श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 521–530
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 521–530
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अ ० १३ चिकित्सितस्थानम् ५३७ www इन उपरोक्त घृतो को पीकर अनुपान रूप मे मधुर दूध या मास - रस पीना चाहिये । इस प्रकार करने से विरेचन होने पर घृत के जीर्ण हो जाने पर सोठ के साथ पकाया गरम पानी पीना चाहिये । पीछे से पेया पीनी चाहिये । फिर कुलत्थी का यूप पीये ' प्रथम दिन सोठ से साधित पानी, दूसरे दिन पेया और तीसरे दिन कुलत्थी का यूत्र पीना चाहिये । यह स्नेह विरेचन रूक्षव्यक्ति को ही करना चाहिये । फिर दूध के साथ अन्न खाना चाहिये । इस प्रकार से तीन दिन घृत पान करे । जब तक स्निग्ध न हो जाये बार - बार वृत पान करे । कुशल वैद्य ' चाहिये कि गुल्म रोग, गर - दोषो मे, उदर रोगो की शान्ति के लिये इन सिद्धफल घृणे को बनाये ॥ १४१ - १४३ ॥ पीलुक ० कोर्पासिद्धं वा घृतमानाहभेदनम् ॥ ९ ४४ ॥ गुल्म नीलिनीसर्पिः स्नेहं वा मिश्रक पिबेत् । पीलु के चतुर्थांश क्ल्क द्वारा चतुर्गुण पानी से सिद्ध घृत आनाह को नष्ट करता है । नीलिन्यादि - वृत तथा मिश्रक - स्नेह जा कि गुल्म रोग मे कहे है, उनको पीना चाहिये ॥ १४४ ॥
क्रमान्नितदोषाणा जाङ्गलप्रतिभोजिनाम् ॥ १४५ ॥
दोपशेषनिवृत्त्यर्थं योगान्वक्ष्याम्यतः परम् । इस प्रकार से उदर रोगी का विरेचन द्वारा शोधन होने पर जागल मास रस के साथ अन्न देना चाहिये । इसके आगे शेप दोष की शान्ति के लिये योगों को कहते है ॥ १४५ ॥
चित्रकामरदारुभ्या कल्कं क्षीरेण ना पिबेत् ॥ १४६ ॥
मायुक्तं तथा हस्तिपिप्पली विश्वभेषजम् । ( १ ) उदर रोगी को जितेन्द्रिय होकर एक मास तक चीता और देवदारु के कल्क को अथवा हस्तिपिप्पली ( अष्टागसग्रह के मत से चविका ) और सोठ इनके कल्क का दूध के साथ पीना चाहिये ' ॥ १४६ ॥
विडङ्गं चित्रक दन्ती चव्यं व्योष च तैः समैः ॥ १४७ ॥
कल्कैः कोलसमैः पीत्वा प्रवृद्धमुदर जयेत् । ( २ ) बावडा, चीता, दन्ती, चव्य, सोठ, मरिच, पिप्पली प्रत्येक दो शाण लेकर चतुर्गुण जल मे दूध सिद्ध करके पीने से उदर रोग शान्त होता है ॥ १४७ ॥
पिबेत्कपायं त्रिफलादन्तीरोहितकैः शृतम् ॥ १४८ ॥
व्योषक्षारयुतं जीर्ण रसैरद्यात्तु र जाङ्गलैः । १. दोषशेषविजयाय च शीलयेच्चविकानागर क्षीरेण पिष्टम् । सग्रह ० अ ० चि ०१७ २ रसैरद्यात्सजागलै इति वा ।
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५३८ चरकसंहिता [ अ ० १३ संवा भोजनं योज्यं सुधाक्षीरघृतान्वितम् ॥ १४६ ॥
