श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2031–2040
महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2031–2040
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एकत्वं च बहुत्वं च प्रकृतेरर्थतत्त्ववान् ।
एकत्वं प्रलये चास्य बहुत्वं च प्रवर्तनात् ॥ ३५ ॥
अर्थतत्त्वके ज्ञाता पुरुषको यह जानना चाहिये कि प्रलयकालमें प्रकृतिमें भी एकता और सृष्टिकालमें अनेकता रहती है । इसी प्रकार पुरुष भी प्रलयकालमें एक ही रहता है; किंतु सृष्टिकालमें प्रकृतिका प्रेरक होनेके कारण उसमें नानात्वका आरोप हो जाता है ॥
बहुधाऽऽत्मा प्रकुर्वीत प्रकृतिं प्रसवात्मिकाम् ।
तच्च क्षेत्रं महानात्मा पञ्चविंशोऽधितिष्ठति ॥ ३६ ॥
परमात्मा ही प्रसवात्मिका प्रकृतिको नाना रूपोंमें परिणत करता है । प्रकृति और उसके विकारको क्षेत्र कहते हैं । चौबीस तत्त्वोंसे भिन्न जो पचीसवाँ तत्त्व महान् आत्मा है, वह क्षेत्रमें अधिष्ठातारूपसे निवास करता है ॥ ३६ ॥
अधिष्ठातेति राजेन्द्र प्रोच्यते यतिसत्तमैः ।
अधिष्ठानादधिष्ठाता क्षेत्राणामिति नः श्रुतम् ॥ ३७ ॥
राजेन्द्र! इसीलिये यतिशिरोमणि उसे अधिष्ठाता कहते हैं । क्षेत्रोंका अधिष्ठान होनेके कारण वह अधिष्ठाता है, ऐसा हमने सुन रखा है ॥ ३७ ॥
क्षेत्रं जानाति चाव्यक्तं क्षेत्रज्ञ इति चोच्यते ।
आव्यक्तिके पुरे शेते पुरुषश्चेति कथ्यते ॥ ३८ ॥
वह अव्यक्तसंज्ञक क्षेत्र ( प्रकृति ) को जानता है, इसलिये क्षेत्रज्ञ कहलाता है और प्राकृत शरीररूपी पुरोंमें अन्तर्यामीरूपसे शयन करनेके कारण उसे ' पुरुष' कहते हैं ॥ ३८ ॥
अन्यदेव च क्षेत्रं स्यादन्यः क्षेत्रज्ञ उच्यते ।
क्षेत्रमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञाता वै पञ्चविंशकः ॥ ३ ९ ॥
वास्तवमें क्षेत्र अन्य वस्तु है और क्षेत्रज्ञ अन्य। क्षेत्र अव्यक्त कहा गया है और क्षेत्रज्ञ उसका ज्ञाता पचीसवाँ तत्त्व आत्मा है ॥ ३ ९ ॥
अन्यदेव च ज्ञानं स्यादन्यज्ज्ञेयं तदुच्यते ।
ज्ञानमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञेयो वै पञ्चविंशकः ॥ ४० ॥
ज्ञान अन्य वस्तु है और ज्ञेय उससे भिन्न कहा जाता है । ज्ञान* अव्यक्त कहा गया है और ज्ञेय पचीसवाँ तत्त्व आत्मा है ॥ ४० ॥
अव्यक्तं क्षेत्रमित्युक्तं तथा सत्त्वं तथेश्वरः ।
अनीश्वरमतत्त्वं च तत्त्वं तत् पञ्चविंशकम् ॥ ४१ ॥
अव्यक्तको क्षेत्र कहा गया है । उसीको सत्त्व ( बुद्धि) और शासककी भी संज्ञा दी गयी है; परंतु पचीसवाँ तत्त्व परमपुरुष परमात्मा जड तत्त्व और ईश्वरसे रहित भिन्न है ॥
सांख्यदर्शनमेतावत् परिसंख्यानुदर्शनम् ।
सांख्याः प्रकुर्वते चैव प्रकृतिं च प्रचक्षते ॥ ४२ ॥
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इतना ही सांख्यदर्शन है । सांख्यके विद्वान् तत्त्वोंकी संख्या (गणना ) करते और
