श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड ६ — पृष्ठ 1101–1110

महाभारत — खण्ड ६ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1101–1110

पृष्ठ 1101

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एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः प्रमथगणोंके द्वारा धर्माधर्मसम्बन्धी रहस्यका कथन भीष्म उवाच

ततः सर्वे महाभागा देवाश्च पितरश्च ह ।

ऋषयश्च महाभागाः प्रमथान् वाक्यमब्रुवन् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर सभी महाभाग देवता, पितर तथा महान् भाग्यशाली महर्षि प्रमथगणोंसे बोले - ॥ १ ॥

भवन्तो वै महाभागा अपरोक्षनिशाचराः ।

उच्छिष्टानशुचीन् क्षुद्रान् कथं हिंसथ मानवान् ॥ २ ॥

‘ महाभागगण! आपलोग प्रत्यक्ष निशाचर हैं । बताइये, अपवित्र, उच्छिष्ट और शूद्र मनुष्योंकी किस तरह और क्यों हिंसा करते हैं? ॥ २ ॥

के च स्मृताः प्रतीघाता येन मर्त्यान् न हिंसथ ।

रक्षोघ्नानि च कानि स्युर्यैर्गृहेषु प्रणश्यथ ।

श्रोतुमिच्छाम युष्माकं सर्वमेतन्निशाचराः ॥ ३ ॥

‘ वे कौन - से प्रतिघात ( शत्रुके आघातोंको रोक देनेवाले उपाय) हैं, जिनका आश्रय लेनेसे आपलोग उन मनुष्योंकी हिंसा नहीं करते । वे रक्षोघ्न मन्त्र कौन - से हैं, जिनका उच्चारण करनेसे आपलोग घरमें ही नष्ट हो जायँ या भाग जायँ? निशाचरो! ये सारी बातें हम आपके मुखसे सुनना चाहते हैं' ॥ ३ ॥

प्रमथा ऊचुः

मैथुनेन सदोच्छिष्टाः कृते चैवाधरोत्तरे ।

मोहान्मांसानि खादेत वृक्षमूले च यः स्वपेत् ॥ ४ ॥

आमिषं शीर्षतो यस्य पादतो यश्च संविशेत् ।

तत उच्छिष्टकाः सर्वे बहुच्छिद्राश्च मानवाः ॥ ५ ॥

उदके चाप्यमेध्यानि श्लेष्माणं च प्रमुञ्चति ।

एते भक्ष्याश्च वध्याश्च मानुषा नात्र संशयः ॥ ६ ॥

प्रमथ बोले- जो मनुष्य सदा स्त्री-सहवासके कारण दूषित रहते, बड़ोंका अपमान करते, मूर्खतावश मांस खाते, वृक्षकी जड़में सोते, सिरपर मांसका बोझा ढोते, बिछौनोंपर पैर रखनेकी जगह सिर रखकर सोते, वे सब- के - सब मनुष्य उच्छिष्ट ( अपवित्र ) तथा बहुत-से छिद्रोंवाले माने गये हैं । जो पानीमें मल- मूत्र एवं थूक फेकते हैं, वे भी उच्छिष्टकी ही

पृष्ठ 1102

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कोटिमें आते हैं । ये सभी मानव हमारी दृष्टिमें भक्षण और वधके योग्य हैं । इसमें संशय नहीं है ॥ ४–६ ॥

एवंशीलसमाचारान् धर्षयामो हि मानवान् ।

श्रूयतां च प्रतीघातान् यैर्न शक्नुम हिंसितुम् ॥ ७ ॥

जिनके ऐसे शील और आचार हैं, उन मनुष्योंको हम धर दबाते हैं । अब उन प्रतिरोधक उपायोंको सुनिये, जिनके कारण हम मनुष्योंकी हिंसा नहीं कर पाते ॥ ७ ॥

