श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 531–540
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 531–540
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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५४७ इसी प्रकार से अन्य सहज रोगो के भी ये ही दो कारण है । इनमे गर्भ - शरीर के साथ उत्पन्न सहज - अर्श अधिमास के ही विकार हैं । इनको अधिमास विकार ही समझना चाहिये । [ किसी स्थान पर अधिक मास का उठ आना ' अधिमास ’ विकार कहता है, यह भी एक प्रकार का रोग है ] ॥ ५ ॥
सर्वेषां चार्शसा क्षेत्रं - गुदस्यार्धपञ्चमाङ्गलेऽवकाशे त्रिभागान्त-रास्तिस्रो गुदवलयः, क्षेत्रमिति देश: । स्थान – दानो प्रकार के अर्शों का स्थान गुदा के मुख से लेकर साढे पाच अगुल गुदाभाग है । इस गुदा भाग के तीन विभाग है । इसमे तीन वलिया ( चक्र ) है । ( १ ) प्रवाहिणी, ( २ ) विसर्जनी और ( ३ ) सवरणी ' । ये तीनो वलिया दोनो प्रकार के अर्श रोगो का उत्पत्ति स्थान है । [ ये वली या चक्र डेढ २ अगुल चौड़ी ओर एक अगुल उभार की चार अगुल भर हाती हैं । ] केचित्तु भूयांसमेव देशमुपदिशन्त्यर्शसां शिश्नमपत्यपथं गलमुख-नासिकाकर्णाक्षिवर्त्मानित वकू च । कई आचार्य इससे भी अधिक स्थानों को अर्श का स्थान मानते है । जैसे - अपत्य - पथ ( योनिमार्ग ) लिग ( इन्द्रिय ), गला, तालु, मुख, नाक, कान, आख इनके मार्ग और त्वचा इन स्थानो मे भी अर्शरोग होता है ।
तदस्त्यधिमांसदेशतया, गुदवलिजाना त्वर्शासीति संज्ञा तन्त्रेऽस्मिन् ।
सर्वेषा चार्शसामधिष्ठानं मेदो मासं त्वक् च ॥ ६ ॥
ये सब स्थान अधिमास के रोग है, इस शास्त्र मे गुदा की वलियो मे उत्पन्न अशो की ही ' अर्श ' सज्ञा है । सब प्रकार के अर्श रोगो का आश्रय स्थान मंद मास और त्वचा है ॥ ६ ॥
तत्र सहजान्यसि कानिचिदणूनि कानिचिन्महान्ति कानिचिद्दी-र्याणि कानिचिद् हस्वानि कानिचिद् वृत्तानि कानिचिद्विषमविसृतानि कानिचिदन्तः कुटिलानि कानिचिद् बहिः कुटिलानि कानिचिज्जटिलानि कानिचिदन्तर्मुखानि यथास्वं दोषानुबन्धवर्णानि ॥ ७ ॥
सहज अर्श - कोई तो अति सूक्ष्म, कोई बड़े, कोई लम्बे, कोई छोटे, कोई गोल, कोई विषम रूप मे फैले, कोई अन्दर से टेढे, कोई बाहर से टेढे, कोई जटिल ( गुथे हुए ), कोई अन्दर की ओर मुख किये हुए तथा दोषानुसार वर्ण वाले होते है ॥ ७ ॥
१ सुश्रुत में कहा है —– तत्र स्थूलात्रप्रतिविद्धमर्धपंचागुल गुदमाहुः । तस्मि-न्वलयस्तिस्रः अध्यर्धीगुलसम्मिताः । प्रवाहिणी, विसर्जनी, संवरणी चेति । चतुरंगुलमिताः सर्वास्तिर्यगेकागुलोच्छ्रिताः । सु ० नि ० २ ।