प्रकृतिको ही जगत्का कारण बताते हैं । इसीलिये इस दर्शनका नाम सांख्यदर्शन है ॥
तत्त्वानि च चतुर्विंशत् परिसंख्याय तत्त्वतः ।
सांख्याः सह प्रकृत्या तु निस्तत्त्वः पञ्चविंशकः ॥ ४३ ॥
सांख्यवेत्ता पुरुष प्रकृतिसहित चौबीस तत्त्वोंकी परिगणना करके परमपुरुषको जड तत्त्वोंसे भिन्न पचीसवाँ निश्चित करते हैं ॥ ४३ ॥
पञ्चविंशोऽप्रकृत्यात्मा बुध्यमान इति स्मृतः ।
यदा तु बुध्यतेऽऽत्मानं तदा भवति केवलः ॥ ४४ ॥
वह पचीसवाँ प्रकृतिरूप नहीं है । उससे सर्वथा भिन्न ज्ञानस्वरूप माना गया है । जब वह अपने - आपको प्रकृतिसे भिन्न नित्यचिन्मय जान लेता है, उस समय केवल हो जाता है अर्थात् अपने विशुद्ध परब्रह्मरूपमें स्थित हो जाता है ॥ ४४ ॥
सम्यग्दर्शनमेतावद् भाषितं तव तत्त्वतः ।
एवमेतद् विजानन्तः साम्यतां प्रति यान्त्युत ॥ ४५ ॥
इस प्रकार मैंने तुमसे यह सम्यग्दर्शन ( सांख्य ) का यथावत्रूपसे वर्णन किया है । जो इसे इस प्रकार जानते हैं, वे शान्तस्वरूप ब्रह्मको प्राप्त होते हैं ॥ ४५ ॥
सम्यङ्निदर्शनं नाम प्रत्यक्षं प्रकृतेस्तथा ।
गुणतत्त्वान्यथैतानि निर्गुणोऽन्यस्तथा भवेत् ॥ ४६ ॥
प्रकृति- पुरुषका प्रत्यक्ष- दर्शन ( अपरोक्ष- अनुभव) ही सम्यग्दर्शन है । ये जो गुणमय तत्त्व हैं, इनसे भिन्न परमपुरुष परमात्मा निर्गुण हैं ॥ ४६ ॥
न त्वेवं वर्तमानानामावृत्तिर्विद्यते पुनः ।
विद्यतेऽक्षरभावत्वादपरं परमव्ययम् ॥ ४७ ॥
इस दर्शनके अनुसार ज्ञान प्राप्त करनेवालोंकी इस संसारमें पुनरावृत्ति नहीं होती; क्योंकि वे अविनाशी ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाते हैं, अतः परापरस्वरूप निर्विकार परब्रह्मरूपसे ही उनकी स्थिति होती है ॥ ४७ ॥
पश्येरन्नैकमतयो न सम्यक् तेषु दर्शनम् ।
ते व्यक्तं प्रतिपद्यन्ते पुनः पुनररिंदम ॥ ४८ ॥
शत्रुदमन नरेश! जिनकी बुद्धि नानात्वका दर्शन करती है, उन्हें सम्यक् - ज्ञानकी प्राप्ति नहीं होती । ऐसे लोगोंको बारंबार शरीर धारण करना पड़ता है ॥ ४८ ॥
सर्वमेतद् विजानन्तो नासर्वस्य प्रबोधनात् ।
व्यक्तीभूता भविष्यन्ति व्यक्तस्य वशवर्तिनः ॥ ४९ ॥
जो इस सारे प्रपंचको ही जानते हैं, वे इससे भिन्न परमात्माका तत्त्व न जाननेके कारण निश्चय ही शरीरधारी होंगे और शरीर तथा काम-क्रोध आदि दोषोंके वशवर्ती बने रहेंगे ॥ ४ ९ ॥
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सर्वमव्यक्तमित्युक्तमसर्वः पञ्चविंशकः ।
य एनमभिजानन्ति न भयं तेषु विद्यते ॥ ५० ॥
' सर्व ' नाम है अव्यक्त प्रकृतिका और उससे भिन्न पचीसवें तत्त्व परमात्माको असर्व कहा गया है । जो उन्हें इस प्रकार जानते हैं, उन्हें आवागमनका भय नहीं होता है ॥ ५० ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे षडधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०६ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठ और करालजनकका संवादविषयक तीन सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०६ ॥
