श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी — पृष्ठ 301–310
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · पृष्ठ 301–310
पृष्ठ 301
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आश्चोतनाञ्जनविधिरध्यायः २३ ] सूत्रस्थानम् २६५ —लेखनं तत्र कषायाम्लपटूषणैः ॥ १० ॥
लेखन अंजन —यह कसैले, खट्टे, नमकीन तथा कटुरस - प्रधान द्रव्यों द्वारा बनाया जाता है ॥ १० ॥
रोपणं तिक्तकैर्द्रव्यैः-रोपण अंजन — तिक्तरस - प्रधान द्रव्यों द्वारा रोपण अंजन का निर्माण किया जाता है ।
- स्वादुशीतैः प्रसादनम् । तीक्ष्णाञ्जनाभिसन्तप्ते नयने तत्प्रसादनम् ॥ ११ ॥
प्रयुज्यमानं लभते प्रत्यञ्जनसमाह्वयम् । प्रसादन अंजन – मधुररस - प्रधान तथा शीतवीर्य द्रव्यों से निर्मित अंजन को प्रसादन अंजन कहते हैं । प्रत्यञ्जन — तीक्ष्ण ( लेखन ) अंजन का प्रयोग करने से सन्तप्त ( जिसमें जलन हो रही हो ) नेत्र में जलन की शान्ति के लिए चूर्ण रूप जिस अंजन का प्रयोग किया जाता है, उसे प्रत्यञ्जन कहते हैं ॥११ ॥।
वक्तव्य- - ' प्रसादन अंजन ' को ' स्नेहन अंजन ' भी कहा गया है । अंजन के अन्य तीन भेद इस प्रकार हैं— १. गुटिका, जैसे — चन्द्रोदयावर्ति आदि । २. रस, जैसे – नेत्रबिन्दु आदि और ३. चूर्ण, सुरमा आदि । प्रत्यञ्जन का प्रयोग स्वस्थ नेत्रों में प्रतिदिन किया जा सकता है । इसे देखें — अ.सं.सू. ३२।८ । दशाङ्गुला तनुर्मध्ये शलाका मुकुलानना ॥ १२ ॥
प्रशस्ता, लेखने ताम्री, रोपणे काललोहजा । अङ्गुली च, सुवर्णोत्था रूप्यजा च प्रसादने ॥ १३ ॥
अञ्जन - शलाका — इसकी लम्बाई १० अंगुल, मध्य भाग कुछ मोटाई युक्त तथा अगला भाग गोल होना चाहिए । लेखन अंजन लगाने के लिए ताँबा की, रोपण अंजन लगाने के लिए काललौह ( इस्पाती लोह् ) की शलाका अथवा अंगुली और प्रसाद अंजन लगाने के लिए सोने की अथवा चाँदी की शलाका ( सलाई ) होनी चाहिए । शलाका के अभाव में सभी अंजन अंगुली से लगाये जा सकते हैं । १२-१३ ॥ वक्तव्य — बरेली के बाजार में अथवा सर्वत्र शृंगार - साधन की दूकानों में विभिन्न धातुओं की सलाई सहित सुरमादानियाँ मिलती हैं । प्रायः मटर या राजमाष की गोलाई के समान मोटी सलाई सुरमा लगाने के लिए उत्तम मानी जाती है । सलाई का चिकना होना अति आवश्यक होता है । सुरमादानी तथा सलाई सोना, चाँदी, पीतल, कांसा, जस्ता ( यशद ), शीशा तथा काँच की बनायी जाती हैं । सुरमा के साथ उक्त धातुओं का भी उपयोग नेत्रों को लाभ पहुँचाता है । इसके लिए धातुओं के गुण - धर्मों पर विचार करें । पिण्डो रसक्रिया चूर्णस्त्रिधैवाञ्जनकल्पना । गुरौ मध्ये लघौ दोषे तां क्रमेण प्रयोजयेत् ॥१४ ॥
अञ्जनों की त्रिविध कल्पना- अंजनों के निर्माण तीन प्रकार से किये जाते हैं— १. पिण्ड ( गोली या बत्ती के रूप में ), २. रसक्रिया ( मधु या काजल के रूप में ) तथा ३. चूर्ण ( नयनामृत, ममीरा का सुरमा आदि ) । इनके प्रयोग — दोषों के बढ़ जाने पर पिण्ड अंजनों का, मध्यम दोष होने पर रसक्रिया का तथा लघु दोष में चूर्ण रूप में प्रयुक्त होने वाले अंजनों का प्रयोग करना चाहिए ॥१४ ॥
हरेणुमात्रा पिण्डस्य वेल्लमात्रा रसक्रिया । तीक्ष्णस्य, द्विगुणं तस्य मृदुनः-अञ्जनों की मात्रा — तीक्ष्ण पिण्ड ( वर्ति ) रूप अंजन की मात्रा हरेणु ( बड़े चने ) के बराबर, रसक्रिया नामक अंजन की मात्रा वेल्ल ( वायविडंग ) के बराबर होती है । मृदु पिण्ड अंजन की मात्रा दो हरेणु के
बराबर और मृदु रसक्रिया नामक अंजन की मात्रा दो वेल्ल के बराबर होती है ।
- चूर्णितस्य च ॥ १५ ॥
द्वे शलाके तु तीक्ष्णस्य, तिस्रस्तदितरस्य च । तीक्ष्ण अञ्जनों की मात्रा - तीक्ष्ण चूर्ण अंजन की मात्रा दो सलाई में जितना चूर्ण ( सुरमा या अंजन ) उठ जाय उतनी मात्रा होती है तथा मृदु चूर्णाञ्जन की मात्रा तीन सलाईभर होती है ॥ १५ ॥
