श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 591–600

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 591–600

पृष्ठ 591

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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०७ ww ^ स्वर्जिकायावशूकाख्यौ क्षारौ दत्त्वा च युक्तितः ॥ ८४ ॥

सैन्धवौद्भिदसामुद्रबिडाना रोमकस्य च ।

ससौवर्चलपाक्याना भागान्द्विपलिकान्पृथक् ॥ ८५ ॥

विनीय चूर्णितान् सिद्धात्ततो द्वे द्वे पले पिबेत् ।

करोत्यग्निबलं वर्ण वातघ्नं भुक्तपाचनम् ॥ ८६ ॥

इति दशमूलाद्यं घृतम् । ( ८ ) दशमूला घृत - काथार्थ, दोनो पञ्चमूल ( बिल्व की छाल, अरणी का छाल, सोनापाठा की छाल, गम्भारी की छाल, पाढल की छाल, छोटी कटेरी, बड़ी कटेरी, शालपर्णी, पृश्निपर्णी, गोखरू ), सरल काष्ठ, देवदारू, सांठ, पिली, पिप्पलीमूल, गजपिप्पली, सन के बीज, जी, बेर, कुलत्थी, सुरभी ( रास्ता ) ये मिलित द्रव्य १६ पल, आरनाल ( काजी ) या दही ( दही का मस्तु ) अथवा सौवीरक काजी इनमे से कोई एक १२८ पल लेकर काथ करना चाहिये | जब चतुर्थीश शेष रह जाये तब गाय का घृत एक आढक लेकर घृत सिद्ध करना चाहिये | जब घृत सिद्ध होने के लगभग हो तो इसमे सर्जक्षार और यवक्षार का थोड़ी मात्रा मे प्रक्षेप देना चाहिये । फिर सैन्धा नमक, उद्भेद नमक, सामुद्र नमक, बिड् नमक, रोमक ( साभर ) नमक, सचल नमक, पाक्य ( पाशुज ) नमक, प्रत्येक का दो दो पल चूर्ण लेकर इसमे मिला देना चाहिये । इसमे से दो दो पल घृत पीना चाहिये । यह घृत अग्नि, बल और वर्ण को बढाता है, वायु को नष्ट करता है और खाये हुए आहार को पचाता है ' । नमक आदि को कल्क रूप मे प्रक्षेप करके भी घृतपाक किया जा सकता है और विशेषतया गुण भी इसी विधि से पाक करने मे आता है । इसलिये कल्क रूप मे इनका प्रक्षेप देना चाहिये ॥ ८२-८६ ॥ त्र्यूषणत्रिफलाकल्के बिल्वमात्रे गुडात्पले । सर्पिषोऽष्टपलं पक्त्वा मात्रा मन्दानिलः पिबेत् इति १. जतुकर्ण ने सर्जक्षार और यवक्षार की मात्रा दो दो द्वौ क्षारौ सप्त लवण दापयेद् द्विपलोन्मितम् ॥ अष्टाग - संग्रह मे यह पाठ थोड़े अन्तर से है । यथा- --॥ ८७ ॥

त्र्यूषणाद्यं घृतम् । पल कही है । ' द्विपचमूलपचकोलसरलसुरदारुसुरभिगजपिप्पलीशणबीजकोलकुलत्थान्मस्तुना-नालेन वा पाचयेत् । तेन पादावशेषेण पञ्चलवणद्विक्षाराम्लबदरयुक्तं सर्पिर्विपक्कम् ।

पृष्ठ 592

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६०८ चरकसंहिता [ अ ० १५ ( ६ ) त्र्यूषणाय घृत -- त्रिकटु ( सोठ, मरिच, पिप्पली ) और त्रिफला ( हरड़, बहेड़ा, आवला ) मिलित एक पल, गुड़ १ पल इस कल्क से गाय का घृत ८ पल लेकर यथाविधि पाक करना चाहिये । इ ० घृत को उचित मात्रा मे ( आधा ताला ) मन्दानि वाले रोगी को पीना चाहिये ॥ ८७ ॥

