श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 1–10
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 1–10
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|| ओ ३ म् || चरक - संहिता महर्षि अनिवेश प्रणीत चरक और दृढबल से प्रतिसस्कृत ( हिन्दी अनुवाद ) शारीर, इन्द्रिय, चिकित्सितस्थान ( १ - १५ अ ० ) द्वितीय खण्ड अनुवादक-श्री कविराज अत्रिदेवजी गुप्त, विद्यालङ्कार, भिषग्रन । प्रकाशक-भार्गवपुस्तकालय, गायघाट, बनारस । ब्राञ्च - कचौड़ीगली, बनारस । द्वितीयावृत्ति सं ० २००५ वि ० मूल्य २००० १२ )
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विषय - सूची शारीरस्थानम् प्रथमोऽध्यायः ( पृ ० १-२८ ) कतिधापुरुपीयम् - पुरुष के भेद उसकी प्रधान कारणता, पुरुष की उत्पत्ति, पुरुष की नित्यता और अनि-स्यता, प्रकृति उसके विकार, पुरुष और प्रकृति के लक्षण आत्मा के जन्म, उसको सुख दुख, उसकी अदृश्यता, उसकी साक्षिता आदि विषयक सराय, बेदना के कारण आदि अग्निवेश के २३ प्रश्न । महषि आने का समाधान । ' पुरुष ' शब्दवाच्य पदार्थ | मन का लक्षण, मन के विषय, मन के कर्म, बुद्धि की उत्पत्ति । इन्द्रियाँ । पंचमहा-भूतों के लक्षण, ग्राह्य विषय । अव्यक्त आत्मा । पुरुष आत्मा, राशिलज्ञक पुरुष । आत्मा का प्रतिपादन । नारिक मत, नास्तिक मत मे दोष । आत्मा के । विषय प्रतिपादन । व्यक्त, अव्यक्त । आभूत प्रकृति । १६ विकार वर्ग क्षेत्र ( शरीर ) अव्यक्त से बुद्धि सच्चादि की उत्पत्ति । जन्म । पुरुष के लक्षण, पञ्चस्व, आत्मा कर्त्ता आत्मा विभु । आत्मा अनादि, साक्षी । उत्तम चिकित्सा का प्रयोजन । उपधा । दुःख के कारण । प्रज्ञापराध । कालज रोग । कर्मफलज । असाध्य रोग । गन्धादि रस, शब्द, स्पर्श आदि का, योग, अयोग, अतियोग, मिथ्यायोग | उनसे उत्पन्न ऐन्द्रियक । रोग । सुख, आरोग्य का कारण समान योग । सुख दुख का कारण । वेदनाओं का प्रवर्तक मानस योग । वेदनाओं का आश्रय | योग और मोक्ष- वेदना की । निवृत्ति । योगियो का आठ प्रकार का ऐश्वर्य, मोक्ष । मोक्ष के उपाय । स्मृति, स्मृति उत्पत्ति के आठ कारण । योग-मार्ग । द्वितीयोऽध्यायः ( १०२८-३६ ) अतुल्यगोत्रीयम् - गर्भ की उत्पत्ति विषयक प्रश्न | गर्भोत्पत्ति विषयक उत्तर | गर्भ विषयक पांच प्रश्न, उनके उत्तर, पूर्ण शरीर होने का कारण, ढेर से गर्भ धारण के कारण, गर्भ के असत् रूप, भूतों द्वारा गर्भ हरण का निरा-करण । पुत्र, पुत्री और नपुसक की उत्पत्ति, अनेक सन्तानो की एक साथ उत्पत्ति, प्रसव काल मे विलम्ब, युगल सन्तान में एक की विशेष वृद्धि विषयक आठ प्रश्न | उनके समाधान,