गोरोचनासमालम्भो वचाहस्तश्च यो भवेत् ।

घृताक्षतं च यो दद्यान्मस्तके तत्परायणः ॥ ८ ॥

ये च मांसं न खादन्ति तान् न शक्नुम हिंसितुम् । जो अपने शरीरमें गोरोचन लगाता, हाथमें वच नामक औषध लिये रहता, ललाटमें घी और अक्षत धारण करता तथा मांस नहीं खाता– ऐसे मनुष्योंकी हिंसा हम नहीं कर सकते ॥ ८३ ॥

यस्य चाग्निर्गृहे नित्यं दिवारात्रौ च दीप्यते ॥ ९ ॥

तरक्षोश्चर्म दंष्ट्राश्च तथैव गिरिकच्छपः ।

आज्यधूमो बिडालश्चच्छागः कृष्णोऽथ पिङ्गलः ॥ १० ॥

येषामेतानि तिष्ठन्ति गृहेषु गृहमेधिनाम् ।

तान्यधृष्याण्यगाराणि पिशिताशैः सुदारुणैः ॥ ११ ॥

जिसके घरमें अग्निहोत्रकी अग्नि नित्य-दिन- रात देदीप्यमान रहती है, छोटे जातिके बाघ ( जरख ) का चर्म, उसीकी दाढ़ें तथा पहाड़ी कछुआ मौजूद रहता है, घीकी आहुतिसे सुगन्धित धूम निकलता रहता है, बिलाव तथा काला या पीला बकरा रहता है, जिन गृहस्थोंके घरोंमें ये सभी वस्तुएँ स्थित होती हैं, उन घरोंपर भयंकर मांसभक्षी निशाचर आक्रमण नहीं करते हैं ॥ ९ –११ ॥ लोकानस्मद्विधा ये च विचरन्ति यथासुखम् ।

तस्मादेतानि गेहेषु रक्षोघ्नानि विशाम्पते ।

एतद् वः कथितं सर्वं यत्र वः संशयो महान् ॥ १२ ॥

हमारे - जैसे जो भी निशाचर अपनी मौजसे सम्पूर्ण लोकोंमें विचरते हैं, वे उपर्युक्त घरोंको कोई हानि नहीं पहुँचा सकते; अतः प्रजानाथ! अपने घरोंमें इन रक्षोघ्न वस्तुओंको अवश्य रखना चाहिये । यह सब विषय, जिसमें आपलोगोंको महान् संदेह था, मैंने कह सुनाया ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि प्रमथरहस्ये एकत्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३१ ॥

पृष्ठ 1103

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इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंप्रमथगणोंका धर्मसम्बन्ध रहस्यविषयक एक सौ एकतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३१ ॥

पृष्ठ 1104

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द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः दिग्गजोंका धर्मसम्बन्धी रहस्य एवं प्रभाव भीष्म उवाच

ततः पद्मप्रतीकाशः पद्मोद्भूतः पितामहः ।

उवाच वचनं देवान् वासवं च शचीपतिम् ॥ १ ॥

भीष्मजी कहते हैं - राजन्! तदनन्तर कमलके समान कान्तिमान् कमलोद्भव ब्रह्माजीने देवताओं तथा शचीपति इन्द्रसे इस प्रकार कहा— ॥ १ ॥

अयं महाबलो नागो रसातलचरो बली ।

तेजस्वी रेणुको नाम महासत्त्वपराक्रमः ॥ २ ॥

अतितेजस्विनः सर्वे महावीर्या महागजाः ।

धारयन्ति महीं कृत्स्नां सशैलवनकाननाम् ॥ ३ ॥

‘ यह रसातलमें विचरनेवाला, महाबली, शक्ति- शाली, महान् सत्त्व और पराक्रमसे युक्त तेजस्वी रेणुक नामवाला नाग यहाँ उपस्थित है । सब- के - सब महान् गजराज ( दिग्गज ) अत्यन्त तेजस्वी और महापराक्रमी होते हैं । वे पर्वत, वन और काननोंसहित समूची पृथ्वीको धारण करते हैं ॥ २-३ ॥