Fard * जैसे घड़ेमें जल भरा जाता है, उसी प्रकार पादांगुष्ठसे लेकर मूर्धातक सम्पूर्ण शरीरमें नासिकाके छिद्रोंद्वारा वायुको खींचकर भर ले । फिर ब्रह्मरन्ध्र ( मूर्धा ) से वायुको हटाकर ललाटमें स्थापित करे । यह प्राणवायुके प्रत्याहारका पहला स्थान है । इसी प्रकार उत्तरोत्तर हटाते और रोकते हुए क्रमशः भ्रूमध्य, नेत्र, नासिकामूल, जिह्वामूल, कण्ठकूप, हृदयमध्य, नाभिमध्य, मेढ्र ( उपस्थका मूलभाग ), उदर, गुदा, ऊरुमूल, ऊरुमध्य, जानु, चितिमूल, जंघामध्य, गुल्फ और पादांगुष्ठ— इन स्थानोंमें वायुको ले जाकर स्थापित करे । इन अट्ठारह स्थानोंमें किये हुए प्रत्याहारोंको अठारह प्रकारकी प्रेरणा समझना चाहिये । इनके सिवा ध्यान, धारणा, समाधि तथा ' सत्त्वपुरुषान्यता ख्याति' (बुद्धि और पुरुष इन दोनोंकी भिन्नताका बोध ) —ये चार प्रेरणाएँ और हैं । ये ही सब मिलकर बाईस प्रकारकी प्रेरणाएँ कही गयी हैं । * यहाँ ' ज्ञान' शब्दसे बुद्धिवृत्तिको समझना चाहिये ।
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सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्यायः विद्या अविद्या, अक्षर और क्षर तथा प्रकृति और पुरुषके स्वरूपका एवं विवेकीके उद्गारका वर्णन वसिष्ठ उवाच
सांख्यदर्शनमेतावदुक्तं ते नृपसत्तम ।
विद्याविद्ये त्विदानीं मे त्वं निबोधानुपूर्वशः ॥ १ ॥
वसिष्ठजी कहते हैं – नृपश्रेष्ठ! यहाँतक मैंने तुम्हें सांख्यदर्शनकी बात बतायी है । अब इस समय तुम मुझसे विद्या और अविद्याका वर्णन क्रमसे सुनो ॥ १ ॥
अविद्यामाहुरव्यक्तं सर्गप्रलयधर्मि वै ।
सर्गप्रलयनिर्मुक्तां विद्यां वै पञ्चविंशकः ॥ २ ॥
मुनियोंने सृष्टि और प्रलयरूप धर्मवाले कार्यसहित अव्यक्तको ही अविद्या कहा है तथा चौबीस तत्त्वोंसे परे जो पचीसवाँ तत्त्व परम पुरुष परमात्मा है, जो सृष्टि और प्रलयसे रहित है, उसीको विद्या कहते हैं ॥ २ ॥
परस्परस्य विद्यां वै त्वं निबोधानुपूर्वशः ।
यथोक्तमृषिभिस्तात सांख्यस्याभिनिदर्शनम् ॥ ३ ॥
तात! ऋषियोंने जिस प्रकार सांख्यदर्शनकी बात बतायी है, उसी प्रकार तुम अव्यक्तका जो पारस्परिक भेद है, उनमें जो जिसकी विद्या है अर्थात् श्रेष्ठ है, उसका वर्णन क्रमसे सुनो ॥ ३ ॥
कर्मेन्द्रियाणां सर्वेषां विद्या बुद्धीन्द्रियं स्मृतम् ।
बुद्धीन्द्रियाणां च तथा विशेषा इति नः श्रुतम् ॥ ४ ॥
हमने सुन रखा है कि समस्त कर्मेन्द्रियोंकी विद्या ज्ञानेन्द्रियाँ मानी गयी हैं । अर्थात् कर्मेन्द्रियोंसे ज्ञानेन्द्रियाँ श्रेष्ठ हैं और ज्ञानेन्द्रियोंकी विद्या पञ्चमहाभूत हैं ॥ ४ ॥
विशेषाणां मनस्तेषां विद्यामाहुर्मनीषिणः ।