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[ द्विरेता, पवनेन्द्रिय, सस्कारवाही, नर षण्ढ, ईर्ष्याभिरत वातिकषण्ढ आदि की उत्पत्ति विषयक प्रश्न | उनके उत्तर, गर्भ स्थिति के लक्षण | गर्भ स्थित कन्या और बालक के लक्षण माता पिता के सदृश सन्तान होने के कारण, विकृत, अधिकाग, हीनाग, विकलाग सन्तति विषयक प्रश्न और आत्मा के शरीरान्तर- प्रवेश ओर उसके बन्ध-कारण विषयक प्रश्न । उनके उत्तर । सर्वरूप आत्मा का विश्वकर्मत्व । लिग शरीर । शरीरान्तरगामी सूक्ष्म शरीर, पूर्व कर्मानुरूप शरीर की रचना । रोगोत्पत्ति, रोगशान्ति, हर्ष, शोक, शरीर और मनोविकार के कारण विष यक छ प्रश्न । इनका समाधान । दैव और पौरुष का विवेचन । रोग किसको नहीं सताते । उपसद्दार । तृतीयोऽध्यायः ( पृ ० ३६-५३ ) खुड्डीकागर्भावक्रान्तिः –गर्भ मे जीव के आगमन सम्बन्ध मे क्षुद्र - शरीर का उपदेश । गर्भ की उत्पत्ति विषयक ऋषियों में परस्पर सवाद । इस विषय मे भगवान् आत्रेय पुनर्वसु का सिद्धान्त प्रतिपादन - पिता आदि से गर्भ की उत्पत्ति-आत्मा का जन्म सन्तानोत्पत्ति में माता पिता का अश - आत्मज गर्भ - सात्म्यज गर्भ और रसज गर्भ की व्याख्या । सत्त्वज गर्भ, स्पृक् - शरीर का वर्णन | त्रिविध सत्त्व, जातिस्मर | जीव की उत्पत्ति के सम्बन्ध में मुनि भरद्वाज के प्रश्न । आत्रेय २ ] पुनर्वसु का समाधान | प्राणियो की चार प्रकार की योनि - अध्यात्मज्ञान । चतुर्थोऽध्यायः ( पृ ० ५३-६६ ) महती गर्भावक्रान्तिः - गर्भ की सज्ञा, विकार, परिणाम, गर्भ रचना का अनुक्रम, वृद्धि के कारण, जन्म, विनाश, विकृति आदि का वर्णन | पाँच महाभूत | और छठे धातु आत्मा का वर्णन । गर्भा-शय में गर्भ विकास का क्रम । मन-साधन वाले चेतना धातु के २ ९ पर्याय नामो का निरूपण । पाँचों धातुओं का क्रमिक प्रादुर्भाव । गर्भ का प्रथम रूप खेट । द्वितीय रूप, ' घन ' । घन, पेशी अर्बुद आदि से पुमान्, स्त्री, नपुंसक आदि की उत्पत्ति । लोक - समित पुरुष का निदर्शन, पुरुष की प्रकृति और विकृति । गर्भस्थ जीव की चेष्टा और मनोविकार । दो हृदयो के लक्षण । गर्भ के ९ मासो मे गर्भिणी के शरीर की दशा आदि का वर्णन 1 । गर्भ - वृद्धि के कारण । गर्भ विकृति के कारण स्त्री-। व्यापत् । पुरुष व्यापत् । सत्व ( मन ) के शुद्ध, राजस, तामस भेद से तीन | प्रकार | शुद्ध सात्विक चित्तों के सात भेद - ब्राह्म, आर्ष, ऐन्द्र, याम्य, वारुण, कौबेर, गान्धर्व । राजस सत्त्व के ६ भेद-आसुर, राक्षस, पैशाच, सार्प, प्रेत, शाकुन । तामस सच के ३ भेद - पाशव, मात्स्य, वानस्पत्य । उपसहार । पञ्चमोऽध्यायः ( पृ ० ६६-७८ ) पुरुषंविचयः - लोक सम्मित पुरुष । का विस्तृत वर्णन । पुरुष का लक्षण!