भवद्भिः समनुज्ञातो रेणुकस्तान् महागजान् ।

धर्मगुह्यानि सर्वाणि गत्वा पृच्छतु तत्र वै ॥ ४ ॥

‘ यदि आपलोग आज्ञा दें तो रेणुक उन महान् गजोंके पास जाकर धर्मके समस्त गोपनीय रहस्योंको पूछे ' ॥

पितामहवचः श्रुत्वा ते देवा रेणुकं तदा ।

प्रेषयामासुरव्यग्रा यत्र ते धरणीधराः ॥ ५ ॥

पितामह ब्रह्माजीकी बात सुनकर शान्त चित्तवाले देवताओंने उस समय रेणुकको उस स्थानपर भेजा, जहाँ पृथ्वीको धारण करनेवाले वे दिग्गज मौजूद थे ॥ ५ ॥

रेणुक उवाच अनुज्ञातोऽस्मि देवैश्च पितृभिश्च महाबलाः ।

धर्मगुह्यानि युष्माकं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः ।

कथयध्वं महाभागा यद् वस्तत्त्वं मनीषितम् ॥ ६ ॥

रेणुकने कहा – महाबली दिग्गजो! मुझे देवताओं और पितरोंने आज्ञा दी है, इसलिये यहाँ आया हूँ और आपलोगोंके जो धर्मविषयक गूढ़ विचार हैं, उन्हें मैं यथार्थरूपसे सुनना

पृष्ठ 1105

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चाहता हूँ । महाभाग दिग्गजो! आपकी बुद्धिमें जो धर्मका तत्त्व निहित हो, उसे कहिये ॥ ६ ॥

दिग्गजा ऊचुः

कार्तिके मासि चाश्लेषा बहुलस्याष्टमी शिवा ।

तेन नक्षत्रयोगेन यो ददाति गुडौदनम् ॥ ७ ॥

इमं मन्त्रं जपन् श्राद्धे यताहारो ह्यकोपनः । दिग्गजोंने कहा — कार्तिक मासके कृष्णपक्षमें आश्लेषा नक्षत्र और मंगलमयी अष्टमी तिथिका योग होनेपर जो मनुष्य आहार- संयमपूर्वक क्रोधशून्य हो निम्नांकित मन्त्रका पाठ करते हुए श्राद्धके अवसरपर हमारे लिये गुड़मिश्रित भात देता है ( वह महान् फलका भागी होता है) ॥ बलदेवप्रभृतयो ये नागा बलवत्तराः ॥ ८ ॥

अनन्ता ह्यक्षया नित्यं भोगिनः सुमहाबलाः ।

तेषां कुलोद्भवा ये च महाभूता भुजङ्गमाः ॥ ९ ॥

ते मे बलिं प्रतीच्छन्तु बलतेजोऽभिवृद्धये ।

यदा नारायणः श्रीमानुज्जहार वसुंधराम् ॥ १० ॥

तद् बलं तस्य देवस्य धरामुद्धरतस्तथा । ‘ बलदेव ( शेष या अनन्त) आदि जो अत्यन्त बलशाली नाग हैं, वे अनन्त, अक्षय, नित्य फनधारी और महाबली हैं । वे तथा उनके कुलमें उत्पन्न हुए जो अन्य विशाल भुजंगम हों, वे भी मेरे तेज और बलकी वृद्धिके लिये मेरी दी हुई इस बलिको ग्रहण करें । जब श्रीमान् भगवान् नारायणने इस पृथ्वीका एकार्णवके जलसे उद्धार किया था, उस समय इस वसुन्धराका उद्धार करते हुए उन भगवान्‌के श्रीविग्रहमें जो बल था, वह मुझे प्राप्त हो ' ॥ ८ –१० ॥ एवमुक्त्वा बलिं तत्र वल्मीके तु निवेदयेत् ॥ ११ ॥

गजेन्द्रकुसुमाकीर्णं नीलवस्त्रानुलेपनम् ।

निर्वपेत् तं तु वल्मीके अस्तं याते दिवाकरे ॥ १२ ॥

इस प्रकार कहकर किसी बाँबीपर बलि निवेदन करे । उसपर नागकेसर बिखेर दे, चन्दन चढ़ा दे और उसे नीले कपड़ेसे ढक दे तथा सूर्यास्त होनेपर उस बलिको बाँबीके पास रख दे ॥ ११-१२ ॥

