श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 1981–1990

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1981–1990

पृष्ठ 1981

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भीष्मजीने कहा- भारत! जो धानकी खुद्दी और तिलकी खली खाता तथा घी-तेलका परित्याग कर देता है, उसी योगीको योगबलकी प्राप्ति होती है ॥ ४३ ॥

भुञ्जानो यावकं रूक्षं दीर्घकालमरिंदम ।

एकाहारो विशुद्धात्मा योगी बलमवाप्नुयात् ॥ ४४ ॥

शत्रुदमन नरेश! जो दीर्घकालतक एक समय जौका रूखा दलिया खाता है, वह योगी शुद्धचित होकर योगबलकी प्राप्ति कर सकता है ॥ ४४ ॥

पक्षान् मासानृतूंश्चैतान् संवत्सरानहस्तथा ।

अपः पीत्वा पयोमिश्रा योगी बलमवाप्नुयात् ॥ ४५ ॥

जो योगी दुग्धमिश्रित जलको दिनमें एक बार पीता है; फिर पंद्रह दिनोंमें एक बार पीता है । तत्पश्चात् एक महीनेमें, एक ऋतुमें और एक वर्षमें एक बार उसे ग्रहण करता है, उसको योगशक्ति प्राप्त होती है ॥ ४५ ॥

अखण्डमपि वा मांसं सततं मनुजेश्वर ।

उपोष्य सम्यक् शुद्धात्मा योगी बलमवाप्नुयात् ॥ ४६ ॥

नरेश्वर! जो लगातार जीवनभरके लिये मांस नहीं खाता है और विधिपूर्वक उत्तम व्रतका पालन करके अपने अन्तःकरणको शुद्ध बना लेता है, वह योगी भी योगशक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ ४६ ॥

कामं जित्वा तथा क्रोधं शीतोष्णे वर्षमेव च ।

भयं शोकं तथा श्वासं पौरुषान् विषयांस्तथा ॥ ४७ ॥

अरतिं दुर्जयां चैव घोरां तृष्णां च पार्थिव ।

स्पर्शं निद्रां तथा तन्द्रीं दुर्जयां नृपसत्तम ॥ ४८ ॥

दीपयन्ति महात्मानः सूक्ष्ममात्मानमात्मना ।

वीतरागा महाप्राज्ञा ध्यानाध्ययनसम्पदा ॥ ४ ९ ॥

पृथ्वीनाथ! नृपश्रेष्ठ! काम, क्रोध, सर्दी, गर्मी, वर्षा, भय, शोक, श्वास, मनुष्योंको प्रिय लगनेवाले विषय, दुर्जय असंतोष, घोर तृष्णा, स्पर्श, निद्रा तथा दुर्जय आलस्यको जीतकर वीतराग, महान् एवं उत्तम बुद्धिसे युक्त महात्मा योगी स्वाध्याय तथा ध्यानका सम्पादन करके बुद्धिके द्वारा सूक्ष्म आत्माका साक्षात्कार कर लेते हैं ॥

दुर्गस्त्वेष मतः पन्था ब्राह्मणानां विपश्चिताम् ।

यः कश्चिद् व्रजति ह्यस्मिन् क्षेमेण भरतर्षभ ॥ ५० ॥

भरतश्रेष्ठ! विद्वान् ब्राह्मणोंने योगके इस मार्गको दुर्गम माना है । कोई बिरला ही इस मार्गको कुशलपूर्वक तै कर सकता है ॥ ५० ॥

यथा कश्चिद् वनं घोरं बहुसर्पसरीसृपम् ।

श्वभ्रवत् तोयहीनं च दुर्गमें बहुकण्टकम् ॥ ५१ ॥

अभक्तमटवीप्रायं दावदग्धमहीरुहम् ।

पृष्ठ 1982

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पन्थानं तस्कराकीर्णं क्षेमेणाभिपतेद् युवा ॥ ५२ ॥

योगमार्गं तथाऽऽसाद्य यः कश्चिद् व्रजते द्विजः ।

क्षेमेणोपरमेन्मार्गाद् बहुदोषो हि स स्मृतः ॥ ५३ ॥

जैसे कोई-कोई बिरला नवयुवक ही अनेकानेक सर्पों तथा विच्छू आदिसे भरे हुए गड्ढ़ों और बहुत - से काँटोंवाले, जलशून्य, दुर्गम एवं घोर वनमें सकुशल यात्रा कर सकता है तथा जहाँ भोजन मिलना असम्भव है, जिसमें प्रायः जंगल- ही - जंगल पड़ता है, जहाँके वृक्ष दावानलसे जलकर भस्म हो गये हैं तथा जो चोर डाकुओंसे भरा हुआ है, ऐसे मार्गको सकुशल तै कर सकता है; उसी प्रकार योगमार्गका आश्रय लेकर कोई बिरला ही द्विज उसपर कुशलपूर्वक चल पाता है, क्योंकि वह बहुत- से दोषों ( कठिनाइयों) -से भरा हुआ बताया गया है ॥ ५१–५३ ॥

