श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ५ — पृष्ठ 2221–2230

महाभारत — खण्ड ५ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 2221–2230

पृष्ठ 2221

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अब मैं वहीं जाऊँगा, जहाँ मेरे आत्माको शान्ति मिलेगी तथा जहाँ मैं अक्षय, अविनाशी और सनातनरूपसे स्थित रहूँगा ॥ ५१ ॥

न तु योगमृते शक्या प्राप्तुं सा परमा गतिः ।

अवबन्धो हि बुद्धस्य कर्मभिर्नोपपद्यते ॥ ५२ ॥

परंतु योगके बिना उस परम गतिको नहीं प्राप्त किया जा सकता । बुद्धिमान्का कर्मोंके निकृष्ट बन्धनसे बँधा रहना उचित नहीं है ॥ ५२ ॥

तस्माद् योगं समास्थाय त्यक्त्वा गृहकलेवरम् ।

वायुभूतः प्रवेक्ष्यामि तेजोराशिं दिवाकरम् ॥ ५३ ॥

अतः मैं योगका आश्रय ले इस देह - गेहका परित्याग करके वायुरूप हो तेजोराशिमय सूर्यमण्डलमें प्रवेश करूँगा ॥ ५३ ॥

न ह्येष क्षयतां याति सोमः सुरगणैर्यथा ।

कम्पितः पतते भूमिं पुनश्चैवाधिरोहति ॥ ५४ ॥

देवतालोग चन्द्रमाका अमृत पीकर जिस प्रकार उसे क्षीण कर देते हैं, उस प्रकार सूर्यदेवका क्षय नहीं होता। धूममार्गसे चन्द्रमण्डलमें गया हुआ जीव कर्मभोग समाप्त होनेपर कम्पित हो फिर इस पृथ्वीपर गिर पड़ता है । इसी प्रकार नूतन कर्मफल भोगनेके लिये वह पुनः चन्द्रलोकमें जाता है ( सारांश यह कि चन्द्रलोकमें जानेवालेको आवागमनसे छुटकारा नहीं मिलता है ) ॥ ५४ ॥

क्षीयते हि सदा सोमः पुनश्चैवाभिपूर्यते ।

नेच्छाम्येवं विदित्वैते ह्रासवृद्धी पुनः पुनः ॥ ५५ ॥

इसके सिवा चन्द्रमा सदा घटता- बढ़ता रहता है । उसकी ह्रास- वृद्धिका क्रम कभी टूटता नहीं है । इन सब बातोंको जानकर मुझे चन्द्रलोकमें जाने या ह्रास वृद्धिके चक्करमें पड़नेकी इच्छा नहीं होती है ॥ ५५ ॥

रविस्तु संतापयते लोकान् रश्मिभिरुल्बणैः ।

सर्वतस्तेज आदत्ते नित्यमक्षयमण्डलः ॥ ५६ ॥

सूर्यदेव अपनी प्रचण्ड किरणोंसे समस्त जगत्‌को संतप्त करते हैं । वे सब जगहसे तेजको स्वयं ग्रहण करते हैं ( उनके तेजका कभी ह्रास नहीं होता ); इसलिये उनका मण्डल सदा अक्षय बना रहता है ॥ ५६ ॥

अतो मे रोचते गन्तुमादित्यं दीप्ततेजसम् ।

अत्र वत्स्यामि दुर्धर्षो निःशङ्केनान्तरात्मना ॥ ५७ ॥

अतः उद्दीप्त तेजवाले आदित्यमण्डलमें जाना ही मुझे अच्छा जान पड़ता है । इसमें मैं निर्भीकचित्त होकर निवास करूँगा । किसीके लिये भी मेरा पराभव करना कठिन होगा ॥ ५७ ॥

सूर्यस्य सदने चाहं निक्षिप्येदं कलेवरम् ।

पृष्ठ 2222

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ऋषिभिः सह यास्यामि सौरं तेजोऽतिदुःसहम् ॥ ५८ ॥

इस शरीरको सूर्यलोकमें छोड़कर मैं ऋषियोंके साथ सूर्यदेवके अत्यन्त दुःसह तेजमें प्रवेश कर जाऊँगा ॥