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[ लोक और पुरुष की समानता । सर्व लोको में आत्म- बुद्धि और आत्मा मे सर्वलोक - बुद्धि, मोक्षमार्ग पर प्रथम ज्ञानचरण । हेतु, जन्म, उपप्लत्र, वियोग, भग, उपरम प्रवृत्ति, विकृति, सत्य आदि का वर्णन 1 | अग्निवेश का ससार मे प्रवृत्ति के कारण और मोक्षरूप निवृत्ति के उपाय विषयक प्रश्न | भग-वान् आत्रेय का उत्तर, मोक्ष और मुमु-क्षुओ के उदय के साधनो का वर्णन, अध्यात्म देह की लोक से तुलना । मुक्त का लक्षण । उपसहार । षष्ठोऽध्यायः ( पृ ० ७८ – ९ ० ) शरीरविचयः - शरीर रचना विज्ञान की प्रशा, aa at लक्षण, धातु वैषम्य, वृद्धि हास का कारण, औषध का उपयोग, औषध प्रयोग और स्वस्थ-वृत्त पालन का फल, धातुसाम्य । सक्षेप मे स्वस्थवृत्त । धातु के हास और वृद्धि के कारण । समान गुण वाले विजातीय पदार्थों से वृद्धि | सम्पूर्ण रूपों मे शरीर-वृद्धिकारक भाव | आहार पचाने वाले पदार्थ । आहार परिपाक के परिणाम । शरीर के धातु, मल और प्रसाद - उनके गुण । गर्भ के सम्बन्ध मे ११ प्रश्न । आत्रेय पुनर्वसु का समाधान, गर्भ की अग - रचना विषय मे सूत्रकार ऋषियो के मत - गर्भाशय में बालक की स्थिति-गर्भगत बालक का जीवन । नाभि, नाड़ी और अपरा का वर्णन - जीव का बाहर आना - प्रकृति इससे विपरीत विकृति-गर्भ की वृद्धि । गर्भ के रोग । काल-३ ] | मृत्यु और अकाल - मृत्यु का विवेचन, काल और अकाल निर्णय | कलि मे शतवर्ष आयु - परिमाण । उपसहार । सप्तमोऽध्यायः ( पृ ० १०-१७ ) शरीरसंख्याशारीरम् — अवयवो की सख्या विषय मे अग्निवेश का प्रश्न, आत्रेय का प्रतिवचन, शरीर की ६ त्वचा, शरीर के ६ अग, तीन सौ साठ | हड्डिया, इन्द्रियों के पाच आश्रय, पाच कर्मेन्द्रिय, पाच ज्ञानेन्द्रिय । चेतना का स्थान । प्राण के दस आयतन । कोष्ठ के १५ अग । ५६ प्रत्यग, ९ महान् छिद्र । परमाणु भेद से शरीर के असख्य अवयव | उपहार | | अष्टमोऽध्यायः ( पृ ० ६७-१३५ ) जातिसूत्रीयम् — गुणवान् सन्तान उत्पादक कर्मों का उपदेश, रजस्वला के कर्त्तव्य । स्नानोपरान्त कर्त्तव्य । गर्भा-धान काल मे स्त्री की उचित स्थिति । गर्भाधान के अयोग्य स्त्री पुरुष । गर्भा-धान के नियम । पुत्रेष्टि । यथेष्ट सन्तान प्राप्ति के उपाय | पुसवन विधि | गर्भ-स्थापन की विधियाँ | गर्भ - नाशक वाते, गर्भ विकारक कारण । गर्भिणी के लिये उपचार । विशेष उपदेश । उपविष्टक -नागोदर के लक्षण । उनकी चिकित्सा । प्रसुप्त - गर्भ की चिकित्सा | गर्भिणी के उदावर्त्त की चिकित्सा | मृत गर्भ के लक्षण | मृत गर्भ शल्य की बाहर करने की विधि | स्वस्थ गर्भ के पाल-नोपयोगी कर्मों का उपदेश । उस सम्ब-न्ध मे ऋषियों के मत भेद । सूतिका