सुस्थेयं क्षुरधारासु निशितासु महीपते ।

धारणासु तु योगस्य दुःस्थेयमकृतात्मभिः ॥ ५४ ॥

पृथ्वीपते! छुरेकी तीखी धारपर कोई सुखपूर्वक खड़ा रह सकता है; किंतु जिनका चित्त शुद्ध नहीं है, ऐसे मनुष्योंका योगकी धारणाओंमें स्थिर रहना नितान्त कठिन है ॥ ५४ ॥

विपन्ना धारणास्तात नयन्ति न शुभां गतिम् ।

नेतृहीना यथा नावः पुरुषानर्णवे नृप ॥ ५५ ॥

तात! नरेश्वर! जैसे समुद्रमें बिना नाविककी नाव मनुष्योंको पार नहीं लगा सकती, उसी प्रकार यदि योगकी धारणाएँ सिद्ध न हुईं तो वे शुभगतिकी प्राप्ति नहीं करा सकतीं ॥ ५५ ॥

यस्तु तिष्ठति कौन्तेय धारणासु यथाविधि ।

मरणं जन्म दुःखं च सुखं च स विमुञ्चति ॥ ५६ ॥

कुन्तीनन्दन! जो विधिपूर्वक योगकी धारणाओंमें स्थिर रहता है, वह जन्म, मृत्यु, दुःख और सुखके बन्धनोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ५६ ॥

नानाशास्त्रेषु निष्पन्नं योगेष्विदमुदाहृतम् ।

परं योगस्य यत् कृत्यं निश्चितं तद् द्विजातिषु ॥ ५७ ॥

यह मैंने तुम्हें योगविषयक नाना शास्त्रोंका सिद्धान्त बतलाया है । योग- साधनाका जो-जो कृत्य है, वह द्विजातियोंके लिये ही निश्चित किया गया है अर्थात् उन्हींका उसमें अधिकार है ॥ ५७ ॥

परं हि तद् ब्रह्म महन्महात्मन् ब्रह्माणमीशं वरदं च विष्णुम् । भवं च धर्मं च षडाननं च यद् ब्रह्मपुत्रांश्च महानुभावान् ॥ ५८ ॥

पृष्ठ 1983

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तमश्च कष्टं सुमहद् रजश्च सत्त्वं विशुद्धं प्रकृतिं परां च । सिद्धिं च देवीं वरुणस्य पत्नीं तेजश्च कृत्स्नं सुमहच्च धैर्यम् ॥ ५ ९ ॥ ताराधिपं खे विमलं सतारं विश्वांश्व देवानुरगान् पितॄंश्च । शैलांश्च कृत्स्नानुदधींश्च घोरान् नदीश्च सर्वाः सवनान् घनांश्च ॥ ६० ॥

नागान् नगान् यक्षगणान् दिशश्च गन्धर्वसंघान् पुरुषान् स्त्रियश्च । परस्परं प्राप्य महान्महात्मा विशेत योगी न चिराद् विमुक्तः ॥ ६१ ॥

महात्मन्! योगसिद्ध महात्मा पुरुष यदि चाहे तो तुरंत ही मुक्त होकर महान् परब्रह्मके स्वरूपको प्राप्त कर लेता है अथवा वह अपने योगबलसे भगवान् ब्रह्मा, वरदायक विष्णु, महादेवजी, धर्म, छः मुखोंवाले कार्त्तिकेय, ब्रह्माजीके महानुभाव पुत्र सनकादि, कष्ट -दायक तमोगुण, महान् रजोगुण, विशुद्ध सत्त्वगुण, मूल प्रकृति, वरुणपत्नी सिद्धिदेवी, सम्पूर्ण तेज, महान् धैर्य, ताराओंसहित आकाशमें प्रकाशित होनेवाले निर्मल तारापति चन्द्रमा, विश्वेदेव, नाग, पितर, सम्पूर्ण पर्वत, भयंकर समुद्र, सम्पूर्ण नदी- समुदाय, वन, मेघ, नाग, वृक्ष, यक्ष, दिशा, गन्धर्वगण, समस्त पुरुष और स्त्री– इनमेंसे प्रत्येकके पास पहुँचकर उसके भीतर प्रवेश कर सकता है ॥ ५८–६१ ॥ कथा च येयं नृपते प्रसक्ता देवे महावीर्यमतौ शुभेयम् । योगी स सर्वानभिभूय मर्त्यान् नारायणात्मा कुरुते महात्मा ॥ ६२ ॥