एवं तुष्टास्ततः सर्वे अधस्ताद्भारपीडिताः ।

श्रमं तं नावबुध्यामो धारयन्तो वसुंधराम् ॥ १३ ॥

एवं मन्यामहे सर्वे भारार्ता निरपेक्षिणः ।

पृष्ठ 1106

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इस प्रकार संतुष्ट होकर पृथ्वीके नीचे भारसे पीड़ित होनेपर भी हम सब लोगोंको वह परिश्रम प्रतीत नहीं होता है और हमलोग सुखपूर्वक वसुधाका भार वहन करते हैं । भारसे पीड़ित होनेपर भी किसीसे कुछ न चाहनेवाले हम सब लोग ऐसा ही मानते हैं ॥ १३३ ॥

ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यः शूद्रो वा यद्युपोषितः ॥ १४ ॥

एवं संवत्सरं कृत्वा दानं बहुफलं लभेत् ।

वल्मीके बलिमादाय तन्नो बहुफलं मतम् ॥ १५ ॥

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र यदि उपवासपूर्वक एक वर्षतक इस प्रकार हमारे लिये बलिदान करे तो उसका महान् फल होता है । बाँबीके निकट बलि अर्पित करनेपर वह हमारे लिये अधिक फल देनेवाला माना गया है ॥

ये च नागा महावीर्यास्त्रिषु लोकेषु कृत्स्नशः ।

कृतातिथ्या भवेयुस्ते शतं वर्षाणि तत्त्वतः ॥ १६ ॥

तीनों लोकोंमें जो समस्त महापराक्रमी नाग हैं, वे इस बलिदानसे सौ वर्षोंके लिये यथार्थरूपसे सत्कृत हो जाते हैं ॥ १६ ॥

दिग्गजानां च तच्छ्रुत्वा देवताः पितरस्तथा ।

ऋषयश्च महाभागाः पूजयन्ति स्म रेणुकम् ॥ १७ ॥

दिग्गजोंके मुखसे यह बात सुनकर महाभाग देवता, पितर और ऋषि रेणुक नागकी भूरि- भूरि प्रशंसा करने लगे ॥ १७ ॥

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि दिग्गजानां रहस्ये द्वात्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३२ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमेंदिग्गजोंका धर्मसम्बन्धी रहस्यविषयक एक सौ बत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ १३२ ॥

पृष्ठ 1107

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त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः महादेवजीका धर्मसम्बन्धी रहस्य महेश्वर उवाच

सारमुद्धृत्य युष्माभिः साधुधर्म उदाहृतः ।

धर्मगुह्यमिदं मत्तः शृणुध्वं सर्व एव ह ॥ १ ॥

(ऋषि, मुनि, देवता और पितरोंसे ) महेश्वर बोले- तुमलोगोंने धर्मशास्त्रका सार निकालकर उत्तम धर्मका वर्णन किया है । अब सब लोग मुझसे धर्म - सम्बन्धी इस गूढ़ रहस्यका वर्णन सुनो ॥ १ ॥

येषां धर्माश्रिता बुद्धिः श्रद्दधानाश्च ये नराः ।

तेषां स्यादुपदेष्टव्यः सरहस्यो महाफलः ॥ २ ॥

जिनकी बुद्धि सदा धर्ममें ही लगी रहती है और जो मनुष्य परम श्रद्धालु हैं, उन्हींको इस महान् फलदायक रहस्ययुक्त धर्मका उपदेश देना चाहिये ॥ २ ॥

निरुद्विग्नस्तु यो दद्यान्मासमेकं गवाह्निकम् ।

एकभक्तं तथाश्नीयाच्छूयतां तस्य यत् फलम् ॥ ३ ॥

जो उद्वेगरहित होकर एक मासतक प्रतिदिन गौको भोजन देता है और स्वयं एक ही समय खाता है, उसे जो फल मिलता है, उसका वर्णन सुनो ॥ ३ ॥

