श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 11–20
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 11–20
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[ १० हर लेप । ऐडगजादि लेप 1 । सिद्ध कुष्ठ । हर लेप । कुष्ठ में स्नान पान, अनेक योग | अभ्यग | रक्त - पित्त प्रधान कुष्ठों मे अनेक घृत । त्रैफल योग । तिक्तष-ट्पल घृत । महातिक्तक घृत 1 महाखा-दिर घृत । कृमि - कुष्ट पर अनेक लेप | श्वित्र चिकित्सा । पलाश क्षार, खदिरो-दक पान । मन शिलादि लेप, त्रिक पर अनेक लेप | असाध्य रोग | किलास के तीन भेद । किलास के कारण । उपसहार | अष्टमोऽध्यायः ( पृ ० ४१५-४४२ ) राजयक्ष्मचिकित्सितम् — यक्ष्मा की उत्पत्ति का उपाख्यान । यक्ष्मा के चार कारण । राजयक्ष्मा के लक्षण । शक्ति से अधिक कार्य करने से उत्पन्न क्षय । वेगोंके सधारण से उत्पन्न यक्ष्मा धातुक्षय से उत्पन्न यक्ष्मा | विषमान से उत्पन्न यक्ष्मा, राजयक्ष्मा का पूर्वरूप । यक्ष्मा के रूप और औषध । यक्ष्मा के ग्यारह रूप | राजयक्ष्मा का लक्षण स्वर भेद आदि । प्रतिश्यायादि लक्षणों पर चिकित्सा । स्वेदन । प्रदेह । बस्ति, नलों । का शिरावेध आदि । सशभनी क्रिया । संशमन चिकित्सा । यक्ष्म रोगी की मल स्त्रसन से मृत्यु । दशमूलाद्य घृत । कास, श्वासादि लक्षणों पर स्नेह और लेह । पञ्च पञ्चमूल घृत । चार लेह । सितो पलादि लेह- वासा घृत -शतावरी घृत । गोक्षुरादि घृत । जीवन्त्यादि घृत । बलादि क्षीर । अन्य उपयोगी योग । यवानी षाडव । तालीशाद्य चूर्ण । पथ्य, ] ] घृत सेवन । दशमूलादि घृत । पञ्चको-लादि । रास्नादि घृत । सेवन विधि । उत्सादनयोग, स्नानीय जल | पथ्य खाद्य । अभ्यग । उपसहार । नवमोऽध्यायः ( पृ ० ४४२-४६२ ) उन्मादचिकित्सितम् —- उन्माद के कारण और सामान्य लक्षण, सम्प्राप्ति-लक्षण । कारणभेद से उन्माद के दो भेद- निज और आगन्तुज । आगन्तुज के पाच प्रकार । वातजन्य उन्माद, लक्षण | पित्तजन्य उन्माद के पूर्वरूप और लक्ष्यण -कफज उन्माद, पूर्वरूप और लक्षण | सन्निपातजन्य उन्माद - आग-न्तुज उन्माद - लक्षण - ग्रहोन्माद के लक्षण देव, सिद्ध, पितृ, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, ब्रह्मराक्षस, पिशाच आदि से उत्पन्न होन्माद । उनके आगमन काल । असख्य ग्रहों में मुख्य आठ ग्रह 1 । निज आगन्तुज भेद से उन्माद के दो प्रकार । उपचार कल्याणक घृत । महाकल्याणक घृत । महापैशाचिक घृत । लशुनाद्य घृत । हिग्वादि पुरातन घृत योग । नस्त्र और अजन । उन्माद पर प्रायो-गिक धूम । उन्माद पर अन्य उपचार, दैवव्यपाश्रय चिकित्सा, उपसहार । दशमोऽध्यायः ( पृ ० ४६२–४७४ ) अपस्मारचिकित्सितम् — अपस्मार का लक्षण, निदानपूर्वक सम्प्राप्ति । सामा-न्य लक्षण । अपस्मार के चार प्रकार । वातिक अपस्मार के लक्षण । पैत्तिक अपस्मार के लक्षण | कफजन्य अपस्मार के लक्षण । चिकित्सा । पञ्चगव्य घृत ।