नरेश्वर! महान् बल और बुद्धिसे सम्पन्न परमात्मासे सम्बन्ध रखनेवाली यह कल्याणमयी वार्ता मैंने प्रसंगवश तुम्हें सुनायी है । योगसिद्ध महात्मा पुरुष सब मनुष्योंसे ऊपर उठकर नारायणस्वरूप हो जाता है और संकल्पमात्रसे सृष्टि करने लगता है ॥ ६२ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि योगविधौ त्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०० || इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें योगविधिविषयक तीन सौवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०० ॥

पृष्ठ 1984

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एकाधिकत्रिशततमोऽध्यायः सांख्ययोगके अनुसार साधन और उसके फलका वर्णन युधिष्ठिरउवाच

सम्यक् त्वयाऽयं नृपते वर्णितः शिष्टसम्मतः ।

योगमार्गे यथान्यायं शिष्यायेह हितैषिणा ॥ १ ॥

युधिष्ठिरने कहा – महाराज! आप मेरे हितैषी हैं, आपने मुझ शिष्यके प्रति शिष्ट पुरुषोंके मतके अनुसार इस योगमार्गका यथोचितरूपसे वर्णन किया ॥ १ ॥

सांख्ये त्विदानीं कात्र्त्स्न्येन विधिं प्रब्रूहि पृच्छते ।

त्रिषु लोकेषु यज्ज्ञानं सर्वं तद् विदितं हि ते ॥ २ ॥

अब मैं सांख्यविषयक सम्पूर्ण विधि पूछ रहा हूँ । आप मुझे उसे बतानेकी कृपा करें; क्योंकि तीनों लोकोंमें जो ज्ञान है, वह सब आपको विदित है ॥ २ ॥

भीष्म उवाच

शृणु मे त्वमिदं सूक्ष्मं सांख्यानां विदितात्मनाम् ।

विहितं यतिभिः सर्वैः कपिलादिभिरीश्वरैः ॥ ३ ॥

भीष्मजीने कहा – युधिष्ठिर! आत्मतत्त्वके जाननेवाले सांख्यशास्त्रके विद्वानोंका यह सूक्ष्म ज्ञान तुम मुझसे सुनो । इसे ईश्वरकोटिके कपिल आदि सम्पूर्ण यतियोंने प्रकाशित किया है ॥ ३ ॥

यस्मिन् न विभ्रमाः केचिद् दृश्यन्ते मनुजर्षभ ।

गुणाश्च यस्मिन् बहवो दोषहानिश्च केवला ॥ ४ ॥

नरश्रेष्ठ! इस मतमें किसी प्रकारकी भूल नहीं दिखायी देती । इसमें गुण तो बहुत - से हैं; किंतु दोषोंका सर्वथा अभाव है ॥ ४ ॥

ज्ञानेन परिसंख्याय सदोषान् विषयान् नृप ।

मानुषान् दुर्जयान् कृत्स्नान् पैशाचान् विषयांस्तथा ॥ ५ ॥

राक्षसान् विषयान् ज्ञात्वा यक्षाणां विषयांस्तथा ।

विषयानौरगान् ज्ञात्वा गान्धर्वविषयांस्तथा ॥ ६ ॥

पितॄणां विषयान् ज्ञात्वा तिर्यक्षु चरतां नृप ।

सुपर्णविषयान् ज्ञात्वा मरुतां विषयांस्तथा ॥ ७ ॥

राजर्षिविषयान् ज्ञात्वा ब्रह्मर्षिविषयांस्तथा ।

आसुरान् विषयान् ज्ञात्वा वैश्वदेवांस्तथैव च ॥ ८ ॥

देवर्षिविषयान् ज्ञात्वा योगानामपि चेश्वरान् ।

पृष्ठ 1985

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प्रजापतीनां विषयान् ब्रह्मणो विषयांस्तथा ॥ ९ ॥