मनसः पञ्च भूतानि विद्या इत्यभिचक्षते ॥ ५ ॥
मनीषी पुरुष कहते हैं कि स्थूल पञ्चभूतोंकी विद्या मन है और मनकी विद्या सूक्ष्म पञ्चभूत हैं ॥ ५ ॥
अहङ्कारस्तु भूतानां पञ्चानां नात्र संशयः ।
अहङ्कारस्य च तथा बुद्धिर्विद्या नरेश्वर ॥ ६ ॥
नरेश्वर! उन सूक्ष्म पञ्चभूतोंकी विद्या अहंकार है, इसमें कोई संशय नहीं है तथा अहंकारकी विद्या बुद्धि मानी गयी है ॥ ६ ॥
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विद्या प्रकृतिरव्यक्तं तत्त्वानां परमेश्वरी ।
विद्या ज्ञेया नरश्रेष्ठ विधिश्च परमः स्मृतः ॥ ७ ॥
नरश्रेष्ठ! अव्यक्त नामवाली जो परमेश्वरी प्रकृति है, वह सम्पूर्ण तत्त्वोंकी विद्या है । यह
विद्या जानने योग्य है । इसीको ज्ञानकी परम विधि कहते हैं ॥ ७ ॥
अव्यक्तस्य परं प्राहुर्विद्यां वै पञ्चविंशकम् ।
सर्वस्य सर्वमित्युक्तं ज्ञेयं ज्ञानस्य पार्थिव ॥ ८ ॥
पचीसवें तत्त्वके रूपमें जिस परम पुरुष परमात्माकी चर्चा की गयी है, उसीको अव्यक्त प्रकृतिकी परम विद्या बताया गया है । राजन्! वही सम्पूर्ण ज्ञानका सर्वरूप ज्ञेय है ॥ ८ ॥
ज्ञानमव्यक्तमित्युक्तं ज्ञेयो वै पञ्चविंशकः ।
तथैव ज्ञानमव्यक्तं विज्ञाता पञ्चविंशकः ॥ ९ ॥
ज्ञान अव्यक्त कहा गया है और परम पुरुष ज्ञेय बताया गया है, उसी प्रकार ज्ञान अव्यक्त है और उसका ज्ञाता परम पुरुष है ॥ ९ ॥
विद्याविद्यार्थतत्त्वेन मयोक्ता ते विशेषतः ।
अक्षरं च क्षरं चैव यदुक्तं तन्निबोध मे ॥ १० ॥
राजन्! मैंने तुम्हारे समक्ष यथार्थरूपसे विद्यासहित अविद्याका विशेषरूपसे वर्णन किया है । अब जो क्षर और अक्षर तत्त्व कहे गये हैं; उनके विषयमें मुझसे सुनो ॥
उभावेवाक्षरावुक्तावुभावेतावनक्षरौ ।
कारणं तु प्रवक्ष्यामि याथातथ्यं तु ज्ञानतः ॥ ११ ॥
सांख्यमतमें प्रकृति और पुरुष दोनोंको ही अक्षर कहा गया है तथा ये ही दोनों क्षर भी हैं । मैं अपने ज्ञानके अनुसार इसका यथार्थ कारण बतलाता हूँ ॥ ११ ॥
अनादिनिधनावेतावुभावेवेश्वरौ मतौ ।
तत्त्वसंज्ञावुभावेतौ प्रोच्येत ज्ञानचिन्तकैः ॥ १२ ॥
ये दोनों ही अनादि और अनन्त हैं; अतः परस्पर संयुक्त होकर दोनों ही ईश्वर ( सर्वसमर्थ) माने गये हैं। सांख्यज्ञानका विचार करनेवाले विद्वान् इन दोनोंको ही ' तत्त्व ' कहते हैं ॥ १२ ॥
सर्गप्रलयधर्मत्वादव्यक्तं प्राहुरक्षरम् ।
तदेतद् गुणसर्गाय विकुर्वाणं पुनः पुनः ॥ १३ ॥
सृष्टि और प्रलय प्रकृतिका धर्म है । इसलिये प्रकृतिको अक्षर कहा गया है । वही प्रकृति महत्तत्त्व आदि गुणोंकी सृष्टिके लिये बारंबार विकारको प्राप्त होती है; इसलिये उसे क्षर भी कहा जाता है ॥ १३ ॥
गुणानां महदादीनामुत्पत्तिश्च परस्परम् ।
अधिष्ठानात् क्षेत्रमाहुरेतत्तत् पञ्चविंशकम् ॥ १४ ॥