आपृच्छामि नगान् नागान् गिरिमुर्वी दिशो दिवम् ।

देवदानवगन्धर्वान् पिशाचोरगराक्षसान् ॥ ५ ९ ॥

इसके लिये मैं नग- नाग, पर्वत, पृथ्वी, दिशा, द्युलोक, देव, दानव, गन्धर्व, पिशाच, सर्प और राक्षसोंसे आज्ञा माँगता हूँ ॥ ५ ९ ॥

लोकेषु सर्वभूतानि प्रवेक्ष्यामि न संशयः ।

पश्यन्तु योगवीर्यं मे सर्वे देवाः सहर्षिभिः ॥ ६० ॥

आज मैं निःसन्देह जगत्के सम्पूर्ण भूतोंमें प्रवेश करूँगा । समस्त देवता और ऋषि मेरी योगशक्तिका प्रभाव देखें ॥ ६० ॥

अथानुज्ञाप्य तमृषिं नारदं लोकविश्रुतम् ।

तस्मादनुज्ञां सम्प्राप्य जगाम पितरं प्रति ॥ ६१ ॥

ऐसा निश्चय करके शुकदेवजीने विश्वविख्यात देवर्षि नारदजीसे आज्ञा माँगी । उनसे आज्ञा लेकर वे अपने पिता व्यासजीके पास गये ॥ ६१ ॥

सोऽभिवाद्य महात्मानं कृष्णद्वैपायनं मुनिम् ।

शुकः प्रदक्षिणं कृत्वा कृष्णमापृष्टवान् मुनिम् ॥ ६२ ॥

वहाँ अपने पिता महात्मा श्रीकृष्णद्वैपायन मुनिको प्रणाम करके शुकदेवजीने उनकी प्रदक्षिणा की और उनसे जानेके लिये आज्ञा माँगी ॥ ६२ ॥

श्रुत्वा चर्षिस्तद् वचनं शुकस्य प्रीतो महात्मा पुनराह चैनम् । भो भो पुत्र स्थीयतां तावदद्य यावच्चक्षुः प्रीणयामि त्वदर्थे ॥ ६३ ॥

शुकदेवकी यह बात सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए महात्मा व्यासने उनसे कहा — ‘ बेटा! बेटा! आज यहीं रहो, जिससे तुम्हें जी- भर निहारकर अपने नेत्रोंको तृप्त कर लूँ' ॥ ६३ ॥

निरपेक्षः शुको भूत्वा निःस्नेहो मुक्तसंशयः ।

मोक्षमेवानुसंचिन्त्य गमनाय मनो दधे ॥ ६४ ॥

परंतु शुकदेवजी स्नेहका बन्धन तोड़कर निरपेक्ष हो गये थे । तत्त्वके विषयमें उन्हें कोई संशय नहीं रह गया था; अतः बारंबार मोक्षका ही चिन्तन करते हुए उन्होंने वहाँसे जानेका ही विचार किया ॥ ६४ ॥

पितरं सम्परित्यज्य जगाम मुनिसत्तमः ।

कैलासपृष्ठं विपुलं सिद्धसंघनिषेवितम् ॥ ६५ ॥

पृष्ठ 2223

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पिताको वहीं छोड़कर मुनिश्रेष्ठ शुकदेव सिद्ध समुदायसे सेवित विशाल कैलासशिखरपर चले गये ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकाभिगमने एकत्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३१ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका प्रस्थानविषयक तीनसौ इकतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३१ ॥

पृष्ठ 2224

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द्वात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः शुकदेवजीकी ऊर्ध्वगतिका वर्णन भीष्म उवाच