आयुषश्च परं कालं लोके विज्ञाय तत्त्वतः ।

सुखस्य च परं तत्त्वं विज्ञाय वदतां वर ॥ १० ॥

प्राप्ते काले च यद् दुःखं सततं विषयैषिणाम् ।

तिर्यक्षु पततां दुःखं पततां नरके च यत् ॥ ११ ॥

स्वर्गस्य च गुणान् कृत्स्नान् दोषान् सर्वांश्च भारत ।

वेदवादेऽपि ये दोषा गुणा ये चापि वैदिकाः ॥ १२ ॥

ज्ञानयोगे च ये दोषा गुणा योगे च ये नृप ।

सांख्यज्ञाने च ये दोषास्तथैव च गुणा नृप ॥ १३ ॥

सत्त्वं दशगुणं ज्ञात्वा रजो नवगुणं तथा ।

तमश्चाष्टगुणं ज्ञात्वा बुद्धिं सप्तगुणां तथा ॥ १४ ॥

षड्गुणं च मनो ज्ञात्वा नभः पञ्चगुणं तथा ।

बुद्धिं चतुर्गुणां ज्ञात्वा तमश्च त्रिगुणं तथा ॥ १५ ॥

द्विगुणं च रजो ज्ञात्वा सत्त्वमेकगुणं पुनः ।

मार्गं विज्ञाय तत्त्वेन प्रलये प्रेक्षणे तथा ॥ १६ ॥

ज्ञानविज्ञानसम्पन्नाः कारणैर्भाविताः शुभाः ।

प्राप्नुवन्ति शुभं मोक्षं सूक्ष्मा इव नभः परम् ॥ १७ ॥

वक्ताओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! जो ज्ञानके द्वारा मनुष्य, पिशाच, राक्षस, यक्ष, सर्प, गन्धर्व, पितर, तिर्यग्योनि, गरुड़, मरुद्ण, राजर्षि, ब्रह्मर्षि, असुर, विश्वेदेव, देवर्षि, योगी, प्रजापति तथा ब्रह्माजीके भी सम्पूर्ण दुर्जय विषयोंको सदोष जानकर, संसारके मनुष्योंका परमायुकाल तथा सुखके परमतत्त्वका ठीक- ठीक ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं और विषयोंकी इच्छा रखनेवाले पुरुषोंको समय - समयपर जो दुःख प्राप्त होता है, उसको, तिर्यग्योनि और नरकमें पड़नेवाले जीवोंके दुःखको, स्वर्ग तथा वेदकी फल- श्रुतियोंके सम्पूर्ण गुण -दोषोंको जानकर ज्ञानयोग, सांख्यज्ञान और योगमार्गके गुण- दोषोंको भी समझ लेते हैं तथा भरतनन्दन! सत्त्वगुणके दस, रजोगुणके नौर, तमोगुणके आठ, बुद्धिके सात, मनके छः? और आकाशके पाँच गुणोंका ज्ञान प्राप्त करके बुद्धिके दूसरे चार, तमोगुणके दूसरे तीनI, रजोगुणके दूसरे दो और सत्त्वगुणके पुनः एक गुणको जानकर आत्माकी प्राप्ति करानेवाले मार्ग— प्राकृत प्रलय तथा आत्मविचारको ठीक-ठीक जान लेते हैं, वे ज्ञान-विज्ञानसे सम्पन्न तथा मोक्षोपयोगी साधनोंके अनुष्ठानसे शुद्धचित्त हुए कल्याणमय सांख्ययोगी परम आकाशको प्राप्त होनेवाले सूक्ष्म भूतोंके समान मंगलमय मोक्षको प्राप्त कर लेते हैं ॥ ५-१७ ॥ रूपेण दृष्टिं संयुक्तां घ्राणं गन्धगुणेन च ।

पृष्ठ 1986

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1986 का मूल पृष्ठ
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शब्दे सक्तं तथा श्रीत्रं जिह्वा रसगुणेषु च ॥ १८ ॥

नेत्र रूप- गुणसे संयुक्त हैं । घ्राणेन्द्रिय ग्रन्ध नामक गुणसे सम्बन्ध रखती है । श्रोत्रेन्द्रिय शब्दमें आसक्त है और रसना रसगुणमें ॥ १८ ॥

तनुं स्पर्शे तथा सक्तां वायुं नभसि चाश्रितम् ।

मोहं तमसि संयुक्तं लोभमर्थेषु संश्रितम् ॥ १ ९ ॥

त्वचा स्पर्शनामक गुणमें आसक्त है । इसी प्रकार वायुका आश्रय आकाश, मोहका आश्रय तमोगुण और लोभका आश्रय इन्द्रियोंके विषय हैं ॥ १ ९ ॥