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[ गार निर्माण | बहूपयोगी उचित श्री संग्रह | प्रसवकालवी कागार मे प्रवेश | प्रसन काल के लक्षण प्रसव काल में उपदेश मानार्थ के मत और निर्णय - गर्भ का नीच उमारने के प्रकार | प्रवाहण का उपदेश व के कर्णं मे जपने का मन्त्र | उसके प्रसव काल मे विशेष शिक्षा, प्रस-विनी का उत्साह वर्धन | प्रसव के उपरान्त उपचार । अपरा पातन । सद्यो-जात बालक के स्नान आदि कर्म । नाड़ी छेदन विधि | काटन का प्रकार, जात कम सस्कार | माता को स्नेहपान सूतिका स्त्री का स्वस्थवृत्त । प्रसूता ४ ] । श्री के पति विशेष उपचार । प्रसूता का दिन स्नान ओर बालक का नानक कुमार की परीक्षा । धात्री-परीक्षा । स्तन के उत्तम लक्षण । दूध लक्षण | दूषित दूध के लक्षण दुषित दूध वाली स्त्री के दूध के शोध-नार्थं खानपान विधि । दूधवर्धक पदार्थ । धात्री की नियुक्ति । कुमारागार विधि । कुमार योग्य उचित वस्त्रादि । वस्त्रो के रोग नाशक धूम, बालक के आभूषण । बच्चो के खिलाने । शिशु को भय देने
। का निषेध । बालकोचित ओषधोपचार ।
। उपसहार । इति शारीरस्थानम् ॥
इन्द्रियस्थानम् प्रथमोऽध्यायः ( पृ ० १३६ - १४२ ) | वर्णस्वरीयम् - रोगी के वर्ण, स्वर, गन्ध, रसादि परीक्षा | प्रकृति विकृति से पुरुष की परीक्षा । प्रकृति के छ प्रकार । तीन प्रकार की विकृति । वर्णा-धिकार । स्वराधिकार । वैकृतिक स्वर, वर्ण संग्रह -- मरणोन्मुख के लक्षण । उपसहार । द्वितीयोऽध्यायः ( पृ ० १४२-१४५ ) पुष्पितकम् — धिकार पुष्प की अरिष्ट से समानता | दो प्रकार के अरिष्ट - नियत और अनियत, पुष्पित अरिष्ट के लक्षण, रस - ज्ञान अरि । तृतीयोऽध्यायः ( पृ ० १४५ - १४८ ) परिमर्शनीयम् - स्पर्शाष्टि, श्वासो च्छ्वास, चक्षु, केश, लोम, शिरा, नख, मामादि अगुली आदि गत लक्षण । चतुर्थोऽध्यायः ( पृ ० १४६-१५२ ) इन्द्रियानीकम् - इन्द्रिय गोचर अरिष्ट । पञ्चमोऽध्यायः ( पृ ० १५३ - १५ ९ ) पूर्वरूपीयम् - असाध्य रोगों के भिन्न भिन्न पूर्व रूप - स्वप्न लक्षणारिष्ट स्वभ | के ७ भेद । षष्ठोऽध्यायः ( पृ ० १६ ९ - १६३ ) कतमानिशरीरीयम्भावी व्याधि के आश्रय स्थानों के अरिष्ट लक्षण, अनपच, प्यास, हृदयवेदना, हिचकी,
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[ रक्तातिसार, आनाह, तृष्णा, ज्वर, शोथ, कफ, मूत्र, पीडा, कोष्ठ, त्वग्ररोग, हनु-ग्रह, मन्याग्रह, श्वास रोग, चिकलता, मास, बल, आहार आदि की क्षीणता, रोग के विरोधी कारण आदि विषयक असाध्य अरिष्ट । सप्तमोऽध्यायः ( पृ ० १६३-१६८ ) पन्नरूपीयम् - छाया, प्रतिच्छाया रूप अरिष्ट, चक्षु से प्रतिबिम्बित छाया, चॉदनी, धूप, दीप, प्रकाश, जल, दर्पण की छाया, प्रतिबिम्ब, उसकी विकृति आदि अरिष्ट, आकृति की सम विष मता, मध्य अल्प महान् परिमाण, प्रति-च्छाया, छाया, वर्ण, प्रभा आदि सुख-दायक और कष्टदायकच्छाया, प्रभा के सात प्रकार - शरीर मे वातजन्य असाध्य लक्षण । अष्टमोऽध्यायः ( पृ ० १६८ - १७२ ) अवाक्- शिरसीयम् - पॉव ऊपर शिर नीचे किये छाया के लक्षण - शरीर गत अन्य असाध्य लक्षण - पलको, आँखो, भौहों के लक्षण - केश, नासिका, मुख, कान, दाँत, श्वास, हाथ, पॉव, घुटने, नख, निचला दाँत कटकटाना, हँसने, बकने, रोने, स्पर्श करने, वायु से, राग द्वेषादि, निर्बलता, प्रस्वेद, बलनाश, हाथ आदि पटकने आदि के अनेक असाध्य लक्षण । नवमोऽध्यायः ( पृ ० १७२ - १७५ ) श्यावनिमित्तीयम् — चक्षुका लाल काला होना, शिराओका हरापन, लोम-च्छिद्रो का बन्द होना, पसीना न आना, शरीरशोष, हिचकी, स्कन्धपीड़ा, अपस्मार, शोथ, उदररोग, ज्वर रोग, गुल्म, राज-५ ] | यक्ष्मा विरेचन, आध्मान, तृष्णा, मुख-शोष, ऊर्ध्वश्वास, विकृतस्वर, सहला रोगमुक्ति, चिरकाल चिकित्सा से भी लाभ न दीखना, थूक - वीर्यादि की जल परीक्षा, शंखक रोग, झागदार रक्त इत्यादि असाध्य, मरणोन्मुख के लक्षण । दशमोऽध्यायः ( पृ ० १७५-१७ = ) सद्योमरणीयम् - शीघ्र प्राण छोड़ने वाले के लक्षण - वाताष्ठीला - वातिक विकार, भ्रुकुटीस्खलन, मन्याओ आदि स्थानों में वायुकृत अनेक विकृतियों, परिकर्त्तिका, सज्ञानाश, दन्तपंक, अति-स्वेद- प्यास, दाह कूजन, अतिसारादि, असाध्य लक्षण । | एकादशोऽध्यायः ( पृ ० १७८ - १८२ ) अणुज्योतीयम् - शरीर के तेज मन्द होने का अरिष्ट - मन्द जाठराग्नि, प्रदत्त | बलि - अरुन्धतीदर्शन, सहसा धननाग आदि के अरिष्ट षण्मासन्त अरिष्ट, सद्योमरण अरिष्ट । द्वादशोऽध्यायः ( पृ ० १८२ - १६४ ) गोमयचूर्णीयम् - शिर पर गोवर के चूर्ण की सी प्रतीति, पांव घिसकर चलना आदि मृत्यु लक्षण - लेप सूखना न सुखना - वैद्य का औषध तैयार न कर | सकना - औषध की व्यर्थता आदि मृत्यु लक्षण । दूतारिष्ट । वैद्यगत - अरिष्ट । । देशकालगत अरिष्ट । दूतगत अरिष्ट । अशुभ लक्षण | पूर्वापर लक्षण, | मार्ग के औत्पातिक लक्षण, गृहत्र-बेशकाल में गृहगत लक्षण, इन्द्रियस्थान का उपहार । वैद्य के कर्तव्य । शुभ लक्षण । उपहार । इति इन्द्रियस्थानम् ।
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[ ६ ] चिकित्सितस्थानम् प्रथमोऽध्यायः ( पृ ० १६५ - २४७ ) | अभयामलकीयो रसायनपादः प्रथमः -- भेषज के पर्याय । अभेषज के दो प्रकार । रसायन का लक्षण । रसा-यन के कार्य - इन गुणों की प्राप्ति का कारण, वाजीकरण औषध । अभेषज का लक्षण । रसायन प्रयोग के दो प्रकार - कुटी प्रावेशिक विधि, सशोधन । हरड के गुण | हरीतकी सेवन के योग्य व्यक्ति । आवले के गुण, कर्म । ब्राह्म रसायन का द्वितीययोग । च्यवनप्राश, आमलक रसायन । हरीतक्यादि योग । हरीतक्यादि द्वितीय योग । उपसहार प्राणकामीयो रसायनपादो द्वितीयः । रसायन विधि के गुण, रसायन के साथ आहार विधि आमलकावलेह , | आमलक चूर्ण । विडगावलेह । आमलकावलेह । नागबला रसायन । भल्लातकक्षीर । भल्ला-तक तैल । भल्लातक विधान - भल्लातक प्राश – भल्लातक का विशेष गुण । उपसंहार ।, करप्रचितीयो रसायनपादस्तृ-तीय:: - -आमलकायस ब्रह्म - रसायन । केवलामलक रसायन । लौहादिरसा यन । ऐन्द्री - रसायन । मेधाकर वा मेध्य चार रसायन । पिप्पली रसायन । पिप्पली वर्धमान रसायन । गंगाधर कविराज का मतभेद | त्रिफला रसायन के तीन योग । शिलाजतु । भावनाए । शिलाजतु के तीन प्रकार के प्रयोग । शिलाजतु की भिन्न २ गतिया, शिला-जतु के आलोडन द्रव्य । आयुर्वेदसमुत्थानीयो रसायन-पादश्चतुर्थः — ऋषियो के प्रति इन्द्र का उपदेश । इन्द्रोक्त रसायन । द्रोणी-प्रावेशिक रसायन - ब्रह्मसुवर्चला, आदि-त्यपर्णी, बल्वज, सोम, पद्मा, काष्ठ, गोधा, सर्पा, अजवगी इन आठ औष-धियो का प्रयोग- इन्द्रोक्त रसायन दूसरा, आचार रसायन । अश्वियों के कार्य । अश्वियो की मान - प्रतिष्ठा - प्राणाचार्य के लक्षण | आयुर्वेद का उद्देश्य— उपसहार | द्वितीयोऽध्यायः ( पृ ० २४७-२७३ ) संप्रयोगशरमूलीयो वाजीकरण-पादः प्रथमः -- सबसे प्रधान वाजी -करण स्त्री, स्त्री की श्रेष्ठता, अपत्य रहित पुरुष की निन्दा, बहु सन्तान पुरुष की उत्तमता, बृहणी - गुटिका । वाजीकरण घृत । वाजीकरण पिण्डरस । वृष्यरस । आसिक्क्षीरीयो वाजीकरणपादो द्वितीयः - षष्टिकादि गुटिका । वृष्य भक्ष्य । अपत्यकर स्वरस । वृष्य क्षीर । । वृष्य घृत । दधिशरं प्रयोग । षष्टिकौ -दन प्रयोग - वृष्य पूपलिका । उपसहार । माषपर्णभृतयो वाजीकरणपाद-स्तृतीयः-: - माष के पत्तो पर पली गाय के दूध का प्रयोग, वृष्य क्षीर प्रयोग ।
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[ ७ अपत्यकर क्षीरयोग । अपत्यजनन क्षीर । योग । वृष्य पायल योग । वृष्य पूप-लिका । शतावरी घृत । वृष्य मधुक योग | उपसंहार | पुमान् जातबलादिको वाजीकर-णपादश्चतुर्थः – स्त्रियो मे रमण करने और सन्तानवान् होने का विस्तार से वर्णन, वृष्य बस्तिया । वृष्य मास गुडिका, वृष्य माहिषरस । पूपलिका योग । वृष्य घृतभृष्ट मत्स्यमास - गर्भाधानकर योग, पूपलिका योग । वृष्य पूपलिका योग, वृष्य माषादि पूपलिका । वृष्ययोग, अपत्यकर घृत, वृष्य गुटिका । वृष्य उत्कारिका, वृष्यका लक्षण, शुक्र के क्षय के कारण । शुक्र प्रवृत्त न होने की दशाए । शुक्र का मथे जाकर प्रवृत्त होने में आठ कारण, कवि गगाधरसेन का मत । कामेच्छा से शरीर में आने वाली विकृतिया । वीर्य का महत्त्व । प्रशस्त शुक्र । उपसहार । तृतीयोऽध्यायः ( पृ ० २७३ - ३२८ ) ज्वरचिकित्सितम् —अग्निवेश के ज्वरसम्बन्धी प्रश्न | गुरु आत्रेय पुन-र्वसु कासमाधान, ज्वर की प्रकृति अर्थात् स्वाभाविक रूप, ज्वर की उत्पत्ति 1 । शिव-कोप से ज्वर की उत्पत्ति । ज्वर का प्रभाव व लक्षण । जन्म मृत्यु के समय का महातम ज्वर । ज्वर का पूर्वरूप । ज्वर का अपना स्वरूप, विधि भेद से ज्वर के दो प्रकार, सौम्य, " आग्नेय, वेगा-भिप्राय से दो भेद प्राकृत, वैकृत - साध्या साध्य भेद से दो प्रकार, दोष कालादि । भेद से पाच प्रकार, रसादि धातुभेद से । ] सात प्रकार, कारण भेद से ज्वर के भाठ प्रकार । मानस ज्वर के लक्षण । अन्त-वेंग ज्वर के लक्षण । बहिर्वंग ज्वर के लक्षण | प्राकृत ज्वर के साध्यासाध्य पर विचार । वैकृतज्वर के साध्य साध्य पर विचार । क्षीण शोष सहित असा ध्य ज्वर । सन्तत ज्वर की उत्पत्ति । तृतीयक और चतुर्थक ज्वर की उत्पत्ति । अन्येद्युष्क ज्वर की उत्पत्ति । दोषो की गति, अन्येद्युष्क, तृतीयक, चतुर्थक के लक्षण, तृतीयक ज्वर के तीन प्रकार । चतुर्थक ज्वर के दो प्रकार । चतुर्थक का भेद विषम ज्वर । ज्वर के पाच प्रकार । ज्वर के होने मे ऋतु, दिन, रात्रि, मन के बलाबल की कारणता, चतुर्थकादि का तृतीयकादि में परिवर्तन । सातों धातुओं मे आश्रित