श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 551–560

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 551–560

पृष्ठ 551

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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६७ ~ ^^ M AMAN MAANAV w AN मिला कर खाना चाहिये । इसी प्रकार ( २ ) पिप्पलीमूल के कल्क से घृत को सिद्ध करके गुड और यवक्षार का प्रक्षेप देकर खाना चाहिये । ( ३ ) पिप्पली,

पिप्पलीमूल, सोठ और धनिया इनके कल्क से दही मे घृत सिद्ध करना चाहिये ।

ये तीनो घृत वायु और मल के विबन्ध को नष्ट करते है ॥१०६-१०७ ॥

चव्यं त्रिकटुकं पाठां क्षारं कुस्तुम्बुरूणि च ।

यवानी पिप्पलीमूलमुभे च बिडसैन्धवे ॥ १०८ ॥

चित्रकं बिल्पमभया पिष्ट्वा सर्पिर्विपाचयेत् ।

शकृद्वातानुलोम्यार्थ जाते दृनि चतुर्गुणे ॥ १०६ ॥

प्रवाहिका गुदभ्रंशं मूत्रकृच्छ्रं परिस्रवम् ।

गुदवंक्षणशूलं च घृतमेतद् व्यपोहति ॥ ११० ॥

( २५ ) चव्याद्य घृत -चव्य, सोठ, मरिच, पिप्पली, पाठा, यवक्षार, हरा धनिया, अजवायन, पिप्पलीमूल, विड् नमक, सैन्धव, चित्रक, बेलगिरी, हरड़ इन चौदह द्रव्या को पीस कर कल्क ( २० तोला ) तैयार करना चाहिये । दही ( ४ सेर ) ओर वृत ( १ सेर ) लेकर वायु, मल के अनुलोमन के लिये घृत सिद्ध करना चाहिये । यह घृत प्रवाहिका, गुदभ्रंश, मूत्रकृच्छ्र, परिस्रव ( पिच्छास्राव ), गुदाशूल और वक्षण शूल को नष्ट करता है ॥

नागरं पिप्पलीमूलं चित्रको हस्तिपिप्पली ।

वदंष्ट्रा पिपली धान्यं बिल्वं पाठा यवानिका ॥

चारीस्वर से सर्पिः कल्कैरेतैर्विपाचयेत् ।

चतुर्गुणेन दध्ना च तद् घृतं कफवातनुत् ॥ ११२

अर्शास ग्रहणदोषं मूत्रकृच्छ प्रवाहिकाम् ।

गुदभ्रंशार्तिमानाहं घृतमेतद् व्यपोहति ॥ ११३ ॥

१०८ - ११० ॥

१११ ॥

॥

इति नागरादिघृतम् । ( २६ ) नागराथ घृत सोठ, पिप्पलीमूल, चित्रक, गजपिप्पली, गोखरू, पिप्पली, धनिया, बेलगिरी, पाठा, अजवायन इनको समान भाग लेकर इनका कल्क ( २० तोला ), चागेरी ( तिपतिया ) का स्वरस ४ सेर, दही ४ सेर ओर घी १ सेर लेकर घृत पकाना चाहिये । यह घृत कफ और वायु का नाश करता है । अर्श, ग्रहणीरोग, मूत्रकृच्छ्र, प्रवाहिका, गुदभ्रंश और आनाह - रोग मे हितकारी है ॥ १११–११३ ॥