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[ ११ महापञ्चगव्य घृत, ब्राह्मी घृत । अपस्मार । नाशक अनेक योग, अपस्मार नाशक नस्य । तीन योग अजन । धूपन । अत-वाभिनिवेश नामक महारोग । चिकि त्सा | उपसंहार । एकादशोऽध्यायः ( पृ ० ४७४ - ४८६ ) क्षतक्षीणचिकित्सितम् - कारण और सम्प्राप्ति | लक्षण | चिकित्सा | अनेक योग । अमृतप्राश घृत । श्वदंष्ट्रादि घृत । सक्त प्रयोग । सर्पिगुंड के चार योग । सपिर्मोदक । सैन्धवादि चूर्णं । षाडव । उपसहार | द्वादशोऽध्यायः ( पृ ० ४८६-५१२ ) श्वयथुचिकित्सितम् - कारण । ढो भेद - निज और आगन्तुज । निज शोथ के भेद । सम्प्राप्ति, पूर्वरूप सामान्य लक्षण | पैत्तिक शोथ कफजन्य शोथ असाध्य शोथ । शोथ के उपद्रव । साध्य शोथ । आमजन्य शोथ की चिकित्सा । अपथ्य । चिकित्सा । अनेक योग । गण्डीराद्यरिष्ट । अष्टशतारिष्ट । पुनर्न-वाद्यरिष्ट । फलत्रिकाद्यरिष्ट । क्षार गुडिका, गुडाक प्रयोग | शिलाजतु प्रयोग । कसहरीतकी । पटोलमूलाद्य घृत । चित्रकाद्य घृत, चित्रक घृत । जीवन्त्यादि यवागू | अन्य पथ्य, शाक-शैलेयादि तैल, प्रदेह | पैत्तिक शोथ चिकित्सा । कफजन्य शोथ चिकित्सा । शोफ रोगी को उबटन । बिडालिका का लक्षण तालु विधि | उपजिह्निका, उपकुश | गलगण्ड - गण्डमाला चिकित्सा ग्रन्थि । चिकित्सा - असाध्यग्रन्थि । ] बिदारिका - विस्फोटक - कक्षा । रोमान्तिका-मसूरिका - वृद्धिरोग । भगन्दर - चिकित्सा, श्लीपद - जालगर्दभ - चिकित्सा । उप-सहार - आगन्तुज शोथ । उपसहार । त्रयोदशोऽध्यायः ( पृ ० ५१२-५४५ ) उदरचिकित्सितम् — अग्निवेश का निवेदन- आत्रेय ऋषि का उपदेश । उदर रोग के सामान्य कारण । उदर रोग के पूर्व रूप । रूप । वातोदर के कारण और लक्षण । पित्तोदर के कारण-लक्षण । कफोदर के कारण लक्षण । सन्निपातोदर के कारण और लक्षण । होदर | यकृत्प्लीहोदर | बद्धगुदोदर लक्षण । छिद्रोदर - लक्षण । उदकोदर-लक्षण । असाध्य रोगी । वातोदर की चिकित्सा । पित्तोदर की चिकित्सा । कफोदर को चिकित्सा । अनेक योग । रोहितक घृत | बद्धगुदोदर की चिकित्सा, छिद्रोदर की चिकित्सा | उदकोदर की चिकित्सा | अपथ्य | उदर रोग पर तक्र का प्रयोग | दुग्धयोग लेप - परिषेचन, अवसेचन, अष्टसूत्र प्रयोग | दीपनीय घृत । पञ्चकोल घृत । नागराद्य घृत । चित्रक घृत । यवाद्य घृत । पटोलमूला-दिचूर्ण । गवाक्ष्यादि चूर्ण । नारायण चूर्ण । हवुषाद्य चूर्ण, नीलिन्याद्य चूर्ण । अन्य अनेक योग | वर्धमान - पिप्पली विधि से हरड़ का सेवन । दूष्योदर ( सन्निपातोदर ) ) में दन्त्यादि तैल । वातोदर में सरलादि तैलाभ्यग | अरिष्टों के प्रयोग । उदकोदर पर अन्नकरीषादि क्षार योग! अन्य अनेक योग - उदर-