पृष्ठ 302
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६६ अष्टाङ्गहृदये वक्तव्य — कुछ संस्करणों में इसका पाठभेद मिलता है, किन्तु अर्थ की दृष्टि से दोनों पाठ समान
नहीं हैं ।
निशि स्वप्ने न मध्याह्ने म्लाने नोष्णगभस्तिभिः ॥ १६ ।
अक्षिरोगाय दोषाः स्युर्वर्धितोत्पीडितद्रुताः । प्रातः सायं च तच्छान्त्यै व्यभ्रेऽर्केऽतोऽञ्जयेत्सदा ॥ अञ्जनप्रयोग - निर्देश— रात में, सोते समय, दोपहर में, सूर्य की तेज किरणों से आँखों के मलिन होने पर अंजन का प्रयोग न करें; क्योंकि उक्त अवसरों तथा स्थितियों में दोष बढ़े रहते हैं, उत्पीड़ित तथा पिघले हुए रहते हैं । अतः इन समयों में अंजन का प्रयोग करने से अंजन नेत्ररोगों को पैदा करने में कारण हो सकते हैं । अतएव नेत्ररोगों की शान्ति के लिए प्रतिदिन प्रातःकाल, सायंकाल तथा जब आकाश में बादल छाये न हों तब अंजन प्रयोग करना चाहिए ॥ १६-१७ ॥ वदन्त्यन्ये तु न दिवा प्रयोज्यं तीक्ष्णमञ्जनम् । विरेकदुर्बलं चक्षुरादित्यं प्राप्य सीदति ॥ १८ ॥
अन्य आचार्यों का मत — अंजन- प्रयोग के सन्दर्भ में आचार्यों का मतभेद – कुछ आचार्यों का कथन है कि तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग दिन में करना ही नहीं चाहिए, क्योंकि तीक्ष्ण अंजन को दिन में लगाने से आँखों से आँसुओं का अधिक स्राव हो जाने पर आँखें दुर्बल पड़ जाती हैं । इस स्थिति में वे सूर्य के प्रकाश को पाकर पीड़ित हो जाती हैं ॥ १८ ॥
स्वप्नेन रात्रौ कालस्य सौम्यत्वेन च तर्पिता । शीतसात्म्या दृगाग्नेयी स्थिरतां लभते पुनः ॥ १ ९ ॥ तीक्ष्णाञ्जन का रात्रि - प्रयोग – रात्रि में सोने से तथा काल के सोमगुणसम्पन्न होने से तृप्त हुई आग्नेय गुण - प्रधान होने पर भी शीतसात्म्य गुणवाली आँखें तीक्ष्ण अंजन द्वारा विरिक्त होने पर भी पुनः स्थिरता को प्राप्त कर लेती हैं ॥ १ ९ ॥ अत्युद्रिक्ते बलासे तु लेखनीयेऽथवा गदे । काममह्नयपि नात्युष्णे तीक्ष्णमक्ष्णि प्रयोजयेत् ॥ २० ॥
उष्णकाल में तीक्ष्णाञ्जन - निषेध - कफदोष की अधिक वृद्धि होने पर अथवा लेखनीय नेत्ररोग होने पर दिन में तीक्ष्ण अंजन का प्रयोग समशीतोष्ण ऋतुओं में भले ही कर लें, परन्तु अत्यन्त उष्णकाल में कभी भी दिन में तीक्ष्णांजन का प्रयोग न करें ॥ २० ॥
अश्मनो जन्म लोहस्य तत एव च तीक्ष्णता । उपघातोऽपि तेनैव तथा नेत्रस्य तेजसः ॥ २१ ॥
लौह एवं नेत्र की समानता — जिस प्रकार लौहधातु की उत्पत्ति पत्थर से होती है, उस पत्थर से ही उस लौह में तीक्ष्णता भी आती है और वह लौहधातु पत्थर के उपघात ( चोट ) से टूट भी जाता है; ठीक यही स्थिति नेत्र की उत्पत्ति आदि की है । यथा— नेत्र की उत्पत्ति तेजस् तत्त्व से होती है, उसमें जो तेजोमयता अर्थात् तीक्ष्णता होती है, वह भी तेजस् तत्त्व से ही होती है और वह नेत्र का उपघात ( विनाश ) भी तेजस् तत्त्व से ही होता है ॥ २१ ॥।
वक्तव्य — नेत्र का यह आलंकारिक परिचय हमें यह समझा रहा है कि तेजोगुण प्रधान नेत्र में कभी भी दिन में उसमें भी उष्णकाल में तीक्ष्णाञ्जन का प्रयोग नहीं करना चाहिए । इसी से मिलता - जुलता एक उदाहरण ज्योतिषशास्त्र में है— ' त्रिज्येष्ठं नैव युक्तं कदापि ' । अर्थात् वर - वधू अपने - अपने घर में सबमें बड़े हों तो उनका विवाह ज्येष्ठ में न करें । यहाँ भी ' तेजसः ' से सम्बन्ध है, अस्तु । न रात्रावपि शीतेऽति नेत्रे तीक्ष्णाञ्जनं हितम् । दोषमस्रावयेत्स्तब्धं कण्डूजाड्यादिकारि तत् ॥ तीक्ष्ण अञ्जन का निषेध - अधिक शीतकाल में रात के समय में भी तीक्ष्ण अंजन हितकारक नहीं होता, क्योंकि शीतकाल में कालप्रभाव से जमे हुए दोष को वह अंजन निकाल तो पाता नहीं, इसके विपरीत वह नेत्र में स्तब्धता, खुजली तथा जड़ता आदि विकारों को पैदा कर देता है ॥ २२ ॥