क्षीरानुपानं गोमूत्रेणाभ्यां वा प्रयोजयेत् । ( ३ ) त्रिफला दन्ती और रोहेड़े के क्वाथ मे सोठ, मरिच, पिप्पली और यवक्षार मिला कर पीना चाहिये । औपध के जीर्ण होने पर लागल मास - रस के साथ भोजन करना चाहिये । अथवा पूर्वोक्त सुधा - दूध से साधित घृत के साथ मास या भोजन खाना चाहिये । गोमूत्र के साथ हरड खा कर ऊपर से दूध पीना चाहिये || १४८-१४६ ॥ सप्ताह माहिपं मूत्र क्षीर चानन्नभुक् पिबेत् ॥ १५० ॥
मासमोष्ट पयश्छाग त्रीन्मासान् व्योपसंयुतम् । ( ४ ) ओर सब प्रकार का अन्न छोड कर एक सप्ताह तक भैस का मूत्र और दूध ( त्रिकटु मिला कर ) पीना चाहिये, एक मास तक ऊठ का दूध ( त्रिकुटु मिला कर ) पीना चाहिये । तीन मास तक त्रिकटु मिला कर बकरी का दूध पीना चाहिये ॥ १५०– ॥ हरीतकीसह वा क्षीराशी वा शिलाजतु ॥ १५१ ॥
शिलाजतुविधानेन गुग्गुलुं वा प्रयोजयेत् । ( ५ ) केवल दूध पर रहते हुए वर्धमान - पिप्पली विधि से एक हजार हरड़ो का सेवन करना चाहिये । अथवा शिलाजतु की विधि से शिलाजीत या गुग्गुल का प्रयोग करना चाहिये ॥ १५१ - ॥ वेरार्द्रकरसः पाने क्षीरसमो मतः ॥ १५२ ॥
तैलं रसेन तेनैव सिद्धं दशगुणेन वा । ( ६ ) दूध के बराबर भाग मे आर्द्रक का रस मिला कर पीना चाहिये । आर्द्रक का रस १० भाग और तैल १ भाग लेकर सिद्ध करना चाहिये | यह तैल पीना चाहिये ॥ १५२- ॥ दन्तीद्रवन्तीफलजं तैल दूष्योदरे हितम् ॥ १५३ ॥
शूलानाहविबन्धेषु सक्तयूपरसादिभिः । ( ७ ) दूष्योदर ( सन्निपातोदर ) मे दन्ती - फल और द्रवन्ती - फल का तैल पीना चाहिये । शूल, अनाह, विबन्ध मे यह तैल मस्तु, यूष, या मास रस के साथ लेना चाहिये ॥ १५३– ॥ सरलामधुशिणां बीजेभ्यो मूलकस्य च ॥ १५४ ॥
तैलान्यभ्यङ्गपानार्थं शूलघ्न्नान्यनिलोदरे । ( ८ ) वातोदर मे - सरला, मधु, शित्रु ( लाल सहजन ) और मूली के बीजसे
उत्पन्न तैल अभ्यग और पान करने में हितकारी हैं । ये शूलनाशक हैं । १५४- ॥
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अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५३६ स्वैमित्यारुचिहल्लासेष्वल्पान्नौ मद्यपाय च ' ॥ १५५ ॥
अरिष्टान् दापयेत् क्षारान्कफस्त्यानस्थिरोदरे ।
ष्मणो वियार्थ तु दोपं वीक्ष्य भिषग्वरः 3 ॥ १५६ ॥
( ६ ) वैद्य को चाहिये कि स्तिमितता ( गीले वस्त्र से आच्छादित की भाति ), अरुचि, जी मचलना, अग्नि मान्य, रोगी के मद्यपी होने पर कफजन्य उदर यदि कठिन ओर स्थिर हो ता कफ के विलयन के लिये अरिष्टो का प्रयोग करे || १५५–१५६ ॥
पिप्पली तिल्वकं हिङ्गु नागर हस्तिपिप्पलीम ।
भल्लातकं शिग्रुफल त्रिफला कटुरोहिणीम् ॥ १५७ ॥
देवदारु हरिद्रे द्वे सरलातिविषे वचाम् ।
कुष्ठ मुक्त तथा पञ्च लवणानि प्रकलय च ॥ १५८ ॥
दधिसपिर्व सातैलमज्जयुक्तानि दाहयेत् ।
अन्नादूर्ध्वमतः क्षाराद्विडालकपद पिवेत् ॥ १५६ ॥