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५४८ चरकसंहिता [ अ ० १४ तैरुपहतो जन्मप्रभृति भवत्यतिकृशो विवर्णः क्षामो दीनः प्रचुरवि-बद्ध - वात - मूत्र - पुरीषः शार्करी चाश्मरी वा तथाऽनियत- दि बद्ध - मुक्त - पक्का-शुष्कभिन्न अन्तरान्तरा श्वेत - पाण्डु- हरित पीत- रक्तारुण- तनु सान्द्र-पिच्छिल - कुणप गन्धाम - पुरीपोपवेशी नाभि - बस्ति - " क्षणोद्देशे प्रचुरपरि-कतिकान्वितः सशूलगुदप्रवाह्निकः परिहर्त - प्रमेह प्रसक्त - विष्टम्भान्त्र- कूजो-दावत हृदयेन्द्रियोपलेपः प्रचुरविबद्धति काम्लोद्गारः सुदुर्बलो सुदुर्नला-मिररुपशुक्रः क्रोधनो दुःखोपचारशीलः कारा इवास - तमक - तृष्णा - हल्लास-छरिरोच काविपाक - पीनस - क्षवथु - पतरतेमिरिकः शिरःशूली क्षाम-भिन्न - सन्न - सक्त - जर्जर - स्वरः कर्णरोगी सशूल - पाणि - पाद - वदनाक्षि- कूटः सज्वरः साङ्गमर्दः सर्वपर्वास्थिशूली चान्तरान्तरा पार्श्व - दि - बस्ति-हृदय - पृष्ठ - त्रिक -ग्रहोपतप्तः प्रध्यानपरः परमालसश्चेति 1 । जन्मप्रभृत्यस्य गुदजेरावृतो मागोपरोधाद्वायुरपानः प्रत्यारोहन्समानव्यानप्राणोदानान् पित्तश्लेष्माणो च प्रकोपयति, ते नकुपिताः पञ्च वाताः पिरालेष्माणौ चार्शसमभिद्रवन्त एतान् विकारानुपजनयन्तीत्युक्तानि सहजा-न्यर्शासि ॥ ८ ॥
लक्षण- - अर्शरोग के कारण रोगी जन्म से ही अति कृग, विवर्ण ( कान्ति-रहित ), क्षीण, दीन होता है । वायु, मूत्र और मल की अधिकता और रुकावट रहती है | अश्मरी ( पथरी ) तथा मूत्र मे शर्करा ( रेत ) रोग की शिकायत होती है । अनिश्चित रूप में बधा, ढीला, कच्चा, पका, शुष्क या पतला मल आता है । बीच - बीच मे कभी कभी श्वेत, पीला, हरा, धूसर वर्ण, लाल, अरुण, पतला, गाढ़ा, चिकना, शव के समान गन्धयुक्त, कच्चा मल त्याग करता है । नाभि, बस्ति और वक्षण ( कोख ) प्रदेश मे काटने के समान वेदना होती है । गुदा मे शूल, प्रवाहिका, परिहर्ष ( रोमाच ) प्रमोह रहता है । निरन्तर विष्टम्भ ( अवराध, वायु का ), आटोप ( वेदनायुक्त गुडगुड़ शब्द ), आतो मे कूजन, उदावर्त्त, हृदय और इन्द्रियों का उपलेप ( कार्यों मे असमर्थता ) रहती है । उद्गार ( डकार ) बहुत, विबद्ध, तिक्त और अम्ल आता है । निर्बल, मन्दाग्नि, अल्पशुक्र, क्राधी, निरन्तर दुःखी, कास, श्वास, तमक श्वास, प्यास, जी-मचलाना, वमन, अरुचि, अविपाक, पीनस, छीक इन रोगों से युक्त, तिमिर नामक नेत्ररोग से पीड़ित, शिर. शूलयुक्त हाता है । इसका स्वर निर्बल फटा तथा जर्जरित रहता है । कर्ण रोग होते है । हाथ, पाव, मुख और आखों के गोलकों पर सूजन होती है । ज्वर, अगों का टूटना, पर्व अस्थियों मे शूल रहता है । बीच - बीच मे पार्श्वशूल, कुक्षिशूल, बस्तिशूल, हृदयशूल, पृष्ठशूल,
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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५४६ ^^ www त्रिशूल या इनका जकड़ाव हो जाता है । रोगी निरन्तर चिन्ताशील और अत्यन्त आलसी होता है । जन्मकाल से ही लेकर गुदा मार्ग के बन्द होने के कारण अपानवायु ऊपर की ओर आकर समान वायु, प्राण वायु, व्यान वायु, उदान वायु तथा पित्त ओर कफ को प्रकुपित कर देती है । ये पाच वायुए तथा पित्त और कफ कुपित होकर अर्ग - रोगी मे वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य रोगो को उत्पन्न करते है । इस प्रकार से सहज अर्शो का वर्णन किया जा चुका है ॥ ८ ॥
अत ऊर्ध्व जातस्योत्तरकालजानि व्याख्यास्यामः ॥ ६ ॥
इसके आगे बालक की उत्पत्ति के पीछे होने वाले अर्शरोग की व्याख्या करते है ॥ ॥ ६ ॥