पञ्चमूलाभयाजाजीपिप्पलीमूलसंन्धवैः ।

विडङ्गदू पणशटीरास्नाक्षारद्वयघृतम् ॥ == ॥

शुक्तन मातुलुङ्गम्य स्वरसेनार्द्रकस्य च ।

शुष्कमूलक कोलाम्बुचुक्रिकादाडिमस्य च ॥ ८६ ॥

तक्रमस्तुसुरामण्डसौवीरकतुपोदकैः ।

काञ्जिकेन च तत्पक्कमभिदीप्तिकर परम् ॥ ६० ॥

शूलगुल्मोदरश्वासकासानिलकफापहम् । ( १० ) पचमूलाद्य चूर्ण - पचमूल ( बेल की छाल, सोनापाठा की छाल, अरणी की छाल, गम्भारी की छाल, पाढल की छाल ), अभया ( हरड़ ), व्योष ^ ( सोठ, मरिच, पिप्पली ), बायबिडंग, राटी ये दस द्रव्य, शुक्त, मातुलुग ( गलगल, बडा नीबू ) का स्वरस ओर आर्द्रक का स्वरस ये तीन द्रव, ये सब द्रव्य अलग अलग घृत के समान भाग में लेने चाहिये । सूखी हुई मूली, बेर, नागरमोथा, चुक्रिका ( चागेरी ) और अनार, तक्र, मरतु, सुरामण्ड, सौवीरक, काजी, तुषोदक और काजी इनसे घृत पाक करना चाहिये । इस पाकविधि मे पचमूलादि दस द्रव्यों को ओर मूली, बेर, नागरमोथा इनको कल्क के रूप मे बरतना चाहिये । यह घृत खूत्र अग्निवर्धक है । शूल, गुल्म, उदररोग, श्वास, कास, वायु और कफ को नष्ट करता है ॥ ८८ - ९ ० ॥ सबीजपूरकरसं सिद्धं वा पाययेद् घृतम् ॥ ६१ ॥

सिद्धमभ्यञ्जनार्थं च तैलमेतैः प्रयोजयेत् । ( ११ ) अथवा बिजौरे के स्वरस में उपरोक्त घृत को सिद्ध करके पीना चाहिये । इसमें भी पंचमूलादि दस द्रव्यो का कल्क रूप मे व्यवहार करना

चाहिये । पचमूलादि से सिद्ध तैल को मालिश के लिये प्रयोग करना चाहिये ।

इसमे तक्र, मस्तु, सुरामण्ड, काजी आदि का उपयोग करना चाहिये ॥ ६१ ॥

एतेषामौषधानां वा पिबेचर्णं सुखाम्बुना ॥ ६२ ॥

वाते श्लेष्मावृते सामे कफे वा वायुनोद्धते ।

दद्याचूर्ण पाचनार्थमग्निसन्दीपनं परम् ॥ ६३ ॥

इति पञ्चमूलाद्यं घृतं चूर्णं च ।

पृष्ठ 593

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अ ० १५ ] ३६ चिकित्सितस्थानम् ६०६ ^^ ( १२ ) अथवा पन्चमूलादि दस द्रव्यो के चूर्ण को गरम पानी के साथ पीना चाहिये । इस चूर्ण को वात, कफजन्य से आवृत ग्रहणी रोग में, आमयुक्त ग्रहणी रोग मे, कफजन्य या वात प्रबल ग्रहणी रोग मे इस करना चाहिये यह चूर्ण अति अग्निवर्धक है ॥ ६२-६३ ॥

मज्जत्यामाद् गुरुत्वाद्विट् पक्का तूत्मवते जले ।

विनाऽतिद्रवसंघातशत्यश्लेष्मप्रदूषणात् ॥ ६४ ॥

परीक्ष्यैवं पुरा सामं निरामं चामदोषिणाम् ।

विधिनोपाचरेत्सम्यक् पाचनेनेतरेण वा ॥ ६५ ॥

साम और निराम मल की परीक्षा - अति द्रव, सघात फफ से यदि मल दूषित न हो तो मल आम के कारण भारी जाता है और पक मल पानी में तैरता है । चूर्ण का व्यवहार और शैत्य अथवा होने से पानी में अपवाद - ( १ ) अति द्रव होने के कारण आम - मल भी पानी मे तैरता है । ( २ ) अतिसहित ( घट्ट ) होने से पक्क मल भी पानी मे डूब जाता है ( ३ ) शैत्य और कफ से दूषित पक्क मल भी पानी मे डूब जाता है । इस प्रकार से प्रथम साम या दोषयुक्त निराम की परीक्षा करके भली प्रकार से बात या कफ दोष का निश्चय करके विविपूर्वक चिकित्सा करनी चाहिये अथवा