मदिरादधिमण्डोष्णजलारिष्टसुरासः । ( १० ) पिप्पली, तिन्दुक, हींग, साठ, गजपिप्पली, भिलावा, सहजन का फल, त्रिफला, कुटकी, देवदारू, हल्दी, दारूहल्दी, सरला, अतिविषा ( अतीस ), स्थिरा ( शालिपर्णा ), कूठ, मोथा और पाची नमक ( सैन्धव, सचल, सामुद्र, विड् ओर उद्भिद् ) ये सब द्रव्य समान भाग लेकर इनको दही, घी, वसा, मज्जा, ओर तेल में मिला करके [ हण्डी मे बन्द कर उपलो मे रखकर ] जलाना चाहिये || १५७–१५६ ॥ हृद्रोगं श्वयथु गुल्मं सीहाशोंजठराणि च ॥ १६० ॥
विपूचिकामुदावत वाताष्टीला च नाशयेत् । भाजन के पीछे इस क्षार की एक कर्प मात्रा का मादरा, दधि - मस्तु, गरम जल, अरिष्ट, सुरा या आसव किसी एक वस्तु मे घोल कर पीना चाहिये । यह क्षार हृदयरोग, शाथ, गुल्म, प्लीहा, अर्श, उदर रोग, विसूचिका, उदावर्त्त और वाताष्ठीला का नष्ट करता है ॥ १६० ॥
१. ' मद्यपस्तथा ' इति च । २ ' अरिष्टान् वा पिबेत् ' इति च । ३. इति श्लोकार्ध क्वचिद् नापि पठ्यते । ४ वाताष्ठीला - " नाभेरधस्तात् सजातः सचारी यदि वाचलः ।
अष्ठीलावद् धनो ग्रन्थिरूर्ध्वमायात उन्नतः ।
वाताष्ठीला विजानीयात् ॥ निदान ० ॥
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५४० चरकसंहिता [ अ ० १३ क्षार चाजकरीपाण स्रुत मूत्रैर्विपाचयेत् ॥ १६ ९ ॥
काषिक पिप्पलीमूलं पञ्चैव लवणानि च ।
पिप्पली चित्रव गुण्ठी त्रिफला त्रिवृता वचाम् ॥ १६२ ॥
द्वौ क्षारौ शातला दन्ती स्वर्णक्षीरी विषाणिकाम् ।
को प्रमाण टिका पिवेत्सोवीरर युताम् ॥ १६३ ॥
श्वयथावविपाके च प्रवृद्वे चोदकोटरे । ( ११ ) बकरी की मोगनियो को जला कर इस भस्म को छ गुणे पानी मे घोल लेना चाहिये, फिर इस पानी को नितार लेना चाहिये । दूसरी बार फिर पानी मिला कर फिर नितार लेना चाहिये । इस प्रकार इक्कीस बार करके आरो-दक बना कर इसको पका कर क्षार बनाना चाहिये । यह क्षार एक कर्म, पिप्पलीमूल, सैन्धव, सन्चल, सामुद्र, विड, उद्भिद पाचो नमक, पिप्पली, चित्रक, सोठ, त्रिफला, निशोथ, वच, यवक्षार, सर्जक्षार, मातला, दन्ती, सत्या-नाशी और विपाणिका ( मेढासिगी ) इनका समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इन सब चूर्ण और क्षार का गोमूत्र मे पकाना चाहिये । पकाने पर जब गाढा हो जाय तब बेर के बराबर दो गाण की गोली बना कर सौवीरक-काजी के साथ पीना चाहिये । इससे शोथ, अविपाक और उदकोदर नष्ट होता है । इसको भोजन के पीछे पीना चाहिये ॥ १६१-१६३ ॥ भावितानां गवा मूत्रे षष्टिकाना तु तण्डुलैः ॥ १६४ ॥
यवागूं पयसा सिद्धा प्रकामं भोजयेन्नरम् ।
पिबेदिक्षुरस चानु जठराणां निवृत्तये ॥ १६५ ॥