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[ २२ । रोगो में शस्त्रचिकित्सा । उपसहार । चतुर्दशोऽध्यायः ( प्र ० ५४६-५८८ ) अर्शश्चिकित्सितम् — इन और उप देश | अर्श रूप | अभिः अर्श मंज्ञा विवेक । सहज र्श । लक्षण उत्पति कारण । वातादिजन्य भशी की विशे -पता । वातजन्य अर्श के कारण । पित्त- । जन्य अर्श के कारण - कफ प्रधान अर्धा के लक्षण | कारण | पर्वरूप | असा ध्यता | चिकित्सा | अर्श पर शस्त्र के अयुक्त प्रयोग ले हानियों की सम्भावना, शुष्क अर्शो की विके आउटलेप दूषित रक्त पर जल का प्रयोग | पाचन योग | दश योग | तक्रा f रष्ट: तक्र का सर्वोपरि प्रयोग । मास रस का प्रयोग । ों और यूषों का प्रयोग | अनेक योग 1 । तीन घृत - चव्यघृत । नागराद्य-घृत । पिप्पलाद्य घृत । माल रस । शाक | अनुवासन | अनेक योग अभया-रिष्ट । दन्त्यरिष्ट । फलारिष्ट । शर्करा-सव । कनकारिष्ट । शुष्क अर्शो की सिद्ध फल- चिकित्सा | स्रावी अर्शो को सिद्ध- चिकित्सा | रक्तपित्तल्बण स्त्रावी चिकित्सा - अन्ययोग कुटजादि रस क्रिया, अनेक योग और पथ्य अर्श के मस्सों का प्रतिसारण । पिच्छाबस्ति । हीवेरादि घृत 1 । सुनिषण्णकचाङ्गेरीघृत । उपसंहार । पञ्चदशोऽध्यायः ( पृ ० ५८ ९ -६३२ ) ग्रहणीचिकित्सितम् — जाठर अग्नि वा देहानि की प्रधानता । देहाग्नि द्वारा आहार पाचन की चूल्हे पर रखी भात की हडिया से तुलना । आहार से रस का बनना । उसले इन्द्रियो का तपण । | भोम आदि पाच प्रकार की उष्माए, 1 उन द्वारा पाच कार के गुणों का पाक, | सात अनियो द्वारा मात देह धातुओं के से प्रकार के पाक, किह और प्रमाद । t | प्रसादज धातु, रस द्वारा धातुओं के पोषण मे ४ प्रकार के न्यायों का वर्णन । उपधातुओं की उत्पत्ति । किट का रूप आहार रखो को धातुओं में बदलने का । का क्रम । धातु परिवर्तन के सम्बन्ध | से चक्रपाणि का मत अचि सन्तान और । पललतान का दृष्टान्त । आहर रस से रक्तादि बनने के सम्बन्ध मे अग्निवेश का प्रश्न । आत्रेय का उत्तर । रस को फैलाने मे विक्षेपक व्यान का कार्य, । निरन्तर गतिशील रस के स्रोतों में रुक जाने से व्याधियों की उत्पत्ति । तीन प्रकार की अग्नियों मे जाठराग्नि की मुख्यता । अजीर्ण के सामान्य कारण । सामान्य लक्षण । घोर अन्नविष की उत्पत्ति, उसके द्वारा अनेक रोगो की उत्पत्ति । विषमाभि के द्वारा धातु - वैष-म्य और देह - शोष । समाग्निसे धातु-सरता दुर्बलानि द्वारा अन्न का विदग्ध होना, उसका गुदद्वार से विरेचन, ग्रहणी रोग का स्वरूप, ग्रहणी के लक्षण, ग्रहणी के पूर्वरूप, ग्रहणी का स्थान और निरुक्ति । ग्रहणी रोग के ४ प्रकार । वातजन्य ग्रहणी लक्षण । पैत्तिक ग्रहणी- लक्षण । कफजन्य ग्रहणी - लक्षण । ग्रहणी दोष । सन्निपातजन्य ग्रहणी । ग्रहणी चिकित्सा । आम दोष में चिकित्सा - दशमूलाद्य घृत । त्र्यूषणाद्य वृत । पञ्चमूलाद्य चूर्ण । अन्य