पृष्ठ 303
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
आश्चोतनाञ्जनविधिरध्यायः २३ ] सूत्रस्थानम् २६७ नाञ्जयेद्भीतवमितविरिक्ताशितवेगिते I क्रुद्धज्वरिततान्ताक्षिशिरोरुक्शोकजागरे ॥ २३ । अदृष्टेऽर्के शिरःस्नाते पीतयोर्धूममद्ययोः । अजीर्णेऽग्न्यर्कसन्तप्ते दिवासुप्ते पिपासिते ॥२४ ॥
अञ्जन के अयोग्य व्यक्ति — भयभीत पुरुष, जिसने अभी वमन किया हो, जिसने अभी विरेचन किया हो, जिसने तत्काल भोजन किया हो, मल - मूत्र आदि के वेग के समय, क्रोध की स्थिति में, ज्वर होने पर, तान्त ( सूक्ष्मदर्शन, तेजोमय पदार्थों को देखने के बाद अथवा अभिघात ) होने पर, नेत्ररोग में, शिरोरोग में, शोक की स्थिति में, अधिक जागरण होने पर, सूर्य के ढके होने पर, शिरः स्नान करने के बाद, धूमपान तथा मद्यपान करने पर, अजीर्ण की स्थिति में, आग या सूर्य से आँखों के सन्तप्त होने पर, दिन में सोने के बाद तथा प्यास लगी हो उस समय भी अंजन का प्रयोग नहीं करना चाहिए ॥ २३-२४ ॥ वक्तव्य — उक्त व्यक्तियों को अंजन का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए, यदि कर दिया जाता है तो उसका क्या प्रतिफल होता है, इसका विवेचन सु. उ. १८।६८ से ७४ तक दिया गया है, देखें ।
अतितीक्ष्णमृदुस्तोकबह्वच्छघनकर्कशम् । अत्यर्थशीतलं तप्तमञ्जनं नावचारयेत् ॥ २५ ॥
निषिद्ध अंजन का वर्णन — अतितीक्ष्ण, अत्यन्त मृदु, बहुत कम, बहुत अधिक, अत्यन्त द्रव, बहुत गाढ़ा, कर्कश ( खुरदरा ), अत्यन्त शीतल तथा अत्यन्त तपा हुआ ( गरम ) इस प्रकार के अंजन प्रयोग करने योग्य नहीं होते, अतएव इन्हें निषिद्ध कहा गया है ॥ २५ ॥
अथानुन्मीलयन् दृष्टिमन्तः सञ्चारयेच्छनैः । अञ्जिते वर्त्मनी किञ्चिञ्चालयेच्चैवमञ्जनम् ॥ २६ ॥
तीक्ष्णं व्याप्नोति सहसा, न चोन्मेषनिमेषणम् । निष्पीडनं च वर्त्मभ्यां क्षालनं वा समाचरेत् ॥ अंजन - प्रयोगविधि —–— अंजन लगाने के बाद पलकों को बिना खोले हुए नेत्रगोलक को धीरे - धीरे भीतर - ही - भीतर नीचे, ऊपर, दाहिने तथा बायें घुमाता रहे और थोड़ा - थोड़ा पलकों को भी कुछ - कुछ टपटपाता रहे । इस प्रकार करने से आँख में लगाया हुआ अंजन आँख के चारों ओर फैल जाता है । विशेष करके यह विधि तीक्ष्ण अंजन के प्रयोग की है । अंजन लगाने के तत्काल बाद सहसा उन्मेष ( पलक को उठाना ) तथा निमेष ( पलक को गिराना ) क्रिया नहीं करनी चाहिए । आँख की पलकों द्वारा अक्षिगोलक को दबाना अथवा आँख को धोना नहीं चाहिए ॥ २६-२७ ॥ वक्तव्य — अंजन लगाने की सुश्रुतसम्मत विधि को देखें — सु.उ. १८।६४-६५ । अपेतौषधसंरम्भं निर्वृतं नयनं यदा । व्याधिदोषर्तुयोग्याभिरद्भिः प्रक्षालयेत्तदा ॥ २८ ॥
नेत्र- प्रक्षालनविधि — अंजन लगाने के बाद जब औषध का लगना एवं गड़ना बन्द हो जाय तब रोग, दोष, ऋतु ( काल ) के अनुकूल अर्थात् शीतकाल में गुनगुने जल से तथा गर्मी में शीतल जल से नेत्र को धो देना चाहिए ॥ २८ ॥
दक्षिणाङ्गुष्ठकेनाक्षि ततो वामं सवाससा । ऊर्ध्ववर्त्मनि सङ्गृह्य शोध्यं वामेन चेतरत् ॥ २ ९ ॥ नेत्र- शोधनविधि — उसके बाद दाहिने अँगूठा पर कोमल एवं साफ वस्त्र लपेट कर उससे बायें नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर उसे साफ कर देना चाहिए और वस्त्र लपेटे हुए बायें अँगूठा से उसके दाहिने नेत्र के ऊपर के पलक को पकड़ कर दाहिने नेत्र को साफ कर देना चाहिए ॥ २ ९ ॥ वर्त्मप्राप्तोऽञ्जनाद्दोषो रोगान् कुर्यादतोऽन्यथा । नेत्र- शोधन में हेतु —अंजन का प्रयोग करने के पश्चात् उक्त विधि से प्रक्षालन ( धोना ) तथा शोधन न करने से पलकों के भीतर बचे हुए अंजन से कुपित हुए दोष रोगों को उत्पन्न कर देते हैं । वक्तव्य- -इसका स्पष्टीकरण देखें— ' अति विरेकात् ’ ' ' दौर्बल्यानि ' । ( अ.सं.सू. ३२।१ ९ ) कण्डूजाड्येऽञ्जनं तीक्ष्णं धूमं वा योजयेत् पुनः ॥ ३० ॥