पिप्पलीं नागरं पाठां श्वदंष्ट्रां च पृथक् पृथक् ।

भागांस्त्रिपलिकान्कृत्वा कषायमुपकल्पयेत् ॥ ११४ ॥

पृष्ठ 552

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५६८ चरकसंहिता [ अ ० १४

गण्डीरं पिप्पलीमूलं व्योषं चव्यं च चित्रकम् ।

पिटा कपाये विनयेत्पूते द्विपलिकं पृथक् ॥ ११५ ॥

पलानि सर्पिपस्तस्मिश्चत्वारिशत्प्रदापयेत् ।

चाङ्गेरीस्वरसं तुल्यं सर्पिपा दधि षड्गुणम् ॥ ११६ ॥

मृद्वनिना ततः साध्य सिद्धं सर्पिर्निधापयेत् ।

तदाहारे विधातव्यं पाने प्रायोगिके विधो ॥ ११७ ॥

ग्रहण्यशोविकारनं गुल्महृद्रोगनाशनम् ।

शोथम्मीहोदरानाहमूत्रकृच्छ्रज्वरापहम् ॥ ११८ ॥

कासहिकारुचिश्वाससूदनं पार्श्वशलनुत् ।

बलपुष्टिकरं वमग्निसदीपनं परम् ॥ ११६ ॥

इति पिपल्याद्यं घृतम् । ( २७ ) पिप्पल्याद्य घृत - पिपली, सोठ, पाठा और गोखरू प्रत्येक द्रव्य तीन पल लेकर क्वाथ विधि से क्वाथ करना चाहिये । इस काथ मे गण्डीर, पिप्पलीमूल, व्योष, ( त्रिकटु ), चव्य, चित्रक प्रत्येक आधा पल लेकर पीस कर कल्क रूप मे मिला देना चाहिये । साथ मे घी ४० पल, चागेरी का स्वरस ४० पल, दही २४० पल मिला कर मृदु अनि पर पाक करना चाहिये । इस प्रकार से सिद्ध घृत को प्रति दिन खान - पान में बरतना चाहिये । यह घृत ग्रहणी, अर्शरोग, गुल्म, हृदय रोग, शोथ, प्लीहा, उदर, आनाह, ज्वर, मूत्र-कृच्छ्र, कास, हिचकी, अरुचि, श्वासपीड़ा, ओर पार्श्वशूल को नष्ट करता है । यह बलकारक, पुष्टिदायक, कान्तिवर्धक और अग्निदीपक है ॥ ११४-११६ ॥

सगुड पिप्पलीयुक्तां घृतभृष्टां हरीतकीम् ।

त्रिवृन्तयुतां वाऽपि भक्षयेदानुलोमिकीम् ॥ १२० ॥

विड्वातकफपित्तानामानुलोम्येन निर्मले ।

गुदेऽसि प्रशाम्यन्ति पावकश्चाभिवर्धते ॥ १२१ ॥

पिप्पली से युक्त घी मे भुनी त्रिवृत् ( निशोथ ), दन्ती से युक्त हरड़ को वायु और मल के अनुलोमन के लिये सेवन करे । वायु मल, कफ, पित्त का अनुलोमन होने पर, गुदा के स्वस्थ होने से अर्श स्वयं शान्त हो जाते हैं और अनि बढती है । १२०-१२१ ॥

बर्हितित्तिरिलावानां रसानम्लान् सुसंस्कृतान् ।

दक्षाणां वर्तकानां च दद्याद्विवातसंग्रहे । १२२ ॥

( २८ ) मल और वायु का अवरोध होने पर मोर, तीतर, बटेर इनके मास-

पृष्ठ 553

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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५६६ रस को तथा दक्ष ( कुक्कुट ) और वर्त्तको ( बतख ) के मासरस को घी से संस्कृत करके बेर, आवले आदि फलों से खट्टा बना कर देना चाहिये ॥ १२२ ॥

त्रिवृहन्तीपलाशानां चाङ्गेर्याश्वित्रकस्य च ।

सुभृष्टं यमके दद्याच्छाकं दधिसमन्वितम् ॥ १२३ ॥

उपोदिकां तण्डुलीयं वीरा वास्तुकपल्लवाम् ।

सुवर्चलां सलोणीकां यवशाकमवल्गुजम् ॥ १२४ ॥

काकमाची रुहापत्र महापत्री तथाऽम्लिकाम् ।

जीवन्तीशटिशाक च शाकं गृञ्जनकस्य च ॥ १२५ ॥

दधिदाडिममिद्धानि यमके भर्जितानि च ।

धान्यनागरयुक्तानि शाकान्येतानि दापयेत् ॥ १२६ ॥

( २६ ) शाक - - निशोथ, दन्ती, पलाश, चागेरी, चीता इनके शाको को घी और तैल मे भून कर दधि के साथ मिला कर देना चाहिये । इसी प्रकार से उपोदिका ( चौलाई ), तण्डुलीय, वीरा ( पृश्निपर्णी ), बथुआ, सुवर्चला ( हुलहुल ), लोणि, यवशाक, अवल्गुजा ( बावची ), काकमाची ( मकोय ), रूहापत्र, महापत्री ( जामुन ), अम्बिका, जीवन्ती, कचूर का शाक, गृञ्जनक ( शलजम ) का शाक इनको घी और तैल यमक मे भूनकर दही तथा अनार के रस से खट्टा करके वनिया और सोठ मिलाकर देना चाहिये ॥ १२३-१२६ ॥

