श्रीगणेशाय नमः।
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 561–570
चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 561–570
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अ ० १४ ] ३७ चिकित्सितस्थानम् ५७७ जैसे -- रक्तपित्त, ज्वर, तृष्णा, अग्निमान्द्य, अरोचक, कामला, श्वयथु, गुदा मे शूल, वक्षण ( कोख ) मे शूल, कण्डू, कोठ, पिडकाये, कुष्ठ, पाण्डुरोग, वायु, मूत्र, मल की विबन्वता, शिरोवेदना, स्तिमितता, शरीर मे भारीपन, अन्य रक्त-जन्य रोगो को उत्पन्न कर देता है । इसलिये दूषित रक्त के निकल जाने पर ही
रक का रोकना हितकारी है । प्रारम्भ मे नही रोकना चाहिये ॥ १७८-१८१ ॥
हेतुलक्षणकालज्ञो बलशोणितवर्णवित् ।
कालं तावदुपेक्षेत यावन्नात्ययमाप्नुयात् ॥ १८२ ॥
हेतु, लक्षण और काल को समझने वाले तथा बल और शुद्ध एव अशुद्ध रक्त के वर्ण की पहिचान करने वाले वैद्य को चाहिये कि रक्तस्राव की उपेक्षा उस समय तक करता रहे जब तक कि भयानक रूप धारण न करले, अथवा काई घातक रूप पैदा न करे ॥ १८२ ॥
अग्निसन्दीपनार्थ च रक्तसग्रहणाय च ।
दोषाणा पाचनार्थ च परं तितेरुपाचरेत् ॥ १८३ ॥
( ४२ ) अग्नि को बढ़ाने के लिये और रक्त को रोकने के लिये तथा दोषा के पाचन के लिये तिक्त क्वाथों से या तिक्त घृतो से चिकित्सा करना श्रेष्ठ है || १८३ ॥
यत्तु प्रक्षीणदोषस्य रक्त वातोल्बणस्य च ।
वर्तते स्नेहसाध्य तत्पानाभ्यङ्गानुवासनैः ॥ १८४ ॥
यत्तु पित्तोल्बण रक्तं धर्मका प्रवर्त्तते ।
स्तम्भनीय तदेकान्तान्न चेद्वातकफानुगम् ॥ १८५ ॥
जिस व्यक्ति के दोष क्षीण हो गये हो और रक्त मे वायु की प्रधानता हो, उसके लिये पान, अभ्यग और अनुवासन मे स्नेह क्रिया का उपयोग करना चाहिये । वह रोगी स्नेहसाध्य है और जिस रक्त मे पित्त की प्रधानता हो तथा ग्रीष्म काल मे रक्त स्रवित होता है, उसके लिये स्तम्भन - चिकित्सा करनी चाहिये, इस रक्त का रोकना ही उत्तम है । परन्तु स्तम्भन क्रिया मे यह देख लेना चाहिये कि इस रक्त मे वायु और कफ का ससर्ग न हो । यदि कफ का अनुबल हो तो उपेक्षा अथवा लघन करना चाहिये ॥ १८४-१८५ ॥
कुटजत्वनिर्यूहः सनागरः स्निग्धरक्तसंग्रहणः ।
त्वग्दाडिमस्य तद्वत्सनागरश्चन्दनरसश्च ॥ १८६ ॥
१ शुद्ध रक्त की परीक्षा - तपनेन्द्रगोपप्रतिभ पद्मालक्तकसन्निभम् ।
गुञ्जाफलसवर्ण च विशुद्धं विद्धि शोणितम् ॥ च ० सू ०२४ ॥
अशुद्ध रक्त के लिये देखिये चरक ० सूत्रस्थान अ ० २४ और सुश्रुतसूत्रस्थान अ ०१२ ॥
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चरकसंहिता [ अ ० १४ 204 ( ४३ ) कुड़े की छाल के क्वाथ के साथ थोडा सा सोठ चूर्ण मिलाकर लेने से स्निग्ध रक्त ( कफ मिश्रित रक्त का ) अवरोध होता है । इसी प्रकार से अनार की छाल और चन्दन के क्वाथ को सोंठ के चूर्ण के साथ देने से स्निग्ध रक्त का अवरोध होता है ॥ १८६ ॥