पृष्ठ 304
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२६८ अष्टाङ्गहृदये तीक्ष्णाञ्जन या धूमपान – यदि नेत्रमण्डल में खुजली अथवा जड़ता का अनुभव हो रहा हो तो तीक्ष्ण अंजन का अथवा तीक्ष्ण धूमपान का प्रयोग कराना चाहिए ॥ ३० ॥
तीक्ष्णाञ्जनाभितप्ते तु चूर्णं प्रत्यञ्जनं हिमम् ॥ ३१ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थान आश्चोतनाञ्जनविधिर्नाम त्रयोविंशोऽध्यायः ॥ २३ ॥
प्रत्यञ्जन का वर्णन — तीक्ष्ण अञ्जन का प्रयोग करने पर यदि आँख में जलन प्रतीत हो रही हो तो चूर्ण ( सुरमा ) का प्रत्यञ्जन करना चाहिए ॥ ३१ ॥
वक्तव्य — प्रतिदिन आँख में जो सुरमा लगाया जाता है, इसी को प्रत्यञ्जन कहते हैं । देखें -अ.हृ.सू. २।५ । नेत्र से खूब आँसू गिरे इसके लिए रसाञ्जन का प्रयोग एक - एक सप्ताह में करना चाहिए । सुश्रुत में भी देखें— सु. उ. १८।६८ । इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में आश्चोतनाञ्जनविधि नामक तेईसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २३ ॥
पृष्ठ 305
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
चतुर्विंशोऽध्यायः अथातस्तर्पणपुटपाकविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब हम यहाँ से तर्पण एवं पुटपाक विधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । जैसा कि आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । उपक्रम — तेईसवें अध्याय में नेत्ररोगों की शान्ति के लिए जिन आश्चोतन तथा अञ्जन विधियों का वर्णन किया था, उनसे प्रायः नेत्रों में दुर्बलता आ जाती है । अतएव उसके बाद इस अध्याय में नेत्रतर्पण आदि विधियों का वर्णन किया जा रहा है । तर्पण का अर्थ है— नेत्रों को द्रव औषधों के सेचन से तृप्त करना । इस कार्य में पुटपाक विधि उपकारक होती है । गीले या सूखे औषध - द्रव्यों से विधिभेद से स्वरस निकाला जाता है और केवल सूखे द्रव्यों का पुटपाक विधि से स्वरस निकाला जाता है । इसका ज्ञान महाकवि भवभूति को भी था । देखें— ' पुटपाकप्रतीकाशो रामस्य करुणो रसः ' । इन दोनों विधियों से प्राप्त रस का सेचन आँखों में किया जाता है और इससे नेत्र तृप्त होते हैं । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत — सु.उ. १८ तथा अ.सं.सू. ३३ में देखें । चरक ने इस शालाक्यतन्त्र को पराधिकार समझकर इसका वर्णन अपनी संहिता में नहीं किया है । नयने ताम्यति स्तब्धे शुष्के रूक्षेऽभिघातिते । वातपित्तातुरे जिले शीर्णपक्ष्माविलेक्षणे ॥ १ ॥
कृच्छ्रोन्मीलशिराहर्षशिरोत्पाततमोऽर्जुनैः ॥ स्यन्दमन्थान्यतोवातवातपर्यायशुक्रकैः ॥ २ ॥
आतुरे शान्तरागाश्रुशूलसंरम्भदूषिके । निवाते तर्पणं योज्यं शुद्धयोर्मूर्द्धकाययोः ॥ ३ ॥
काले साधारणे प्रातः सायं वोत्तानशायिनः । तर्पणविधि - वर्णन- -जब आँखों के सामने अन्धेरा प्रतीत हो, जब आँखें स्तब्ध हों, सूखी हों, रूखी हों, उन पर किसी प्रकार का आघात लगा हो, नेत्र पर वात या पित्त दोष की विकृति हो, नेत्रगोलक टेढ़े हो गये हों ( जिसे ऐंचा- -ताना कहते हैं ), पक्ष्म ( बरौनियों ) के बाल उखड़ गये हों, दृष्टि मलिन हो गयी हो, नेत्रों को खोलने में कष्ट होता हो; जब नेत्र सिराहर्ष, सिरोत्पात, तिमिररोग, अर्जुनरोग, अभिष्यन्द, अधिमन्थ, अन्यतोवात, वातपर्यय अथवा शुक्ररोग से पीड़ित हों तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए । जब आँखों की लालिमा, आँसू बहना, शूल, संरम्भ ( शोथ ) तथा दूषिका ( नेत्रमल ) ये शान्त हो जायें तब तर्पण का प्रयोग करना चाहिए । नस्य से सिर का तथा वमन विरेचन आदि द्वारा शरीर का शोधन कराकर निवातस्थान में, समशीतोष्ण काल में प्रातःकाल अथवा सायंकाल में रोगी को चित लिटाकर तर्पण का प्रयोग कराना चाहिए ॥ १-३ ॥ यवमाषमयीं पालीं नेत्रकोशाद्बहिः समाम् ॥ ४ ॥