स्वं स्व स्थानं व्रजन्त्येपा तथा पित्तकफानिलाः । ( १२ ) उदर रोग की शान्ति के लिये साठी के चावलो को गोमूत्र में भिगो कर इनके द्वारा दूध मे यवागू सिद्ध करनी चाहिये । रोगी का यह यवागू यथेच्छ खिलानी चाहिये । पीछे से गन्ने का रस पीना चाहिये । इस प्रकार करने से उन्मार्ग मे गये वात, पित्त, कफ दोष अपने स्थान मे आ जाते है ॥ १६४-१६५ ॥ शङ्खिनी त्रिवृद्दन्तीचिरिबिल्वादिपल्लवैः ॥ १६६ ॥
शाकं गाढपुरीषाय प्राग्भक्तं दापयेद्भिषक् ।
ततोऽस्मै शिथिलीभूतवर्चोदोपाय शास्त्रवित् ॥ १६७ ॥
दद्यान्मूत्रयुत क्षीरं दोषशेषहर शिवम् । ( १३ ) मल कठिन हो तो रोगी को भोजन से पूर्व शखिनी, स्नुही ( थोर ), निशोथ, दन्ती, चिरिबिल्व ( करज ) आदि वृक्षों के पत्तों का शाक खिलाना
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अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५४१ V चाहिये । इनके कारण से मल ओर दोप के शिथिल होने पर शेष दोष का निका-लने के लिये कल्याणकारी क्षार का सूत्र के साथ देना चाहिये || १६६-१६७ ॥ पार्श्वशूलग्रुपस्तम्भं हृद्ग्रहं चापि मारुतम् ॥ १६८ ॥
जनयेद्यस्य तैल से बिल्वक्षारेण ना पिवेत् । ( १४ ) जिम उदर रोगी ने वायु पार्श्वशूल, ऊरुस्तम्भ और हृदय पीड़ा को उत्पन्न करदे, उसको बिल्व क्षारोदक के साथ तैल पिलाना चाहिये ॥ १६८ ॥
तथाऽग्निमन्थम्योनाकपलाशतिलनालजेः ॥ १६६ ॥
बलाकदल्यपामार्गक्षारैः प्रत्येकशः स्रुतैः ।
तैल पक्त्वा भिपगू दत्वादुदराणा प्रशान्तये ॥ १७० ॥
निवर्तते चोदरिणां हृद्ग्रहश्चानिलोद्भवः । ( १५ ) इसी प्रकार से अग्निमन्थ, स्योनाक, ढाक, तिल नाल इनसे तैय्यार किये क्षार, खरैटी, केला, अपामार्ग इनक बनाये क्षारो को छ गुणे पानी मे घोल कर इक्कीस बार नितार लेना चाहिये । इस क्षारादक से तेल पकाना चाहिये | अग्निमन्थ आदि साता के क्षारों से पृथक् पृथक् तैल सिद्ध करना चाहिये । यह तेल उदर रागी को देना चाहिये । इसस वातजन्य ' हृदयग्रह और पार्श्वशूल मिटते ह ॥ १६६-१७०- ॥ कफे वातेन पित्तेन ताभ्या वाऽप्यावृतेऽनिले ॥ १७१ ॥
बलिनः स्वोषधयुतं तैलमैरण्डजं हितम् । ( १६ ) वायु द्वारा कफ के या वायु द्वारा पित्त के अथवा पित्त - कफ दोनो से वायु के आवृत होने पर बलवान् उदररोगी को अपनी औषव से सिद्ध एरण्ड तैल देना चाहिये ॥ १७१ ॥
सुविरिक्तो नरो यस्तु पुनराधमतीह तम् ॥ १७२ ॥
सुस्निग्धरम्ललवणोर्नरूहेः समुपाचरत् ।
सोपस्तम्भोऽपि वा वायुराध्मापयति य नरम् ॥। १७३ ॥
तीक्ष्णः सक्षारगोमूत्रर्बस्तिभिस्तमुपाचरेत् । ( १७ ) यदि रागी का भली प्रकार विरचन देन पर तथा वस्त्र से पेट बाधने पर भी आ मान - अफारा हा जाये तो स्निग्ध, अम्ल, लवण से सिद्ध निरूह बस्तियो से चिकित्सा करनी चाहिये । यदि वस्त्र बाधने पर भी वायु आध्मान करे ता क्षार गामूत्र युक्त तीक्ष्ण बस्तियो द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये ॥१७२-१७३ ॥ १ वातकृतेषु पार्श्वशूलोपस्तम्भहृद्महेषु बिल्वक्षाराम्भसा तैल पाययेत् । स्योनाका-भिमन्थतिलकुन्तलकदल्यपामार्गान्यतमक्षारेण वा विपक्व तैलम् । अष्टागस ० चि ०१७