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महत्तत्त्व आदि गुणोंकी उत्पत्ति प्रकृति और पुरुषके परस्पर संयोगसे होती है; अतः एक- दूसरेका अधिष्ठान होनेके कारण पुरुषको भी क्षेत्र कहते हैं ॥ १४ ॥
यदा तु गुणजालं तदव्यक्तात्मनि संक्षिपेत् ।
तदा सह गुणैस्तैस्तु पञ्चविंशो विलीयते ॥ १५ ॥
योगी जब अपने योगके प्रभावसे प्रकृतिके गुण- समूहको अव्यक्त मूल प्रकृतिमें विलीन कर देता है, तब उन गुणोंका विलय होनेके साथ- साथ पचीसवाँ तत्त्व पुरुष भी परमात्मामें मिल जाता है । इस दृष्टिसे उसे भी क्षर कह सकते हैं ॥ १५ ॥
गुणा गुणेषु लीयन्ते तदैका प्रकृतिर्भवेत् ।
क्षेत्रज्ञोऽपि यदा तात तत्क्षेत्रे सम्प्रलीयते ॥ १६ ॥
तात! जब कार्यभूत गुण कारणभूत गुणोंमें लीन हो जाते हैं, उस समय सब कुछ एकमात्र प्रकृतिस्वरूप हो जाता है तथा जब क्षेत्रज्ञ भी परमात्मामें लीन हो जाता है, तब उसका भी पृथक् अस्तित्व नहीं रहता ॥ १६ ॥
तदा क्षरत्वं प्रकृतिर्गच्छते गुणसंश्रिता ।
निर्गुणत्वं च वैदेह गुणेष्वप्रतिवर्तनात् ॥ १७ ॥
विदेहराज! उस समय त्रिगुणमयी प्रकृति क्षरत्व ( नाश) को प्राप्त होती है और पुरुष भी गुणोंमें प्रवृत्त न होनेके कारण निर्गुण ( गुणातीत) हो जाता है ॥ १७ ॥
एवमेव च क्षेत्रज्ञः क्षेत्रज्ञानपरिक्षये ।
प्रकृत्या निर्गुणस्त्वेष इत्येवमनुशुश्रुम ॥ १८ ॥
इस प्रकार जब क्षेत्रका ज्ञान नहीं रहता अर्थात् पुरुषको प्रकृतिका ज्ञान नहीं रहता, तब वह स्वभावसे ही निर्गुण है - यह हमने सुन रखा है ॥ १८ ॥
क्षरो भवत्येष यदा तदा गुणवतीमथ ।
प्रकृतिं त्वभिजानाति निर्गुणत्वं तथाऽऽत्मनः ॥ १ ९ ॥
जब यह पुरुष क्षर होता है, अर्थात् परमात्मामें लीन हो जाता है, उस समय वह प्रकृतिके सगुणत्वको और अपने निर्गुणत्वको यथार्थ समझ लेता है ॥ १ ९ ॥
तदा विशुद्धो भवति प्रकृतेः परिवर्जनात् ।
अन्योऽहमन्येयमिति यदा बुध्यति बुद्धिमान् ॥ २० ॥
इस तरह ज्ञानवान् पुरुष जब यह जान लेता है कि मैं अन्य हूँ और यह प्रकृति मुझसे भिन्न है, तब वह प्रकृतिसे रहित हो जानेसे अपने शुद्ध स्वरूपमें स्थित होता है ॥ २० ॥
तदैष तत्त्वतामेति न चापि मिश्रतां व्रजेत् ।
प्रकृत्या चैव राजेन्द्र मिश्रो ह्यन्यश्च दृश्यते ॥ २१ ॥
राजेन्द्र! प्रकृतिसे संयोगके समय उससे अभिन्न- सा प्रतीत होनेके कारण यह पुरुष तद्रूपताको प्राप्त हुआ- सा जान पड़ता है, परंतु उस अवस्थामें भी उसका प्रकृतिके साथ
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मिश्रण नहीं होता, उसकी पृथक्ता बनी रहती है । इस प्रकार पुरुष प्रकृतिके साथ संयुक्त और पृथक् भी दिखायी देता है ॥ २१ ॥
यदा तु गुणजालं तत् प्राकृतं वै जुगुप्सते ।
पश्यते च परं पश्यं तदा पश्यन्न संत्यजेत् ॥ २२ ॥
जब वह प्राकृत गुणसमुदायको कुत्सित समझकर उससे विरत हो जाता है, उस समय वह परम दर्शनीय परमात्माका दर्शन पा जाता है और उसको देखकर फिर भी उसका त्याग नहीं करता अर्थात् उससे अलग नहीं होता ॥ २२ ॥