चन्दनकिराततिक्तकथन्वयवासाः सनागराः कथिताः ।
रक्तार्शसां प्रशमना दार्वीत्वगुशीरनिम्बाश्च ॥ १८७ ॥
( ४४ ) चन्दन, चिरायता, धमासा, बासा और सोठ, दारूहल्दी की छाल, खस तथा नीम की छाल इनका क्वाथ रक्तजन्य अर्श मे शान्ति करता है । दारूहल्दी की छाल, खस और नीम की छाल इनको पृथक् भी प्रयोग करने से रक्त रुकता है ॥ १८७ ॥
सातिविषा कुटजत्वकू फलं च सरसाञ्जनं मधुयुतानि ।
रक्तापहानि दद्यात्पिपासवे तण्डुलजलेन ॥ १८८ ॥
( ४५ ) अतीस, कूड़े की छाल, इन्द्रजो, रसौत इनके चूर्ण को मधु मे मिला कर प्यास लगने पर तण्डुलोदक के साथ देना चाहिये । यह योग रक्तनाशक है || १८८ ॥
कुटजत्वचो विपाच्य पलशतमार्द्र महेन्द्रसलिलेन ' ।
यावत्स्याद् गतरसं तद्द्द्रव्यं पूतो रसस्ततो ग्राह्यः ॥ १८६ ॥
मोचरसः ससमङ्गः फलिनी च पलांशिकै स्त्रिभिस्तैश्च ।
वत्सक बीजं तुल्य चूर्णीकृतमत्र प्रदातव्यम् ॥ १६० ॥
पूतोत्कथितः सान्द्रः स रसो दावप्रलेपनो ग्राह्यः ।
मात्राकालोपहिता र सक्रियैषा जयत्यसृक्स्रावम् ॥ १६१ ॥
छागलिपयसा युक्त पेया मण्डेन वा यथाग्निबलम् ।
जीर्णौषधश्च शालीन् पयसा छागेन भुञ्जीत ॥ १८२ ॥
रक्ताशस्यतिसारं रक्तं सासृभुजो निहन्त्याशु ।
बलवश्च्च रक्तपित्तं रसक्रियैषा जयत्युभयभागम् ॥ १६३ ॥
इति कुटजादिरसक्रिया । ( ४६ ) कुटजादि -रस - क्रिया - कुडे की गीली छाल १०० पल लेकर बरसात का पानी एक द्रोण लेकर इसमे क्वाथ करना चाहिये । जब सब रस निकल जाये ब छान लेना चाहिये । इसमें मोचरस ( सीम्बल का १ ' तु मेघसलिलेन ' इति, २ ' समाशिकै ' इति, ३ ' जयति रक्तम् ' इति, ४ ' पीता ' इति च पाठान्तराणि ।
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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् पू ७ ह गोंद ), समंगा ( मजीठ या लाजवन्ती ) और फलिनी ( प्रियंगु ) प्रत्येक द्रव्य समान भाग ( १, १ पल ) और तीनो के बराबर इन्द्रजौ का चूर्ण ( ३ पल ) इस काथ मे मिलाना चाहिये । इसको अनि पर गरम करना चाहिये । जिस समय पकते - पकते यह अवलेह के समान हो जाये तथा कड़छी के साथ उठने लगे तो इसको उतार लेना चाहिये । इसमे से अग्नि बल के अनुसार रस- क्रिया की मात्रा खानी चाहिये । यह अवलेह रक्त को शान्त करता है । औषध के जीर्ण होने पर पेया को बकरी के दूध के साथ अथवा मण्ड के साथ पीना चाहिये । अथवा बकरी के दूध के साथ चावलो को खाना चाहिये । यह रस - क्रिया, रक्तजन्य अर्शरोग को, रक्तातिसार को, रक्त सहित वेदना को ( रक्त स्राव से उत्पन्न रोगो को ) बलवान् रक्तपित्त को चाहे वह किसी भी मार्ग से प्रवृत्त होता है, सब को शान्त करता है । ऊर्ध्वग रक्तपित्त साध्य है, अधोगामी याप्य है | १८६ - १६३ ॥