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५४२ चरकसंहिता [ अ ० १३ क्रियातीते त्रिदोषे च जठरे चाप्रशाम्यति ॥ १७४ ॥
ज्ञातीन्ससुहृदो दारान्त्राह्मणान् नृपतीन् गुरून् ।
अनुज्ञाप्य भिषकर्म विदध्यात्संशय ब्रुवन् ॥ २७५ ॥
( १८ ) सन्निपातादर मे तथा जिस उदररोग मे सम्पूर्ण चिकित्सा विधि करने पर भी रोग शान्त न हो तो वैद्य का चाहिये कि सम्बन्धियो को, मित्रो का, स्त्रियों को, ब्राह्मणो को, राजा को और पूज्यजनो को सूचित करके निम्न कार्य करे || १७४ - १७५ ॥
अक्रियाया ध्रुवो मृत्युः क्रियायां संशयो भवेत् ।
एवमाख्याय तस्येदमनुज्ञातः सुहृद्गणैः १ ॥ १७६
पानभोजनसयुक्तं विपमस्मै प्रदापयेत् ।
यस्मिन्वा कुपितः सर्पो विसृजेद्धि फले विषम् ॥
भक्षयेत्तदुदरिण प्रविचार्य भिपग्वरः ।
तेनास्य दोषसङ्घातः स्थिरो लीनो विमार्गगः ॥
॥
१७७ ॥
१७८ || सबों को सूचित करदे कि चिकित्सा के न करने पर तो मृत्यु अवश्यम्भावी है, चिकित्सा करने पर जीवन का सन्देह है, शायद बच भी जाये । इस प्रकार कहकर मित्रो से आज्ञा लेकर वैद्य पीने मे और भोजन में स्थावर - विष का प्रयोग करे । इसके लिये अश्वमारक ( कनेर ), रतिया, काकादनी - मूल के कल्क को मन्त्र के साथ देना चाहिये । अथवा कुपित कृष्ण सर्प जिस फल को काटे, जिसमे विष छोड देवे, उस फल को विचार कर उदर रोगी को खाने के लिये देना चाहिये । [ यह देख लेना चाहिये कि फल में विष की मात्रा अधिक तो नही है, इसके लिये किसी पशु या पक्षी को खिलाकर देख लेना चाहिये ] ॥१७६-१७८ ॥
विषेणाशु प्रमाथित्वादाशु भिन्नः प्रवर्तते ।
विषेण तदोष त शीताम्बुपरिपेचितम् ॥ १७६ ॥
पाययेत भिषग् दुग्धं यवागू वा यथाबलम् ।
त्रिवृन्मण्डूकपर्योश्च शाकं सयववास्तुकम् ॥ १८० ॥
भक्षयेत्कालशाकं वा सुरसोदकसाधितम् ।
निरम्स्टलवणस्नेहं स्विन्नास्विन्नमनन्नभुक् ॥ १८१ ॥
मासमेकं ततश्चैव तृषितः स्वरसं पिबेत् । १ इत्यर्ध. श्लोक केषुचित् पुस्तकेषु न पठ्यते । २ ' प्रदापयेत् ' इति वा पाठः ।
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अ ० १३ ] चिकित्सितस्थानम् ५४३ ^^ विष के प्रमाथी होने से धातु आदि मे छिपे दोष तथा उन्मार्ग मे पहुचे दोष समूह पृथक् होकर शीघ्र ही बाहर निकल आते है । विष के कारण दोष के बहार निकल आने पर रोगी को शीतल जल से स्नान दूध या यवागू खाने के लिये देनी चाहिये । नशोथ, मण्डूकपर्णी, यवशाक, बथुए का शाक और कालशाक इनको इन्ही के स्वरस मे बना कर खाने को देना चाहिये । इन शाको मे अम्ल और लवण न मिला कर कुछ पके और कुछ न पके शाकों को एक मास तक विना किसी और अन्न के खाना चाहिये । प्यास लगने पर इनका ही स्वरस पीना चाहिये || १७६-१८१ ॥ एवं विनिर्हृते दोषे शाकैर्मासात्परं ततः ॥ १८२ ॥