द्व्यङ्गुलोच्चां दृढां कृत्वा यथास्वं सिद्धमावपेत् । सर्पिर्निमीलिते नेत्रे तप्ताम्बुप्रविलायितम् ॥ ५ ॥
नक्तान्ध्यवाततिमिरकृच्छ्रबोधादिके वसाम् । आपक्ष्माग्रात्— तर्पण की दूसरी विधि - इस विधि में भी रोगी को चित लिटाकर उसके नेत्रकोश से बाहर जौ या उड़द के आटे के समान आकार की एक पाली बनवाये, जो दो अंगुल ऊँची हो और दृढ़ हो, जो तर्पण
पृष्ठ 306
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२७० अष्टाङ्गहृदये द्रव डालने पर टूट न जाय । उसमें दोष तथा रोग के अनुसार सिद्ध किये हुए स्नेह को भर दें । इस सिद्ध स्नेह को भरते समय नेत्रों को बन्द कर लें । यदि स्नेह में घृत है तो उसे गरम पानी में पात्र सहित रखकर पिघला लें । यदि रतौंधी, वातदोष - प्रधान तिमिररोग हो तथा कठिनायी से नींद खुलती हो तो इन रोगों में वसा का प्रयोग करना चाहिए । यह वसा उस पाली में उतनी भरनी चाहिए, जिससे बरौनी के बाल उसमें डूब जायें ॥ ४-५ ॥ — अथोन्मेषं शनकैस्तस्य कुर्वतः ॥ ६ ॥
मात्रा विगणयेत्तत्र वर्त्मसन्धिसितासिते । दृष्टौ च क्रमशो व्याधौ शतं त्रीणि च पञ्च च ॥७ ॥
शतानि सप्त चाष्टौ च, दश मन्थे, दशानिले । पित्ते षट्, स्वस्थवृत्ते च बलासे पञ्च धारयेत् ॥ ८ ॥
स्नेह - धारणकाल — स्नेह के भर जाने के बाद वह रोगी धीरे - धीरे आँख या आँखों को खोलने का प्रयत्न करे । तदनन्तर चिकित्सक रोगी के समीप बैठकर मात्रा की गणना इस प्रकार करे — वर्त्मगत रोग में १००, सन्धिगत रोगों में ३००, सफेदमण्डल के रोगों में ५००, कृष्णमण्डल के रोगों में ७००, दृष्टिमण्डल के रोगों में ८००, अधिमन्थरोग में १०००, वातज नेत्ररोगों ( वातपर्यय आदि ) में १०००, पित्तज नेत्ररोगों में ६००, स्वस्थवृत्त अर्थात् स्वस्थ पुरुष के प्रति प्रयोग किये जाने पर भी ६०० तथा कफज रोगों में ५०० मात्रा तक का समय स्नेह धारण करने के लिए पर्याप्त है ॥ ६-८ ॥ वक्तव्य — जिस कालप्रमाण को महर्षि वाग्भट ने ' मात्रा ' कहा है, उसे श्रीसुश्रुत ने ( सु.उ. १८।८ में ) ‘ वाक् ’ कहा है । ये शब्द प्राचीन काल में काल को नापने के लिए प्रयुक्त किये जाते थे । यहाँ मात्रा शब्द से लघुमात्रा उच्चारण के बराबर काल का ही ग्रहण करना चाहिए । १०० मात्रा के उच्चारण में प्रायः ३ मिनट लग जाते हैं, यही स्थिति वाक् की भी है । कृत्वाऽपाङ्गे ततो द्वारं स्नेहं पात्रे निगालयेत् । पिबेच्च धूमं, नेक्षेत व्योम रूपं च भास्वरम् ॥९ ॥
तर्पण का पश्चात् कर्म – अपांग ( आँख का बाहरी कोर ) की ओर द्वार करके अर्थात् उस ओर सिर सहित आँख को झुकाकर नेत्र - तर्पण के लिये डाले गये स्नेह को किसी पात्र में निकाल लें ( सुश्रुत के अनुसार — ' स्विन्नेन यवपिष्टेन शोधयेत् ' ( सु.उ. १८१० ) अर्थात् जौ के सने हुए आटा को उबाल कर उससे नेत्र के अवयवों का उबटन करके उसे शुद्ध करें । ), तदनन्तर उसे धूमपान करायें । यह व्यक्ति आकाश की ओर अर्थात् दूरी में स्थित वस्तुओं को देखने का प्रयत्न न करे और सूर्य आदि चमकीली वस्तुओं को न देखें॥९ ॥
इत्थं प्रतिदिनं वायौ, पित्ते त्वेकान्तरं, कफे । स्वस्थे च द्व्यन्तरं दद्यादातृप्तेरिति योजयेत् ॥ १० ॥
दोषानुसार तर्पण - इस प्रकार वातदोष में प्रतिदिन, पित्तदोष में एक दिन छोड़कर अर्थात् प्रति तीसरे दिन और कफदोष में तथा स्वस्थ पुरुष के नेत्रों में दो - दो दिन का अन्तर देकर तर्पण का प्रयोग तब तक करता रहे जब तक सम्यक् तर्पण के लक्षण उत्पन्न न हो जायें ॥ १० ॥