विष्णुं क्रान्ते बले शक्रं कोष्ठे सक्तं तथानलम् ।

अप्सु देवीं समासक्तामपस्तेजसि संश्रिताः ॥ २० ॥

तेजो वायौ तु संसक्तं वायुं नभसि चाश्रितम् ।

नभो महति संयुक्तं महद् बुद्धौ च संश्रितम् ॥ २१ ॥

गतिका आधार विष्णु, बलका इन्द्र, उदरका अग्नि तथा पृथ्वीदेवीका आधार जल है । झलका तेज, तेजका वायु, वायुका आकाश, आकाशका आश्रय महत्तत्त्व अर्थात् महत्तत्त्वका कार्य अहंकार है और अहंकारका अधिष्ठान समष्टि बुद्धि है ॥ २०-२१ ॥

बुद्धिं तमसि संसक्तां तमो रजसि संश्रितम् ।

रजः सत्त्वे तथा सक्तं सत्त्वं सक्तं तथाऽऽत्मनि ॥ २२ ॥

सक्तमात्मानमीशे च देवे नारायणो तथा ।

देवं मोक्षे च संसक्तं मोक्षं सक्तं तु न क्वचित् ॥ २३ ॥

बुद्धिका आश्रय तमोगुण, तमोगुणका आश्रय रजोगुण और रजोगुणका आश्रय सत्त्वगुण है । सत्त्वगुण जीवात्माके आश्रित है । जीवात्माको भगवान् नारायण - देवके आश्रित समझो । भगवान् नारायणका आश्रय है मोक्ष ( परब्रह्म), परंतु मोक्षका कोई भी आश्रय नहीं है ( वह अपनी ही महिमामें प्रतिष्ठित है ) ॥ २२-२३ ॥

ज्ञात्वा सत्त्वगुणं देहं वृतं षोडशभिर्गुणैः ।

स्वभावं चेतनां चैव ज्ञात्वा देहसमाश्रिते ॥ २४ ॥

मध्यस्थमेकमात्मानं पापं यस्मिन् न विद्यते ।

द्वितीयं कर्म विज्ञाय नृपते विषयैषिणाम् ॥ २५ ॥

इन बातोंको भलीभाँति जानकर तथा सत्त्वगुणको, मनसहित ग्यारह इन्द्रिय, पाँच प्राण- इन सोलह गुणोंसे घिरे हुए सूक्ष्म शरीरको, शरीरके आश्रित रहनेवाले स्वभाव और चेतनाको जाने । नरेश्वर! जिसमें पापका लेश भी नहीं है, वह एकमात्र जीवात्मा शरीरके भीतर हृदयरूपी गुफामें उदासीन भावसे विद्यमान है, इस बातको जाने । विषयकी अभिलाषा रखनेवाले मनुष्योंका जो कर्म है, वह शरीरके भीतर आत्माके अतिरिक्त दूसरा तत्त्व है । यह भी अच्छी तरह जान ले ॥ २५ ॥

इन्द्रियाणीन्द्रियार्थांश्च सर्वानात्मनि संश्रितान् ।

पृष्ठ 1987

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1987 का मूल पृष्ठ
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दुर्लभत्वं च मोक्षस्य विज्ञाय श्रुतिपूर्वकम् ॥ २६ ॥

इन्द्रिय और इन्द्रियोंके विषय – ये सब - के - सब शरीरके भीतर स्थित हैं । मोक्ष परम दुर्लभ वस्तु है । इन सब बातोंको वेदोंके स्वाध्यायपूर्वक भलीभाँति समझ ले ॥

प्राणापानौ समानं च व्यानोदानौ च तत्त्वतः ।

अधश्चैवानिलं ज्ञात्वा प्रवहं चानिलं पुनः ॥ २७ ॥

सप्त वातांस्तथा ज्ञात्वा सप्तधा विहितान् पुनः ।

प्रजापतीनृषींश्चैव मार्गांश्चैव बहून् वरान् ॥ २८ ॥

प्राण, अपान, समान, व्यान और उदान- से पाँच प्राणवायु हैं। अधोगामी वायु छठा और ऊर्ध्वगामी प्रवह नामक वायु सातवाँ है । ये वायुके जो सात भेद हैं, इनमेंसे प्रत्येकके सात- सात भेद और हो जाते हैं । इस प्रकार कुल उन्चास वायु होते हैं । अनेक प्रजापति, अनेक ऋषि तथा मुक्तिके अनेकानेक उत्तम मार्ग हैं । इन सबकी जानकारी प्राप्त करनी चाहिये ॥ २७-२८ ॥

