श्रीगणेशाय नमः।
अष्टाङ्गहृदयम् (सूत्रस्थान) ब्रह्मानन्द त्रिपाठी
Astanga Hrdayam (Sutrasthana) Brahmananda Tripathi · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली · 387 पृष्ठ · 39 खण्ड
विषय सूची
- अष्टाङ्गहृदयम् डॉ ॰ ब्रह्मानन्द त्रिपाठी । श्रीः । व्रजजीवन आयुर्विज्ञान ग्रन्थमाला 27 अष्टाङ्गहृदयम् ‘ निर्मला ’ - हिन्दीव्याख्यया विशेषवक्तव्यादिभिश्च… 1–10
- ( ११ ) वाग्भट की प्रतिज्ञा — वैयाकरण सम्प्रदाय में यह प्रतिज्ञा प्रसिद्ध है कि ' एकमात्रालाघवेन पुत्रोत्सवं मन्यन्ते वैयाकरणाः ’… 11–20
- ( २१ ) विषय कुलथी का वर्णन सेम का वर्णन माष ( उड़द ) का वर्णन काकाण्डोला एवं केवाँच तिल का वर्णन अतसी एवं कुसुम्भ बीज माष, यवक - वर्णन धान्य- विवेचन अथ… 21–30
- ( ३१ ) विषय स्नेहनस्य से लाभ ( २१ ) धूमपानविधिरध्यायः धूमपानविधि का वर्णन धूम के भेद तथा प्रयोग धूमपान का निषेध धूमपान से हानि धूमपानजनित रोगों की… 31–40
- आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् अष्टांगहृदय का स्वरूप — महर्षि वाग्भट का कथन है कि इधर - उधर बिखरे हुए उन प्राचीन तन्त्रों में से उत्तम - से - उत्तम (… 41–50
- आयुष्कामीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् १५ शार्ङ्गधराचार्य ने विपाक का परिचय इस प्रकार दिया है— ' जाठरेणाग्निना योगाद् यदुदेति रसान्तरम्… 51–60
- आयुष्कायीयाध्यायः १ ] सूत्रस्थानम् २५ चिकित्सितस्थान के अध्याय - चिकित्सितस्थान के अध्यायों की गणना की जा रही है — १. ज्वर, २. रक्तपित्त, ३. कास, ४.… 61–70
- दिनचर्याध्यायः २ ] सूत्रस्थानम् ३५ याचकों की सम्मान -1 -विधि - अर्थियों ( याचकों ) को अपनी शक्ति के अनुसार कुछ देना चाहिए… 71–80
- ऋतुचर्याध्यायः ३ ] सूत्रस्थानम् वसन्त ऋतुचर्या — शिशिर ऋतु में शीत की अधिकता के कारण स्वाभाविक रूप से कफदोष का संचय हो जाता है… 81–90
- रोगानुत्पादनीयाध्यायः ४ ] सूत्रस्थानम् मलवेगरोधज रोग — पुरीष के वेग को रोकने से पिण्डलियों में ऐंठन, प्रतिश्याय, सिर में पीड़ा का होना, उद्गार ( डकारों का… 91–100
- द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ६५ गङ्गा ' । अतएव वेगवती नदियों का जल शुद्ध होता है । देखें— ' नदी वेगेन शुध्यति ' । ( चा.नी. ६… 101–110
- द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्याय: ५ ] सूत्रस्थानम् ७५ शतपर्वक आदि ईखों के गुण — शतपर्वक ईख ( अनेक पोरों वाला ) कान्तार, नैपाल, आदि शब्द से दीर्घपत्र आदि भेदों को… 111–120
- द्रवद्रव्यविज्ञानीयाध्यायः ५ ] सूत्रस्थानम् ८५ उष्ण, लवणरसयुक्त तथा कटुरसयुक्त होते हैं । ये क्रिमि, शोथ, उदररोग, आनाह ( अफरा ), शूल, पाण्डुरोग, कफविकार,… 121–130
- अत्रस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ९ ५ वक्तव्य — वाग्भट ने उक्त ' धाना ' को ' गुरु ' कहा है, सुश्रुत का मत इसके विपरीत है — ' धानोलुम्बास्तु लघवः… 131–140
- अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् १०५ वक्तव्य — करीर या करील को ' क्रकरीपत्र ' भी कहा गया है… 141–150
- अन्नस्वरूपविज्ञानीयाध्यायः ६ ] सूत्रस्थानम् ११५ भिलावा का वर्णन — भिलावा का छिलका तथा गूदा बृंहण ( शरीर को स्थूल करने वाला ), रस में मधुर तथा शीतवीर्य… 151–160
- अन्नरक्षाध्यायः ७ ] सूत्रस्थानम् १२५ मुख में विष का प्रभाव – यदि मुख के भीतरी प्रदेश में किसी विष का प्रभाव हो गया हो तो उसमें ये लक्षण होते हैं — मुख से… 161–170
- अष्टमोऽध्यायः अथातो मात्राशितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब हम यहाँ से मात्राशितीय नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा… 171–180