गिरिशृङ्गं समारुह्य सुतो व्यासस्य भारत ।

समे देशे विविक्ते स निःशलाक उपाविशत् ॥ १ ॥

धारयामास चात्मानं यथाशास्त्रं यथाविधि ।

पादप्रभृतिगात्रेषु क्रमेण क्रमयोगवित् ॥ २ ॥

भीष्मजी कहते हैं- भरतनन्दन! कैलास-शिखरपर आरूढ़ हो व्यासपुत्र शुकदेव एकान्तमें तृणरहित समतल भूमिपर बैठ गये और शास्त्रोक्त विधिसे पैरसे लेकर सिरतक सम्पूर्ण अंगोंमें क्रमशः आत्माकी धारणा करने लगे । वे क्रमयोगके पूर्ण ज्ञाता थे ॥ १-२ ॥

ततः स प्राङ्मुखो विद्वानादित्ये नचिरोदिते ।

पाणिपादं समादाय विनीतवदुपाविशत् ॥ ३ ॥

न तत्र पक्षिसंघातो न शब्दो नातिदर्शनम् ।

यत्र वैयासकिर्धीमान् योक्तुं समुपचक्रमे ॥ ४ ॥

थोड़ी ही देरमें जब सूर्योदय हुआ, तब ज्ञानी शुकदेव हाथ- पैर समेटकर विनीतभावसे पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके बैठे और योगमें प्रवृत्त हो गये। उस समय बुद्धिमान् व्यास-नन्दन जहाँ योगयुक्त हो रहे थे, वहाँ न तो पक्षियोंका समुदाय था, न कोई शब्द सुनायी पड़ता था और न दृष्टिको आकृष्ट करनेवाला कोई दृश्य ही उपस्थित था ॥ ३-४ ॥

स ददर्श तदाऽऽत्मानं सर्वसंगविनिःसृतम् ।

प्रजहास ततो हासं शुकः सम्प्रेक्ष्य तत्परम् ॥ ५ ॥

उस समय उन्होंने सब प्रकारके संगोंसे रहित आत्माका दर्शन किया । उस परमतत्त्वका साक्षात्कार करके शुकदेवजी जोर- जोर से हँसने लगे ॥ ५ ॥

स पुनर्योगमास्थाय मोक्षमार्गोपलब्धये ।

महायोगेश्वरो भूत्वा सोऽत्यक्रामद् विहायसम् ॥ ६ ॥

फिर मोक्षमार्गकी उपलब्धिके लिये योगका आश्रय ले महान् योगेश्वर होकर वे आकाशमें उड़नेके लिये तैयार हो गये ॥ ६ ॥

ततः प्रदक्षिणं कृत्वा देवर्षि नारदं ततः ।

निवेदयामास च तं स्वं योगं परमर्षये ॥ ७ ॥

तदनन्तर देवर्षि नारदके पास जा उनकी प्रदक्षिणा की और उन परम ऋषिसे अपने योगके सम्बन्धमें इस प्रकार निवेदन किया ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2225

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शुकउवाच

दृष्टो मार्गः प्रवृत्तोऽस्मि स्वस्ति तेऽस्तु तपोधन ।

त्वत्प्रसादाद् गमिष्यामि गतिमिष्टां महाद्युते ॥ ८ ॥

शुकदेव बोले- महातेजस्वी तपोधन! आपका कल्याण हो। अब मुझे मोक्षमार्गका दर्शन हो गया । मैं वहाँ जानेको तैयार हूँ । आपकी कृपासे मैं अभीष्ट गति प्राप्त करूँगा ॥ ८ ॥

नारदेनाभ्यनुज्ञातः शुको द्वैपायनात्मजः ।

अभिवाद्य पुनर्योगमास्थायाकाशमाविशत् ॥ ९ ॥

कैलासपृष्ठादुत्पत्य स पपात दिवं तदा ।

अन्तरिक्षचरः श्रीमान् वायुभूतः सुनिश्चितः ॥ १० ॥

नारदजीकी आज्ञा पाकर व्यासकुमार शुकदेवजी उन्हें प्रणाम करके पुनः योगमें स्थित हो आकाशमें प्रविष्ट हुए । कैलासशिखरसे उछलकर वे तत्काल आकाशमें जा पहुँचे और सुनिश्चित ज्ञान पाकर वायुका रूप धारण करके श्रीमान् शुकदेव अन्तरिक्षमें विचरने लगे ॥ ९ -१० ॥