नीलोत्पलं समङ्गा मोचरसश्चन्दनं तिला लोध्रम् ।
पीत्वा छागलिपयसा भोज्यं पयसैव शाल्यन्नम् ॥ १६४ ॥
( ४७ ) नीला कमल, समगा ( लाजवन्ती ), मोचरस ( सीम्बल की गोद ), तिल, पठानी लोध इनको समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको ( ६ माशे लेकर ) बकरी के दूध के साथ पीना चाहिये । जीर्ण होने पर बकरी दूध के साथ चावल ( हेमन्त ऋतु मे पके ) खाने चाहिये ॥ १६४ ॥
छागलिपयः प्रयुक्तं निहन्ति रक्तं सवास्तुकरसं च ।
धन्वविहङ्गमृगाणां रसो निरम्लः कदम्लो वा ॥ १६५ ॥
( ४८ ) बथुए के रस मे बकरी का दूध मिलाकर पीने से रक्तस्राव रुकता है । इसी प्रकार जागल पशु - पक्षियो के मास रस को अनार के रस आदि से थोड़ा खट्टा बना कर अथवा बिना खट्टा किये पीने से रक्त स्राव रुकता ॥ १६५ ॥
पाठा वत्सकबीजं रसाञ्जनं नागरं यवान्यश्च ।
बिल्वमिति चासैश्चूर्णितानि पेयानि सशूलेषु ॥
( ४६ ) पाठा, इन्द्रजौ, रसौत, सोंठ, अजवायन और परस्पर समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण मात्रा में ) पानी के साथ पीने से शूलयुक्त अर्श रोग शान्त होते
दाव किराततिकं मुस्तं दुःस्पर्शकच रुधिरन्नम् ।
रक्तेऽतिवर्तमाने शूले च घृतं विधातव्यम् ॥ १६७
१६६ ॥
बेलगिरी इनको को ( ६ माशा हैं ॥ १६६ ॥
॥
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५८० चरकसंहिता [ अ ० १४ ( ५० ) दारूहल्दी, चिरायता, नागरमाथा और कौच इनका चूर्ण या काथ रक्तनाशक है । परन्तु यदि रक्त बहुत होता हो और शूल हो तो इनके क्वाथ मे इन्ही के कल्क से घृत सिद्ध करके प्रयोग करना चाहिये ॥ १६७ ॥
कुटजफलवल्ककेशरनीलोत्पललोभधातकीकरकैः ।
सिद्धं घृतं विधेयं शूले रक्तार्शसां भिषजा ॥ १६८ ॥
( ५१ ) वैद्य को चाहिये कि रक्तार्श में यदि शल भी हो तो कुड़े की छाल और इन्द्रजो, नागकेशर, नीला कमल, पठानी लोव, धाय के फूल इनका कल्क
मिलित १ पाव, पानी ४ सेर और घृत १ सेर लेकर घृत सिद्ध करना चाहिये ।
यह घृत रक्तार्श ने उत्तम है ॥ १६८ ॥
सर्पिः सदाडिमरसं सयावशूकं जयत्याशु । रक्तं सशूलमथवा निदिग्धिकादुग्धिकासिद्धम् ( ५२ ) अनार के रस मे ओर यावशूक ( जवासे ) करके लेने से अथवा छोटी कटेरी और दधि के रस मे सिद्ध रक्त स्राव को शान्त करता है ॥ १६६ ॥
लाजापेया पीता चुक्रिका केशरोत्पलैः सिद्धा ।
हन्त्याश्वसृक्स्रावं तथा बलापृश्निपर्णीभ्याम् ॥
( ५३ ) चुक्रिका ( चागेरी ), केशर ( नागकेशर ) ॥ १६६ ॥
के रस में घी सिद्ध किया घृत शूलयुक्त २०० ॥ और कमलगट्टे से सिद्ध की हुई लाजा से बनी पेया पीने से रक्तस्राव रुकता है । अथवा बला और पृश्निपर्णी द्वारा लाजा से बनी पेया को सिद्ध करके पीना चाहिये ॥ २०० ॥
हीबेर बिल्वनागरनिर्यूहे साधिता सनवनीताम् ।