गुरु - मधुर - शीताभिष्यन्दि - विदाहि विरुद्धाजीर्ण - प्रमिताशनासात्म्य-भोजनाद् गव्य मात्स्य कुक्कुट वाराह - माहिपाजाविक पिशित - भक्षणान् कृश - शुष्क - पूतिमास - पैष्टिक- परमान्न - क्षीर - मन्दक - दधि - तिल - गुड - विकृति-संनाच माप - यूपेक्ष - रन - पिण्याक - पिण्डालुक - शुष्क - शाक - शुक्त - लशुन--किलाट - पिण्डक - बिस - मृणाल शालूक क्रौञ्चादन कशेरुक - शृङ्गाटक - तरुण-विरूढ नवधान्याममूलकोपयोगाद् गुरु - फल - शाक - राग- हरितक मर्दक- -वसा - शिरस्पंद - पर्युपित - पूति शीत संकीर्णान्नाभ्यवहरणान्मन्दकातिक्रान्त-मद्य - पानाद् व्यापन्न - गुरु - सलिल - पानादतिम्नेह - पानादसशोधनाद्वस्तिकर्म-विभ्रमादव्यवायाद्दिवास्वप्नात्सुखशयनासनोपसेवनाञ्चोपहताग्नेर्मलोपच-यो भवत्यतिमात्रम् । गुरु, मधुर, शातल, अभिष्यन्दी, विदाही, विरुद्ध, अजीर्ण, प्रमिताशन, ( एक रस के भोजन से ), असात्म्य भोजन के कारण, गाय, मत्स्य, कुक्कुट, वराह ( शूकर ), महिप ( भैंसा ), बकरी, भेड इन पशुओ के मास के भक्षण मे, कृश और शुक प्राणी का मास खाने से, सडे, दुर्गन्धयुक्त माम से, पिडी से बने अन्न का, परमान्न को, दूध, दही, दधिमण्ड, तिल, गुड से बने पदाथो के सेवन से, उडद, गन्न के रस, पिण्याक ( खल ), पिण्डाल ( कचालु ), शुष्क शाक, शुक्त, लहपुन, किलाट ( फटा हुआ दूध ), तक्रपिण्डक ( तक्र कूर्चिका अथवा तक्र का घना भाग ), बिस, मृणाल, शालक ( कन्द ) क्रोञ्चा-दन, कसेरू, सिवाडा, तरुण ( कच्चे ), अविरूढ ( अकुरित ), नव ( नये ) शूक - धान्य, शमी - वान्यो के सेवन से, कच्ची मूली के खाने से, गुरु फल, गुरु-शाक के खाने से, राग ( रायता षाडव ), हरित ( आर्द्रक आदि ), करमर्द, वसा, शिरस्पद, पर्युषित ( बासी ), पूति ( दुर्गन्धयुक्त ), शीतल, सकीर्ण
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५५० चरकसंहिता [ अ ० १४ ^^^ ( नाना द्रव्य से मिलकर बना मिश्र प्रकृतिक ), अन्न के प्रयोग करने से, मन्दक दधि, अतिक्रान्त ( व्यापन्न, दूषित ) मद्य के पान करने से, दूषित और भारी पानी के पीने से, अति स्नेहपान से, शरीर शुद्धि न करने से, बस्तिकर्म के मिथ्यायोग से, मैथुन के सर्वथा अभाव से, दिन मे सोने से, सुखकारक शय्या, आसन और स्थान के सेवन से, मन्द अग्निवाले पुरुष मे मल की वृद्धि अति मात्रा मे होती है ॥ तथोत्कटुक - विषम - कठिनासन - सेवनादुद्भ्रान्तयानोष्ट्रयानादतिव्य-वायाद्वस्तिनेत्रासम्यक्प्रणिधानाद् गुदक्षणनादभीक्ष्णं शीताम्बुसंस्पर्शा-चेल्लोष्ट्रतृणादि घर्षणात्प्रततातिनिबर्हणाद् पातसूत्रपुरीषवेगोदीरणात्स-मुदीर्णवेगविनिग्रहात्त्रीणा चाऽऽमगर्भभ्रंशाद् गर्भोत्पीडवाद् बहुविषम-प्रसूतिभिश्च प्रकुपितो वायुरपानस्तं मलमुपचितमधोगममासाद्य गुद-वलिष्वाधत्ते, ततस्तास्वर्शासि प्रादुर्भवन्ति ॥ १० ॥
