श्रीगणेशाय नमः।

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) — पृष्ठ 581–590

चरक - संहिता (द्वितीय खण्ड) · भार्गवपुस्तकालय, बनारस · पृष्ठ 581–590

पृष्ठ 581

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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम्

व्यानेन रसधातुर्हि विक्षेपोचितकर्मणा ।

redasti देहे विक्षिप्यते सदा ॥ ३६ ॥

विक्षेप करने वाला व्यान वायु रस धातु को सम्पूर्ण शरीर साथ समस्त शरीर मे फैला देता है ॥ ३६ ॥

क्षिप्यमाणः स्वयैगुण्यासः सज्जति यत्र सः ।

तस्मिन् विकारान् कुरुते विवमिव तोयदः ॥

निरन्तर गति करता हुआ यह रस स्रोतो के विकारों के ५७ मे सब ओर एक ३७ ॥ कारण जहा कहीं भी रुक जाता है वही पर रोगो का उत्पन्न कर देता है । जिस प्रकार वायु द्वारा वेग से जाते हुए बादल जहा कही भी रुक जाते है वहीं पर बरसने लगते हैं । उसी प्रकार रस के रुकने से रोग उत्पन्न होते है । [ रस शब्द का अर्थ ही गति वाला है, जो प्रतिदिन प्रतिक्षण चलता रहता है वह ' रस ' कहता है ] ॥ ३७ ॥

दोपणामपि चेवं स्यात्तत्र देशे प्रकोपणम् । फैलने वाले दोपो का भी जहा पर इसी प्रकार से रुकाव ( स्थान, सश्रय )

हो जाता है, वही पर प्रकोप ( रोग ) हो जाता है २ ।

इति भौतिकधात्वन्नपणां कर्म भाषितम् ॥ ३८ ॥

यह भौतिक अनि, त्वग्नि और अन्न पाचक अनि के कर्मों का उपदेश कर दिया || ३८ ॥

अन्नस्य पक्ता सर्वेषां पक्तृणामधिपो 3 मतः ।

तन्मूलास्ते हि तद्वृद्धिक्षयवृद्धिक्षयात्मकाः ॥ ३६ ॥

तस्मात्तं विधिवद्यत्तैरन्नपानेन्धनेर्हितैः ।

पालयेत्प्रयतस्तस्य स्थितौ ह्यायुर्बलस्थितिः ॥ ४० ॥

यो हि भुक्ते विधि मुक्त्वा ग्रहणीदोषजान् गदान् ।

सलौल्याल्लभते शीघ्रं वक्ष्यन्तेऽतः परं तु ये ॥ ४१ ॥

गुले दक्षिणे पार्श्वे बस्तिद्वारस्य चाप्यध ।

मूत्रस्रोतः पथाच्छुक्र पुरुषस्य प्रवर्त्तते ॥

कृत्स्नदेहाश्रित शुक्र प्रसन्नमनसस्तथा 1 स्त्रीषु व्यायच्छतश्चापि हर्षात् तत्सम्प्रवर्त्तते ॥ सु ० शा ० ४ ॥ १. " करोति विकृतिं चात्र खे वर्षमिव " इति वा । २ सुश्रुत में - " कुपिताना हि दोषाणा शरीरे परिधावताम् । यत्र सग. स्ववैगुण्याद् व्याधिस्तत्रोपजायते ॥ ” ३. ' मधिको ' इति पाठान्तरम् ।

पृष्ठ 582

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चरकसंहिता [ अ ० १५ पू ६८ ^^ इन तीनो प्रकार की अनियों में से प्रधान अनि अन्न का पाचक जाठ-राग्नि ही है । इस जाठराग्नि पर ही शेष अग्निया निर्भर है । इस जाठराग्नि के बढ़ने पर ये बढते है और इसके घटने पर ये घट जाते है 1 । इसलिये मनुष्य को चाहिये कि प्रयत्नपूर्वक विधि से अति हितकारी अन्नपान रूपी इधन के द्वारा इस जाठराग्नि की सदा रक्षा करे । क्योकि इसी अन्न - पाचक जाठराग्नि की स्थिति पर बल और आयु की स्थिति निर्भर है । जो मनुष्य विधि का त्याग करके आहार का रोवन करते हैं, वे लोभवश ग्रहणी के दान से रोगो से पीड़ित होते हैं । [ ग्रहणी दोष से उत्पन्न होने वाले का वर्णन आगे करेग ] ॥ ३६-४१ ॥