वृक्षाम्लदाडिमाम्लामम्लीकाम्ला सकोलाम्लाम् ॥ २०१ ॥
गृञ्जनकसुरासिद्धां भृष्टा यमकेन वा पिबेत्पेयाम् ।
रक्तातिसारशूलप्रवाहिकाशोथनिग्रहणीम् ॥ २०२ ॥
( ५४ ) ह्रीवेर ( नेत्रबाला ), बेलागरी, सोठ इनके क्वाथ मे पेया को सिद्ध करे । इस पेया को वृक्षाम्ल ( समगदाना ), अनारदाना, इमली, खट्टे बेर इनसे खट्टा बना कर मक्खन मिला कर पीना चाहिये । अथवा गृञ्जनक ( शलजम या प्याज ) के रस मे सिद्ध पेया को घी और तैल यमक में भून कर पीना चाहिये । ये पेया रक्तातिसार, शूल, प्रवाहिका और शोथ को हटाती है ॥ २०२ ॥
काश्मर्यामलकानां सकर्बुदारफलाम्लानाम् ।
गृञ्जनकशाल्मलीनां क्षीरिण्याशुक्रिकायाञ्च ॥ २०३ ॥
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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८१
न्यग्रोधशुङ्गकाना खडास्तथा कोविदारपुष्पाणाम् ।
दनः सरेण सिद्धान्दद्याद्रके प्रवृत्तेऽति ॥ २०४ ॥
( ५५ ) रक्त के अतिस्राव होने पर गम्भारी, आवला और कर्बुदार ( कचनार का भेद ) इनके फलो से गुञ्जनक ( प्याज़ ), सिम्बल, दूधी तथा चागेरी ( चोपतिया ), बरगद के कोमल पत्ता से, कोविदार ( कचनार ) के फूलो से सिद्ध किये पदाथो ( पेया आदि ) को दही की मलाई के साथ देना चाहिये ॥ २०२-२०४ ॥
सिद्धं पलाण्डुशाकं तत्रेणोपोदिकां सबदराम्लाम् ।
रुधिरस्रुतौ प्रदद्यान्मसूरयूषं च तक्राम्लम् ॥ २०५ ॥
( ५६ ) तीनयोग - ( १ ) प्याज के शाक को बेर से खट्टा करके तक्र के साथ, ( २ ) उपोदिका ( पोई या लुणी शाक ) के शाक को बेर से खट्टा करके तक्र के साथ, ( ३ ) मसूर की दाल को तक्र से खट्टा करके रक्त स्राव मे देना चाहिये । ये तीन योग है ॥ २०५ ॥
पयसा शृतेन यूषैर्मसूरमुद्गाढकीमकुष्ठानाम् ।
भोजनमद्यादम्लैः शालिश्यामाककोद्रवजम् ॥२०६ ॥
( ५७ ) शालि धान्य, श्यामाक ( सावक ), कोद्रव ( कोदों ) धान्यों को दूध मे सिद्ध करके मसूर, मूग, अरहर या मोठ इनको अनार, आवला, बेर आदि द्वारा खट्टे बनाये यूपो के साथ खाना चाहिये ॥ २०६ ॥
शशहरिणला मासैः कपिञ्जलयः सुसिद्धेश्च ।
भोजनमद्यादम्लैर्मधुरैरीषत्समरिचैर्वा ॥ २०७ ॥
( ५८ ) अथवा शशक, हरिण, बटेर, कपिञ्जल, एण ( हरिण का भेद ) इनके मास रस को सिद्ध करके अनार के रस से थोडा खट्टा मधुर करके थोड़ा सा काली मरिच का चूर्ण मिला कर खाना चाहिये ॥ २०७ ॥
दक्षशिखितित्तिररसैर्द्विककुदलोपाकजैव मधुराम्लैः ।
अद्याद्रसैरतिवहेष्वर्शःस्व निलोल्वणशरीरः ॥ २०८ ॥
( ५६ ) दक्ष ( कुक्कुट ), शिखि ( मोर ), तीतर, द्विककुद ( ऊट ) और लोपाक ( शृगाल का भेद ) इनके मास - रसो को मीठा खट्टा ( अनार रस या र द्वारा ) बना कर वात- प्रधान रक्ताओं में खाना चाहिये ॥ २०८ ॥
रसखडयूषयवागूसंयोगतः १ केवलोऽथवा जयति ।