इसी प्रकार से उत्कट आसन, विषम या कठिन आसन के सेवन से, विक्षा-भकारक पान से, ऊँट की सवारी से, अतिमैथुन से बस्ति - नेत्र के मिथ्यायोग से, गुदा मे क्षत होने से, ठण्डे पानी के स्पर्श से, वस्त्र, ढेला, तिनके आदि से घसड़ लगने पर, निरन्तर वेगपूर्वक प्रवाहण से, अनुपस्थित वायु, मूत्र, मल को जोर से प्रवाहण करने से, उपस्थित मल मूत्र के वेगो को रोकने से, स्त्रियों मे आम - गर्भ के गिरने से, प्रवृद्ध गर्भ द्वारा उत्पीडन होने से, विषम प्रसूति ( अकाल-प्रसव ) से, प्रकुपित अपानवायु अधोगत मल ( दोष ) को गुदवलियो मे एक त्रत कर देते है । इससे गुदवलियो मे अर्श उत्पन्न हो जाते है ॥१० ॥
सर्षप - मसूर -माप - मुद्ग - कुष्ठक - यव - कलाय- पिण्डि टिण्टिकेर- खर्जर - कर्क-न्धु- काकणन्तिका -बिम्बी - बदर - करीरोदुम्बर- जाम्बव - गोस्तनाङ्गष्ट- कशेरु-क - शृङ्गाटक - शृङ्गी - दक्ष - शिखि शुकतुण्ड - जिह्वा - पद्ममुकुल - कर्णिका - संस्था-नानि सामान्याद्वातपित्तकफप्रबलानि || ११ || उत्पत्ति के पीछे उत्पन्न होने वाले वात, पित्त और कफजन्य तथा द्वन्द्वज अर्श सामान्यरूप मे – सरसो, मसूर, उड़द, मोठ, जौ, मटर, पिण्डि ( पिण्डा-कार ), टिण्टिकेर ( टेटु ), केबुक, तिन्दुक, काकणन्तिका ( काकदन्तिका, रन्ती ), कर्कन्धु ( बेर ), कदर ( श्वेत खदिर ), बिम्बी फल, करीर, गूलर, खजूर, जामुन, गाय के स्तन, अगूठा, कशेरू, सिंघाड़ा, कुक्कुट, मोर, तोते की चोच के समान तथा जीभ की भाति, कमल के डोडे के समान और कर्णिका ( पद्मकर्णिका ) के समान आकार के अर्श होते है ॥ ११ ॥
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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५५१ तेषामयं विशेषः - शुष्क - लान कठिन परुष- रूक्ष श्यावानि तीक्ष्णा-प्राणि वक्राणि स्फुटितमुखानि विषमविस्तृतानि शूलाक्षेप - तोद - स्फुरण-चिमिचिमासंहर्षणापरीतानि स्निग्धोष्णोपगमानि प्रवाहिका मान - शिन-वृषण - बस्ति वक्षण - हृद्गृहान मर्द - हृदय - द्रव - प्रबलानि प्रतत - विबद्ध बात-मूत्र - वर्चासि कठिन वर्चास्यूरु- कटी - पृष्ठ - त्रिक पार्श्व - कुक्षि- बस्ति - शूल - शिरो-ऽभिताप - क्षवथूद्गार अतिश्याय कासोदावर्तायास- शोष - शोथ- मूर्च्छारो-चक- मुखवैरस्य तैमिर्य तैमिर्य - - कण्डू कण्डू नासा - कर्ण - शङ्ख - शल - स्वरोपघात - कराणि व्यावारुण- परुष - नख - नयन - वदन - त्व - मूत्रपुरीषस्य वातोल्बणान्यश-सीति विद्यात् || १२ || इन वातादिजन्य अशो की विशेषता यह है - जो अर्श शुष्क, म्लान ( मुरझाये ), कठिन, परुष ( कर्कश ), रूक्ष, श्याव वर्ण के हो, आगे से तीक्ष्ण, टेढे, फटे ( विदीर्ण ) मुख वाले, विषम रूप में फैले हो, जिनमे शूल, आक्षेप, भेदन, स्फुरण, चिमिचिमायन ( सरसो या राई के लेप के समान वेदना ) और स्वहर्ष ( खाज ) होती हो, स्निग्व ओर उष्ण उपचार से शान्त हो जाये, प्रवा-हिका, आम्मान, शिश्नग्रह ( रोगी लिंग का खीचे, या पकड़े ), वृषण - ग्रह, बस्ति-ग्रह, वक्षण - ग्रह, हृदय - ग्रह ( इनका जकड़ जाना या इनसे वेदना होना ), जगों का टूटना, हृदय का जल्दी - जल्दी चलना, वायु, मल, मूत्र का सदा अवरोध रहना, जाव, कटि, पीठ, पार्श्व, कुक्षि तथा बस्ति मे शूल रहना, शिरोवेदना, छीक आना, उद्गार - प्रवृत्ति, प्रतिश्याय, कास, उदावर्त्त, आयाम ( बात रोग ) शोष, शोथ, मूर्च्छा, अरुचि, मुख की विरसता, तैमिर्य ( तिमिर नामक नेत्र रोग ), नासिका में खाज, कर्णशूल, शखशूल, स्वरभेद, त्वचा, नख, आखे, मुख, मल और मूत्र का श्याव या अरुण ( नीला या लाल ) वर्ण, इनमे कठोरता का होना वात प्रधान अशो के लक्षण है ॥ १२ ॥