गोधाश्वावित्सलोपाकमार्जारोष्ट्रगवामपि ।

कूर्मशल्लकयोश्चैव साधयेच्छाकवद्रसान् ॥ १२७ ॥

( ३० ) गोह, लोपक ( शृगाल भेद ), बिल्ली, श्वावित्, ऊट, गाय, कछुआ और शल्लकी इनके मास - रसों को भी शाक की भाति दही और अनार रस में सिद्ध करके घी और तैल मे भून कर धनिया और सोठ मिला कर देना चाहिये || १२७ ॥ रक्तशाल्योदनं दद्याद्रसैस्तैर्वादशान्तये । ( ३१ ) यदि रोगी मे वायु की प्रधानता है, रोगी रूक्ष हो, अनि मन्द हो

तो वायु की शान्ति के लिये मासरसो के साथ लाल चावल देने चाहिये ।

ज्ञात्वा वातोल्बणं रूक्षं मन्दाग्नि गुदजातुरम् ॥ १२८ ॥

मदिरां शार्करं जातं शीधुं तक्रं तुषोदकम् ।

अरिष्टं दधिमण्डं वा शृतं वा शिशिरं जलम् ॥ १२६ ॥

कण्टकार्या शृतं वाऽपि शृतं नागरधान्यकैः ।

अनुपानं भिषग्दद्याद्वातवर्चोऽनुलोमनम् ॥ १३० ॥

पृष्ठ 554

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५७० चरकसंहिता [ अ ० १४ I I ( ३२ ) वैद्य को चाहिये कि वायु और मल का अनुलोमन करने के लिये शर्करा से उत्पन्न मदिरा, मीधु, तक्र, तुषोदक, अरष्टि, दधि मस्तु, पका कर ठण्डा किया जल, कण्टकारी ( छोटी कटेरी ) का पका कषाय, सोठ और धनिया का पका कषाय अनुपान रूप मे देवे ॥ १२८-१३० ॥

उदावर्तपरीता ये ये चात्यर्थं विरूक्षिताः ।

विलोमवाताः शूलार्तास्तेष्विष्टमनुवासनम् ॥ १३१ ॥

( ३३ ) जो अर्श रोगी उदावर्त्त राग से पीड़ित हो, जो अत्यन्त रूक्ष हो, जिनका वायु विलोम हो, शूल से पीडित हो उन रोगियों को अनुवासन देना चाहिये || १३१ ॥

पिपल मदनं बिल शताह्वा मधुकं वचाम् ।

कुष्ट राटी पुष्कराख्यं चित्रकं देवदारु च ॥ १३२

पिष्ट्वा तैल विपक्तव्य पयसा द्विगुणेन च ।

अर्शसा मूढवाताना तच्छ्रेष्ठमनुवासनम् ॥ १३३

गुदनिःसरणं शूलं मूत्रकृच्छ्रं प्रवाहिकाम् ।

ट्यूरुपृष्ठदौर्बल्यमानाहं वंक्षणाश्रयम् ॥ १३४ ॥

पिच्छास्राव गुदे शोफ वातवर्चाविनिग्रहम् ।

उत्थान बहुशो यच्च जयेत्तच्चानुवासनात् ॥ १३५

॥

॥

॥

अनुवासन द्रव्य – पिप्पली, मैनफल, बेलगिरी, सौफ, मुलहठी, वच, कूठ, कचूर, पोहकर मूल, चित्रक, देवदारु प्रत्येक समान भाग लेकर कल्क रूप मे पीस लेना चाहिये । यह कल्क २० तोला, दूध २ सेर, तैल १ सेर लेकर तेल सिद्ध करना चाहिये । यह तैल मूढ - वात ( जिनमे वायु न ऊपर जाये न नीचे जाती हो ) रोगिया के लिये उत्तम अनुवासन है । गुदा का बाहर निकलना, शूल, मूत्रकृछु, प्रवाहिका, कटि, पीठ, जावो की निर्बलता, काखो का फूलना, दिच्छा स्राव, गुदा की सूजन, वायु और मल का अवरोध, बार - बार थोड़ा-थोड़ा मल आता हो तो वह भी इससे शान्त होता है ॥ १३२-१३५ ॥