पाचन औषध देनी चाहिये । जिससे आम का परिपाक हो जाये ॥ ६४-६५ ॥

चित्रकं पिप्पलीमूलं द्वौ क्षारो लवणानि च ।

व्योषं हिङ्गबजमोदा च चव्यं चकत्र चूर्णयेत् ॥ ६६ ॥

गुडिका मातुलुङ्गस्य दाडिमस्य रसेन वा ।

कृता विपाचयन्त्यामं दीपयन्त्याशु चानलम् ॥ ६७ ॥

इति चित्रकाद्या गुडिका । ( १३ ) चित्रकाद्या गुडिका – चीता, पिप्पलीमूल, सर्जक्षार, यवक्षार, पाचों नमक ( सैन्धव, विड, साभर, सवल आर उद्भिद ), व्योष ( साठ, मरिच और पिप्पली ), हीग, अजवायन, चविका इन सब को समान भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण मे मातुलुग ( गलगल ) का रस अथवा

१ आम का लक्षण –आमाशयस्थ. कायाने दौर्बल्यादविपाचितः ।

आद्य आहार धातुर्य, स आम इति सज्ञितः ॥

आमं अन्नरस केचित् केचित्तु मलसचयम् ।

प्रथम दोषदुष्टिं च केचिदाम प्रचक्षते ॥

२ कोई कोई पाच के स्थान में तीन नमक डालने का आदेश देते हैं ।

पृष्ठ 594

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६१० चरकसंहिता [ अ ० १५ AAAAAAAA ^ अनार का रस मिला कर गोलिया बना लेनी चाहियें, ये गोलिया आम का परि-पाक करनी और अग्नि को बढाती है ॥ ६६-६७ ॥

नागरातिविषासुस्तक्वाथः स्यादामपाचनः ।

मुस्तान्तकल्कः पथ्या वा नागरं चोष्णवारिणा ॥ ६८ ॥

देवदारुवचामुस्तनागरातिविषाभयाः ।

वारुण्यामासुतास्तोये कोष्णे वाऽलवणाः पिबेत् ॥ ६६ ॥

वर्चस्यामे सशूले च पिबेद्वा दाडिमाम्बुना ।

बिडेन लवणं पिष्टं बिल्वं चित्रकनागरम् ॥ १०० ॥

सामे वा कफे वा कोष्ठशूलकरे पिबेत् । ( १४ ) छः योग- ( १ ) सोठ, अतीस, मोथा इनका क्वाथ पीने से आम का पाचन होता है । अथवा ( २ ) सोठ, अतीस, मोथा, हरड़ या इनके सोठ चूर्ण को गरम पानी से पीना चाहिये । ( ३ ) देवदारु, वच, मोथा, सोंठ, अतीस और हरड़ इनके चूर्ण को भवके मे खीच वारुणी के पानी के साथ पीना चाहिये अथवा ( ४ ) गरम पानी में नमक मिला कर पीना चाहिये, अथवा ( ५ ) अनार के रस के साथ पीना चाहिये । इससे कर्त्तन के समान पीड़ा और आमयुक्त मल नष्ट होता है । ( ६ ) आमयुक्त मल मे अथवा शूल होने पर बिडू ( काला नमक ), सैन्धा नमक, बेलगिरी, चीता और सोठ इनको पीस कर अनार के रस के साथ पीना चाहिये ॥ ६८-१०० ॥ कलिङ्ग हिड्ग्वतिविषावचासौवर्चलाभयाः ॥ १०१ ॥

( १५ ) यदि उदर मे शूल आम के कारण या वात मिश्रित कफ के ( का-रण से होती हो तो इन्द्रजौ, हीग, अतीस, बच, सौवर्चल ( सचल नमक ) और हरढ़ इनके चूर्ण को अनार के रस के साथ पीना चाहिये ॥ १०१ ॥