किं मया कृतमेतावद् योऽहं कालमिमं जनम् ।
मत्स्यो जालं ह्यविज्ञानादनुवर्तितवानिह ॥ २३ ॥
( जिस समय जीवात्माको विवेक होता है, उस समय वह यों विचार करने लगता है— ) ' ओह! मैंने यह क्या किया? जैसे मछली अज्ञानवश स्वयं ही जाकर जालमें फँस जाती है, उसी प्रकार मैं भी आजतक यहाँ इस प्राकृत शरीरका ही अनुसरण करता रहा ॥ २३ ॥
अहमेव हि सम्मोहादन्यमन्यं जनाज्जनम् ।
मत्स्यो यथोदकज्ञानादनुवर्तितवानहम् ॥ २४ ॥
‘ जैसे मत्स्य पानीको ही अपने जीवनका मूल समझकर एक जलाशयसे दूसरे जलाशयको जाता है, उसी तरह मैं भी मोहवश एक शरीरसे दूसरे शरीरमें भटकता रहा ॥ २४ ॥
मत्स्योऽन्यत्वं यथाज्ञानादुदकान्नाभिमन्यते ।
आत्मानं तद्वदज्ञानादन्यत्वं नैव वेद्म्यहम् ॥ २५ ॥
‘ जैसे मत्स्य अज्ञानवश अपनेको जलसे भिन्न नहीं समझता, उसी प्रकार मैं भी अपनी अज्ञताके कारण इस प्राकृत शरीरसे अपनेको भिन्न नहीं समझता था ॥
ममास्तु धिगबुद्धस्य योऽहं मग्नमिमं पुनः ।
अनुवर्तितवान् मोहादन्यमन्यं जनाज्जनम् ॥ २६ ॥
' मुझ मूढ़को धिक्कार है; जो कि संसारसागरमें डूबे हुए इस शरीरका आश्रय ले मोहवश एक शरीरसे दूसरे शरीरका अनुसरण करता रहा ॥ २६ ॥
अयमत्र भवेद् बन्धुरनेन सह मे क्षमम् ।
साम्यमेकत्वमायातो यादृशस्तादृशस्त्वहम् ॥ २७ ॥
‘ वास्तवमें इस जगत्के भीतर यह परमात्मा ही मेरा बन्धु है । इसीके साथ मेरी मैत्री हो सकती है । पहले मैं कैसा भी क्यों न रहा होऊँ, इस समय तो मैं इसकी समानता और एकताको प्राप्त हो चुका हूँ, जैसा वह है वैसा ही मैं हूँ ॥ २७ ॥
तुल्यतामिह पश्यामि सदृशोऽहमनेन वै ।
अयं हि विमलो व्यक्तमहमीदृशकस्तथा ॥ २८ ॥
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‘ इसीमें मुझे अपनी समानता दिखायी देती है । मैं अवश्य इसके ही सदृश हूँ । यह परमात्मा प्रत्यक्ष ही अत्यन्त निर्मल है और मैं भी ऐसा ही हूँ ॥ २८ ॥
योऽहमज्ञानसम्मोहादज्ञया सम्प्रवृत्तवान् ।
ससङ्गयाहं निःसङ्गः स्थितः कालमिमं त्वहम् ॥ २ ९ ॥
‘ मैं जो कि आसक्तिसे सर्वथा रहित हूँ तो भी अज्ञान एवं मोहके वशीभूत होकर इतने समयतक इस आसक्तिमयी जड प्रकृतिके साथ रमता रहा ॥ २ ९ ॥
अनयाहं वशीभूतः कालमेतं न बुद्धवान् ।
उच्चमध्यमनीचानां तामहं कथमावसे ॥ ३० ॥
'इसने मुझे इस तरह वशमें कर लिया था कि मुझे आजतकके समयका पता ही न चला । यह तो उच्च, मध्यम तथा नीच सब श्रेणीके लोगोंके साथ रहती है । भला, इसके साथ मैं कैसे रह सकता हूँ? ॥ ३० ॥
समानयानया चेह सह वासमहं कथम् ।
गच्छाम्यबुद्धभावत्वादेषेदानीं स्थिरो भवे ॥ ३१ ॥
‘जो मेरे साथ संयुक्त होकर मेरी समानता करने लगी है, ऐसी इस प्रकृतिके साथ मैं मूर्खतावश सहवास कैसे कर सकता हूँ? यह लो, अब मैं स्थिर हो रहा हूँ ॥
सहवासं न यास्यामि कालमेतद्धि वञ्चनात् ।