आनुवासनिकैः पिष्टैः सुखोष्णैः स्नेहसंयुतैः ।

दर्व्या तैरौषधैर्देह्याः स्तब्धाः शूना गुदेरुहाः " ॥ १३६ ॥

दिग्धास्तैः प्रस्रवन्त्याशु श्लेष्मपिच्छां सशोणिताम् २ ।

कण्डूः स्तम्भः सरुकू शोफः स्रुतानां विनिवर्तते ॥ १३७ ॥

१. ' दार्वन्तै स्तब्धशूलानि गुदजानि प्रलेपयेत् ' इति च । २ श्लेष्मपिच्छासशोणिताः ' इति च पाठः ।

पृष्ठ 555

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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७१ ( ३४ ) अकुर यदि कठोर तथा सूजे हुए हो तो पिप्पल्यादि अनुवासन द्रव्यों को पीसकर घी आदि मिलाकर थोड़ा सा गरम करके कड़छी ( चम्मच ) द्वारा अकुरो पर लेप करना चाहिये । इस प्रकार लेप करने से रक्तयुक्त कफ मिश्रित पिच्छा ( स्राव ) अकुरो से निकल आती है । इससे कण्डु ( खाज ), कठोरता, वेदना और सूजन शान्त हो जाती है ॥ १३६-१३७ ॥

निरूहं वा प्रयुञ्जीत सक्षीरं दाशमूलिकम् ।

समूत्रस्नेहलवणं कल्कैर्युक्तं फलादिभिः ॥ १३८ ॥

( ३५ ) दशमूल के क्काय मे दूध, गोमूत्र, वृतादि स्नेह, नमक, मेनफल आदि का कल्क मिलाकर इनसे सिद्ध निरूह का प्रयोग करना चाहिये ॥ १३८ ॥

हरीतकीना प्रस्थार्ध प्रस्थमामलकस्य च ।

स्यात्कपित्थाद्दशपल ततोऽर्धा चेन्द्रवारुणी ॥ १३६ ॥

विडङ्गं पिप्पली लोध्र मरिव सेलवालुकम् ।

द्विपलांशं जलस्यैतच्चतु द्रोणे विपाचयेत् ॥ १४० ॥

द्रोणशेषेरसे तस्मिन्पूते शीते समावपेत् ।

गुडस्य द्विशतं तिष्ठेत्तत्पक्ष घृतभाजने ॥ १४१ ॥

पक्षादूर्ध्व भवेत्पेया ततो मात्रा यथाबलम् ।

अस्याभ्यासादद्दिष्टस्य नश्यन्ति गुद्जा द्रुतम् ॥।

ग्रहणीपाण्डुहृद्रोगसीहगुल्मोदरापहः ।

कुष्ठशोफारुचिहरो बलवर्णाग्निवर्धनः ॥ १४३ ॥

सिद्धोऽयमभयारिष्टः कामलाश्वित्रनाशनः ।

१४२ ॥

कृमिप्रन्थ्यर्बुदव्यङ्गराजयक्ष्मज्वरान्तकत् ॥ १४४ ॥

इत्यभयारिष्टः । ( ३६ ) अभयारिष्ट - हरड ( बिना गुठलियों के ) ८ पल, बिना गुठली का आवला ८ पल, कैथ का गुदा १० पल, इन्द्रवारुणी ( भसडूम्बा ) ५ पल, वायविडंग, पिप्पली, लोध, मरिच, ऐलाबालक प्रत्येक द्रव्य दो पल इन सब द्रव्यो का चार द्रोण पानी में क्वाथ करना चाहिये । जब एक द्रोण रह जाये तो छान लेना चाहिये । ठण्डा होने पर इसमे गुड़ २०० पल मिला कर घी से भावित घड़े मे १५ दिन तक रख देना चाहिये । पन्द्रह दिन के पीछे अनि के बलानुसार इसको पीना चाहिये । इसके निरन्तर सेवन से अर्श रोग नष्ट होता है ' । यह अरिष्ट ग्रहणी, पाण्डुरोग, हृदयरोग, प्लीहा, गुल्म, उदररोग, कुष्ठ, १ जल्पकल्पतरु में ‘ पलार्धेनेन्द्रवारुणी ' इस पाठ से आधा पल इन्द्र-वारुणी लिया है । परन्तु सुश्रुत के पाठ से असंगत होने के कारण विचारणीय