दुर्बलाय प्रयुञ्जीत प्राणभृत्कारभ पयः । इस प्रकार से एक मास तक रहने पर शाक द्वारा दोषा के निकल जाने से निर्वल हुए रोगी का प्राणदायक ऊट का दूध पिलाना चाहिये ॥ १८२- ॥ इदं तु शल्यहर्तॄणा कर्म स्याद् दृष्टकर्मणाम् ॥ १८३ ॥
वामं कुक्षि मापयित्वा नाभ्यधश्चतुरङ्गुलम् ।
मात्रायुक्तेन शस्त्रेण पाटयेन्मतिमान् भिषक् ॥ १८४ ॥
विपाट्यान्त्रं ततः पश्चाद्वीक्ष्य बद्धक्षतान्त्रयोः ।
सर्पिषाऽभ्यज्य केशादीनवसृज्य विमोक्षयेत् ॥ १८५ ॥
( १६ ) शस्त्र - चिकित्सा — जिन शल्य चिकित्सको ने अनेक बार शस्त्र - कर्म देखा है, उनको छिद्रोदर और बद्धोदर मे शल्य - कर्म करना चाहिये । बुद्धिमान् और शस्त्र - कर्म मे कुशल वैद्य बद्ध - गुदोदर और क्षतान्त्रोदर मे नाभि के नीचे वाम भाग मे चार अंगुल परिमित स्थान को बचा कर कर्मोचित मात्रा मे शस्त्र से चीरा लगाये । इस प्रकार से कुक्षि को चीर कर और आतो ( दोष युक्त आत्रभाग ) का बाहर निकाल कर इनको देख कर, केश आदि को दूर करके पुन. आतो को घी से चिकना करके पूर्व की भाति रख देवे ॥१८३-१८५॥ा मूर्छनाद्यच्च संमूढमन्त्रं तच्च विमोक्षयेन् । आत के सम्मूर्छन ( मिलने ) से जो बद्धगुदोदर उत्पन्न हुआ हो उसमे मल या चिकास को हटा कर घी से चिकना करके पृथक् करना चाहिये । बाह्य
व्रण को सी देना चाहिये ।
छिद्राण्यन्त्रस्य तु स्थूलशयित्वा पिपीलिकैः ॥ १८६ ॥
बहुशः संगृहीतानि ज्ञात्वा छित्वा पिपीलिकान् ।
प्रतियोगः प्रवेश्यान्त्रं प्रयैः सीव्येद् व्रणं ततः ॥ १८७ ॥
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५४४ चरकसंहिता [ अ ० १३ NAVA छिद्रोदर मे छिद्रयुक्त आतो को निकाल कर इनकी परीक्षा करके शर्करादि का हटा कर, अन्त स्राव का शोधन करके, छिद्रयुक्त स्थान पर बड़ी - बड़ी चिऊटियों से कटवाना चाहिये । इनके काटने से जगह मिल जायेगी । जिस समय अच्छी प्रकर से चिऊटिया काट लता इनका काट कर बाहर निकाल देना चाहिये । इनके शिर का वृक्ष लगा रहने II देना चाहिये । फिर आतो को यथास्थान रस कर कुक्षिन को सूई से सी देना चाहिये । [ चिउटियो या मकड़ो को काटने का प्रकार यह है कि आत का जो भाग चिरा हो उसके चर्न भागों को एक साथ निउटो के खुले चिमटो मे पकड़ादे और चिउटी धड काट दे, मिर भाग वहा ही चिपटा रहेगा ' ] ॥१८६-१८७ ॥
तथा जातोदकं सर्वमुदरं व्यधपि ।
वामपाल वधो नाभेर्नाडी दत्त्वा च गालयेत् ॥ १८८ ॥
निःस्राव्य च विसृज्येतद्वेष्टयेद्वारा सोवरम् ।
तथा बस्तिविरेकाद्येर्लानं सर्व च वेष्टयेत् ॥ १८६ ॥