इमा गावो महाभागाः पवित्रं परमं स्मृताः ।

त्रील्लोँकान् धारयन्ति स्म सदेवासुरमानुषान् ॥ ४ ॥

ये गौएँ परम सौभाग्यशालिनी और अत्यन्त पवित्र मानी गयी हैं । ये देवता, असुर और मनुष्योंसहित तीनों लोकोंको धारण करती हैं ॥ ४ ॥

तासु चैव महापुण्यं शुश्रूषा च महाफलम् ।

अहन्यहनि धर्मेण युज्यते वै गवाह्निकः ॥ ५ ॥

इनकी सेवा करनेसे बहुत बड़ा पुण्य और महान् फल प्राप्त होता है । प्रतिदिन गौओंको भोजन देनेवाला मनुष्य नित्य महान् धर्मका उपार्जन करता है ॥ ५ ॥

मया ह्येता ह्यनुज्ञाताः पूर्वमासन् कृते युगे ।

ततोऽहमनुनीतो वै ब्रह्मणा पद्मयोनिना ॥ ६ ॥

मैंने पहले सत्ययुगमें गौओंको अपने पास रहनेकी आज्ञा दी थी । पद्मयोनि ब्रह्माजीने इसके लिये मुझसे बहुत अनुनय- विनय की थी ॥ ६ ॥

तस्माद् व्रजस्थानगतस्तिष्ठत्युपरि मे वृषः ।

रमेऽहं सह गोभिश्च तस्मात् पूज्याः सदैव ताः ॥ ७ ॥

पृष्ठ 1108

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इसलिये मेरी गौओंके झुंडमें रहनेवाला वृषभ मुझसे ऊपर मेरे रथकी ध्वजामें विद्यमान है । मैं सदा गौओंके साथ रहनेमें ही आनन्दका अनुभव करता हूँ । अतः उन गौओंकी सदा ही पूजा करनी चाहिये ॥ ७ ॥

महाप्रभावा वरदा वरं दद्युरुपासिताः ।

ता गावोऽस्यानुमन्यन्ते सर्वकर्मसु यत् फलम् ॥ ८ ॥

तस्य तत्र चतुर्भागो यो ददाति गवाह्निकम् ॥ ९ ॥

गौओंका प्रभाव बहुत बड़ा है । वे वरदायिनी हैं । इसलिये उपासना करनेपर अभीष्ट वर देती हैं । उसे सम्पूर्ण कर्मोंमें जो फल अभीष्ट होता है । उसके लिये वे गौएँ अनुमोदन करती —उसकी सिद्धिके लिये वरदान देती हैं । जो पूर्वोक्तरूपसे गौको नित्य भोजन देता है, उसे सदाकी जानेवाली गोसेवाके फलका एक चौथाई पुण्य प्राप्त होता है ॥ ८ - ९ ॥ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि महादेवरहस्ये त्रयस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १३३ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें महादेवजीका धर्मसम्बन्धी रहस्यविषयक एक सौ तैंतीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १३३ ॥

पृष्ठ 1109

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चतुस्त्रिंशदधिकशततमोऽध्यायः स्कन्ददेवका धर्मसम्बन्धी रहस्य तथा भगवान् विष्णु और भीष्मजीके द्वारा माहात्म्यका वर्णन स्कन्द उवाच

ममाप्यनुमतो धर्मस्तं शृणुध्वं समाहिताः ।

नीलषण्डस्य शृंगाभ्यां गृहीत्वा मृत्तिकां तु यः ॥ १ ॥

अभिषेकं त्र्यहं कुर्यात् तस्य धर्मं निबोधत । स्कन्दने कहा —– देवताओ! अब एकाग्रचित्त होकर मेरी मान्यताके अनुसार भी धर्मका गोपनीय रहस्य सुनो । जो मनुष्य नीले रंगके साँड़की सींगोंमें लगी हुई मिट्टी लेकर इससे तीन दिनोंतक स्नान करता है, उसे प्राप्त होनेवाले पुण्यका वर्णन सुनो ॥ १३ ॥