छर्द्यर्शोग्रन्थिशूलेषु पिबेदुष्णेन वारिणा ।

पथ्यासौवर्चलाजाजिचूर्ण मरिचसयुतम् ॥। १०२ ॥

( १६ ) वमन, अर्श, ग्रन्थि - शूल मे - हरड़, सचल नमक, काला जीरा और मरिच इनके चूर्ण को गरम पानी से पीना चाहिये ॥ १०२ ॥

अभयां पिप्पलीमूलं वचां कटुकरोहिणीम् ।

पाठ वत्सकबीजानि चित्रकं विश्वभेषजम् ॥ १०३ ॥

पिबेन्निक्काथ्य चूर्णानि कृत्वा कोष्णेन वारिणा ।

पित्तश्लेष्माभिभूतायां ग्रहण्यां शलनुद्धितम् ॥ १०४ ॥

( १७ ) पित्त - कफजन्य ग्रहणीरोग में यदि तीव्र शूल होरहा हो तो हरड़,

पृष्ठ 595

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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६११ पिप्पलीमूल, बच, कुटकी, पाठा, इन्द्रजौ, चीता और सोंठ इनका क्वाथ करके पीना चाहिये अथवा इनके चूर्ण का गरम पानी से पीना चाहिये ॥ १०३-१०४ ॥

सामे सातिविषं व्योषं लवणक्षारहिङ्गुवत् ।

निःकाथ्य पाययेच्चूर्णं कृत्वा वा कोष्णवारिणा ॥ १०५ ॥

( १८ ) आमयुक्त शूल मे - अतीस, सोठ, मरिच, पिप्पली, 2 सैन्धा नमक, यवचार और हीग इनका क्वाथ करके पीना चाहिये । अथवा इनके चूर्ण को गरम पानी के साथ पीना चाहिये ॥ १०५ ॥

पिप्पली नागरं पाठा सारिवा बृहतीद्वयम् ।

चित्रकं कौटजं वीजं लवणान्यथ पञ्च च ॥ १०६ ॥

तच्चूर्ण सयवक्षारं दध्युष्णाम्बुसुरादिभिः ।

पिवेदग्निविवृद्धयर्थं कोष्ठवातहरं नरः ॥ १०७ ॥

इति पिप्पल्याद्यं चूर्णम् । ( १६ ) अनि को बढ़ाने के लिये और उदर की वायु को शान्त करने के लिये पिप्पल्याद्य चूर्ण —– पिप्पली, सोंठ, पाठा, सारिवा, कटेरी और बड़ी कटेरी, चीता, इन्द्रजो, पाचो नमक ( सैन्धव, सन्चल, साभर, विड और उद्भिद ) और यवक्षार इन सबका चूर्ण बना कर दही या गरम पानी अथवा सुरा या काजी आदि के साथ पीना चाहिये ॥ १०६-१०७ ॥

मरिचं कुञ्चिकाम्बष्ठावृक्षाम्लाः कुडवाः पृथक् ।

पलानि दश चाम्लस्य वेतसस्य पलाशिकाः ॥ १०८ ॥

सौवर्चलं बिडं पाक्यं यवक्षारः ससैन्धवः ।

शटीपुष्करमूलानि हिङ्ग हिङ्गशिराटिका ॥ १०६ ॥

तत्सर्वमेकतः सूक्ष्मं चूर्ण कृत्वा प्रयोजयेत् ।

हितं वाताभिभूतायां ग्रहण्यामरुचौ तथा ॥ ११० ॥

इति मरिचाद्यं चूर्णम् । ( २० ) मरिचाद्य - चूर्ण - मरिच, कुञ्चिका ( काला जीरा ), अम्बष्ठ ( पाठा ), वृक्षाम्ल ( समगदाना ) पृथक् - पृथक् एक कुडव, अम्लवेतस दस पल, संचल, बिड् नमक, पाक्य ( सामुद्र ) नमक, यवक्षार, सैन्धा नमक, शटी, पोहकरमूल, हींग, हिंगुशिराटिका ( डीकामारी ) ये प्रत्येक आधा पल लेकर सबको बारीक चूर्ण कर लेना चाहिये । यह चूर्ण वातजन्य ग्रहणी - रोग तथा अरुचि मे लाभदायक है | १०८-११० ॥

पृष्ठ 596

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६१२ चरकसंहिता [ अ ० १५ wwwwww