तमुद्यन्तं द्विजश्रेष्ठं वैनतेयसमद्युतिम् ।

ददृशुः सर्वभूतानि मनोमारुतरंहसम् ॥ ११ ॥

उस समय समस्त प्राणियोंने ऊपर जाते हुए द्विजश्रेष्ठ शुकदेवको विनतानन्दन गरुड़के समान कान्तिमान् तथा मन और वायुके समान वेगशाली देखा ॥ ११ ॥

व्यवसायेन लोकांस्त्रीन् सर्वान् सोऽथ विचिन्तयन् ।

आस्थितो दीर्घमध्वानं पावकार्कसमप्रभः ॥ १२ ॥

वे निश्चयात्मक बुद्धिके द्वारा सम्पूर्ण त्रिलोकीको आत्मभावसे देखते हुए बहुत दूरतक आगे बढ़ गये । उस समय उनका तेज सूर्य और अग्निके समान प्रकाशित हो रहा था ॥ १२ ॥

तमेकमनसं यान्तमव्यग्रमकुतोभयम् ।

ददृशुः सर्वभूतानि जङ्गमानि चराणि च ॥ १३ ॥

यथाशक्ति यथान्यायं पूजां वै चक्रिरे तदा ।

पुष्पवषैश्च दिव्यैस्तमवचक्रुर्दिवौकसः ॥ १४ ॥

उन्हें निर्भय होकर शान्त और एकाग्रचित्तसे ऊपर जाते समय समस्त चराचर प्राणियोंने देखा और अपनी शक्ति तथा रीतिके अनुसार उनका यथोचित पूजन किया। देवताओंने उनपर दिव्य फूलोंकी वर्षा की ॥ १३-१४ ॥

तं दृष्ट्वा विस्मिताः सर्वे गन्धर्वाप्सरसां गणाः ।

ऋषयश्चैव संसिद्धाः परं विस्मयमागताः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 2226

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उन्हें इस प्रकार जाते देख समस्त गन्धर्व, अप्सराओंके समुदाय तथा सिद्ध ऋषि-मुनि महान् आश्चर्यमें पड़ गये ॥

अन्तरिक्षगतः कोऽयं तपसा सिद्धिमागतः ।

अधःकायोर्ध्ववक्त्रश्च नेत्रैः समभिरज्यते ॥ १६ ॥

और आपसमें कहने लगे – 'तपस्यासे सिद्धिको प्राप्त हुआ यह कौन महात्मा आकाशमार्गसे जा रहा है, जिसका मुख- मण्डल ऊपरकी ओर और शरीरका निचला भाग नीचेकी ओर ही है? हमारी आँखें बरबस इसकी ओर खिंच जाती हैं ' ॥ १६ ॥

ततः परमधर्मात्मा त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।

भास्करं समुदीक्षन् स प्राङ्मुखो वाग्यतोऽगमत् ॥ १७ ॥

तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध परम धर्मात्मा शुकदेवजी पूर्व दिशाकी ओर मुँह करके सूर्यको देखते हुए मौनभावसे आगे बढ़ रहे थे ॥ १७ ॥

शब्देनाकाशमखिलं पूरयन्निव सर्वशः ।

तमापतन्तं सहसा दृष्ट्वा सर्वाप्सरोगणाः ॥ १८ ॥

सम्भ्रान्तमनसो राजन्नासन् परमविस्मिताः । वे अपने शब्दसे सम्पूर्ण आकाशको पूर्ण- सा कर रहे थे । राजन्! उन्हें सहसा आते देख सम्पूर्ण अप्सराएँ मन ही मन घबरा उठीं और अत्यन्त आश्चर्यमें पड़ गयीं ॥ १८३ ॥

पञ्चचूडाप्रभृतयो भृशमुत्फुल्ललोचनाः ॥ १ ९ ॥

दैवतं कतमं ह्येतदुत्तमां गतिमास्थितम् ।

सुनिश्चितमिहायाति विमुक्तमिव निःस्पृहम् ॥ २० ॥

पञ्चचूडा आदि अप्सराओंके नेत्र विस्मयसे अत्यन्त खिल उठे थे । वे परस्पर कहने लगीं कि उत्तम गतिका आश्रय लेकर यह कौन- सा देवता यहाँ आ रहा है? इसका निश्चय अत्यन्त दृढ़ है । यह सब प्रकारके बन्धनों तथा संशयोंसे मुक्त-सा हो गया है और इसके भीतर किसी वस्तुकी कामना नहीं रह गयी है ॥