रक्तमतिवर्तमानं वातं च पलाण्डुरुपयुक्तः ॥ २०६ ॥
१ ' सयुक्त ' इति वा पाठ ।
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५८२ चरकसंहिता [ अ ० १४ ( ६० ) पलाण्डु ( प्याज ) अकेला स्वतंत्र रूपमे अथवा मास - रस खड, यूष वा यवागू के साथ लेने से अति रक्तस्राव और वायु का शमन करता है ॥ २०६ ॥
छागान्तराधितरुण सरुधिरमुपसाधितं बहुपलाण्डु ।
व्यत्यासान्मधुराम्ल विशोणितसक्षये देयम् ॥ २१० ॥
( ६१ ) जवान बकरी के शरीर का मध्य भाग ( यकृत् भाग और फेफड़े ) रक्त सहित लेकर प्याज के साथ सिद्ध करना चाहिये । मल और रक्त का क्षय होने पर क्रमशः मधुर तथा अम्ल रूप मे प्रयोग करना चाहिये । प्रथम मधुर देना चाहिये, पीछे अम्ल और फिर मधुर फिर अम्ल इस प्रकार से देना चाहिये २१०
नवनीततिलाभ्यासात्केसरनवनीतशर्करा भ्यासात् ।
दधिसरमथिताभ्यासादशस्यपयान्ति रक्तानि ॥२११ ॥
( ६२ ) रक्त जन्य अशो के लिये तीन योग - ( १ ) मक्खन और तिल का चूर्ण नित्य प्रति खाना चाहिये । ( २ ) नागकेशर, मक्खन और मिश्री नित्य खानो चाहिये । ( ३ ) दही की मलाई का मथ कर प्रतिदिन खाने से रक्तजन्य अग शान्त होते है ॥ २११ ॥
नवनीतघृतं छागं मांसं सषष्टिकः शालिः ।
तरुणश्च सुरामण्डस्तरुणी च सुरा निहन्त्यस्रम् ॥२१२ ॥
( ६३ ) नवनीत ( ताजा मक्खन ), घी ( बकरी का ), बकरी का मास, साठी चावल, तरुण सुरामण्ड और तरुणसुरा ( जो पुरातन न हो ) ये रक्तस्राव को नष्ट करते है ॥ ११२ ॥
प्रायेण वातबहुलान्यर्शासि भवन्त्यतिस्रुते रक्ते ।
दुष्टेऽपि कफपित्तं तस्मादनिलोऽधिको ज्ञेयः ॥ २१३ ॥
कप, पित्त, दूषित होने पर भी रक्त का अधिक स्राव होने से प्राय. अश में वायु की प्रबलता हो जाती है, इसलिये वायु को मुख्य समझना चाहिये २१३
दृष्ट्वा तु रक्तपित्त प्रबल कफवातलिङ्गमल्पं च ।
शीताः क्रियाः प्रयोज्या यथेरिता वक्ष्यते चान्या ॥ २१४ ॥
मधुकं सपञ्चवल्कं बदरीत्वगुदुम्बर धवपटोलम् ।
परिषेचने विध्याद् वृषककुभयवासनिम्बांव ॥२१५ ॥
यदि रक्त, पित्त प्रबल हों, वायु और कफ के लक्षण मन्द हो तो पूर्वकथित तथा अन्य आगे कहे जाने वाली शीतल क्रियाये बरतनी चाहिये । ( ६४ ) मुलहठी, पचवल्कल ( बरगद, गूलर, पीपल, पारस पीपल, जामुन इनकी छाल ), बेर की छाल, गूलर, धव ( धवा ), पटोल, वासा, ककुभ
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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम् ५८३ ( अर्जुन ), यवास ( जवासा ) और नीम की छाल इनका काथ करके रि-षेचन करना चाहिये ॥ २१४–२१५ ॥
रक्तेऽतिवर्तमाने दाहे क्लेदेऽवगाहयेच्चापि ।
मधुकमृणालपद्मकचन्दन कुशकाशनिःक्काथे ॥ २१६ ॥
इक्षुरसमधुकवेतसनिर्यूहे शीतले पयसि वा तम् ।
अवगाहयेत्प्रदिग्धं पूर्व शिशिरेण तैलेन ॥ २१७ ॥