सप्तर्षीश्च बहून् ज्ञात्वा राजर्षीश्च परंतप ।

सुरर्षीन् महतश्चान्यान् ब्रह्मर्षीन् सूर्यसंनिभान् ॥ २ ९ ॥

परंतप! सप्तर्षियों, बहुसंख्यक राजर्षियों, देवर्षियों, अन्यान्य महापुरुषों तथा सूर्यके समान तेजस्वी ब्रह्मर्षियोंका भी ज्ञान प्राप्त करे ॥ २ ९ ॥

ऐश्वर्याच्च्यावितान् दृष्ट्वा कालेन महता नृप ।

महतां भूतसंघानां श्रुत्वा नाशं च पार्थिव ॥ ३० ॥

गतिं चाप्यशुभां ज्ञात्वा नृपते पापकर्मिणाम् ।

वैतरण्यां च यद् दुःखं पतितानां यमक्षये ॥ ३१ ॥

पृथ्वीनाथ! महान् कालकी प्रेरणासे मनुष्य ऐश्वर्यसे भ्रष्ट कर दिये जाते हैं । बड़े - बड़े जो भूत - समुदाय हैं, उनका भी कालके द्वारा नाश हो जाता है । यह सब देख - सुनकर पापकर्मी मनुष्योंको जो अशुभ गति प्राप्त होती है तथा यमलोकमें जाकर वैतरणी नदीमें गिरे हुए प्राणियोंको जो दुःख होता है, उसको भी जाने ॥ ३१ ॥

योनीषु च विचित्रासु संसारानशुभांस्तथा ।

जठरे चाशुभे वासं शोणितोदकभाजने ॥ ३२ ॥

श्लेष्ममूत्रपुरीषे च तीव्रगन्धसमन्विते ।

शुक्रशोणितसंघाते मज्जास्नायुपरिग्रहे ॥ ३३ ॥

शिराशतसमाकीर्णे नवद्वारे पुरेऽशुचौ ।

विज्ञाय हितमात्मानं योगांश्च विविधान् नृप ॥ ३४ ॥

प्राणियोंको विचित्र- विचित्र योनियोंमें अशुभ जन्म धारण करने पड़ते हैं । रक्त और मूत्रके पात्ररूप अपवित्र गर्भाशयमें निवास करना पड़ता है, जहाँ कफ, मूत्र और मल भरा होता है तथा तीव्र दुर्गन्ध व्याप्त रहती है, जो रज और वीर्यका समुदायमात्र है, मज्जा एवं

पृष्ठ 1988

महाभारत — खण्ड ५, पृष्ठ 1988 का मूल पृष्ठ
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स्नायुका संग्रह है, सैकड़ों नस - नाड़ियोंमें व्याप्त है तथा जिसमें नौ द्वार हैं; उस अपवित्र पुर अर्थात् शरीरमें जीवको रहना पड़ता है । नरेश्वर! इन सब बातोंको जानकर अपने परम हितस्वरूप आत्माको और उसकी प्राप्तिके लिये शास्त्रोंद्वारा बताये हुए नाना प्रकारके योगों ( साधनों ) की जानकारी प्राप्त करनी चाहिये ॥ ३२–३४ ॥

तामसानां च जन्तूनां रमणीयावृतात्मनाम् ।

सात्त्विकानां च जन्तूनां कुत्सितं भरतर्षभ ॥ ३५ ॥

गर्हितं महतामर्थे सांख्यानां विदितात्मनाम् । भरतश्रेष्ठ! तामस, राजस और सात्त्विक– इन तीन प्रकारके प्राणियोंके जो तत्त्वज्ञानी महात्मा पुरुषोंद्वारा निन्दित मोक्षविरोधी व्यवहार हैं, उनको भी जानना चाहिये ॥ उपप्लवांस्तथा घोरान् शशिनस्तेजसस्तथा ॥ ३६ ॥

ताराणां पतनं दृष्ट्वा नक्षत्राणां च पर्ययम् ।

द्वन्द्वानां विप्रयोगं च विज्ञाय कृपणं नृप ॥ ३७ ॥

नरेश्वर! घोर उत्पात, चन्द्रग्रहण, सूर्यग्रहण, ताराओंका टूटकर गिरना, नक्षत्रोंकी गतिमें उलट - फेर होना तथा पति-पत्नियोंका दुःखदायक वियोग होना आदि बातें, जो इस जगत्में घटित होती हैं, उनको भी जानकर अपने कल्याणका उपाय करना चाहिये ॥ ३६-३७ ॥