वक्तव्य — वृद्धवाग्भट ने कुछ अधिक स्पष्ट निर्देश दिये हैं — नेत्रतर्पण के लिए जो आधार ( चहार-दिवारी ) बनाया था उसे हटाकर कल्क से आँख के अवयवों को पोंछ कर उसे धूमपान करायें और गुनगुने जल से उसका मुख धुलवा कर रोगानुसार उसे समुचित भोजन करायें । देखें — अ.सं.सू. ३३।५ । प्रकाशक्षमता स्वास्थ्यं विशदं लघु लोचनम् । तृप्ते, विपर्ययोऽतृप्तेऽतितृप्ते श्लेष्मजा रुजः ॥ तर्पण का समयोग — इसमें रोगी के नेत्रों में प्रकाश की ओर देखने की शक्ति हो जाती है, नेत्र की स्वस्थता का अनुभव, नेत्र में स्वच्छता तथा आँखों में हलकापन प्रतीत होता है । तर्पण का हीनयोग — इसमें
पृष्ठ 307
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् २७१ समयोग के लक्षणों के विपरीत लक्षण होते हैं । तर्पण का अतियोग — इसमें कफज रोगों की उत्पत्ति हो जाती है ॥ ११ ॥
वक्तव्य — तर्पण के हीनयोग में तब तक तर्पण कराना चाहिए जब तक समयोग के लक्षण दृष्टिगोचर न हों और तर्पण के अतियोग में कफनाशक विधियों ( नस्य, धूमपान, अञ्जन, सेक, गण्डूष, कवल आदि ) का प्रयोग कराना चाहिए । कफनाशक विधियों का वर्णन यहाँ भी किया गया है तथा सुश्रुत में भी । देखें – सु.उ. १८।१६ । स्नेहपीता तनुरिव क्लान्ता दृष्टिर्हि सीदति । तर्पणानन्तरं तस्मादृग्बलाधानकारिणम् ॥ १२ ॥
पुटपाकं प्रयुञ्जीत पूर्वोक्तेष्वेव यक्ष्मसु । पुटपाक का वर्णन — जिस प्रकार स्नेहपान कर लेने पर शरीर ढीला पड़ जाता है, वैसे ही स्नेह द्वारा तर्पण करने पर दृष्टि भी ढीली पड़ जाती है । अतएव तर्पण - प्रयोग के बाद दृष्टि को बलवती बनाने के लिए पुटपाक - विधि से निकाले गये रसों का यथोचित प्रयोग करना चाहिए । इसका प्रयोग पहले श्लोक २-३ में कहे गये वातज एवं कफज रोगों में करना चाहिए ॥१२ ॥
स वाते स्नेहनः, श्लेष्मसहिते लेखनो हितः ॥ १३ ॥
दृग्दौर्बल्येऽनिले पित्ते रक्ते स्वस्थे प्रसादनः । दोषानुसार पुटपाक - प्रयोग — पुटपाक तीन प्रकार के होते हैं— १. स्नेहन, २. लेखन तथा ३. प्रसादन । इनका उपयोग — स्नेहन पुटपाक का प्रयोग वातज नेत्ररोगों में, लेखन पुटपाक का प्रयोग कफयुक्त वातज नेत्ररोगों में तथा प्रसादन पुटपाक का प्रयोग दृष्टि की दुर्बलता में, वातज, पित्तज तथा रक्तप्रकोपज नेत्र-रोगों में और स्वस्थ नेत्रों में इनको सदा स्वस्थ रखने की दृष्टि से किया जाता है ॥ १३ ॥
भूशयप्रसहानूपमेदोमज्जवसामिषैः स्नेहनं पयसा पिष्टैर्जीवनीयैश्च कल्पयेत् स्नेहन पुटपाक के द्रव्य - भूशय ( लोमड़ी आदि प्राणी ), प्रसह के प्राणियों की गणना की गयी है ) तथा अनूप ( ' बहूदकनगोऽनूपः ’ – वाले मृग एवं पक्षियों की मेदा, मज्जा, मांस तथा जीवनीय गण के द्रव्यों
बनाना चाहिए ।१४ ॥
मृगपक्षियकृन्मांसमुक्तायस्ताम्रसैन्धवैः स्रोतोजशङ्खफेनालैर्लेखनं मस्तुकल्कितैः ॥ १४ ॥
। ( अ.हृ.सू. ६।४८ इसमें प्रसहवर्ग शा.सं.पू.खं. १।६४ ) देश में रहने को दूध में पीसकर स्नेहन पुटपाक ॥ १५ ॥
। लेखन पुटपाक के द्रव्य- जांगलदेशीय मृग एवं पक्षियों के यकृत्, मांस, मोती, लौहभस्म, ताम्रभस्म, सेंधानमक, काला तथा सफेद सुरमा, शंख, समुद्रफेन और हरिताल – इन द्रव्यों को मस्तु ( दही के पानी ) में पीसकर लेखन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १५ ॥
मृगपक्षियकृन्मज्जवसान्त्रहृदयामिषैः ॥१६ ॥
मधुरैः सघृतैः स्तन्यक्षीरपिष्टैः प्रसादनम् । प्रसादन पुटपाक के द्रव्य - साधारणदेशीय मृग एवं पक्षियों के यकृत्, मज्जा, वसा, अन्त्र ( आँत ), हृदय, मांस तथा मधुरवर्ग में परिगणित द्रव्य एवं घी — इन सबको स्त्री के दूध में पीसकर प्रसादन पुटपाक बनाना चाहिए ॥ १६ ॥
पृष्ठ 308
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