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[ १३ योग - साम और निराम मल की परीक्षा-अपवाद । चित्रकाद्य गुडिकान्छ योग । वमन, अर्श, ग्रन्थि - शूल मे सिद्ध योग । आमयुक्त । शूल मे सिद्धयोग । अभि-वर्धक पिप्पल्याद्य - चूर्ण । मरिचाद्य चूर्ण । अन्य योग । पञ्च प्रकार यवागू । भोज-नादि व्यवस्था । तक्र प्रयोग । तक्रारिष्ट, चन्दनाद्य घृत । तिक्त घृतो का प्रयोग । नागराद्य चूर्णं । भूनिम्बादि चूर्ण । किराताद्य चूर्ण । कफजन्य ग्रहणी मे वमन - पलाशादि योग । अग्निवृद्धयर्थ । योग । मध्वासव । मधूकासव । दुराल-] भासव । मूलासव । पिण्डासव । मध्व-रिष्ट । क्षार घृत । पिप्पल्यादि योग । तीन क्षार । क्षार गुडिका । वत्मकादि योग । अग्निवर्धक त्रिफलादि क्षार योग । त्रिदोषजन्य ग्रहणी मे पञ्च कर्म । कफ की प्रबलावस्था मे वमनादि विधि । मन्दाग्निवाले को दीपनीय भोषधि साधित घृत पान । नाना प्रकार की महा अग्नियो पर अनेक उपचार । अग्नि-मान्ध का कारण । भस्मक चिकित्ला । सम्प्राप्ति । उसके १८ उपचार । पथ्य । देश - काल विचार से भोजन विधि । उपसंहार ।
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भार्गवपुस्तकालय, बनारस द्वारा प्रकाशित चिकित्सा सम्बन्धी उपयोगी पुस्तकें बृहद् बूटीप्रचार ( दसवाँ संस्करण ) सम्पा०- पं ० हरिनारायण शर्मा वैद्य आयुर्वेदाचार्य काव्यतीर्थं मूल्य २ ) घरेलू सस्ती दवायें ( दूसरा संस्करण ) ले ० - आचार्य स्वामी विश्वनाथ शास्त्री विश्वेश राजवैद्य मूल्य ३ ) निघण्टुकल्पद्रुम पृष्ठ संख्या ६०० सैकड़ो चित्रयुक्त मूल्य ६ ) शार्ङ्गधर संहिता भाषा टीका ( ६ वॉ संस्करण ) टीकाकार - पं ० रामेश्वर भट्ट वैद्य मूल्य ६ ) माधवनिदान ( संस्कृत टीका तथा भा ० टी ० ) सम्पा०- पं ० हरिनारायण शर्मा वैद्य आयुर्वेदा ० काव्यतीर्थ मू ० = ), १० ) माधवनिदान भाषा टीकाविभूषित मूल्य ४ ) रुपया ( सैकडों चित्रयुक्त ) जन्मनिरोध मूल्य ७ ) रुपया ( अर्थात् स्त्री के गर्भवती होने से बचने के उपाय ) बड़े - बड़े विद्वानों तथा पत्र - पत्रिकाओं द्वारा प्रशसित ( चतुर्थ संस्करण ) होमियोपैथिक चिकित्सा मूल्य = ) डाक्टर एस ० एस ० मिश्रा एच ० एम ० बी ० ( होमियोपैथिक सम्बन्धी अपूर्व चिकित्सा ग्रन्थ ) योगचिन्तामणि ( भाषा टीका सहित ) टीकाकार - श्री पण्डित बुद्ध सीताराम शर्मा मूल्य ५ ॥ सोंठ लेखक - रमेशद्विवेदी आयुर्वेदालङ्कार मूल्य || ) घरेल चिकित्सा तृतीय संस्करण ] चॉद में प्रकाशित अपूर्व पुस्तकों का संग्रह मूल्य १ ) पता - भार्गव पुस्तकालय, गायघाट, ( ब्राच कचौड़ीगली ), बनारस