पृष्ठ 556

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५७२ चरकसंहिता [ अ ० १४ AAAA शोफ और अरुचि को नष्ट करता है, बल, वर्ण और अग्नि को बढाता है, कामला, श्वित्र, कृमिरोग, ग्रन्थिरोग, अर्बुद, व्यंग और राजयक्ष्मा ज्वर को नष्ट करता है,

यह अरिष्ट सिद्ध फलप्रद है । १३६-१४४ ॥

दन्तीचित्रकमूलानागुभयोः पञ्चमूलयोः ।

भागार पलांशानापोथ्य जलद्रोणे विपाचयेत् ॥ १४५ ॥

त्रिफलाया दलानां च प्रक्षिप्य त्रिपलं ततः ।

रसे चतुर्थशेपे तु पूते शीते समावपेत् ॥ १४६ ॥।

तुला गुडस्य तत्तिष्ठन्मासार्ध घृतभाजने ।

तन्मात्रा पिबेन्नित्यमर्शोभ्योऽपि प्रमुच्यते ॥ १४७ ॥

ग्रहणी पाण्डुरोगन वातवर्चोनुलोमनम् ।

दीपनं चारुचिनं च दन्त्यरिष्टमिमं विदुः ॥ १४८ ॥

इति दन्त्यरिष्टः । ( ३७ ) दन्त्यरिष्ट - दन्तीमूल, चित्रकमूल, दोनों पचमूल ( दशमूल ) और गुठलीरहित हरड़, आवला और बहेड़ा प्रत्येक एक - एक पल लेकर एक द्रोण पानी मे काथ करना चाहिये । जब चतुर्थाश रह जाये तब इस को छान कर ठा होने पर गुड़ के १०० पल मिला कर घी से भावित घडे मे १५ दिना तक रखना चाहिये । इस अरिष्ट को मात्रानुसार पीने से अर्श - रोग से मुक्ति हो जाती है । यह अरिष्ट ग्रहणी, पाण्डु रोग नाशक, वायु और मल का अनुलोमक, अनिदोपक, भोजन मे रुचि उत्पन्न करता है ॥१४५-१४८ ॥

हरीतकीफलप्रस्थं प्रस्थमामलकस्य च ।

विशालाया दधित्थस्य पाठाचित्रकमूलयोः ॥ १४६ ॥

द्वे द्वे पले समापोथ्य द्विद्रोणे साधयेदपाम् ।

पादावशेषे पूते च रसे तस्मिन् प्रदापयेत् ॥ १५० ॥

गुडस्यैका तुला वैद्यस्तत्स्थाप्यं घृतभाजने ।

पक्षस्थितं पिवेदेनं ग्रहण्यर्शोविकारवान् ॥ १५१ ॥

हृत्पाण्डुरोग सीहानं कामला विपमज्वरम् । है । यथा – पिप्पलीमरिचविडङ्ग ' लावालुकलोघ्राणा द्व े पले । इन्द्रवारुण्याः पच पलानि ॥ सुश्रुत ० चि ० ७ ॥ १ वृद्धवाग्भट मे पाठ इस प्रकार से है - ' दन्ती चित्रकत्रिफला दश-मूलानि पलिकानि उदकद्रोणे साधयेत् । ' जल्पकल्पतरु में त्रिफला मे प्रत्येक द्रव्य तीन पल लेना लिखा है ।

पृष्ठ 557

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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७३ वचोमूत्रानिलकृतान्विबन्धानग्निमार्दवम् ॥ १५२ ॥