भवतश्चात्र - कषायकटुतिक्तानि रूक्षशीतलघूनि च ।
प्रमितापाशनं तीक्ष्णमद्यमैथुनसेवनम् ॥ १३ ॥
लङ्घनं देशकालौ च शीतो व्यायामकर्म च ।
शोको वातातपस्पर्शो हेतुर्वातार्शसामिति ॥ १४ ॥
वातजन्य- अर्श के कारण - कषाय, कटु, तिक्त, रूक्ष, लघु और शीतल प्रमित ( एक ही रस का सेवन ) और अल्प भोजन करने से, तीक्ष्ण मद्य से, मैथुन से, उपवास से, शीत देश मे वास वा शीत काल से, व्यायाम से, शोक से, वायु, धूप के स्पर्श से वातजन्य- अर्श उत्पन्न होते है ॥१३-१४ ॥
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५५२ चरकसंहिता [ अ ० १४ तत्र यानि मृदु - शिथिल - सुकुमाराणि स्पर्शासहानि रक्त - पीत - नील-कृष्णानि स्वेदोपक्के बहुलानि वित्रगन्धीनि तनु- पीत- रक्त स्रावीण दाह-कण्डू - शूल - निस्तोद - पाकवन्ति शिशिरोपशयानि संभिन्नपीतहरितवसि पीत - बिस्रगंध- प्रचुर - विण्लूत्राणि पिपासाञ्चरतमकस मोहभोजनद्वेषकरा-णि पीत - नख - नयन - त्व- गूत्र- पुरीपस्य पित्तो बणान्यशसांति विद्या ११५ पित्तप्रधान अगों के लक्षण – जो अर्श कोमल, शिथिल, मुकुमार, स्पर्श को न सहन करने वाले, लाल, पीले, नीले, काले जिनमें पमीना और क्लिन्नता बहुत रहती हो, जिनसे सड़ी, आम गन्ध आती हो, पतला, पीला रक्त जिनसे बहता हो, रक्तस्राव हाता हो, जिनमें जलन, कण्डू ( खाज ), शूल, तोद, वेदना तथा पाक हो, जो शीत क्रिया से शान्त हो जाये, जिनमे पतला ( भिन्न ), पीला, हरा मल आता हो, जिनम मल मूत्र पीले वर्ण तथा बुरी गन्ध का और मात्रा मे बहुत हो, रोगी को प्यास, ज्वर, तमक, श्वास, समोह ( मूर्च्छा ) तथा भोजन से द्व ेष रहता हो, नख, आखे, त्वचा, मल, मूत्र पीले हों तो पिसप्रवान अर्शो को समझना चाहिये ॥ १५ ॥
भवतश्चात्र --- कट्वम्ललवणक्षारव्यायामाग्न्यातपप्रभाः ।
देशकालावशिशिरौ क्रोधो मद्यमसूयनम् ॥ १६ ॥
विदाहि तीक्ष्णमुष्ण च सर्वपानान्नभेषजम् ।
पित्तल्बणाना विज्ञेयः प्रकोपे हेतुरर्शसाम् ॥ १७ ॥
कारण — कटु, अम्ल, लवण, क्षार, व्यायाम, अनि, धूप, और प्रभा ( ज्योति ), उष्ण देश, उष्ण काल, क्रोध का आना, मद्य, अस्या ( पर निन्दा ), विदाही, तीक्ष्ण और उष्ण प्रकृति का सब खानपान, पित्तप्रधान अशोका प्रकोपक कारण है ॥ १६-१७- ॥ तत्र यानि प्रमाणवन्त्युपचितानि श्रक्ष्णानि स्पर्शसहानि श्वेतपाण्डु-पिच्छिलानि स्तब्धानि गुरूणि स्तिमितानि सुप्तसुप्तानि स्थिरश्वयथूनि कण्डूबहुलानि प्रतत - पिञ्जर श्वेत रक्त पिच्छास्रावीणि गुरु - पिच्छिल इवेत-मूत्र - पुरीषाणि रुक्षोष्णोपशयानि प्रवाहिकातिमात्रोत्थानवडूक्षणानाहव-न्ति परिकर्तिका - हल्लास - निष्ठीविका कासारोचक - प्रतिश्याय गौरव - - च्छर्दि-मूत्र कृच्छ्र- शोष - शोथ- पाण्डु - रोग शीत - - ज्वराश्मरी - शर्करा - हृदयेन्द्रियास्यो -पलेपास्यमाधुर्य - प्रमेह - कराणि दीर्घकालानुपशयान्यतिमात्रमग्नि- मार्दव-क्लैब्य - कराण्याम - विकार - प्रबलानि गुरूणि च शुक्ल - नख - नयन - वदन - त्वड-मूत्र - पुरीषस्य श्लेष्मोल्बणार्यांसीति विद्यात् ॥ १८ ॥