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ओ ३ म् चरकसंहिता शारीरस्थानम् प्रथमोऽध्यायः अथातः कतिधापुरुषीयं शारीर व्याख्यास्यामः इति ह स्मा sse भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
इसके आगे ' कतिधापुरुषीय ' नामक शारीर - स्थान की ऐसा भगवान् आत्रेय ने उपदेश किया है ॥ २ ॥
अग्निवेश उवाच-कतिधा पुरुषो धीमन् धातुभेदेन भिद्यते ।
पुरुषः कारण कस्मात्, प्रभवः पुरुषस्य कः ॥ ३
॥ १ ॥
व्याख्या करते हैं, ॥
किमज्ञो ज्ञः स नित्यः कि किमनित्यो निदर्शितः ।
प्रकृतिः का विकाराः के कि लिङ्गं पुरुषस्य च ॥ ४ ॥
भगवान् आत्रेय से अग्निवेश पूछते हैं - हे धीमन् गुरो । धातुभेद से पुरुष का कितने प्रकार से भेद किया है । इस संसार में पुरुष को प्रधान कारण किस लिये कहा जाता है? पुरुष का उत्पत्ति कारण क्या है? यह पुरुष ज्ञान से रहित मूढ है या ज्ञानी हैं? यह पुरुष नित्य हैं या अनित्य १ प्रकृति क्या वस्तु हे? विकार कौन से हैं? पुरुष के लक्षण क्या हैं, ( जिनसे इसका अनुमान होता है ) ॥ ३-४ ॥
निष्क्रिय च स्वतन्त्र च वशिनं सर्वगं विभुम् ।
वदन्त्यात्मानमात्मज्ञाः क्षेत्रज्ञं साक्षिणं तथा ५ ॥
आत्मा को जानने वाले ब्रह्मवादी आत्मा को क्रियाहीन, स्वतंत्र, सब को वश में करने वाला, सर्वव्यापक, विभु ( महान् ) क्षेत्रज्ञ, और साक्षी कहते हैं ॥५ ॥
निष्क्रियस्य क्रिया तस्य भगवन् । विद्यते कथम् ।
स्वतन्त्रश्चदनिष्टासु कथं योनिषु जायते ॥ ६ ॥
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a चरकसंहिता
वशी यद्यसुखैः कस्माद्भावैराक्रम्यते बलात् ।
सर्वाः सर्वगतत्वाच्च वेदनाः कि न वेत्ति सः ॥ ७ ॥
न पश्यति विभुः कस्माच्छैलकुड्य तिरस्कृतम् ।
क्षेत्रज्ञः क्षेत्रमथवा किं पूर्वमिति सशयः ॥ ८ ॥
ज्ञेय क्षेत्रं विना पूर्वं क्षेत्रज्ञो हि न युज्यते ।
क्षेत्र च यदि पूर्वं स्यात् क्षेत्रज्ञः स्यादशाश्वतः ॥ ६
साक्षिभूतश्च कस्यायं कर्ता ह्यन्यो न विद्यते ।
स्यात्कथ चाविकारस्य विशेषो वेदनाकृतः ॥ १० ॥
[ अ ० १ ॥ हे भगवन् | यदि आत्मा क्रियाहीन है तो उसकी क्रियायें किस प्रकार से होती हैं? क्रियाहीन क्रिया नहीं कर सकता । आत्मा यदि स्वतंत्र है तो फिर वह दुखकारक, अनिष्ट दुःखदायी योनियों में किस लिये उत्पन्न होता है १ यदि आत्मा वशी है, तो वह दुःखदायक पदार्थों से क्यों बलात् पीड़ित होता है? आत्मा यदि सर्वत्र व्यापक है तो सब शरोरों की समस्त वेदनाओं को क्यों नहीं जानता? आत्मा यदि आकाश के समान व्यापक और महान् है