वञ्चितोऽस्म्यनया यद्धि निर्विकारो विकारया ॥ ३२ ॥
‘ मैं निर्विकार होकर भी इस विकारमयी प्रकृतिके द्वारा ठगा गया । इतने समयतक
इसने मेरे साथ ठगी की है । इसलिये अब इसके साथ नहीं रहूँगा ॥ ३२ ॥
न चायमपराधोऽस्या ह्यपराधो ह्ययं मम ।
योऽहमत्राभवं सक्तः पराङ्मुखमुपस्थितः ॥ ३३ ॥
‘किंतु यह इसका अपराध नहीं है, सारा अपराध मेरा ही है; जो कि मैं परमात्मासे विमुख होकर इसमें आसक्त हुआ स्थित रहा ॥ ३३ ॥
ततोऽस्मि बहुरूपासु स्थितो मूर्तिष्वमूर्तिमान् ।
अमूर्तश्चापि मूर्तात्मा ममत्वेन प्रधर्षितः ॥ ३४ ॥
' यद्यपि मैं सर्वथा अमूर्त हूँ अर्थात् किसी आकार वाला नहीं हूँ तो भी मैं प्रकृतिकी अनेक रूपवाली मूर्तियोंमें स्थित हुआ देहरहित होकर भी ममतासे परास्त होनेके कारण देहधारी बना रहा ॥ ३४ ॥
प्राक् कृतेन ममत्वेन तासु तास्विह योनिषु ।
निर्ममस्य ममत्वेन किं कृतं तासु तासु च ॥ ३५ ॥
‘ पहले जो मैंने इसके प्रति ममता की थी, उसके कारण मुझे भिन्न - भिन्न योनियोंमें भटकना पड़ा । यद्यपि मैं ममतारहित हूँ तो भी इस प्रकृतिजनित ममताने भिन्न-भिन्न योनियोंमें मुझे डालकर मेरी बड़ी दुर्दशा कर डाली ॥
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योनीषु वर्तमानेन नष्टसंज्ञेन चेतसा ।
न ममात्रानया कार्यमहंकारकृतात्मया ॥ ३६ ॥
‘ इसके साथ नाना प्रकारकी योनियोंमें भटकनेके कारण मेरी चेतना खो गयी थी । अब इस अहंकारमयी प्रकृतिसे मेरा कोई काम नहीं है ॥ ३६ ॥
आत्मानं बहुधा कृत्वा येयं भूयो युनक्ति माम् ।
इदानीमेष बुद्धोऽस्मि निर्ममो निरहंकृतः ॥ ३७ ॥
‘ अब भी यह बहुत - से रूप धारण करके मेरे साथ संयोगकी चेष्टा कर रही है; किंतु अब मैं सावधान हो गया हूँ, इसलिये ममता और अहंकारसे रहित हो गया हूँ ॥ ३७ ॥
ममत्वमनया नित्यमहंकारकृतात्मकम् ।
अपेत्याहमिमां हित्वा संश्रयिष्ये निरामयम् ॥ ३८ ॥
' अब तो इसको और इसकी अहंकारस्वरूपिणी ममताको त्यागकर इससे सर्वथा अतीत होकर मैं निरामय परमात्माकी शरण लूँगा ॥ ३८ ॥
अनेन साम्यं यास्यामि नानयाहमचेतया ।
क्षेमं मम सहानेन नैकत्वमनया सह ॥ ३ ९ ॥
‘ उन परमात्माकी ही समानता प्राप्त करूँगा । इस जड प्रकृतिकी समानता नहीं धारण करूँगा । परमात्माके साथ संयोग करनेमें ही मेरा कल्याण है । इस प्रकृतिके साथ नहीं ॥ ३ ९ ॥
एवं परमसम्बोधात् पञ्चविंशोऽनुबुद्धवान् ।
अक्षरत्वं नियच्छेत त्यक्त्वा क्षरमनामयम् ॥ ४० ॥
‘ इस प्रकार उत्तम विवेकके द्वारा अपने शुद्ध स्वरूपका ज्ञान प्राप्तकर चौबीस तत्त्वोंसे परे पचीसवाँ आत्मा क्षरभाव ( विनाशशीलता ) का त्याग करके निरामय अक्षरभावको प्राप्त होता है ॥ ४० ॥
अव्यक्तं व्यक्तधर्माणं सगुणं निर्गुणं तथा ।
निर्गुणं प्रथमं दृष्ट्वा तादृग् भवति मैथिल । ४१ ॥