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अ ० १ चिकित्सितस्थानम् ५५३ MV कफप्रधान अर्शो के लक्षण - जो अर्श बहुत बडे प्रमाण के ( बढे हुए ), चिकने, स्पर्श को सहने वाले, स्निग्ध, श्वेत, पाण्डु और चिक्कन ( पिच्छिल ), स्तब्ध ( जड़ी भूत ), भारी, स्तिमित ( गीले वस्त्र से ढपे हुए के समान ), अति सुप्त ( स्पश ज्ञान से रहित ), स्थिर, शाथयुक्त जिनमे बहुत खाज हो, जिनमे स्राव मात्रा मे अधिक तथा निरन्तर आये, खाव, धूमर, श्वेत, लाल, शुक्र, पिच्छा ( सीम्बल के गाद के समान ) जैसा हो, मल और मूत्र, भारी, पिच्छिल और श्वेतवर्ण हो, रूक्ष और उष्ण क्रिया से जिनमे शान्ति होती हो, प्रवाहिका बार - बार उठ कर बैठना ( थोडा मल बाहर आये ), वक्षणों में आनाह हो, परिकर्त्तिका, जी मचलाना, निष्ठीवन ( थूक का आना ), कास, अरुचि, प्रतिश्याय, भारीपन, छर्दि, मूत्रकृच्छ्र, शाष, ग्रोथ, पाण्डुरोग, शीत ज्वर, अश्मरी, शर्करा, हृदय - उपलेप, इन्द्रिय उपलेप ( कफाविकता ), सुख मे मधुर रस, प्रमेह - राग का होना, दीर्घ काल तक रहने वाली अग्नि की अति-मन्दता, क्लीवता को करने वाले, आमजन्य प्रा रोगी को पैदा करने वाले, नख, नयन, मुख, त्वचा, सून और मल का वर्ण श्वेत हता है, इन अर्शा को कफप्रधान अर्श समझना चाहिये ॥ १८ ॥
भवन्ति चात्र - मधुरस्निग्धशीतानि लवणाम्लगुरूणि च ।
अव्यायामो दिवास्वप्नः शय्यासनसुखे रतिः ॥ १६ ॥
प्राग्वातसेवा शीतौ च देशकालावचिन्तनम् ।
लैष्मिकाणा समुद्दिष्टमेतत्कारणमर्शसाम् ॥ २० ॥
कारण – मधुर, स्निग्ध, शीतल, लवण, अम्ल, गुरु भाजनो के सेवन से, व्यायाम न करने से, दिन में सोने से, शय्या सुख, आसन - सुख की प्रवृत्ति, जोर की सीधी वायु का सेवन, शीतल देश, शीतल काल, चिन्ता न करना ये कफजन्य अर्शरोग के कारण है ॥ १६-२० ॥
हेतुलक्षणससर्गाद्विद्याद् द्वन्द्वोल्वणानि च ।
सर्वो हेतुस्त्रिदोषाणा सहजैर्लक्षणं समम् ' ॥ २१ ॥
उपरोक्त दो कारण ओर लक्षणो के मिलने से द्वन्द्वज- अर्श ( वात, पित्त-ल्बण, वात, श्लेष्मोल्बण, पित्तश्लेष्मोल्वण ) उत्पन्न होते है । तीनों दोपों के मिलने से सन्निपातजन्य अर्श - रोग उत्पन्न होते हैं, इसके लक्षण सहज ( गर्भ शरीर के साथ उत्पन्न ) अर्ग के समान होते है ॥ २१ ॥
१ ' लक्षणै. समम् ' इति वा पाठ. ।
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५५४ चरकसंहिता [ अ ० १४ AMAN AVAM
विष्टम्भो s न्नस्य दौर्बल्यं कुक्षेराटोप एव च ।
कार्यमुद्गार बाहुल्यं सक्थिसादोऽल्पविकता ॥ २२ ॥
ग्रहणीदोषपाण्ड्वर्तेराशङ्का चोदरत्य च ।
पूर्वरूपाणि निर्दिष्टान्यशंसामभिवृद्धये ॥ २३ ॥