तो पर्वत या दीवार से छिपे पदार्थों को क्यों नही देखता? आत्मा ' क्षेत्रज्ञ ' है । क्षेत्रज्ञ और क्षेत्र में पहिले कौन है, इसमें सशय है? ज्ञेय क्षेत्र के बिना ज्ञाता क्षेत्र हो ही नहीं सकता । और यदि पहिले क्षेत्र हो पीछे क्षेत्रज्ञ मानों तो क्षेत्र अनित्य हो जाता है । आत्मा किसके कमो का साक्षी है? [ दूसरे के कर्मों को देखने वाला लोक में साक्षी कहा जाता है ] | क्योंकि आत्मा से अतिरिक्त कोई कर्त्ता नहीं है । आत्मा यदि ' निर्विकार ' है तो वेदना से उत्पन्न सुख-दूसरा दुख आदि क्यों होते है? ॥६–१० ॥
अथ चाऽऽर्तस्य भगवस्तिसृणा कां चिकित्सति ।
अतीत वेदना वैद्यो वर्तमानां भविष्यतीम् ॥ ११ ॥
भविष्यन्त्या असंप्राप्तिरतीताया अनागमः ।
सांप्रतिक्या अपि स्थानं नास्त्यर्ते. संशयो हातः ॥ १२ ॥
हे भगवन्! वैद्य रोगी की अतीत, वर्त्तमान और भविष्य इन तीन प्रकार की वेदनाओं में से किस वेदना ( पीड़ा ) की चिकित्सा करता है? क्योकि भविष्य में होने वाली वेदनाये ( पीड़ाए ) अप्राप्त हैं, वे उपस्थित ही नहीं, उनकी चिकित्सा हो नहीं सकती । अतीत वेदनायें फिर नही आयेगी, वे तो जा चुकीं । शेष वर्त्तमान काल की वेदनाओं की भी स्थिति नहीं है, क्योंकि
वे अनित्य है । इसलिये सशय है ॥११- १२ ॥
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अ ० १ ] शारीरस्थानम VA जन ~
कारणं वेदनानां किं किमधिष्ठानमुच्यते ।
क चैता वेदना सर्वा निवृत्ति यान्त्यशेषतः ॥ १३ ॥
सर्ववित्सर्व संन्यासी सर्वसयोगनिःसृतः ।
एकः प्रशान्तो भूतात्मा कैर्लिङ्गैरुपलभ्यते ॥ १४ ॥
वेदनाओं का क्या कारण है? वेदनाओं का आश्रय क्या है? ये सब वेदनाए किस अवस्था में शान्त हो जाती है १ सर्वज्ञ, सर्वसन्यासी, सब प्रकार के सयोंगों से मुक्त, प्रशान्त, भूतात्मा किन लक्षणों से जाना जाता है? अग्नि-वेश के ये तेईस प्रश्न हैं ॥१३-१४ ॥
इत्यग्निवेशस्य वचः श्रुत्वा मतिमतां वरः ।
सर्वं यथावत्प्रोवाच प्रशान्तात्मा पुनर्वसुः ॥ १५ ॥
खादयश्चेतनाषष्ठा धातवः पुरुषः स्मृतः ।
चेतनाधातुरख्येकः स्मृतः पुरुषसंज्ञकः ॥ १६ ॥
पुनश्च धातुभेदेन चतुर्विंशतिकः स्मृतः ।
मनोदशेन्द्रियाण्यर्थाः प्रकृतिश्चाष्टधातुकी ॥ १७ ॥
बुद्धिमानों मे श्रेष्ठ, प्रशान्त चिच वाले पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश के इन प्रश्नों को सुनकर क्रम से सबका यथोचित उत्तर दिया-- आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी और चेतना ( मन सहित आत्मा ) ये छ ' धातु ' पुरुष ' शब्द से कहे जाते है, ' एक अकेले प्रकृति आदि से पृथकू चेतना धातु को भी पुरुष शब्द से कहते है । [ यह साख्य मत का पुरुष चिकित्सा का विषय नहीं है, चिकित्सा का विषय