कासं गुल्ममुदावर्त फलारिष्टो व्यपोहति ।

अग्निसन्दीपनो ह्येष कृष्णात्रेयेण भाषितः ॥ १५३ ॥

इति फलारिष्टः । ( ३८ ) फलारिष्ट - गुठलीरहित हरड़ १ प्रस्थ, गुठलीरहित आवले १ प्रम्थ, विशाला ( इन्द्रवारुणा ), कपित्थ ( कैथ ), पाठा और चित्रक-मूल प्रत्येक द्रव्य दो पल इन सन वस्तुओ को कूट कर दो द्रोण पानी मे क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थाश रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे गुड़ १०० पल मिला कर घी से भावित घडे मे १५ दिन तक रख देना चाहिये । इसके पीछे ग्रहणी, अर्शरोग, हृदय, पाण्डुरोग, प्लीहा, काम्ला, विषम ज्वर, मल - मूत्र वायुजन्य विबन्धो मे, अग्निमान्द्य मे, कास, गुल्म और उदावर्त्त मे पीना चाहिये । यह फलारिष्ट अग्नि- सन्दीपक है । इसका उपदेश किया है || १४६-१५३ ॥

दुरालभायाः प्रस्थः स्याच्चित्रकस्य वृपस्य च ।

पथ्यामलकयोश्चैव पाठाया नागरस्य च ॥ १५४

दन्त्याश्च द्विपलान् भागाज्जलद्रोणे विपाचयेत् ।

पादावशेषे पूते च सुशीते शर्कराशतम् ॥ १५५ ॥

दत्त्वा कुम्भे दृढे स्थाप्यं मासार्ध घृतभाजने ।

प्रलिप्ते पिप्पलीचव्यप्रियक्षौद्रसर्पिषा ॥ १५६ ॥

तस्य मात्रा पिबेत्काले शार्करस्य यथाबलम् ।

अशसि ग्रहणीदोषमुदावर्तमरोचकम् ॥ १५७ ॥

शकृन्मूत्रानिलोद्गारविबन्धानग्निमादेवम् ।

हृद्रोग पाण्डुरोग च सर्वमेतेन साधयेत् ॥ १५८ ॥

कृष्णात्रेय ने ॥ इति शर्करासवः । ( ३६ ) शर्करारिष्ट —दुरलभा १ प्रस्थ, चीता, बासा, हरड़, आवला, पाठा, सोठ, दन्तीमूल प्रत्येक द्रव्य दो पल लेकर एक द्रोण पानी मे क्वाथ करना चाहिये । चतुर्थाश रहने पर छान लेना चाहिये । इसमे गुड़ १०० पल मिला कर घी से भावित घड़े मे १५ दिनो तक रख देना चाहिये । घड़े को पिप्पली, चव्य, प्रियगु, मधु और घी के कल्क से प्रथम लेप कर देना चाहिये । पीछे तैय्यार होने पर बल और मात्रानुसार इसको पीना चाहिये, इसको प्रति-दिन प्रातः पीना चाहिये | यह अर्श, ग्रहणी, उदावर्त्त, अरुचि, मल - मूत्र और

पृष्ठ 558

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५७४ चरकसंहिता [ अ ० १४ WW A वायु के विबन्ध, उद्गार, अग्नि- मार्दव ( मन्दता ) हृदयरोग और पाण्डुरोग सब को शान्त करता है || १५४-१५८ ॥

नवस्यामलकस्यैका कुर्याज्जर्जरिता तुलाम् ।

asai शाच पिप्पल्यो विडङ्गं मरिचं तथा ॥ १५६ ॥

पाठां मूलं च पिप्पल्याः क्रमुकं चव्यचित्रकौ ।

मञ्जिष्ठा वालुकं लोध्रं पलिकानुपकल्पयेत् ॥ १६०

कुष्टं दारुहरिद्रा च सुराह्वं सारिवाद्वयम् ।

इन्द्रा भद्रमुस्तं च कुर्यादर्धपलोन्मितम् ॥ १६१

चत्वारि नागपुष्पस्य पलान्यभिनवस्य च । द्रोणाभ्यामम्भसो द्वाभ्या साधयित्वाऽवतारयेत्