अन्योन्यभक्षणं दृष्ट्वा भूतानामपि चाशुभम् ।

बाल्ये मोहं च विज्ञाय क्षयं देहस्य चाशुभम् ॥ ३८ ॥

रागे मोहे च सम्प्राप्ते क्वचित् सत्त्वं समाश्रितम् ।

सहस्रेषु नरः कश्चिन्मोक्षबुद्धिं समाश्रितः ॥ ३ ९ ॥

संसारके प्राणी एक- दूसरेको खा जाते हैं, यह कैसी अशुभ घटना है । इसपर दृष्टिपात करो । बाल्यावस्थामें मनपर मोह छाया रहता है और वृद्धावस्थामें शरीरका अमंगलकारी विनाश उपस्थित होता है । राग और मोह प्राप्त होनेपर अनेक दोष उत्पन्न होते हैं, इन सबको जानकर कहीं किसी- किसीको ही सत्त्वगुणसे युक्त देखा जाता है । सहस्रों मनुष्योंमेंसे कोई बिरला ही मोक्षविषयक बुद्धिका आश्रय लेता है ॥ ३८-३९ ॥

दुर्लभत्वं च मोक्षस्य विज्ञाय श्रुतिपूर्वकम् ।

बहुमानमलब्धेषु लब्धे मध्यस्थतां पुनः ॥ ४० ॥

वेद- वाक्योंके श्रवणद्वारा मुक्तिकी दुर्लभताको जानकर अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति न होनेपर भी उस परिस्थितिके प्रति अधिक आदर- बुद्धि रखे और मनोवांछित वस्तु प्राप्त हो जाय, तो भी उसकी ओरसे उदासीन ही रहे ॥ ४० ॥

विषयाणां च दौरात्म्यं विज्ञाय नृपते पुनः ।

गतासूनां च कौन्तेय देहान् दृष्ट्वा तथाशुभान् ॥ ४१ ॥

नरेश्वर! शब्द - स्पर्श आदि विषय दुःखरूप ही हैं, इस बातको जाने । कुन्तीनन्दन! जिनके प्राण चले जाते हैं, उन मनुष्योंके शरीरोंकी जो अशुभ एवं बीभत्स दशा होती है,

पृष्ठ 1989

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उसपर भी दृष्टिपात करे ॥ ४१ ॥

वासं कुलेषु जन्तूनां दुःखं विज्ञाय भारत ।

ब्रह्मघ्नानां गतिं ज्ञात्वा पतितानां सुदारुणाम् ॥ ४२ ॥

भरतनन्दन प्राणियोंका घरोंमें निवास करना भी दुःखरूप ही है, इस बातको अच्छी तरह समझे तथा ब्रह्मघाती और पतित मनुष्योंकी जो अत्यन्त भयंकर दुर्गति होती है, उसको भी जाने ॥ ४२ ॥

सुरापाने च सक्तानां ब्राह्मणानां दुरात्मनाम् ।

गुरुदारप्रसक्तानां गतिं विज्ञाय चाशुभाम् ॥ ४३ ॥

मदिरापानमें आसक्त दुरात्मा ब्राह्मणोंकी तथा गुरुपत्नीगामी मनुष्योंकी जो अशुभ गति होती है, उसका भी विचार करे ॥ ४३ ॥

जननीषु च वर्तन्ते ये न सम्यग् युधिष्ठिर ।

सदेवकेषु लोकेषु ये न वर्तन्ति मानवाः ॥ ४४ ॥

तेन ज्ञानेन विज्ञाय गतिं चाशुभकर्मणाम् ।

तिर्यग्योनिगतानां च विज्ञाय गतयः पृथक् ॥ ४५ ॥

युधिष्ठिर! जो मनुष्य माताओं, देवताओं तथा सम्पूर्ण लोकोंके प्रति उत्तम बर्ताव नहीं करते हैं, उनकी दुर्गतिका ज्ञान जिससे होता है, उसी ज्ञानसे पापाचारी पुरुषोंकी अधोगतिका ज्ञान प्राप्त करे तथा तिर्यग्योनिमें पड़े हुए प्राणियोंकी जो विभिन्न गतियाँ होती हैं, उनको भी जान ले ॥४४-४५ ॥