ज्वर के लक्षण | वात पित्त ज्वर के छक्षण, वात कफ ज्वर के लक्षण, कफ पित्त ज्वर के लक्षण | सन्निपातज ज्वरो का वर्णन, उसकै १२ प्रकार । सन्निपातज्वर के लक्षण, सुश्रुतोक्त अभिन्यास ज्वर के लक्षण । सन्निपातज साध्यासाध्यता, भागन्तु ज्वर के चार प्रकार | अभिचार और अभिशाप द्वारा उत्पन्न ज्वर । कामजन्य ज्वर । शोक जन्य ज्वर । क्रोधजन्य ज्वर, भूताविष्ट ज्वर के लक्षण । ज्वर का रूप । आम ज्वर के लक्षण | पच्यमान ज्वर के लक्षण । निराम ज्वर । नवज्वर में अप-थ्य । ज्वर मे लंघन । [ लघन के लक्षण और पहचान ] दोषो के पाचन । षड-गपानीय । साम ज्वरो के उपचार ।
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I लंघन की मर्यादा । घृतपान आदि उप-चार । शिरोविरेचन । जूपन और अजन प्रयोग । ज्वर नाशक द्रव्यों के अनुपा-नादि का क्रम । हितकारी यूष, शाक, मास रस मद्य आदि । ज्वरनाशक कषाय । बृहत्यादि गण । पिप्पल्यादि घृत । वासाद्य घृत । बलाद्य वृत । वमन के योग 1 । विरेचन के योग । पञ्चमूल सिद्ध दूध | त्रिकण्टकाद्य दूध | वात - पित्त ज्वर नाशक योग । पटोलाद्य बस्ति । आर raat aft । गुडूच्यादि - निरूह । जीवन्त्यादि अनुवासन । ज्वर नाशक कुछ योग । चन्दनाद्य तैल । दाहज्वर नाशक परिषेक - अवगाहन । दाहनाशक उपचार । शीत ज्वर मे अगरु आदि तैल । शीतज्वर नाशक तेरह प्रकार के स्वेद । शीत नाशक अन्य वस्त्र आदि उपचार, वायुजन्य ज्वर के लिये उपचार | निराम ज्वर वातिकज्वरमें पथ्य - अपथ्य, कफ प्रधान ज्वर में अल्पाशन विधि । साम ज्वरो मे लघन । सन्निपात ज्वर । उसके २५ भेद । वीसर्प आदि से उत्पन्न, ज्वर पर उप-चार, जीर्ण ज्वर के पुन लौटने पर उप चार, तृतीयक चतुर्थक ज्वर के उपचार । वाव प्रधान, पित्त प्रधान और कफ प्रधान विषम ज्वर । बिषम ज्वर नाशक योग । शाप, अभिचार तथा भूताभि-पग के कारण से हुए ज्वर की चिकित्सा, अभिघातजन्य ज्वरचिकित्सा | क्षत, व्रण और काम क्रोधजन्य ज्वर की चिकित्सा । नवज्वर और चिरकालिक । ज्वरमोक्ष । ज्वर से मुक्त पुरुष के । लक्षण | ज्वरयुक्त और ज्वरमुक्त के लिये पथ्य, अवशिष्ट ज्वरदोष की हानियां - उन दोषो का शोधन । उपसहार । चतुर्थोऽध्यायः ( पृ ० ३२८-३४५ ) रक्तपित्तचिकित्सितम् — रक्तपित्त के सम्बन्ध में अग्निवेश का निवेदन और आत्रेय पुनर्वसु का समाधान, पित्त के रक्त को दूषित करने का कारण । रक्त पित्त - नाम का कारण | कफ आदि दोषो कंसर्ग । रक्तपित्त की गति । रक्तपित्त का कारण | चिकित्सा विधि | रक्तपित्त में तर्पण । रक्तपित्ती का भोजन । रक्त-पित्त मे यवागू, पेया आदि । तृष्णोप-शम । ऊर्ध्वगामी, अधोगामी रक्तपित्त के लिये वमन, विरेचन । सशमनी क्रिया के २२ योग । घृतपाक । रक्तपित्त नाशक अन्य उपचार । शतावरी घृत । अवपीड़न । रक्तपित्त मे नस्य । रक्त-पित्त शामक लेप - परिषेचन - अवगाहन, दाह - शान्ति के लिये धरागृह आदि अनेक उपचार । उपसहार । पञ्चमोऽध्यायः ( पृ ० ३४६-३७४ ) गुल्मचिकित्सितम् ——कोष्ठ में वायु प्रकोप के ९ कारण । वातगुल्म आदि नाम से कहने योग्य पिण्डाकार पदार्थ । वातजन्य आदि पाच प्रकारों के गुल्मो के पाच स्थान | वातगुल्म के कारण वात-गुल्म के लक्षण पित्त गुल्म के कारण और लक्षण । कफगुल्म के कारण, लक्षण । द्विदोषजन्य गुल्म और लक्षण । सन्नि-पातजन्य गुल्म के लक्षण, रक्तगुल्म का निदान और लक्षण । गुल्मनाशक योग