चतुर्णा प्रस्थमम्लानां त्र्यूपणाच्च पलन्नयम् ।

लवणानां च चत्वारि शर्करायाः पलाष्टकम् ॥ १११ ॥

संचूर्ण्य शाकसूपान्नरागादिष्ववचारयेत् ।

कासाजीर्णारुविश्वासहत्पाण्डवामयशूलनुत् ॥। ११२ ॥

( २१ ) चार प्रकार के अम्लो ( वृक्षाम्ल, अम्लवेतस, अनार और बेर अथवा कैथ, चौपतिया, वृक्षाम्ल ओर अनार ' ) का एक प्रस्थ, सोठ, मरिच और पिप्पली मिलित तीन पल, पाचो नमक ( सैन्धव, सचल, सामुद्र, विड् और उद्भिद ) मिलित चार पल, शर्करा आठ पल मिला कर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को शाक, दाल, राग ( व्यञ्जन विशेष ) आदि मे मिलाना चाहिये! यह चूर्ण कास, अजीर्ण, अरुचि, वास, हृदयगंग, पाण्डुरोग और गुल्म को नष्ट करता है ॥ १११-११२ ॥

चव्यत्वकूपिपलीमूलधातकीव्योपचित्रकान् ।

कपित्थं बिल्वमम्वष्टा शाल्मलं हस्ति पिप्पलीम् ॥

शिलोद्भेदं तथाऽजाजी पिष्ट्वा बदरसंमितान् ।

परिभ घृते दना यवागूं साधयेद्भिषक् ॥। ११४

रसेंः कपित्थचुक्रीकावृक्षाम्लैर्दाडिमस्य च ।

सर्वातिसार ग्रहणीगुल्माशेः श्रीहनाशिनी ॥ ११५ ॥

११३ ॥

॥

इति पञ्चप्रकारयवागूः । ( २२ ) पाच प्रकार की यवागू — चविका, दालचीनो, पिप्पलीमूल, घाय के फूल, सोठ, मरिच, पिप्पली और चीता, कैथ, बिल्व, पाठा, शाल्मल ( सीबल का गोंद ), गजपिप्पली, शिलाद्भेद ( शैलेय ), अजाजी ( जीरा ) प्रत्येक छः मासा लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूण को घी मे भून लेना चाहिये । फिर दही और कैथ का स्वरस, चागेरी ( चापतिया ) का रस, वृक्षाम्ल ( समगदाना ) और अनार के रस से यवागू पृथक् २ बनानी चाहिये । अथवा सब को मिश्रित करके यवागू सिद्ध करनी चाहिये । यह पाच प्रकार की यवागू सब प्रकार के आतसार, गुल्म, मन्दाग्मि, अर्श और प्लीहा रोग को नष्ट करती है ॥ ११३-११५ ॥

पचकोलकयूषश्च मूलकाना च सोषणः ।

स्निग्धो दाडिमतक्राम्लो जाङ्गलः संस्कृतो रसः ॥ ११६ ॥

१. चार अम्ल--

-- ' वृश्चाम्लं मातुलुगाम्लं बदरं चाम्लवेतसम् ।

चतुरम्लमिदं प्रोक्त पञ्चाम्ल तु सदाडिमम् ॥ १

पृष्ठ 597

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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६१३ MAAAAAAAA

क्रव्यादस्वरसः शस्तो भोजनार्थे सदीपनः ।

तक्रारनालमद्यानि पानार्थे ऽरिष्ट एव च ॥ ११७ ॥

( २३ ) भोजन के लिये जागल पशु पक्षियों का मास रस अथवा मास खाने वाले पशुओ के मास - रस को पचकोल ( पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चीन और सोठ ), मूली और मरिच इनसे सस्कृत करके घी आदि से स्निग्ध करके तथा अनार और दही से खट्टा करके देना चाहिये । यह रस अग्नि- दीपक होता है । मुद्ग यूत्र को भी पचकोल आदि से संस्कृत करके और घी से भून कर अनार आदि से खट्टा करके देना चाहिये । पीने के लिये छाछ, काजी, मन्त्र और अरिष्ट देने चाहिये । ११६-११७ ॥