( ६५ ) रोगी को जलन हो, रक्त का अतिस्राव होता हो, आर्द्रता हो तो मुलहठी, मृणाल ( कमलनाल ), पद्माख, चन्दन, कुश और काश इनके क्वाथ से रोगी को अवगाहन कराना चाहिये । अथवा शरीर पर चन्दनादि शीतल द्रव्यो से साधित शीतल तैल लगवा कर रोगी को शीतल दूध मे या जल मे अथवा गन्ने का रस, मुलहठी और अम्लवेतस इनके शीतल काथ में अवगाहन देना चाहिये ॥ २१६-२१७ ॥
दत्त्वा घृत सशर्करमुपस्थदेशे त्रिके च गुददेशे ।
शिशिरजलस्पर्शसुखा धारा प्रस्तम्भनी योज्या ॥ २१८ ॥
( ६६ ) उपस्थ प्रदेश ( शिश्न भाग पेडू से सम्पूर्ण निचला प्रदेश ), गुदा ओर त्रिक ( कूल्हा ) प्रदेश पर शर्करा मिश्रित घृत मिलाकर लेप करना चाहिये । फिर इन स्थानों पर ठण्डे जल की धारा जा सहन हो सके बल से गिरानी चाहिये । इस प्रकार करने से रक्तस्राव रुक जाता है । जल धारा बहुत तीव्र नही गिरानी चाहिये ॥ २१८ ॥
कदलीदलरभिनवः पुष्करपत्रंश्च शीतजलसिक्तः ।
प्रच्छादनं मुहुमुहुरिष्ट पद्मोत्पलदलैश्च ॥ २१६ ॥
( ६७ ) केले के नय कामल पत्ता का या कमल के पत्तों को शीतल जल से गोला करके अथवा पद्म और उत्पल के पत्तो से उपस्थ प्रदेश, गुदा और त्रिक-भाग पर बार बार रखना चाहिये । पुन. गरम होने पर उनका हटा कर फिर नये पत्ते रखने चाहिये ॥ २१६ ॥
दूर्वाघृत प्रदेहः शतधौतसहस्रधोतमपि सापः ।
व्यजनपवनश्च शोतो रक्तस्राव जयत्याशु ॥ २२० ॥
( ६८ ) दूवा के घृत का लेप, शतधौत या सहस्रघात घृत का लेप अर्श मे करना चाहिये । इस प्रकार से पखे की शीतल वायु रक्तस्राव को शान्त करती है ॥ २२० ॥
समङ्गामधुकाभ्यां तिलमधुकाभ्यां रसाञ्जनघृताभ्याम् ।
सर्जरसघृताभ्यां वा निम्बघृताभ्या मधुघृताभ्यां च ॥ २२ ९ ॥
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५८४ चरकसहिता [ अ ० १४ AAAAWN MAN
दार्वीत्वकूसर्पिर्ध्या सचन्दनाभ्यामथोत्पलघृताभ्याम् ।
दाहे क्लेदे च गुदभ्रंशे गुदजाः प्रतिसारणीयाः स्युः ॥२२२ ॥
( ६६ ) अर्श के मस्सो पर प्रतिसारण करने के लिये नौ योग - ( १ ) लाज-वन्ती और मुलहठी का चूर्ण, ( २ ) तिल और मुलहठी का चूर्ण, ( ३ ) रसोत और घी का लेप, ( ४ ) राल और घी का लेप, ( ५ ) नीम की छाल ओर घी, ( ८ ) चन्दन और घी के साथ, ( ६ ) मल और घी को दाह मे, क्लेद मे, गुदभ्रंश मे ओर अर्श - रोग मे मस्सो पर प्रतिसारण करना चाहिये ॥ २२१-२२२ ॥
आभिः क्रियाभिरथवा शीताभिर्यस्य तिष्ठति न रक्तम् ।
dard faraioff सरसैस्तर्पयेन्मतिमान् ॥ २२३ ॥
अवपीडकसर्पिर्भिः कोष्णेर्वृततेलिकैस्तथाऽभ्यङ्गैः ।
क्षीरघृततैलसेकैः कोष्णैः समुपाचरेदाशु ॥ २२४ ॥