पेट मे पानी भरने को वेवन करना चाहिये । इसके लिये नाभि से नीचे वाम भाग मे चार अंगुल स्थान छाड़ कर वधन करना चाहिये । फिर नाड़ी लगा कर सब दाषादक का निकाल लेना चाहिये । उदर को मल कर सब पानी निकाल लेना चाहिये, फिर नाड़ी को निकाल कर उदर को मजबूत वस्त्र से बाध देना चाहिये । इसी प्रकार बस्ति या विरेचन आदि दोष निःसारक कार्य से म्लान हुए रोगी के उदर को वस्त्र से बाध देना चाहिये, इससे वायु अफारा नहा करती ॥ १८८ १८६ ॥
निःस्रते खितः पेयामस्नेहलवणा पिवेत् ।
अतः परं च पण्मासान् क्षीरवृत्तिर्भवेन्नरः ॥ १६० ॥
त्रीन् मासान् पयसा पेयां पिबेत्त्रीश्चापि भोजयेत् । १ सुश्रुत में विस्तार से विधि दी है यथा-बद्धगुदे परिस्राविणि च स्निग्धस्विन्नाभ्यक्तस्यावोनाभेर्वामतश्चतुरगुलमपहाय रोमराज्या उदर पाटयित्वा चतुर गुलप्रमाणान्यन्त्राणि निष्कृष्य निरीक्ष्य बद्ध-गुदस्य अत्रप्रतिरोधकरमश्मान वाल वाऽपोह्य मलजात वा ततो मधुसर्पिभ्र्भ्यामभ्य-ज्यात्राणि यथास्थान स्थापयित्वा बाह्य व्रणमुदरस्य सीव्येत् ॥ परित्राविण्यप्येव-मेव शल्यमुद्धृत्यान्त्रस्रावान् सशोध्य सच्छिद्रमन्त्र समाधाय कालपिपीलिकाभिर्दश-येत् । दष्टे च तासा कायानपहरेत् न शिरासि । ततः पूर्ववत् सीव्येत् || सु ० चि ०१४ ||
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अ ० १३ ] ३५ चिकित्सितस्थानम ५४५ श्यामाकं कोरदूषं वा पयसाऽलवणं नरः ॥ १६१ ॥
संवत्सरेणैव जयेत् प्राप्तं चैव जलोदरम् ।
प्रयोगाणा च सर्वेषामनुक्षीरं प्रयोजयेत् ॥ ११२ ॥
पानी के निकल जाने पर रोगी को लघन कराके स्नेह आर लवण से रहित पेया पिलानी चाहिये । इसके पीछे छ. मास तक केवल दूध पर ही निवाह करे । तीन माम तक दूध के साथ पेया पीना चाहिये । शेष तीन मासो मे श्यामाक, कोदो आदि लघु अन्न दूध के साथ, थाडे नमक के साथ खाये । इस प्रकार से एक साल की चिकित्सा से जलोदर की चिकित्सा करनी चाहिये ॥१६०-१६२ ॥ दोषानुबन्धरक्षार्थ बलस्थेयोर्थमेव च
प्रयोगापचिताङ्गाना हित हुदुरिणा पयः ।
सर्वधातुक्षयाना देवानाममृतं यथा ॥ १६३ ॥ ॥
दोष- अनुबन्ध की निवृत्ति और बल तथा धातुओ की स्थिरता के लिये सब प्रयागो के पीछे दूध पीना चाहिये । क्योकि विरेचनादि प्रयोगों से क्षीण अगों वाले और सब धातुओं का क्षय होने से उदर रोगी के लिये दूध अमृत के समान हितकारी है ॥ १६३ ॥
तत्र श्लोकौ - हेतुं प्राग्रूपमष्टाना लिङ्गं व्याससमासतः ।
उपद्रवान् गरीयस्त्वं साध्यासाध्यत्वमेव च ॥ १६४ ॥
जाताजाताम्बुलिङ्गानि चिकित्सा चोक्तवानृषिः ।
समासव्यासनिर्देशंरुद्राणा चिकित्सिते ॥ १६५ ॥