तक्रं तु ग्रहणीदोषे दीपनप्राहिलाघवात् ।

श्रेष्ठं मधुरपाकित्वान्न च पित्तं प्रकोपयेत् ॥ ११८ ॥

कषायोष्णविकासित्वाद्रौक्ष्याञ्चैव कफे मतम् ।

वाते स्वाद्वम्लसान्द्रत्वात् सद्यस्कमविदाहि तन् ॥ ११६ ॥

तस्मात् तक्रप्रयोगा ये जठराणा तथाऽर्शसाम् ।

विहिता ग्रहणी दोपे सर्वशस्तान् प्रयोजयेत् ॥। १२० ॥

( २४ ) तक्र - प्रयोग - तक्र के दीपन ( अग्निदीपक ), संग्राही और लघु होने से यह तक ग्रहणी रोग मे हितकारी है । तक का विपाक मधुर है, इसलिये यह पित्त को प्रकुपित नही करता । कषायरस उष्णवीर्य और विकासी ( सब सूक्ष्म स्रोतों मे प्रविष्ट होने की प्रवृत्ति वाला ) और रूक्ष होने से कफजन्य ग्रहणी मे हितकारी है । तुरन्त मथा हुआ तक्र स्वादु ( मधुर ) पाक, अम्ल रस और सान्द्र ( स्नेहयुक्त ) हाने से वातजन्य ग्रहणी मे हितकारी है । तुरन्त मथा हुआ तक विदाह उत्पन्न नही करता । इसलिये उदर रोगियो और अर्ग रोगियों के लिये जो तक के प्रयोग कहे है वे सब ग्रहणी रोग मे प्रयोग करने चाहिये ॥११८-१२० ॥

यवान्यामलके पथ्या मरिचं त्रिपलाशिकम् ।

लवणानि पलांशानि पञ्च चैकत्र चूर्णयेत् ॥ १२१ ॥

तक्रकं सासुतं जातं तक्रारिष्टं पिबेन्नरः ।

दीपनं शोथगुल्मार्शः क्रिमिमेहोदरापहम् ॥ १२२ ॥

इति वक्रारिष्टः । ( २५ ) तक्रारिष्ट - अजवायन, आंवला, हरड़, मरिच ये सब मिलित तिहाई पल और मिलित पाचों नमक ( सैन्धा, सामुद्र, बिड, संचल और उद्-भिद ) चौथाई पल मिला कर सबका चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको तक्र के

पृष्ठ 598

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६ ९ ४ चरकसहिता [ अ ० १५ www . साथ पीना चाहिये और जिस समय तक्रारिष्ट मे अम्लता उत्पन्न हो जाये तब उसको पीना चाहिये । यह अरिष्ट अग्निदीपक, शोथ, गुल्म, प्रमेह और उदर रोग को नष्ट करता है ॥ १२१-१२२ ॥

स्वस्थानगतमुत्क्लिष्टमग्निनिर्वापक भिषक् ।

पित्तं ज्ञात्वा विरेकेण निर्हरेद्वमनेन वा ॥ १२३

अविदाहिभिरन्नैश्च लघुभिस्तिक्तसंयुतैः ।

जाङ्गलाना रसैर्यूपैर्मुद्गादीना खडैरपि ॥ १२४ ॥

दाडिमाम्लैः ससर्पिष्कैर्दीपनग्राहिसंयुतैः ।

तस्याग्नि दीपयेचूर्णैः सर्पिभिर्वा सतिक्तकैः ॥ १२५

अर्थ, कृमिरोग, ॥ ॥ ( २६ ) जिस समय कुपित पित्त अपने स्थान पर पहुँच जाय और अग्नि को कम करता हो उस समय इसको वसन या विरेचन द्वारा बाहर करना चाहिये । अग्नि का बढाने के लिये विदाह न करने वाले, लघु अन्नों को तिक्त पदार्थों से मिला कर देना चाहिये । जागल पशु पक्षियों के मास रस को, मूग आदि के यूष को, खडो को अनार आदि से खट्टा करके दीपनीय और ग्राही वस्तुओं ( तक्र आदि या कैथ, बिल्वगिरी आदि ) के साथ घी मिला कर देना चाहिये । अथवा कुष्ठ रोग मे कहा तिक्त घृत या तिक्त वस्तुओं से साधित घृत देना चाहिये || १२३-१२५ ॥