( ७० ) उपरोक्त प्रतिसारण से अथवा शीतल क्रियाओं द्वारा भी जिस रोगी का रक्त बन्द न हो उसके लिये बृहण -विधि बरतनी चाहिये । बुद्धिमान् वैद्य को चाहिये कि भोजन काल मे रोगी को स्निग्ध, उष्ण मास-रसों से तर्पण करे । इसके लिये अवपीड़क - घृत ( भोजन के ऊपर अथवा अधिक मात्रा में घृतपान ) का प्रयोग करना चाहिये । थोड़े गरम सुहाते हुए गरम तैल और घृत से मालिश करनी चाहिये । कवोष्ण दूध या घी अथवा तैल से सेक करना चाहिये ॥ २२३ - २२४ ॥
कोष्णेन वातप्रबले घृतमण्डेनानुवासयेच्छीघ्रम् ।
पिच्छास्ति दद्याद् बस्ति काले तस्याथवा सिद्धम् ॥ २२५ ॥
( ७१ ) वायु की प्रधानता होने पर कवोष्ण घृत - मण्ड से अनुवासन बस्ति देनी चाहिये | अथवा रोगी को समय २ पर सिद्ध पिच्छा की बस्तिया देनी चाहिये || २२५ ॥
यवासकुशकाशानां मूलं पुष्पं च शाल्मलम् ।
न्यग्रोधोदुम्बराश्वत्थशुङ्गाश्च द्विपलोन्मिताः ॥ २२६ ॥
त्रिप्रस्थं सलिलस्यैतत्क्षीरप्रस्थ च साधयेत् ।
क्षीरशेषं कषायं च पूतं कल्केर्विमिश्रयेत् ॥ २२७ ॥
कल्काः शाल्मलिनिर्याससमङ्गाचन्दनोत्पलम् ।
वत्सकस्य च बीजानि प्रियङ्गु पद्मकेशरम् ॥ २२८ ॥
पिच्छाबस्तिरयं सिद्धः सघृतक्षौद्रशर्करः ।
प्रवाहिकागुदभ्रंशरक्तस्रावन्वरापहः ॥ २२६ ॥
इति पिच्छाबस्तिः ।
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अ ० १४ ] चिकित्सितस्थानम ५८५ ( ७२ ) पिच्छा बस्ति — जवासा, कुश, काश की जडे, सीम्बल के पत्ते और वड़, गूलर, पीपल इनके कोमल पत्ते प्रत्येक वस्तु दो - दो पल, पानी तीन प्रस्थ, दूध १ प्रस्थ मिलाकर क्वाथ करना चाहिये । जब केवल दूध मात्र शेष रह जाये तब छान लेना चाहिये । इसमे सीम्बल का गोद, लाजवन्ती, चन्दन, कमलगट्टा, इन्द्रजौ, फूल, प्रियगु और पद्मकेशर ( कमल का केसर ) सब द्रव्य परम्पर समान भाग और मिलित दूध से चतुर्थांश लेकर दूध में मिला देना चाहिये | इसमे घी, शहद और शक्कर भी मिला देना चाहिये । यह पिच्छा-बस्ति प्रवाहिका, गुदभ्रंश, रक्तस्राव, और ज्वर में प्रयोग करनी चाहिये॥२२६-२२६ ॥
प्रपौण्डरीकं मधुकं पेष्यान् बस्तो ' यथेरितान् ।
पिटा s नुवासनं स्नेहं क्षीरद्विगुणितं पचेत् ॥ २३० ॥
( ७२ ) प्रपौण्डरीकादि अनुवासन - पुण्डरीक काष्ठ, मुलहठी तथा पिच्छा-बस्ति मे कहे गये मोचरस आदि कल्क द्रव्यों को पीस कर दुगने दूध से तल-पाक करना चाहिये ॥ २३० ॥
ह्रीवेरमुत्पलं लोध्रं समङ्गाचव्यचन्दनम् ।
पाठा सातिविषा बिल्वं धातकी देवदारु च ॥ २३१ ॥
दावत्वड नागरं मांसी मस्तं क्षारो यवाग्रजः ।
चित्रकश्चेति पेष्याणि चारीस्वरसे घृतम् ॥। २३२ ॥
ऐकध्यं साधयेत्सर्वं तत्सर्पिः परमौषधम् ।
अर्शोतिसारग्रहणीपाण्डुरोगज्वराऽरुचौ ॥ २३३ ॥
मूत्रकृच्छ्रे गुदभ्रंशे बस्त्याध्माने प्रवाहणे ।
पिच्छास्रावेऽर्शसा शूले योज्यमेतत्त्रिदोषनुत् ॥ २३४ ॥।