ततः समभिचक्राम मलयं नाम पर्वतम् ।

उर्वशी पूर्वचित्तिश्च यं नित्यमुपसेवतः ॥ २१ ॥

कुछ ही देरमें वे मलय नामक पर्वतपर जा पहुँचे, जहाँ उर्वशी और पूर्वचित्ति— ये दो अप्सराएँ सदा निवास करती हैं ॥ २१ ॥

तस्य ब्रह्मर्षिपुत्रस्य विस्मयं ययतुः परम् ।

अहो बुद्धिसमाधानं वेदाभ्यासरते द्विजे ॥ २२ ॥

अचिरेणैव कालेन नभश्चरति चन्द्रवत् ।

पितृशुश्रूषया बुद्धिं सम्प्राप्तोऽयमनुत्तमाम् ॥ २३ ॥

ब्रह्मर्षि व्यासजीके पुत्रकी यह उत्तम गति देख उन दोनोंको बड़ा विस्मय हुआ । वे आपसमें कहने लगीं, 'अहो! इस वेदाभ्यासपरायण ब्राह्मणकी बुद्धिमें कितनी अद्भुत

पृष्ठ 2227

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एकाग्रता है? पिताकी सेवासे थोड़े ही समयमें उत्तम बुद्धि पाकर यह चन्द्रमाके समान आकाशमें विचर रहा है ॥ २२-२३ ॥

पितृभक्तो दृढतपाः पितुः सुदयितः सुतः ।

अनन्यमनसा तेन कथं पित्रा विसर्जितः ॥ २४ ॥

' यह बड़ा ही तपस्वी और पितृभक्त था और अपने पिताका बहुत ही प्यारा बेटा था । उनका मन सदा इसीमें लगा रहता था; फिर भी उन्होंने इसे जानेकी आज्ञा कैसे दे दी? ' ॥ २४ ॥

उर्वश्या वचनं श्रुत्वा शुकः परमधर्मवित् ।

उदैक्षत दिशः सर्वा वचने गतमानसः ॥ २५ ॥

उर्वशीकी बात सुनकर परम धर्मज्ञ शुकदेवजीने सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखा । उस समय उनका चित्त उसकी बातोंकी ओर चला गया था ॥ २५ ॥

सोऽन्तरिक्षं महीं चैव सशैलवनकाननाम् ।

विलोकयामास तदा सरांसि सरितस्तथा ॥ २६ ॥

आकाश, पर्वत, वन और काननोंसहित पृथ्वी एवं सरोवरों और सरिताओंकी ओर भी उन्होंने दृष्टि डाली ॥ २६ ॥

ततो द्वैपायनसुतं बहुमानात् समन्ततः ।

कृताञ्जलिपुटाः सर्वा निरीक्षन्ते स्म देवताः ॥ २७ ॥

उस समय इन सबकी अधिष्ठात्री देवियोंने सब ओरसे बड़े आदरके साथ द्वैपायनकुमार शुकदेवजीको देखा । वे सब--की - सब अंजलि बाँधे खड़ी थीं ॥ २७ ॥

अब्रवीत् तास्तदा वाक्यं शुकः परमधर्मवित् ।

पिता यद्यनुगच्छेन्मां क्रोशमानः शुकेति वै ॥ २८ ॥

ततः प्रतिवचो देयं सर्वैरेव समाहितैः ।

एतन्मे स्नेहतः सर्वे वचनं कर्तुमर्हथ ॥ २ ९ ॥

तब परम धर्मज्ञ शुकदेवजीने उन सबसे कहा– ' देवियो! यदि मेरे पिताजी मेरा नाम लेकर पुकारते हुए इधर आ निकलें तो आप सब लोग सावधान होकर मेरी ओरसे उन्हें उत्तर देना । आप लोगोंका मुझपर बड़ा स्नेह है; इसलिये आप सब मेरी इतनी - सी बात मान लेना ' ॥ २८-२९ ॥