चन्दनं पद्मकोशीरं पाठां मूर्वा कुटन्नटम् ।

षड्यन्थासारिवास्फोतासप्तपर्णाटरूषकान् ॥ १२६ ॥

पटोलोदुम्बराश्वत्थवटमक्षकपीतनान् ।

कटुका रोहिणी मुस्त निम्ब च द्विपलाशिकम् ॥ १२७ ॥

द्रोणेऽपा साधयेत् पादशेषे प्रस्थ घृतात्पचेत् ।

किरातति केन्द्रयववीरामागधिकोत्पलेः ॥ १२८ ॥

कल्कैरक्षसमैः पेय तत् पित्तग्रहणीगदे ।

तिक्तकं यद् घृत चोक्तं कौष्टिके तच्च दापयेत् ॥ १२६ ॥

इति चन्दनाद्यं घृतम् । ( २७ ) चन्दनाद्य घृत ——चन्दन, पद्माख, खस, पाठा, मूवा, कुटन्नट ( कैवर्त्तमुस्ता ), वच, शारिवा, आस्फोता ( सारिवा या कपूर माधुरी ), सतवन आटरूषक ( वासा ), पटोल, गूलर, पीपल, बड़, पिलखन, कपीतन ( पारस पीपल ), कुटकी, माथा और नीम प्रत्येक द्रव्य दो पल लेकर एक द्रोण पानी मे इनका क्वाथ करना चाहिये और जब चतुर्थीश शेष रह जाये तब इसको छान

पृष्ठ 599

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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६१५ NNN लेना चाहिये | इसमे घृत १ प्रस्थ और कल्कार्थ – चिरायता, इन्द्रजौ, वीरा ( शालपर्णी या शतावरी ), मागधिका ( पिप्पली ) ओर कमलगट्टा प्रत्येक एक-एक अक्ष लेकर इनका कल्क करना चाहिये । इन सबो को मिला कर घृत सिद्ध करना चाहिये | यह घृत त्तिजन्य ग्रहणी रोग मे हितकारी है तिक्त घृत [ दो ] कहे है उनका भी प्रयाग करना चाहिये

नागरातिविषे मुस्तं धातकी सरसाञ्जनम् ।

वत्सकत्वक्फलं बिल्वं पाठा कटुकरोहिणीम् ॥

पिवेत् समाशं तच्चूर्ण सक्षौद्रं तण्डुलाम्बुना ।

पैत्तिके ग्रहणीदोषे रक्तं यच्चोपवेश्यते ॥ १३१ ॥

अर्शासि च गुदे शूलं जयेश्चैव प्रवाहिकाम् ।

नागराद्यमिदं चूर्ण कृष्णात्रेयेण पूजितम् ॥

। कुष्ठ रोग मे जो ॥ १२६-१२६ ॥ १३० ॥ १३२ ॥ इति नागराद्यं चूर्णम् । ( २८ ) नागराद्य चूर्ण - सोढ, अतीस, माथा, धाय के फूल, रसाजन ( रसौत ), कूड़े की छाल आर बेलगिरी, पाठा, कुटकी इन सब का समान भाग, लेकर चूर्ण कर लेना चाहिय । इस चूर्ण को शहद में मिला कर चावलों के धोवन के साथ पीना चाहिये | इससे पित्तजन्य ग्रहणी राग मे तथा जब मल मे रक्त आता है तब आराम होता है । अर्श, गुदा मे शूल और प्रवाहिका भी इसस नष्ट होते है । यह नागराचचूर्ण कृष्णात्रेय से प्रशसित है इसलिये यह सिद्ध योग है ॥ १३० - १३२ ॥