पादावशेषे पूते च शीते तस्मिन्समावपेत् ।

॥

॥

॥ १६२ || मृद्वाद्वाढकरसं शीतं निर्यूहसंमितम् ॥ १६३ ॥

शर्करायाश्च भिन्नाया दद्याद् द्विगुणितां तुलाम् ।

कुसुमस्य रसस्यैकमर्धप्रस्थं नवस्य च ॥ १६४ ॥

त्व गेलास पत्राम्बुसेव्यक्रमुकफेशरान् ।

चूर्णयत्वा तु मतिमान्कार्पिकान दापयेत् ॥ १६५ ॥

तत्सर्व स्थापयेत्पक्ष सुचौक्षे घृतभाजने ।

प्रलिप्ते सपिषा किचिच्छर्करागुरुधूपिते ॥ १६६ ॥

पक्षादूर्ध्वमरिष्टोऽय कनको नाम विश्रुतः ।

पेयः स्वादुरसो हृद्यः प्रयोगाद्भुतरोचनः ॥ १६७ ॥

अर्शासि ग्रहणीदोपमानाहमुदर ज्वरम् ।

हृद्रोग पाण्डुता शोषं गुल्म वर्चोविनिग्रहम् ॥। १६८ ॥

कासं श्लेष्मामयाश्चोप्रान् सर्वानेवापकर्षति ।

वलीपलितखालित्यं दोषज च व्यपोहति ॥ १६६ ॥

इति कारिष्टः । ( ४० ) कनकारिष्ट – नूतन आवला १०० पल लेकर इसको जर्जरित कर लेना चाहिये । पिप्पली ४ पल, बायविडंग, मरिच, पाठा, पिप्पली मूल, क्रमुक ( सुपारी ), चव्य, चित्रक, मजीठ, एलाबालक, लोध प्रत्येक द्रव्य एक पल, कूठ, दारूहल्दी, देवदारु [ वृद्ध वाग्भट में शताह्ना पाठ होने से सौंफ ], श्वेत सारिवा, कृष्ण सारिवा, इन्द्रजौ, नागरमोथा प्रत्येक द्रव्य आधा पल, नूतन नागकेसर ४ पल इन सब द्रव्यों को कूट कर दो द्रोण पानी में पकाना चाहिये । जब आधा रह जाये तब उतार लेना चाहिये । इसको छान

पृष्ठ 559

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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५७५ कर शीतल होने पर इसमे द्राक्षा का क्वाथ १ आढक ( द्राक्षा को दो आढक पानी मे पका कर जब आधा रह जाये तब छान कर ) मिलाना चाहिये । इसमे बारीक शक्कर २०० पल, मधु आधा प्रस्थ, दालचीनी, इलायची, प्लव ( कैवर्त्त मुस्ता ), तेजपात, अम्बु, ( बालक ), सेव्य ( खस ), क्रमुक ( सुपारी ), नाग-केसर प्रत्येक द्रव्य का चूर्ण एक कर्ष मिला लेना चाहिये । इन सब को घी से भावित शर्करा, गुड़ से दूषित, पवित्र पात्र मे रख देना चाहिये । पन्द्रह दिन के पीछे स्वर्ण के समान वर्ण करने से कनकारिष्ट नामक अरिष्ट बनता है । इसको प्रतिदिन पीना चाहिये । यह मधुर रस, हृदय के लिये प्रिय अन्न में रुचिकारक, अर्श, ग्रहणी रोग, आनाह, उदररोग, ज्वर, हृदयरोग, पाण्डु-राग, शोथ, गुल्म, मलबन्ध, कास, कफजन्य, रोगो को तथा दोषजन्य बलि, पलित ( वालोकात होना ) और खालित्य ( गज ) को नष्ट करता है ॥ १५६-१६६ ॥

पत्रभङ्गोदकैः शौचं कुर्यादुष्णेन चाम्भसा ।

इति शुष्कार्शसा सिद्धमुक्तमेतश्चिकित्सितम् ॥ १७० ॥

चिकित्सितमिदं सिद्ध स्राविणां शृण्वतः परम् । ( ४१ ) पत्रभग एरण्ड आदि वातनाशक पत्ता के क्वाथ से तथा गरम पानी से शोच कार्य करना चाहिये । यह शुष्काशो की सिद्ध फल चिकित्सा कह दी है । इसके आगे स्रावी ( आर्द्र ) अर्शो की सिद्ध फल चिकित्सा को कहते है ' ॥ १७० - ॥ तत्रानुबन्धो द्विविधः श्लेष्मणो मारुतस्य च ॥ १७१ ॥