अभोजनादजीर्णातिभोजनाद्विपमाशनात् ।

असात्म्यगुरुशीतातिरुक्षस भोजनात ॥ ४२

विरेकवमनस्नेहविभ्रमाद् व्याधिकरणात् ।

देशकाल षम्याद वेगाना च विधारणात् ॥

दुष्यत्यनिः स दुष्टोऽन्नं न तत्पचति लध्वपि ।

अपच्यमान शुक्तत्वं यात्यन्नं विपता च तत् ॥

अजीर्ण के सामान्य कारण - भाजन न करने से उत्पन्न होने वाले चार प्रकार के रोगा ॥ ४३ ॥ ४४ ॥ ( उपवास से ), अजीर्ण मे ( प्रथम भोजन के जीर्ण न होने पर ) भोजन करने से, अति-भोजन से, विषमाशन से ( बहुत थोड़ा या अकाल मे भोजन से ), असात्म्य भोजन से, गुरु, शीत भाजन अथवा अति भोजन से, दूषित ( बासी या दूषित ) भोजन से, विरेचन, वमन अथवा स्नेह के विधिपूर्वक प्रयोग न करने से, किसी रोग के कारण कृशता या निर्बलता हो जाने से, देश, काल अथवा ऋतु की विषमता से, मल, मूत्र आदि के उपस्थित वेगा को राकने से अग्नि दूषित हो जाती है । यह दूषित अभियान से भी जाहार का परिपाक नहीं करता । पार-पाक न होने से अन्न शुक्त अथात् अम्लीभाव से युक्त हो जाता है तथा इसमें विष के गुण आ जाते है । अर्थात् असिक अन्न मृत्यु का भी कारण हो सकता है ' ॥ ४२-४४ ॥ १ " भौतिकाः पञ्च धात्वनयः सप्त, अन्नपक्ता एकः । अग्नयः इति भूतामयः

पञ्च, धात्वमयः सप्त इति द्वादशामय । " इति च चक्रः ० ॥

२ अन्यत्र भी कहा है-मूर्च्छा प्रलापो वमथुः प्रसेकः सदन भ्रमः ।

उपद्रवा भवन्त्येते मरण चाप्यजीर्णत ॥

पृष्ठ 583

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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ५६६

तस्य लिङ्गमजीर्णस्य विष्टम्भः सदनं तथा ।

शिरसो रुक् च मूर्च्छा च भ्रमः पृष्ठकटिग्रहः ॥ ४५ ॥

जृम्भाऽङ्गमर्दस्तृष्णा च ज्वरश्छर्दिः प्रवाहणम् । अरोचकोऽविपाकश्च । सामान्य लक्षण - विष्टम्भ ( अन्नका कोष्ठ में रुका रहना ), सदन ( शिथि-लता ), शिर मे दर्द, मूर्च्छा, भ्रम, पीठ मे वेदना, कमर आना, अगों में पीड़ा, प्यास, ज्वर, वमन, प्रवाहण ( आना ), अरुचि और अविपाक ( भोजन का ठीक पाक के सामान्य लक्षण है ॥ ४५ ॥

घोरमन्नविषं च तत् ॥ संसृज्यमानं पित्तेन दाह तृष्णा मुखामयान् । जनयत्यम्लपित्तं च पित्तजाश्चापरान् गदान् यक्ष्मपीनसमेहादीन्कफजान्कफसङ्गतः । करोति वातसंसृष्टं वातजाश्चापरान् गदान् ' मूत्ररोगाश्च मूत्रस्थं कुक्षिरोगान् शकृद्गतम् । में दर्द, जम्भाई का बार - बार पतला मल न होना ) ये अजीर्ण ४६ ॥ ॥४७ ॥

॥ ४८ ॥

रसादिभिश्च संसृष्टं कुर्याद्रोगान् रसादिजान् ॥ ४६ ॥

यह अन्न अब भयानक विष के समान हो जाता है । जिस समय यह अन्न-विष पित्त के साथ मिल जाता है, तब जलन, प्यास तथा मुख के रोगों को ओर अम्लपित्त को तथा पित्तजन्य अन्य विकारो को उत्पन्न करता है? । कफ के साथ मिल कर यह अन्न वित्र यक्ष्मा, पीनस, प्रमेह आदि कफजन्य रोगा को उत्पन्न करता है । यह अन्नविष वायु के साथ मिल कर विष्टम्भ आदि पूर्व कहे लक्षणों के साथ वात से उत्पन्न शूल, अफारा आदि अन्य अनेक रागों को उत्पन्न करता है । १. ' वातजाश्च गदान् बहून् ' इति वा । २ अम्ल पित्त के लक्षण दूसरे ग्रन्थ