तो प्रथम प्रकार का पुरुष ही है ] । फिर धातु भेद से चौबीस राशियों को भी ' पुरुष ' शब्द से कहा है । मन, पाच ज्ञानेन्द्रिय, पाच कर्मेन्द्रिय, पाच अर्थ - शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध ये १६, अव्यक्त, महान् अहकार और पचमहाभूत ये आठ प्रकृतिया हैं, इस प्रकार है ' । [ ये चौबीस तत्त्व अचेतन है और पुरुष चेतन है । है । लंगड़े और अन्धे के समान इनका सयोग होने होती है ४ ] ||| १५ - १७ ॥ १ यह वैशेषिक मत से कहा ।
२ मूलप्रकृतिर विकृतिर्महदाद्या प्रकृतिविकृतय सप्त ।
षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्न विकृतिः पुरुषः ॥
से चौबीस तत्व यही पुरुष भोक्त से सृष्टि उत्पन्न सा ० का ३ ॥ ३ तस्मात् तत्सयोगादचेतन चेतनावदिव लिङ्गम् ॥ सा ० का ० २० ॥ ४. पडूवन्धवदुभयोरपि सयोगस्तत्कृतः सर्गः ॥ सांख्य का ० २१ ॥
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3 चरकसंहिता [ अ ० १
लक्षण मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव वा ।
सति ह्यात्मेन्द्रियार्थाना संनिकर्षे न वर्तते ॥ १८ ॥
" वैवृत्यान्मनसो ज्ञानं, मानिध्यात्तच्च वर्तते ।
अणुत्वमथ चैकत्व द्वौ गुणौ मनसः स्मृतौ ॥ १६ ॥
चिन्त्यं विचार्यमूह्य च ध्येय संकल्प्यमेव च ।
यत्किचिन्मनसो ज्ञेय तत्सर्वं हार्थसज्ञकम् ॥ २० ॥
इन्द्रियाभिग्रहः कर्म मनसः स्वस्य निग्रहः ।
ऊहो विचारश्च ततः पर बुद्धि प्रवर्तते ॥ २१ ॥
इन्द्रियेणेन्द्रियार्थो हि समनस्केन गृह्यते ।
कल्प्यते मनसाऽप्यूर्ध्वं गुणतो दोषतो यथा ॥ २२ ॥
जायते विषये तत्र या बुद्धिर्निश्चयात्मिका ।
व्यवस्यति यया वक्तु कर्तुं वा बुद्धिपूर्वकम् ॥ २३ ॥
मन का लक्षण - ज्ञान का न होना और होना मन का लक्षण है, क्योंकि आत्मा और इन्द्रिय का विषय के साथ सन्निकर्ष होने पर भी मन का योग न इस ज्ञान नहीं होता । मन का योग होने पर ही ज्ञान होता है । २ मन के दा गुण हैं ( १ ) अणुत्व और ( २ ) एकत्व । मन के विषय — चिन्त्य ( नाना प्रकार के विषयो को सोचना, गुण या दोष से विचारना ), तर्क ( एकाग्र मन से सोचना ), सकल्प, ( कर्त्तव्य अकर्त्तव्य का निश्चय ) इनके अतिरिक्त और भी जो सुख दुःख आदि मन से ग्राह्य हैं, वे सब मन के विषय कहे जाते हैं । मन के कर्म -- इन्द्रियों का नियमन उनको अपने विषय मे प्रवृत्त करना, इस मन को अहित वस्तुओं से राक्ना, शास्त्र मे कही बात पर युक्ति से विचार करना, विचार, ध्यान, सकल्प आदि ये सब मन के कार्य हैं, इसके आगे बुद्धि प्रवृत्त होती है । बुद्धि की उत्पत्ति -- प्रथम मन से युक्त कान आदि इन्द्रिया, इन्द्रिय के विषयों का ग्रहण करती हैं । वे वस्तुमात्र को ही ग्रहण करती है । मन इन्द्रिय से गृहीत विषय का गुण या दोष रूप स विचार करता है । इन्द्रिय से ग्रहण १ वैवृत्यात्या २ मन का लक्षण --