शुकस्य वचनं श्रुत्वा दिशः सर्वाः सकाननाः ।

समुद्राः सरितः शैलाः प्रत्यूचुस्तं समन्ततः ॥ ३० ॥

शुकदेवजीकी यह बात सुनकर कानर्नोसहित सम्पूर्ण दिशाओं, समुद्रों, नदियों, पर्वतों और पर्वतोंकी अधिष्ठात्री देवियोंने सब ओरसे यह उत्तर दिया- ॥ ३० ॥

यथाऽऽज्ञापयसे विप्र बाढमेवं भविष्यति ।

ऋषेर्व्याहरतो वाक्यं प्रतिवक्ष्यामहे वयम् ॥ ३१ ॥

पृष्ठ 2228

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‘ ब्रह्मन्! आप जैसी आज्ञा देते हैं, निश्चय ही वैसा ही होगा । जब महर्षि व्यास 3 पुकारेंगे, तब हम सब लोग उन्हें उत्तर देंगी' ॥ ३१ ॥

इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकाभिपतने द्वात्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः ॥ ३३२ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवजीका ऊर्ध्वगमनविषयक तीन सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३३२ ॥

PPP

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त्रयस्त्रिंशदधिकत्रिशततमोऽध्यायः शुकदेवजीकी परमपद प्राप्ति तथा पुत्र - शोकसे व्याकुल व्यासजीको महादेवजीका आश्वासन देना भीष्मउवाच

इत्येवमुक्त्वा वचनं ब्रह्मर्षिः सुमहातपाः ।

प्रातिष्ठत शुकः सिद्धिं हित्वा दोषांश्चतुर्विधान् ॥ १ ॥

तमो ह्यष्टविधं हित्वा जहौ पञ्चविधं रजः ।

ततः सत्त्वं जहौ धीमांस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ २ ॥

भीष्मजी कहते हैं – युधिष्ठिर! यह वचन कहकर महातपस्वी शुकदेवजी सिद्धि पानेके उद्देश्यसे आगे बढ़ गये । बुद्धिमान् शुकने चार प्रकारके दोषोंका, आठ प्रकारके तमोगुणका तथा पाँच प्रकारके रजोगुणका परित्याग करके सत्त्वगुणको भी त्याग दिया*; यह एक अद्भुत - सी बात हुई ॥ १-२ ॥

ततस्तस्मिन् पदे नित्ये निर्गुणे लिङ्गवर्जिते ।

ब्रह्मणि प्रत्यतिष्ठत् स विधूमोऽग्निरिव ज्वलन् ॥ ३ ॥

तत्पश्चात् वे नित्य निर्गुण एवं लिंगरहित ब्रह्मपदमें स्थित हो गये । उस समय उनका तेज धूमहीन अग्निकी भाँति देदीप्यमान हो रहा था ॥ ३ ॥

उल्कापाता दिशां दाहो भूमिकम्पस्तथैव च ।

प्रादुर्भूतः क्षणे तस्मिंस्तदद्भुतमिवाभवत् ॥ ४ ॥

उसी क्षण उल्काएँ टूटकर गिरने लगीं । दिशाओंमें दाह होने लगा और धरती डोलने लगी । यह सब आश्चर्यकी - सी घटना घटित हुई ॥ ४ ॥

द्रुमाः शाखाश्च मुमुचुः शिखराणि च पर्वताः ।

निर्घातशब्दैश्च गिरिर्हिमवान् दीर्यतीव ह ॥ ५ ॥

वृक्षोंने अपनी शाखाएँ अपने - आप तोड़कर गिरा दीं । पर्वतोंने अपने शिखर भंग कर दिये । वज्रपातके शब्दोंसे गिरिराज हिमालय विदीर्ण- सा होता जान पड़ता था ॥ ५ ॥