भूनिम्बं कटुकं व्योषं मुस्तमिन्द्रयवान् समान् ।

द्वौ चित्रकाद्वत्सकत्वग्भागान् षोडश चूर्णयेत् ॥ १३३ ॥

गुडशीताम्बुना पीत ग्रहणीदोषगुल्मनुत् ।

कामलाज्वरपाण्डुत्वमेहारुच्यतिसारनुत् ॥ १३४ ॥

इति भूनिम्बाद्यं चूर्णम् । ( २६ ) भूनिम्बादि चूर्ण - भूनिम्ब ( चिरायता ), कटुक ( कटु ), सोठ, मरिच, पिप्पली, मोथा, इन्द्रजौ प्रत्येक वस्तु समान भाग, चित्रक दो भाग और कूड़े की छाल १६ भाग लेकर चूर्ण कर लेना चाहिये । इस चूर्ण को ठण्डे पानी मे बने गुड़ के शर्बत के साथ पीना चाहिये । गुड़ इतना डालना चाहिये जिससे शर्बत मीठा हो जाये । इससे ग्रहणी रोग, गुल्म, कामला, ज्वर, पाण्डु प्रमेह, अरुचि और अतिसार नष्ट होता है ॥ १३३–१३४ ॥ वचामतिविषां पाठा सप्तपर्णं रसाञ्जनम् ।

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६१६ चरकसंहिता [ अ ० १५ ~ श्योनाकोदीच्यकट्वङ्गवत्सकत्वग्दुरालभाः ॥ १३५ ॥

दाव पटक मूव यवानी मधुशिप्रकम् ।

पटोलपत्रं सिद्धार्थान् यूथिकां जातिपल्लवान ॥ १३६ ॥

Scorecarf न निम्बशाकफलानि च ।

तद्रोगराममन्विच्छन् भूनिम्बाद्येन योजयेत् ॥ १३७ ॥

( २८ ) वच, अतीस, पाठा, सतवन रसाजन ( रसोत ), श्योनाक ( सोना-पाठा ), उदीच्य, ( नेत्रवाला ), कट्नग ( श्यांनाक ) [ दो नार पढने से दो बार लेना चाहिये ], वत्सकत्वग् ( कूडे की छाल ), दुरालभा ( धमासा ), दाव ( दारूहल्दी ), पित्तपापडा, मूर्वा, अजवायन, मधु, शिशु ( मीठा सुहा -जना ), पटोलपत्र, सिद्धार्थ ( श्वेत सरसो ), यूथिका ( जूई ) और चमेली के पत्ते, जामुन, बेलगिरी, आम की गुठली और नीम तथा शाक - वृक्ष के फल इनको कूट कर चूर्ण कर लेना चाहिये । इसको गुड़ के शर्बत के साथ पीना चाहिये अथवा भूनिम्बादि गण की वस्तुओ से मिलाकर खाना चाहिये । इससे उपरोक्त रोग शान्त होते है ॥ १३५–१३७ ॥

किराततिक्तं षड्ग्रन्था त्रायमाणा कटुत्रिकम् ।

चन्दनं पद्मकोशीरं दार्वी त्वक कटुरोहिणी ॥ १२८ ॥

कुटजत्वकूफलं मुस्तं यवानी देवदारु च ।

पटोलनिम्बपत्रैलासौराष्ट्रातिविषात्वचः ॥ १३६ ॥

मधुशियो बीजानि मूर्वापर्पटकं तथा ।

तचूर्ण मधुना लेह्यं पेयं मद्येर्जलेन वा ॥ १४० ॥

हृत्पाण्डुग्रहणी रोगगुल्मशूलारुचिज्वरान् ।

कामला सन्निपातं ४ च मुखरोगांश्च नाशयेत् ॥ १४१ ॥

इति किराताद्यं चूर्णम् । ( २६ ) किराताद्य चूर्ण - चिरायता, षड् ग्रन्था ( वच ), त्रायमाणा, सोठ मरिच, पिप्पिली, चन्दन, पद्माख, उशीर, ( खस ), दारुल्हदी, दालचीनी, कुटकी, पटोल, नीम के पत्ते, इलायची, सौराष्ट्र ( सुराष्ट्री ), अतीस, त्वच ( दाल-चीनी ), मीठे सुहाजने के बीज, मूर्वा, पित्तपापड़ा इनको समान भाग लेकर इसका चूर्ण करना चाहिये । इस चूर्ण को मधु के साथ चाटना चाहिये । अथवा १. पाठा इति पाठान्तरम् । २ हृद्रोग इति पाठान्तरम् । ३. शाकं वृक्ष के लिये डल्हण ने लिखा है कि- ' कर्कशमसृणपृष्ठोदरपत्रो वृक्षः, महाखरपत्र " । यह सागोन का भेद प्रतीत होता है । ४. ' पाण्डुरोग च ' इति वा पाठः ।