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J वातगुल्म चिकिल्ला । पैतिक गुल्मचि-किल्ला । समन योग । स्तरीण । अपक्क गुल्म के लक्षण | विद्यमान गुल्म के लक्षण, पक्क गुल्म के लक्षण, गुल्म के दो प्रकार अन्त स्य और बहिस्थ । वमन के योग । कफगुल्म मे घृत पान आदि । अरिष्ट प्रयोग के काल भ्यूषणादि घृत । गुल्म षट्पल घून । हिगुसौवर्चलादि घृत । हनुषाद्य वृत । पिप्पल्ल्याद्यघृत | हिग्वादि चूर्ण | हिंग्वा दि गुडिका । शब्यादि वटी । नागरादि योग । लशुनक्षीर । तैल पञ्चक । शिला-जतु प्रयोग । अन्य योग, स्वेद प्रयोग । गुल्मनाशक बस्तिक्रिया । गुल्मनाशक तैल । नीलिन्याद्य घृत । वातगुल्म मे पथ्य । रोहिण्याद्य घृत । त्रायमाणाद्य घृत । आमलकाद्य घृत । द्राक्षाद्य घृत । वासा घृत । कफगुल्म की चिकित्सा । दशमूली घृत । भल्लातकाद्य घृत । पञ्चकोल घृत । मिश्रक स्नेह । वातगुल्म और कफगुल्म मे विरेचन । दन्तिह-रीतकी | अन्य योग । आहार । असा-ध्यता । रक्तगुल्म की चिकित्सा | पला-शक्षार यमक । गुल्मनाशक अनेक योग | वातगुल्म और कफगुल्म में सरामन-चिकित्सा । उपसंहार । षष्ठोऽध्यायः ( पृ ० ३७५-३८६ ) प्रमेहचिकित्सितम् फप्रमेह का निदान । सम्प्राप्ति । प्रमेह के बीस भेद । उनके तीन कारण समक्रिया ", विषम क्रिया और महात्यय | दस प्रकार के कफजन्य प्रमेह 1 । पित्तजन्य छ. प्रमेह । 8 प्रकार के यानिक प्रमेह । पूर्वरूप । प्रमेह रोगियों के दो प्रकार । उपचार । ! कफपमेह क दस योग । कफप्रमेह और पिरुप्रमेह मे पथ्य | त्रिकण्टकाद्य तैल, घृत और यमक । लोध्रासव । दन्त्या-सव । भल्लातकासव । षडगपानीय विधि से साधित मद्य का योग । प्रमेह-नाशक अनेक योग । साध्यासाध्य रूप उपहार | सप्तमोऽध्यायः ( पृ ० ३८६-४१५ ) कुष्ठचिकित्सितम् — कुष्ठ के हेतु. । सम्प्राप्ति । कुष्ठ का पूर्वरूप । १८ कुष्ठों के लक्षण | सात महाकुष्टो के लक्षण | उदुम्बर, मण्डल, ऋभ्यजिह्न, पुण्डरीक, सिध्मकुष्ट, काकणक कुष्ट । क्षुद्र कुष्ट के १६ प्रकार । दोषो की प्रधानता । तीनों दोषो के लक्षण | साध्य असाध्य कुष्ट । चिकित्सा । वमन योग । विरेचन द्रव्य । आस्थापन योग । नस्य । किलासनाश । वैरेचनिक योग । मण्डल कुष्ठो का उपचार । पटोलादि क्वाथ । मुस्तादि चूर्ण । त्रिफलादि चूर्ण, लेली-हक प्रयोग । पारद योग । हीरकादि योग । मध्वासव । कनकबिन्द्वरिष्ट । वाज, कफ अर पित्तजन्य कुष्ठो पर योग । पथ्यापथ्य । चित्रकादि लेप । मास्यादि लेप । त्रप्वादि लेप । सिद्धार्थक स्नान । आठ कषाय । त्रिफलादि कषाय, कुष्टाद्य तैल | श्वेतकरवीराद्य तैल 1 स्वेतकरवीरपत्राद्य तैल । तिक्तैक्ष्वाकु तैल । कनकक्षीरी तैल । सिध्म लेप । विपादिकाहर घृत - तैक । मण्डल कुछ-