पूर्वरूप - अन्न का विष्टम्भ, दुर्बलता, कुक्षि में वेदनायुक्त गुड - गुड़ शब्द, शरीर मे कृशता, ढकार का अधिक आना, टागो मे दर्द, मल का थोड़ा आना, ग्रहणी रोग या पाण्डु - राग की शका ( सम्भावना ), अथवा उदररोग की आशका होना ये अर्गरोग की उत्पत्ति के पूर्वरूप है ॥। २२-२३ ॥
अर्शास खलु जायन्ते नामन्निपतितैस्त्रिभिः ।
दोपैर्दोषविशेषान्तु विशेषः कल्प्यतेऽर्शसाम् ॥ २४ ॥
अर्श - रोग तीनो दोप । क सन्निपात से ही उत्पन्न होते है । सब अर्श दो-जन्य ही है । किन्तु दो विशेष की प्रधानता से ही इनको वातजन्य, पित्तजन्य या कफजन्य कहा जाता है ॥ २४ ॥
पञ्चात्मा मारुतः पित्तं कफो गुइवलित्रयम् ।
सर्व एव प्रकुप्यन्ति गुदजाना समुद्भवे ॥ २५ ॥
तस्मादर्शासि दुःखानि बहुव्याधिकराणि च ।
सर्वदेहोपतापीनि प्रायः कृच्छ्रतमानि च ॥ २६
प्राण, अपान, व्यान, उदान और समान पाच प्रकार कफ और गुदा की तीनों बलिया अर्श - रोग की उत्पत्ति मे ॥ की वायु, पित्त, कुपित हो जाती हैं । इसी कारण से अर्श - रोग अतिदु ख देने वाला, नाना रोगो को उत्पन्न करने वाला, सम्पूर्ण शरीर को पीड़ित करने के साथ - साथ अतिकष्टसाध्य होता है ॥ २५-२६ ॥
हस्ते पादे मुखे नाभ्या गुदे वृपणयोस्तथा ।
शोथो हत्पार्श्वशूलं च यस्यासाध्योऽर्शसो हि सः ॥ २७ ॥
हृत्पार्श्वशूलं संमोहश्छर्दिरङ्गस्य रुग्ज्वरः ।
तृष्णा गुदस्य पाकश्च निहन्युर्गुदजातुरम् ॥ २ = ॥
सहजानि त्रिदोषाणि यानि चाभ्यन्तरा वलिम् ।
जायन्तेऽसि संश्रित्य तान्यसाध्यानि निर्दिशेत् ॥ २६ ॥
असाध्यता - जिस व्यक्ति के हाथ, पाव, मुख, नाभि, गुदा, अण्डकोश शोथ हो जाये, रोगी को हृदयशूल, पार्श्वशूल हो वह अर्श - रोगी असाव्य है । हृदयशूल, पार्श्वशूल, मूर्च्छा, वमन, अगों में दर्द, ज्वर, तृष्णा और गुदा का
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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ~~ ^^ पाक ये अर्श रोगी को मार देते है, इन लक्षणों वाला रोगी अर्ग सहज ( गर्भ - शरीर के साथ उत्पन्न हुए ), सन्निपातजन्य बलि मे आश्रित होते है, वे सब असाध्य होते है ॥ २७–२६ ॥ शेषत्वादायुषस्तानि चतुष्पादसमन्विते । याप्यन्ते दीप्तकायाः प्रत्याख्येयान्यतोऽन्यथा
द्वन्द्वानि द्वितीयायां वलो यान्याश्रितानि च ।
कृच्छ्रसाध्यानि तान्याहुः परिसंवत्सराणि च ॥
५५५ असाध्य है । जो तथा भीतर की ॥ ३० ॥
३१ ॥ असाध्य दो प्रकार के है, याप्य ओर प्रत्याख्येय । यदि रोगी की आयु शेष हो, भिषक्, औषध, रोगी ओर उपचारक ये चारो पाद मिल जाये, रोगी की अनि प्रदीप्त हो तो सहज आदि अर्श याग्य है और यदि आयु शेष न हो, चारो पाद न मिले तथा अमि मन्द हो तो, ' प्रत्याख्येय ' असाध्य हैं ॥ ३०-३१ ॥
बाह्याया तु वलौ जातान्येकदोषाल्वणानि च ।
अर्शासि सुखसाध्यानि न चिरोत्पतितानि च ॥ ३२ ॥
साध्य भी दो प्रकार के है । मुखसाध्य ओर कष्टसाध्य । जो अर्श द्वन्द्वज तथा दूसरी बलि मे आश्रित हो ओर एक साल पुराने हो जाते है, वे कष्टसाध्य है । जो अर्ग बाह्य- वलि मे उत्पन्न हो, जिनमे एक दोष की प्रबलता हा और नूतन ही उत्पन्न हुए हो तो वे सुग्वमान्य होते है ॥ ३२ ॥
तेषां प्रशमने यत्नमाशु कुर्याद्विचक्षणः ।