‘ मिथिलानरेश! अव्यक्त प्रकृति, व्यक्त महत्तत्त्वादि, सगुण (जडवर्ग ), निर्गुण ( आत्मा ) तथा सबके आदिभूत निर्गुण परमात्माका साक्षात्कार करके मनुष्य स्वयं भी वैसा ही हो जाता है ॥ ४१ ॥
अक्षरक्षरयोरेतदुक्तं तव निदर्शनम् ।
मयेह ज्ञानसम्पन्नं यथाश्रुतिनिदर्शनात् ॥ ४२ ॥
राजन्! वेदमें जैसा वर्णन किया गया है, उसके अनुरूप यह क्षर- अक्षरका विवेक करानेवाला ज्ञान मैंने तुम्हें सुनाया है ॥ ४२ ॥
निःसंदिग्धं च सूक्ष्मं च विबुद्धं विमलं यथा ।
प्रवक्ष्यामि तु ते भूयस्तन्निबोध यथाश्रुतम् ॥ ४३ ॥
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अब पुनः श्रुतिके अनुसार संदेहरहित, सूक्ष्म तथा अत्यन्त निर्मल विशिष्ट ज्ञानकी बात तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ॥ ४३ ॥
सांख्ययोगौ मया प्रोक्तौ शास्त्रद्वयनिदर्शनात् ।
यदेव शास्त्रं सांख्योक्तं योगदर्शनमेव तत् ॥ ४४ ॥
मैंने सांख्य और योगका जो वर्णन किया है, उसमें इन दोनोंको पृथक् - पृथक् दो शास्त्र बताया है; परंतु वास्तवमें जो सांख्यशास्त्र है, वही योगशास्त्र भी है ( क्योंकि दोनोंका फल एक ही है ) ॥ ४४ ॥
प्रबोधनकरं ज्ञानं सांख्यानामवनीपते ।
विस्पष्टं प्रोच्यते तत्र शिष्याणां हितकाम्यया ॥ ४५ ॥
पृथ्वीनाथ! मैंने शिष्योंके हितकी कामनासे उनके लिये ज्ञानजनक जो सांख्यदर्शन है, उसका तुम्हारे निकट स्पष्टरूपसे वर्णन किया है ॥ ४५ ॥
बृहच्चैवमिदं शास्त्रमित्याहुर्विदुषो जनाः ।
अस्मिंश्च शास्त्रे योगानां पुनर्वेदे पुरःसरः ॥ ४६ ॥
विद्वान् पुरुषोंका कहना है कि यह सांख्यशास्त्र महान् है । इस शास्त्रमें, योगशास्त्रमें तथा वेदमें अधिक प्रामाणिकता समझकर मनुष्यको इनके अध्ययनके लिये आगे बढ़ना चाहिये ॥ ४६ ॥
पञ्चविंशात् परं तत्त्वं पठ्यते न नराधिप ।
सांख्यानां तु परं तत्त्वं यथावदनुवर्णितम् ॥ ४७ ॥
नरेश्वर! सांख्यशास्त्रके आचार्य पचीसवें तत्त्वसे परे और किसी तत्त्वका वर्णन नहीं करते हैं । यह मैंने सांख्योंके परम तत्त्वका यथावत्रूपसे वर्णन किया है ॥ ४७ ॥
बुद्धमप्रतिबुद्धत्वाद् बुध्यमानं च तत्त्वतः ।
बुध्यमानं च बुद्धं च प्राहुर्योगनिदर्शनम् ॥ ४८ ॥
जो नित्य ज्ञानसम्पन्न परब्रह्म परमात्मा है, वही बुद्ध है तथा जो परमात्मतत्त्वको न जाननेके कारण जिज्ञासु जीवात्मा है, उसकी ' बुध्यमान ' संज्ञा होती है । इस प्रकार योगके सिद्धान्तके अनुसार बुद्ध ( नित्य ज्ञानसम्पन्न परमात्मा ) और बुध्यमान ( जिज्ञासु जीव ) – ये दो चेतन माने गये हैं ॥ ४८ ॥
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि वसिष्ठकरालजनकसंवादे सप्ताधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३०७ ॥
इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें वसिष्ठकरालजनकसंवादविषयक तीन सौ सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३०७ ॥