उपसहार — आठो प्रकार के उदर रोगा के विस्तार और सक्षेन मे कारणों, पूर्वरूपो, लक्षणो और उपद्रवा तथा प्राधान्य- अप्राधान्य, साध्यासाध्य, जातोदक और अजातादक के लक्षण और चिकित्सा का भगवान् आत्रेय ने इस उदररोग-चिकित्सा - अध्याय मे कह दिया ॥ १६४-१६५ ॥ इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसस्कृते चिकित्सितस्थाने उदर-चिकित्सितनाम त्रयोदशोऽव्याय. ॥ १३ ॥
१. ' कोरदूष्य वा क्षीरेण लघुभाजन " इति च पाठ ' । २. सुश्रुत मे --२. निःस्रुते च दोघे गाढ़तरमाविककौशेयकचर्मणामन्यतमेन परिवेष्टयेदुदरम् । तथा नाध्मापयति वायु । षण्मासाश्च पयसा भोजयेत् जागलरसेन वा । तत्र त्रीन् मासान् अद्धोंदकेन पयसा फलाम्लेन जागलरसेन वा । अवशिष्टमासत्रयमन्नं
लघु हि रा वा सेवेत । एवं सवत्सरेणागदो भवति ॥ सु ० चि ० १४ ॥
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५४६ चरकसंहिता [ अ ० १४ AVAKA
चतुर्दशोऽध्यायः ।
अथार्शचिकित्सितं व्याख्यास्यामः ॥ १
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २
इसके आगे अर्शरोग चिकित्सा की व्याख्या करते है, ऐसा उपदेश किया है ' ॥ १-२ ॥
आसीनं सुनिमव्यग्रं कृतजप्यं कृतक्षणम् ।
पृष्टवानर्शसां मुक्तिमग्निवेशः पुनर्वसुम् ॥ ३ ॥
प्रकोपहेतुसंस्थानं स्थानं लिङ्गचिकित्सितम् । साध्यासाध्यविभागं च तस्मै तन्मुनिरब्रवीत् ॥ ॥ भगवान् आत्रेय ने ॥ ४ ॥
मन्त्र आदि जप करके स्वस्थ रूप मे बैठे हुए भगवान् आत्रेय से अवसर देखकर अग्निवेश ने अर्श - रोग से छूटने का उपाय पूछा । आत्रेय मुनि ने अग्निवेश को अर्श रोग के प्रकोपके कारण, आकृति, उत्पत्ति, स्थान, लक्षण, चिकित्सा और साध्य - असाध्य भेदो का उपदेश किया ॥ ३-४ ॥ इह खल्वनिवेश! द्विविधान्यर्शांसि सहजानि कानिचित् कानि-चिज्जातस्योत्तरकालजानि । तत्र बीजं गुदवलिबीजोपतप्तमायतनमर्शसा सहजानाम् । तत्र द्विविधौ बीजावुपतप्तौ हेतुर्मातापित्रोरपचारः, पूर्वकृर्त चकर्म, तथाऽन्येषामपि सहजाना विकाराणाम् । तत्र सहजानि सह-जातानि शरीरेण, अर्शासीत्यधिमांसविकाराः ॥ ५ ॥
हे अग्निवेश! अर्श - रोग दो प्रकार के होते है । कई अर्श सहज अर्थात् गर्भ - शरीर के साथ उत्पन्न होते है, और कई अर्श उत्पत्ति काल के पीछे उत्पन्न हो जाते हैं । इनमे गुदवलि के आरम्भक वीजभाग के उपतप्त ( दूषित ) होने से सहज अर्श उत्पन्न होते है । शुक्र और आर्त्तव के उपतस ( दूषित होने से ) अर्श होते है । शुक्र- आर्त्तव रूपी बीज के उपतप्त ( दूषित ) होने के दो कारण हैं । एक — माता पिता का अनुचित आहार - विहार और दूसरा - पूर्वकृत कर्म । १ कुछ लोगों की धारणा है कि यहा से आरम्भ करके अन्त तक के भाग को आचार्य दृढबल ने पूरा किया है । जैसा कि कहा जाता है-' अखण्डार्थ दृढबलो जातः पञ्चनदे पुरे ।
कृत्वा बहुभ्यः शास्त्रेभ्यो विशेषाच्च बलोच्चयम् ।
सप्तदशौषधाध्यायसिद्धकल्पैरपूरयत् ॥