- नवमोऽध्यायः अथातो द्रव्यादिविज्ञानीयमध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब हम यहाँ से द्रव्यादिविज्ञानीय अर्थात् द्रव्य, रस, गुण,… 181–190
- रसभेदीयाध्यायः १० ] सूत्रस्थानम् १५५ मल को बाँधता है । यह अत्यन्त रूक्ष होता है, त्वचा को स्वच्छ करता है… 191–200
- दोषादिविज्ञानीयाध्यायः ११ ] सूत्रस्थानम् १६५ वृद्धि एवं क्षय निर्देश – वात आदि दोषों, रस आदि धातुओं तथा पुरीष आदि मलों की वृद्धि एवं क्षय को चिकित्सक इस… 201–210
- दोषभेदीयाध्यायः १२ ] सूत्रस्थानम् १७५ विपरीतगुणेच्छा च— दोषों के चय का वर्णन — इसके पहले इसी अध्याय में वात आदि दोषों के स्थानों का वर्णन किया जा चुका है… 211–220
- त्रयोदशोऽध्यायः अथातो दोषोपक्रमणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः । अब यहाँ से हम दोषोपक्रमणीय नामक अध्याय की व्याख्या करेंगे… 221–230
- द्विविधोपक्रमणीयाध्यायः १४ ] सूत्रस्थानम् १ ९ ५ चीता, हल्दी, दारुहल्दी की छाल, कण्टकारी, वनभण्टा, हपुषा, पाठा और करेमू की जड़ — इन सब द्रव्यों का कपड़छन… 231–240
- स्नेहविधिरध्यायः १६ ] सूत्रस्थानम् २०५ स्नेहयोगों के नाम — उक्त स्नेहों की गुरुता के अनुसार घी और तेल इन दो स्नेहों का नाम ‘ यमक ’ है… 241–250
- स्वेदविधिरध्यायः १७ ] सूत्रस्थानम् २१५ इसे घड़ा में या झंझर ( सुराही ) में या नाली ( पिचकारी ) आदि में भरकर रोगयुक्त अंग पर अभ्यंग करने के बाद कपड़े से उस… 251–260
- वमनविरेचनविधिरध्यायः १८ ] सूत्रस्थानम् २२५ पुनः विरेचन - प्रयोग — इस विधि से यदि अल्पमात्रा में भी विरेचन हो तो उस रात्रि में उसे थोड़ा - सा हलका आहार (… 261–270
- बस्तिविधिरध्यायः १ ९ ] सूत्रस्थानम् २३५ अन्वासयेत्तृतीयेऽह्नि पञ्चमे वा पुनश्च तम् । ३३ । यथा वा स्नेहपक्तिः स्यादतोऽत्युल्बणमारुतान्… 271–280
- नस्यविधिरध्यायः २० ] में, कफज ग्रन्थिरोग में, है । २ । बृंहण - - नस्य का में, वाणी की रुकावट करना चाहिए । ३… 281–290
- धूमपानविधिरध्यायः २१ ] सूत्रस्थानम् २५५ धूमपान के लाभ —कास, श्वास, पीनस ( प्रतिश्याय ), स्वरभेद, मुख एवं नासिका की दुर्गन्ध, मुख का पीला पड़ जाना, केशदोष… 291–300
- आश्चोतनाञ्जनविधिरध्यायः २३ ] सूत्रस्थानम् २६५ —लेखनं तत्र कषायाम्लपटूषणैः । १० । लेखन अंजन —यह कसैले, खट्टे, नमकीन तथा कटुरस - प्रधान द्रव्यों द्वारा… 301–310
- यन्त्रविधिरध्यायः २५ ] सूत्रस्थानम् २७५ यन्त्रों की विविधता — उक्त यन्त्रों के विविध आकार - प्रकार तथा अनेक कार्य होते हैं अर्थात् योग्य चिकित्सक इनसे… 311–320
- शस्त्रविधिरध्यायः २६ ] सूत्रस्थानम् २८५ वक्तव्य — यहाँ दो एषणी शस्त्रों का वर्णन किया गया है । इसमें प्रथम एषणी यन्त्र है और दूसरा एषणी शस्त्र है… 321–330
- सिराव्यधविधिरध्यायः २७ ] सूत्रस्थानम् २ ९ ५ — कुरुते ततः । २ । विसर्पविद्रधिप्लीहगुल्माग्निसदनज्वरान् मुखनेत्रशिरोरोगमदतृड्लवणास्यताः । ३… 331–340
- शल्याहरणविधिरध्यायः २८ ] सूत्रस्थानम् ३०५ पीडनाक्षमता पाकः शल्यमार्गो न रोहति । मांसगत शल्य के लक्षण – यदि शल्य मांसधातु में प्रविष्ट होता है तो चोष (… 341–350
- एकोनत्रिंशोऽध्यायः अथातः शस्त्रकर्म विधिमध्यायं व्याख्यास्यामः । इति ह स्माहुरात्रेयादयो महर्षयः… 351–360
- शस्त्रकर्मविधिरध्यायः २ ९ ] सूत्रस्थानम् ३२५ सम बन्धन के स्थान पर शिथिल बन्ध और शिथिल बन्ध के स्थान पर बन्धन लगाना ही नहीं चाहिए, केवल उसे मक्खी, धूल आदि… 361–370
- क्षाराग्निकर्म विधिरध्यायः ३० ] सूत्रस्थानम् ३३५ दुर्दग्ध के लक्षण- - इस प्रकार से जलने पर दग्धस्थान पर फफोले पड़ जाते हैं, दाह युक्त स्थान पर अत्यन्त… 371–380
- सूत्रस्थानम् ] श्लोकानुक्रमणिका ब्राह्मे मुहूर्त उत्तिष्ठेत् भ भक्त्या कल्याणमित्राणि • भगन्दरार्बुदग्रन्थिदुष्ट भङ्गे च युञ्ज्यात्फलकं भजेन्मधुरमेवान्नं… 381–387