तान्याशु हि गुदं बद्ध्वा कुर्युर्बद्धगुदोदरम् ॥ ३३ ॥
इन अर्थो की शान्ति के लिये वैद्य को शीघ्र ही यत्न करना चाहिये । क्याकि ये अर्श गुदा को शक कर शीघ्र ही बद्धगुदोदर रोग को उत्पन्न कर देते है ॥ ३३ ॥
तत्राऽऽहुरेके शस्त्रेण कर्तनं हितमर्शसाम् ।
दाहं क्षारेण चाप्येके ढाके तथाऽग्निना ॥ ३४ ॥
अस्त्येतद् भूरितन्त्रेण धीमता दृष्टकर्मणा ।
क्रियते त्रिविधं कर्म भ्रंशस्तस्य सुदारुणः ॥ ३५ ॥
पुंस्त्वोपघातः श्वयथुर्गुदे वेगविनिग्रहः ।
आध्मानं दारुणं शूलं व्यथा रक्तातिवर्तनम् ॥ ३६ ॥
पुनर्विरोहो रूढानां क्लेदो भ्रंशो गुदस्य च ।
करणं वा भवेच्छीघ्रं शस्त्रक्षाराग्निविभ्रमात् ॥ ३७ ॥
चिकित्सा - अर्श की शान्ति के लिये एक वैद्य का कथन है कि शस्त्र से
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५५६ चरकसंहिता [ अ ० १४ काटना अर्श मे हितकारी है । दूसरे का कथन है कि क्षार से जलाना चाहिये ओर तीसरे का कथन है कि अभि से जलाना चाहिये । ये सब बातें सत्य है, परन्तु बहुत शास्त्र -ज्ञान से सम्पन्न, शस्त्र - कर्म के अनुभवी, बुद्धिमान् वैद्य ही ये कार्य कर सकते हैं और यदि कदाचित् इन कमो मे चूक हो जाये तो अति भयानक फल होता है । जैसे-शस्त्र, धार ओर अनि के अयुक्त प्रयोग से - पुरुषत्व का नाश, गुदा मे शोध, मल का अवरोध, आध्मान ( अफारा ), तीव्र शूल, पीड़ा, अति रक्त स्राव, शस्त्र, क्षार, अग्नि से कट जाने पर भी पुनः उत्पत्ति, भर जाने पर क्लेद, गुद भ्रश अथवा शीघ्र मृत्यु हो जाती है ॥ ३४–३७ ॥
यत्तु कर्म सुखोपायमल्पभ्रंशमदारणम् ।
तदर्श प्रवक्ष्यामि समूलाना निवृत्तये ॥ ३८ ॥
इसलिये जो कर्म सुखपूर्वक हा सकता है, जिसमे थोड़ी सी भूल होने पर भी भयानक फल नही होता, अर्श रोग का मूल नाम करने के लिये इस प्रकार के कर्म का उपदेश करता हृ ॥ ३८ ॥
वातश्लेष्मोल्वणान्याहुः शुष्काण्यर्शासि तद्विदः ।
प्रवीण तथाऽऽर्द्राणि रक्तपित्तोल्बणानि च ॥ ३६ ॥
तत्र शुष्कार्शसा पूर्व प्रवक्ष्यामि चिकित्सितम् । अर्श रोग को जानने वालो का कहना है कि वातप्रधान या कफप्रधान अर्श शुष्क होते है । पित्तप्रधान या रक्तप्रवान अर्ग सावयुक्त और आर्द्र होते है । [ सुश्रुत ने रक्तजन्य अर्रा को माना है, चरकमे पित्तजन्य अर्श मी इसका अन्त-भव किया है ] | इसलिये प्रथम शुष्क अर्शा की चिकित्सा को कहता हूँ || ३६ || स्तब्धानि स्वेदयेत्पूर्वं शोफ शूलान्विधानि च ॥ ४० ॥
चित्रकार बिल्वाना तैलेनाभ्यज्य वेदयेत् ' ।
यवमाषपुलाकाना कुलत्थाना च पोट्टलैः ॥ ४१ ॥
गोखराश्वशकृत्पिण्डैस्तिलकल्कैस्तुपस्तथा । ( १ ) इसके लिये बुद्विमान् वैद्य का चाहिये कि शोथ ओर शूल से युक्त कठोर अर्शों को प्रथम चित्रक क्षार, बिल्व के कल्क से साधित तेल से चिकने करके, जो, माष, कुलत्थि, पुलाक ( जिनसे चावल नही निकाले ऐसे धान्यां ) की पोटलियो से, गाय, घोड़ा, गधा इनके लीद के पिण्डा से, तिल कल्क से और तुष से और वच, सौफ इनके कल्क को पिण्डाकार करके, स्नेह से युक्त करके मन्द २ गरम स्वेद देना चाहिये ॥ ४०-४१- ॥ १. ' बुद्धिमान् ' इति वा पाठ. ।