वेदवादांस्तथा चित्रानृतूनां पर्ययांस्तथा ।

क्षयं संवत्सराणां च मासानां च क्षयं तथा ॥ ४६ ॥

पक्षक्षयं तथा दृष्ट्वा दिवसानां च संक्षयम् ।

क्षयं वृद्धिं च चन्द्रस्य दृष्ट्वा प्रत्यक्षतस्तथा ॥ ४७ ॥

वृद्धिं दृष्ट्वा समुद्राणां क्षयं तेषां तथा पुनः ।

क्षयं धनानां दृष्ट्वा च पुनर्वृद्धिं तथैव च ॥ ४८ ॥

वेदोंके भाँति - भाँतिके विचित्र वचन, ऋतुओंके परिवर्तन तथा दिन, पक्ष, मास और संवत्सर आदि काल जो प्रतिक्षण बीत रहा है, उसकी ओर भी ध्यान दे । चन्द्रमाकी ह्रासवृद्धि तो प्रत्यक्ष दिखायी देती है । समुद्रोंका ज्वारभाटा भी प्रत्यक्ष ही है । धनवानोंके धनका नाश और नाशके बाद पुनः वृद्धिका क्रम भी दृष्टिगोचर होता ही रहता है । इन सबको देखकर अपने कर्तव्यका निश्चय करे ॥ ४६–४८ ॥

संयोगानां क्षयं दृष्ट्वा युगानां च विशेषतः ।

क्षयं च दृष्ट्वा शैलानां क्षयं च सरितां तथा ॥ ४ ९ ॥

वर्णानां च क्षयं दृष्ट्वा क्षयान्तं च पुनः पुनः ।

जरामृत्युं तथा जन्म दृष्ट्वा दुःखानि चैव ह ॥ ५० ॥

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संयोगोंका, युगोंका, पर्वतोंका और सरिताओंका जो क्षय होता है, उसपर दृष्टि डाले । वर्णोंका क्षय और क्षयका अन्त भी बारंबार देखे । जन्म, मृत्यु और जरावस्थाके दुःखोंपर दृष्टिपात करे ॥ ४ ९ -५० ॥

देहदोषांस्तथा ज्ञात्वा तेषां दुःखं च तत्त्वतः ।

देहविक्लवतां चैव सम्यग् विज्ञाय तत्त्वतः ॥ ५१ ॥

देहके दोषोंको जानकर उनसे मिलनेवाले दुःखका भी यथार्थ ज्ञान प्राप्त करे । शरीरकी व्याकुलताको भी ठीक - ठीक जाननेका प्रयत्न करे ॥ ५१ ॥

आत्मदोषांश्च विज्ञाय सर्वानात्मनि संश्रितान् ।

स्वदेहादुत्थितान् गन्धांस्तथा विज्ञाय चाशुभान् ॥ ५२ ॥

अपने शरीरमें स्थित जो अपने ही दोष हैं, उन सबको जानकर शरीरसे जो निरन्तर दुर्गन्ध उठती रहती है, उसकी ओर भी ध्यान दे ( तथा विरक्त होकर परमात्माका चिन्तन करते हुए भवबन्धनसे मुक्त होनेका प्रयत्न करे ) ॥ ५२ ॥

युधिष्ठिर उवाच

कान् स्वगात्रोद्भवान् दोषान् पश्यस्यमितविक्रम ।

एतन्मे संशयं कृत्स्नं वक्तुमर्हसि तत्त्वतः ॥ ५३ ॥

युधिष्ठिरने पूछा— अमितपराक्रमी पितामह! आपके देखनेमें कौन- कौन - से दोष ऐसे हैं, जो अपने ही शरीरसे उत्पन्न होते हैं? आप मेरे इस सम्पूर्ण संदेहका यथार्थरूपसे समाधान करनेकी कृपा करें ॥ ५३ ॥

भीष्म उवाच

पञ्च दोषान् प्रभो देहे प्रवदन्ति मनीषिणः ।

मार्गज्ञाः कापिलाः सांख्याः शृणु तानरिसूदन ॥ ५४ ॥

भीष्मजीने कहा – प्रभो! शत्रुसूदन! कपिल सांख्यमतके अनुसार चलनेवाले उत्तम मार्गोंके ज्ञाता मनीषी पुरुष इस देहके भीतर पाँच दोष बतलाते हैं, उन्हें बताता हूँ, सुनो ॥ ५४ ॥

कामक्रोधौ भयं निद्रा पञ्चमः श्वास उच्यते ।

एते दोषाः शरीरेषु दृश्यन्ते सर्वदेहिनाम् ॥ ५५ ॥

काम, क्रोध, भय, निद्रा और श्वास – ये पाँच दोष समस्त देहधारियोंके शरीरोंमें देखे जाते हैं ॥ ५५ ॥

छिन्दन्ति क्षमया क्रोधं कामं संकल्पवर्जनात् ।

सत्त्वसंसेवनान्निद्रामप्रमादाद् भयं तथा ॥ ५६ ॥

छिन्दन्ति पञ्चमं श्वासमल्पाहारतया नृप ॥ ५७ ॥