विटू श्यावं कठिनं रूक्षं चाधो वायुर्न वर्तते ।

तनु चारुणवर्णं च फेनिलं चासृगर्शसाम् ॥ १७२ ॥

कट्यरुगुदशूलं च दौर्बल्यं यदि चाधिकम् ।

तत्रानुबन्धो वातस्य हेतुर्यादि च रूक्षणम् ॥ १७३ ॥

रक्त - पित्तोल्त्रण स्रावयुक्त अर्शों की चिकित्सा - रक्त पित्तोल्बण ( स्रावयुक्त ) अर्शो मे दो प्रकार का अनुबन्ध होता है । एक वायु का और दूसरा कफ का । इसमे यदि मल कृष्ण वर्ण, कठिन, रूक्ष हो, अपान वायु बाहर न आये, अर्श में से निकलने वाला रक्त पतला झागदार, लाल रंग का हो, कटि, गुदा १ पत्रभंग - अर्श नाशक, जो वस्तुएं अर्शनाशक है, वे वातनाशक है । इसलिये वातनाशक पत्तो के क्वाथ से शौच कार्य करना चाहिये । जैसे- ' पत्रभङ्ग-रिति वातन्नैः ऐरण्डादिपल्लवै ' । ' डल्हण ।

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५७६ चरकसंहिता [ अ ० १४ और ऊरु मे दर्द होता हा, निर्बलता अधिक हो, अर्श रोग का कारण रूक्ष हो तो वायु का अनुबन्ध समझना चाहिये ॥ १७१-१७३ ॥

शिथिलं पीत च विट् सिग्धं गुरु शीतलम् ।

यद्यर्शसा घनं चाकू तन्तुमत् पाण्डु पिच्छिलम् ॥ १७४ ॥

गुर्दा मपिच्छं स्तिमितं गुरु स्निग्ध च कारणम् ।

मानुबन्धो विज्ञेयस्तत्र रक्ताशसा बुधः ॥ १७५ ॥

यदि मल शिथिल ( पतला ), श्वत या पीले रंग का, स्निग्व, गुरु ओर शीतल हो, अर्श में से निकलने वाला रक्त घना रेशो वाला, पाण्डु वर्ण ओर पिच्छिल ( चिकासयुक्त ) हो, गुदा पिच्छा ( चिकास ) से युक्त और स्तिमित हो, रोग का कारण गुरु आर निग्व खानपान हा तो रक्तजन्य अशो में कफ का अनुन्ध समझना चाहिये ॥ १७४-१७५ ॥

स्निग्धशीतं हितं वाते रूक्षशीतं कफानुगे ।

चिकित्सितमिदं तस्मात् समधाय प्रयोजयेत् ॥। १७६ ॥

वायु के अनुबन्ध में स्निग्ध और शीतल चिकित्सा, कफ के अनुबन्ध मे रूक्ष और शीतल चिकित्सा हितकारी है यह सोच कर कार्य प्रारम्भ करना चाहिये ॥ १७६ ॥

पित्तश्लेष्माधिकं मत्वा शोधनेनोपपादयेत् ।

स्रवण चाप्युपेक्षेत लंघनैर्वा समाचरेत् ॥ १७७ ॥

अर्श मे पित्त - कफ की प्रधानता को देखकर प्रथम शोधन ( विरेचन ) करना चाहिये । अथवा लधन कराना चाहिये । बहते हुए दूषित रक्त की उपेक्षा करनी चाहिये, इसको रोकना नहीं चाहिये ॥ १७७ ॥

प्रवृत्तमादावर्शो यो यो निगृद्वात्यबुद्धिमान् ।

शोणितं दोषमलिनं तद्रोगाञ्जनयेद्वहून् ॥ १७८ ॥

रक्तपित्तं ज्वरं तृष्णामग्निनाशमरोचकम् ।

कामलां श्वयथु शूलं गुदवंक्षणसंश्रयम् ॥ १७६ ॥

कण्ड्वरुःकोठपिडकाः कुष्ठं पाण्ड्वामयं गदम् ।

वातमूत्रपुरीषाणा विबन्धं शिरसो रुजम् ॥ १८० ॥

स्तैमित्यं गुरुगात्रत्वं तथाऽन्यान् रक्तजान् गदान् ।

तस्मात्स्रुते दुष्टरक्तं रक्तसंग्रहणं मतम् ॥ १८१ ॥

जो वैद्य प्रथम अर्शो से बहते हुए दूषित रक्त को रोक देता है, वह मूढ़ है । क्योंकि रोका हुआ दूषित रक्त बहुत से रोगों को उत्पन्न कर देता है ।