न बभासे सहस्रांशुर्न जज्वाल च पावकः ।

ह्रदाश्च सरितश्चैव चुक्षुभुः सागरास्तथा ॥ ६ ॥

सूर्यकी प्रभा फीकी पड़ गयी । आग प्रज्वलित नहीं होती थी । सरोवर, सरिता और समुद्र सभी क्षुब्ध हो उठे ॥

ववर्ष वासवस्तोयं रसवच्च सुगन्धि च ।

ववौ समीरणश्चापि दिव्यगन्धवहः शुचिः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 2230

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इन्द्रने सरस और सुगन्धित जलकी वर्षा की तथा दिव्य गन्ध फैलाती हुई परम पवित्र वायु चलने लगी ॥

सशृङ्गे प्रथमे दिव्ये हिमवन्मेरुसम्भवे ।

संश्लिष्टे श्वेतपीते द्वे रुक्मरूप्यमये शुभे ॥ ८ ॥

शतयोजनविस्तारे तिर्यगूर्ध्वं च भारत ।

उदीचीं दिशमास्थाय रुचिरे संददर्श ह ॥ ९ ॥

भरतनन्दन! आगे बढ़नेपर श्रीशुकदेवजीने पर्वतके दो दिव्य एवं सुन्दर शिखर देखे, जो एक- दूसरेसे सटे हुए थे । उनमेंसे एक हिमालयका शिखर था और दूसरा मेरुपर्वतका । हिमालयका शिखर रजतमय होनेके कारणश्वेत दिखायी देता था और सुमेरुका स्वर्णमय

शृंग पीले रंगका था । इन दोनोंकी लंबाई-चौड़ाई और ऊँचाई सौ - सौ योजनकी थी ।

उत्तरदिशाकी ओर जाते समय ये दोनों सुरम्य शिखर शुकदेवजीकी दृष्टिमें पड़े ॥ ८ - ९ ॥

सोऽविशङ्केन मनसा तदैवाभ्यपतच्छुकः ।

ततः पर्वतशृङ्गे द्वे सहसैव द्विधाकृते ॥ १० ॥

अदृश्येतां महाराज तदद्भुतमिवाभवत् । उन्हें देखकर वे पूर्ववत् निःशंक मनसे उनके ऊपर चढ़ गये । फिर तो वे दोनों पर्वतशिखर सहसा दो भागोंमें बँट गये और बीचसे फटे हुए - से दिखायी देने लगे । महाराज! यह एक अद्भुत - सी बात हुई ॥ १०३ ॥

ततः पर्वतशृङ्गाभ्यां सहसैव विनिःसृतः ॥ ११ ॥

न च प्रतिजघानास्य स गतिं पर्वतोत्तमः । तत्पश्चात् उन पर्वतशिखरोंसे वे सहसा आगे निकल गये । वह श्रेष्ठ पर्वत उनकी गतिको रोक न सका ॥ ततो महानभूच्छब्दो दिवि सर्वदिवौकसाम् ॥ १२ ॥

गन्धर्वाणामृषीणां च ये च शैलनिवासिनः । यह देख सम्पूर्ण देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों तथा जो उस पर्वतपर रहनेवाले दूसरे लोग थे, उन सबने बड़े जोरसे हर्षनाद किया । उनकी हर्षध्वनि आकाशमें चारों ओर गूँज उठी ॥ १२३ ॥

दृष्ट्वा शुकमतिक्रान्तं पर्वतं च द्विधाकृतम् ॥ १३ ॥

साधु साध्विति तत्रासीन्नादः सर्वत्र भारत । भारत! शुकदेवजीको पर्वत लाँघकर आगे बढ़ते और उस पर्वतको दो टुकड़ोंमें विदीर्ण होते देख वहाँ सब ओर ‘ साधु- साधु ' शब्द सुनायी पड़ने लगे ॥ १३३ ॥

स पूज्यमानो देवैश्च गन्धर्वैर्ऋषिभिस्तथा ॥ १४ ॥

यक्षराक्षससंघैश्च विद्याधरगणैस्तथा ।

दिव्यैः पुष्पैः समाकीर्णमन्तरिक्षं समन्ततः ॥ १५ ॥