२७२ अष्टाङ्गहृदये बिल्वमात्रं पृथक् पिण्डं मांसभेषजकल्कयोः ॥ १७ ॥
उरुबूकवटाम्भोजपत्रैः स्नेहादिषु क्रमात् । वेष्टयित्वा मृदा लिप्तं धवधन्वनगोमयैः ॥ १८ ॥
पचेत्प्रदीप्तैरग्न्याभं पक्वं निष्पीड्य तद्रसम् । नेत्रे तर्पणवद्युञ्ज्यात्— पुटपाक - रचनाविधि — ऊपर तीन प्रकार के पुटपाकों के निमित्त कहे गये मांस आदि द्रव्यों तथा औषधद्रव्यों का बिल्वभर ( १-१ पल = ४ तोला ) कल्क ( चटनी ) लेकर गोला जैसा बनायें । फिर क्रमशः स्नेहन पुटपाक के लिए एरण्ड के पत्तों से, लेखन पुटपाक के लिए बरगद के पत्तों से तथा प्रसादन पुटपाक के लिए कमल के पत्तों से लपेट कर उन सबके ऊपर दो अंगुल मोटा मिट्टी का लेप करके उसी क्रम से स्नेहन को धव की लकड़ियों में, लेखन को धामिन की लकड़ियों में तथा प्रसादन को उपलों ( गोहरी ) की आग में पकायें । जब मिट्टी ऊपर से लाल हो जाय तो पका हुआ समझें । शीतल हो जाने पर मिट्टी को धीरे से हटाकर उसका रस निचोड़ कर तर्पण - विधि की भाँति इस रस का भी प्रयोग करना चाहिए ॥ १७-१८ ॥ - शतं द्वे त्रीणि धारयेत् ॥ १ ९ ॥ लेखनस्नेहनान्त्येषु — धारणकाल - अवधि — पुटपाक से प्राप्त रस को नेत्रों में डालने के बाद लेखन पुटपाक के रस को १०० मात्रा तक रखें । स्नेहन पुटपाक के रस को २०० मात्रा तक रखें और अन्तिम प्रसादन पुटपाक के रस को ३०० मात्रा तक रखें ॥ १ ९ ॥ — कोणी पूर्वी, हिमोऽपरः । उष्ण - शीतप्रयोग भेद— इन पुटपाक के रसों में पहले के दो ( स्नेहन तथा लेखन ) पुटपाकों का रस गुनगुना करके प्रयोग करना चाहिए और बाद वाला अर्थात् प्रसादन पुटपाक का रस शीतल ही प्रयोग करना चाहिए । धूमपोऽन्ते तयोरेव -पश्चात् कर्म —स्नेहन तथा लेखन पुटपाक से निकले हुए रसों के प्रयोग करने के बाद रोगी को धूमपान कराना चाहिए । इससे स्नेह द्वारा उभड़े हुए कफ की शान्ति हो जाती है । ' एव ' शब्द प्रसादन
पुटपाक के अन्त में धूमपान- - सेवन का निषेध करता है ।
— योगास्तत्र च तृप्तिवत् ॥ २० ॥
योगों का निर्देश – इस पुटपाक के प्रयोग में योग ( समयोग, हीनयोग तथा अतियोग ) तर्पण के समान ही होते हैं ( देखें - अ.हृ.सू. २४ । ११ ) ॥ २० ॥
तर्पणं पुटपाकं च नस्यानर्हे न योजयेत् । तर्पण एवं पुटपाक का निषेध -- जिनको अ.हृ.सू. २०।११-१३ में नस्य सेवन के अयोग्य कहा गया
है, उन्हें तर्पण एवं पुटपाक का प्रयोग भी नहीं कराना चाहिए ।
यावन्त्यहानि युञ्जीत द्विस्ततो हितभाग्भवेत् ॥ २१ ॥
मालतीमल्लिकापुष्पैर्बद्धाक्षो निवसेन्निशाम् । तर्पण एवं पुटपाक की अवधि - जितने दिनों तक तर्पण अथवा पुटपाक का प्रयोग कराया गया हो उससे दुगुने दिनों तक पथ्य का सेवन कराना चाहिए और इन दिनों रात्रि में मालती ( चमेली ) तथा मल्लिका के फूलों को आँखों पर बाँधकर सोना चाहिए ॥ २१ ॥
पृष्ठ 309
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
तर्पणपुटपाकविधिरध्यायः २४ ] सूत्रस्थानम् २७३ वक्तव्य — तर्पण तथा पुटपाक के अनुचित प्रयोग से जो रोग पैदा हो जाता है, उसकी चिकित्सा
अंजन, आश्चोतन तथा स्वेदन आदि द्वारा तत्काल करें । देखें – सु.उ. १८।३० ।
सर्वात्मना नेत्रबलाय यत्नं कुर्वीत नस्याञ्जनतर्पणाद्यैः ॥ २२ ॥
दृष्टिश्च नष्टा विविधं जगच्च तमोमयं जायत एकरूपम्॥२३ ॥
इति श्रीवैद्यपतिसिंहगुप्तसूनुश्रीमद्वाग्भटविरचितायामष्टाङ्गहृदयसंहितायां प्रथमे सूत्रस्थाने तर्पणपुटपाकविधिर्नाम चतुर्विंशोऽध्यायः ॥ २४ ॥
नेत्ररक्षा की आवश्यकता — नेत्ररक्षा के उपाय — नस्य, अंजन, तर्पण आदि ( इस अध्याय में कहे गये ) उपचारों द्वारा सभी प्रकार से नेत्रों की शक्ति को बलवान् बनाये रखने के लिए सर्वदा प्रयत्न करते रहना चाहिए । यदि किसी प्रकार की असावधानी से नेत्रों में विकार उत्पन्न हो जाता है और उससे नेत्र की दर्शनशक्ति नष्ट हो जाती है तो यह विश्व रूप संसार उस नेत्रहीन के लिए अन्धकारमय एकरूप का