शोधयेदशुभं सर्वमाधिपत्यं परत्र च ॥ २ ॥

यावच्च जायते मर्त्यस्तावच्छूरो भविष्यति । वह अपने सारे पापोंको धो डालता है और परलोकमें आधिपत्य प्राप्त करता है । फिर जब वह मनुष्ययोनिमें जन्म लेता है, तब शूरवीर होता है ॥ २३ ॥

इदं चाप्यपरं गुह्यं सरहस्यं निबोधत ॥ ३ ॥

प्रगृह्यौदुम्बरं पात्रं पक्वान्नं मधुना सह ।

सोमस्योत्तिष्ठमानस्य पौर्णमास्यां बलिं हरेत् ॥ ४ ॥

तस्य धर्मफलं नित्यं श्रद्दधाना निबोधत ।

साध्या रुद्रास्तथादित्या विश्वेदेवास्तथाश्विनौ ॥ ५ ॥

मरुतो वसवश्चैव प्रतिगृह्णन्ति तं बलिम् ।

सोमश्च वर्धते तेन समुद्रश्च महोदधिः ॥ ६ ॥

एष धर्मो मयोद्दिष्टः सरहस्यः सुखावहः ॥ ७ ॥

अब धर्मका यह दूसरा गुप्त रहस्य सुनो। पूर्णमासी तिथिको चन्द्रोदयके समय ताँबेके बर्तनमें मधु मिलाया हुआ पकवान लेकर जो चन्द्रमाके लिये बलि अर्पण करता है, उसे जिस नित्य धर्म- फलकी प्राप्ति होती है, उसका श्रद्धापूर्वक श्रवण करो । उस पुरुषकी दी हुई उस बलिको साध्य, रुद्र, आदित्य, विश्वेदेव, अश्विनीकुमार, मरुद्गण और वसुदेवता भी ग्रहण करते हैं तथा उससे चन्द्रमा और समुद्रकी वृद्धि होती है। इस प्रकार मैंने रहस्यसहित सुखदायक धर्मका वर्णन किया है ॥ ३–७ ॥ विष्णुरुवाच धर्मगुह्यानि सर्वाणि देवतानां महात्मनाम् ।

पृष्ठ 1110

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ऋषीणां चैव गुह्यानि यः पठेदाह्निकं सदा ॥ ८ ॥

शृणुयाद् वानसूयुर्यः श्रद्दधानः समाहितः ।

नास्य विघ्नः प्रभवति भयं चास्य न विद्यते ॥ ९ ॥

भगवान् विष्णु बोले- जो देवताओं तथा महात्मा ऋषियोंके बताये हुए धर्मसम्बन्धी इन सभी गूढ़ रहस्योंका प्रतिदिन पाठ करेगा अथवा दोषदृष्टिसे रहित हो सदा एकाग्रचित्त रहकर श्रद्धापूर्वक श्रवण करेगा, उसपर किसी विघ्नका प्रभाव नहीं पड़ेगा तथा उसे कोई भय भी नहीं प्राप्त होगा ॥ ८ - ९ ॥ Brijondher

ये च धर्माः शुभाः पुण्याः सरहस्या उदाहृताः ।

तेषां धर्मफलं तस्य यः पठेत जितेन्द्रियः ॥ १० ॥

यहाँ जिन- जिन पवित्र एवं कल्याणकारी धर्मोंका रहस्योंसहित वर्णन किया गया है, उन सबका जो इन्द्रियसंयमपूर्वक पाठ करेगा, उसे उन धर्मोंका पूरा - पूरा फल प्राप्त होगा ॥ १० ॥

नास्य पापं प्रभवति न च पापेन लिप्यते ।

पठेद् वा श्रावयेद् वापि श्रुत्वा वा लभते फलम् ॥ ११ ॥

भुञ्जते पितरो देवा हव्यं कव्यमथाक्षयम् ।