इति ह्रीवेरादिधृतम् । ( ७४ ) ह्रीवेरादि वृत - ह्रीवेर ( बाल ), कमल, लोध, लाजवन्ती या मजीठ, चव्य, चन्दन, पाठा, अतीस, बेलगिरी, धाय के फूल, देवदार, दारु-हल्दी की छाल, सोंठ, जटामासी, मोथा, यवक्षार, चीता इन सब को समान भाग लेकर एक पाव ( २० तोला ) कल्क तैय्यार करना चाहिये । चागेरी ( चौपतिया ) का स्वरस ४ सेर, घी १ सेर लेकर घृतविधि से घृत पकाना चाहिये । यह घी अर्श, अतीसार, ग्रहणी, पाण्डुरोग, ज्वर, अरुचि, मूत्रकृच्छ्र, गुदभ्रंश, बस्ति के आनाह मे, पिच्छा - खाव मे और अर्गजन्य शूल मे प्रयोग करना चाहिये, यह घृत त्रिदोष नाशक है ॥ २३१-२३४ ॥। १. ' पिच्छावस्तौ ' इति वा पाठः । २ ' बस्त्यानाहे ' इति पाठान्तरम् ।
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५८६ चरकसहिता | अ ० १४
अवाक्पुष्पी बला दार्वी पृश्निपर्णी त्रिकण्टकः ।
न्यग्रोधोदुम्वराश्वत्थशुङ्गाश्च द्विपलोन्मिताः ॥ २३५ ॥
कषाय एषा पेष्यास्तु जीवन्ती कटुरोहिणी ।
पिप्पलीपिप्पलीमूलं नागरं सुरदारु च ॥ २३६ ॥
कलिङ्गाः शाल्मलं पुष्प वीरा चन्दनमुत्पलम् ।
कट्फल चित्रकं मुस्तं प्रियङ्ग्वतिविषास्थिराः ॥ २३७ ॥
पद्मोत्पलाना किञ्जल्कः समङ्गा सनिदिग्धिका ।
बिल्वं मोचरसः पाठा भागाः कर्षसमन्विताः ॥ २३८ ॥
चतुःप्रस्थे शृतं प्रस्थं कषायमवतारयेत् ।
त्रिशत्पलानि प्रस्थोऽत्र विज्ञेयो द्विपलाधिकः ॥ २३६ ॥
सुनिपण्णकचार्याः प्रस्थौ द्वौ स्वरस्य च ।
सरेतैर्यथोद्दिष्टघृतप्रस्थ विपाचयेत् ॥ २४० ॥
एतदर्शःस्वतीसारे रक्तस्रावे त्रिदोषजे ।
प्रवाहणे गुदभ्रंशे पिच्छासु विविधासु च ॥ २४१ ॥
उत्थाने चातिबहुशः शोथशूले गुदाश्रये ।
मूत्रग्रहे मूढवाते मन्देऽग्नावरुचावपि ॥ २४२ ॥
प्रयोज्यं विधिवत्सर्पिर्बलवर्णाग्निवर्धनम् ।
विविधेष्वन्नपानेषु केवलं वा निरत्ययम् ॥ २४३ ॥
इति सुनिषण्णकचाङ्गेरीघृतम् । ( ७५ ) चागेरी घृत – अवाक् पुष्पी ( ओधा हुली ), खरैटी, दारु हल्दा, पृश्निपर्णी, गोखरू, बरगद, गूलर, पीपल इनके कोमल पत्ते प्रत्येक वस्तु दो - दा पल लेकर चार प्रस्थ पानी मे कषाय करना चाहिये । जब एक प्रस्थ रह जाये तब उतार कर छान लेना चाहिये । यह कषाय एक प्रस्थ, चागेरी का स्वरस दो प्रस्थ और सुनिषण्णक ( सुरवारी ) का स्वरस दो प्रस्थ, घी एक प्रस्थ, कल्कार्थ - जीवन्ती, कुटकी, पिप्पली, पिप्पलीमूल, सोठ देवदारु, इन्द्रजी, सिम्बल के फूल, वीरा ( शालपर्णी या शतावरी ), चन्दन, कमल, कायफल, चीता, मोथा, प्रियगु, अतीस, शालपर्णी, पद्म का केशर, उत्पल का केशर, लाजवन्ती, छोटी कटेरी, बेलगिरी, सिम्बल का गोंद, पाठा प्रत्येक वस्तु एक कर्ष लेकर, पीस कर कल्क बनाना चाहिये । इन सब से यथाविधि घृत - पाक करना चाहिये । यह घृत अर्शरोग मे, अतीसार मे, त्रिदोषजन्य रक्तस्राव मे, प्रवाहण मे, गुदभ्रंश मे, नाना प्रकार की पिच्छाओं में, बार - बार थोड़ा - थोड़ा मल त्याग होने मे, गुदा की शाथ या शूल मे, मूत्र की रुकावट में, मूढ़वात मे,