--- ' अयौगपद्यात् ज्ञानाना तस्याणुत्वमिष्यते ।
विश्वनाथकारिका । ' ज्ञानयौगपद्यादेक मन ' 1 ॥ न्याय ० २ । ४ । ६० ॥
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अ ० १ ] शारीरस्थानम किये और मन से विचारे हुए विषय मे जो निश्चयात्मक बुद्धि होती है, उसका नाम प्रत्यक्ष हैं । इस निश्चयात्मक बुद्धि से ही पुरुष वैसा कहने या करने का निश्चय करता है ॥ १८-२३ ॥
एकैकाधिकयुक्तानि खादीनामिन्द्रियाणि तु ।
पञ्चकर्मानुमेयानि येभ्यो बुद्धि प्रवर्तते ॥ २४ ॥
हस्तौ पादौ गुदोपस्थं जिह्वेन्द्रियमथापि वा ।
कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव पादौ गमनकर्मणि ॥ २५ ॥
पायूपस्थौ विसर्गार्थं हस्तो ग्रहणधारणे ।
जिल्हा वागिन्द्रिय, वाक् च सत्या ज्योतिस्तमोऽनृता ॥२६ ॥
इन्द्रिय श्रोत्र, त्वचा, चक्षु, रसना और घ्राण ये पात्र इन्द्रिया आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी इन पंच महाभूतों से उत्पन्न होने पर भी इनमें एक एक भूत की अधिकता रहती है । यथा -- -श्रोत्र 2 में आकाश की, त्वचा में वायुकी । इनमे जिस भूत की अधिकता होती है इन्द्रिय उसी की ओर दौड़ती है । इन इन्द्रियों के अतीन्द्रिय होने से इनका ज्ञान ( अनुमान रूप ) इनके कार्यों ( श्रवण, स्पर्शन, दर्शन, रसन और ब्राण ) से किया जाता है । इन इन्द्रियों मे बुद्धि अर्थात् ज्ञान प्रवृत्त होता है । कर्मेन्द्रिय -- हाथ, पाव, गुदा, ' उपस्थ ' और वाणी ये पांच कर्म-न्द्रिय हैं । इनमें पाव चलने के लिये, पायु ( गुदा ) और उपस्थ ( लिंग ) विसर्ग अर्थात् मल, मूत्र और शुक्र के त्यागने के लिये, हाथ ग्रहण और धारण करने के लिये, वाग् - इन्द्रिय ( जिह्वा ), बोलने के लिये है । वाणी दो प्रकार की -- -- सत्य और असत्य । इनमे सच्ची वाणी -- ज्योति वा प्रकाश स्वरूप ( दोनों लोकों को प्रकाशित करनेवाली ) है और अमृत वाणी अन्धकारमयी है ॥२४-२६ ॥
महाभूतानि खं वायुरग्निरापः क्षितिस्तथा ।
शब्दः स्पर्शश्च रूप च रसौ गन्धाश्च तद्गुणाः ॥ २७ ॥
तेषामेकगुणः पूर्वो, गुणवृद्धि. परे परे ।
पूर्वः पूर्व गुणश्चैव क्रमशो गुणिषु स्मृत ॥ २८ ॥
महाभृत-- आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथिवी ये पाच महाभृत हैं । इन महाभूतों के शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये क्रम से पाच गुण है । इन महाभूतों में प्रथम आकाश एकगुणवाला है, आगे उत्तरोत्तर गुणों की वृद्धि होती गई है 1 । जैसे - वायु दो गुणों वाला ( आकाश, वायु ), अग्नि तीन गुणों वाला ( आकाश, वायु, अग्नि, ), आप ( जल ) चार गुणों