होकर रह जाता है । २२-२३ ॥
इस प्रकार वैद्यरत्न पण्डित तारादत्त त्रिपाठी के पुत्र डॉ ० ब्रह्मानन्द त्रिपाठी द्वारा विरचित निर्मला हिन्दी व्याख्या, विशेष वक्तव्य आदि से विभूषित अष्टाङ्गहृदय - सूत्रस्थान में तर्पणपुटपाकविधि नामक चौबीसवाँ अध्याय समाप्त ॥ २४ ॥
१८ अ ० हृ ०
पृष्ठ 310
पाठ पढ़ें पाठ छिपाएँ
पञ्चविंशोऽध्यायः अथातो यन्त्रविधिमध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब हम यहाँ से यन्त्रविधि नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे । ऐसा आत्रेय आदि महर्षियों ने कहा था । वक्तव्य — प्रस्तुत अध्याय से पहले अध्यायों में बस्ति, नस्य, अञ्जन, क्षार आदि के प्रयोग भी यन्त्रों की अपेक्षा रखते हैं, अतः उनका वर्णन करने के बाद अब यहाँ यन्त्रविधि नामक अध्याय का वर्णन किया जा रहा है । इस २५ वें अध्याय में ४८ यन्त्रों का वर्णन किया गया है, इनका प्रयोग विविध प्रकार के रोगों की चिकित्साओं के लिए किया जाता है । वृद्धवाग्भट ने अ.सं. सू. ३४ ३ में ये यन्त्र असंख्य होते हैं, इस प्रकार ‘ अतः कर्मवशात् तेषामियत्ताऽवधारणमशक्यम् ' कहा है । वृद्धवाग्भट ने एक ही अध्याय में यन्त्र तथा शस्त्रों का वर्णन किया है, जिसे अष्टाङ्गहृदय में २५ वें तथा २६ वें अध्यायों में अलग कहा है । यन्त्र उन उपकरणों को कहते हैं, जिनसे चुभा हुआ काँटा, उखाड़ने योग्य दाँत, निकालने योग्य मृतगर्भ आदि को पकड़ कर निकाला जाता है । इनके अतिरिक्त गुद, भग, मुख आदि को चौड़ा करके भीतर देखने, औषध प्रयोग करने आदि का कार्य भी लिया जाता है, जिनका वर्णन आगे यथास्थान किया जायेगा । सुश्रुत ने ' मन तथा शरीर को पीड़ित करने वाले शल्य होते हैं, इनको निकालने के उपाय यन्त्र होते हैं ', ऐसा कहा है । देखें — सु.सू. ७ । ४ । संक्षिप्त सन्दर्भ - संकेत – सु. सू. ७ तथा अ. सं. सू. ३४ में देखें । विशेष — चरक ने यन्त्र तथा शस्त्रों का वर्णन यह कहकर कि ' तत्र धान्वन्तरीयाणामधिकारः क्रियाविधौ ' । ( च.चि. ५।४४ ) अर्थात् चरककायचिकित्सा - प्रधान संहिता है और यन्त्र - शस्त्र के प्रयोग में धन्वन्तरि के अनुयायी चिकित्सकों का अधिकार है । फिर भी च.चि. २५।५५ से ६० तक छः प्रकार के शस्त्रकर्मों का वर्णन करते हुए कहा है— ' इति षड्विधमुद्दिष्टं शस्त्रकर्म मनीषिभिः ' । यहाँ यह मनीषि शब्द सुश्रुत आदि शल्यशास्त्रज्ञों की ओर संकेत करता है । नानाविधानां शल्यानां नानादेशप्रबाधिनाम् । आहर्तुमभ्युपायो यस्तद्यन्त्रं यच्च दर्शने ॥१ ॥
अर्शोभगन्दरादीनां शस्त्रक्षाराग्नियोजने । शेषाङ्गपरिरक्षायां तथा बस्त्यादिकर्मणि ॥ २ ॥
घटिकाला शृङ्गं च जाम्बवौष्ठादिकानि च । यन्त्रों का वर्णन — शरीर के विभिन्न देशों ( अवयवों ) में गढ़े हुए या चुभे हुए शल्यों, जो कष्ट पहुँचा रहे हों, को निकालने का जो उपाय है, उसे यन्त्र कहते हैं और जो अर्श, भगन्दर आदि को देखने में सहायक होते हैं उन्हें भी यन्त्र कहते हैं । शस्त्र, क्षार तथा अग्निकर्म का प्रयोग करते समय शेष अंगों की सुरक्षा के लिए भी इन यन्त्रों की आवश्यकता पड़ती है । बस्ति ( गुदबस्ति, उत्तरबस्ति ) आदि कर्मों में भी इनका प्रयोग होता है । ये यन्त्र घटिका ( घड़ा, लोटा ), अलाबु ( तुम्बी ), श्रृंगी ( सिंगी ) इनका प्रयोग वातदोष तथा दूषित रक्त को चूसकर निकालने में होता है । जाम्बवौष्ठ यन्त्र का प्रयोग क्षार लगाने में और काँटा आदि निकालने में सदंश ( चिमटी ) आदि का प्रयोग होता है॥१-२ ॥ अनेकरूपकार्याणि यन्त्राणि विविधान्यतः ॥ ३ ॥
विकल्प्य कल्पयेद्बुद्धया-