक्त बाण आदि नाना प्रकारकी छिन्न- भिन्न, पतित और फेंकी हुई वस्तुओंसे वहाँकी भूमि ग्रहोंसे आकाशकी भाँति सुशोभित हो रही थी ॥ २१–२४३ ॥ अचिन्त्यमद्भुतं चैव तयोः कर्मातिमानुषम् ॥ २५ ॥

दृष्ट्वा चारणसिद्धानां विस्मयः समजायत । उन दोनोंके उस अचिन्त्य, अलौकिक और अद्भुत कर्मको देखकर चारणों और सिद्धोंके मनमें भी महान् विस्मय हो गया ॥ २५३ ॥

अग्नेर्वायुसहायस्य गतिः कक्ष इवाहवे ॥ २६ ॥

आसीद् भीमसहायस्य रौद्रमाधिरथेर्गतम् । जैसे वायुकी सहायता पाकर सूखे वनमें तथा घास -फूँसमें अग्निकी गति बढ़ जाती है, उसी प्रकार उस महायुद्धमें भीमसेनके साथ सूतपुत्र कर्णकी भयंकर गति बढ़ गयी थी ॥ २६३ ॥

निपातितध्वजरथं हतवाजिनरद्विपम् ॥ २७ ॥

गजाभ्यां सम्प्रयुक्ताभ्यामासीन्नलवनं यथा ।

मेघजालनिभं सैन्यमासीत् तव नराधिप ॥ २८ ॥

विमर्दः कर्णभीमाभ्यामासीच्च परमो रणे । नरेश्वर! जैसे दो हाथी किसीसे प्रेरित होकर नरकुलके वनको रौंद डालते हैं, उसी प्रकार मेघोंकी घटाके समान आपकी सेना बड़ी दुरवस्थामें पड़ गयी थी । उसके रथ और ध्वज गिराये जा चुके थे । हाथी, घोड़े और मनुष्य मारे गये थे । कर्ण और भीमसेनने उस युद्धस्थलमें महान् संहार मचा रखा था ॥ २७-२८३ ॥ इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि जयद्रथवधपर्वणि भीमकर्णयुद्धे अष्टात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३८ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत जयद्रथवधपर्वमें भीम और कर्णका युद्धविषयक एक सौ अड़तीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १३८ ॥