मे इस प्रकार हैं— ' अविपाक्रक्लमात्क्लेदति काम्लोद्गारगौरवै. ।

हत्कण्ठदाहारुचिभिश्वाम्लपित्त विनिर्दिशेत् ॥

भोजन का न पकना, क्लान्ति होना, वमन की सी इच्छा, खट्टे डकार, भारीपन, हृदय और गले मे जलन और भोजन की अनिच्छा आदि लक्षणों से अम्ल पित्त को जाने । ३. यक्ष्मा - रोग त्रिदोषज होता है तो भी स्रोतो के रुकने पर कफ ही मुख्य उपद्रव उत्पन्न करता है इसलिये उसको कफजन्य कहा है ( चक्र ० ) ।

पृष्ठ 584

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६०० चरकसंहिता [ अ ० १५ www.v AMMA यह अन्न- विष मूत्र मे स्थित होकर मूत्रसम्बन्धी रोगों को, मल में आश्रित होकर उदर रोगों को, रस, रक्त आदि धातुओ मे आश्रित होकर रस आदि से उत्पन्न होने वाले रोगों को उत्पन्न करता है ' ॥ ४६–४६ ॥

विषमो धातुवैषम्यं करोति विपमं पचन् ।

तीक्ष्णो मन्देन्धनो धातून्विशोषयति पावकः ॥ ५० ॥

विपम अनि अन्न का पाक विषम रूप में करके धातुजो मे भी विषमता उत्पन्न कर देता है । तीक्ष्णामि को यदि आहार रूप इधन न मिले ता वह धातुओं को ही सुखाने लगता है ॥ ५० ॥

युक्तं भुक्तवतो युक्तो धातुसाम्यं समं पचन् ।

दुर्बल वित्यनं तद्यत्यूर्धमधोऽपि वा ॥ ५१ ॥

युक्त अर्थात् समाग्नि, हित और मात्रा मे खाये युक्त आहार को समता से परिपाक करके धातुओं को समानावस्था मे रखता है | दुर्बल अनि अन्न को विदग्ध करता है, यह विदग्ध अन्न या तो ऊर्ध्वमार्ग से ( वमन के रूप में ) निकल जाता है या अधोमार्ग, गुदा द्वार से विरेचन के रास्ते मलरूप मे बाहर होता है ॥ ५१ ॥

अधस्तु पक्कमामं वा प्रवृत्तं ग्रहणीगदः ।

उच्यते सर्वमेवानं प्रायो ह्यस्य विदह्यते ॥ ५२ ॥

जब विदग्ध अन्न पके वा कच्चे मल के रूप मे नीचे के गुदा मार्ग से निकलता है, तब उसको ' ग्रहणी ' रोग कहते है । इस ग्रहणी रोग मे सब प्रकार का अन्न प्रायः विदग्ध हो जाता है । रोगी स्निग्ध, रूक्ष, गुरु या लघु जो भी कुछ खाता है वह सब विदग्ध हो जाता है ॥५२ ॥

अतिसृष्टं विबद्धं वा द्रवं तदुपवेश्यते ।

तृष्णारोचकवैरस्यप्रसेकतमकान्वितः ॥ ५३ ॥

शूनपादकरः सास्थिपर्वरुक् छदेनं ज्वरः ।

लोहानुगन्धिस्तिक्ताम्ल उद्गारश्चास्य जायते ॥ ५४ ॥

ग्रहणी के लक्षण -- ग्रहणी के रोगी का मल बहुत पतला अथवा बंधा हुआ या पानी के समान द्रवरूप होता है । रोगी को प्यास, अरुचि, मुख मे विरसता, सुख मे थूक का बहुत आना और तमक श्वास रहता है । रोगी के हाथ - पाव पर १ रोगो के लिये देखिये चरक सूत्रस्थान अ ० २८ ॥ २. ' लोहाम ' इति पाठान्तरम् । ' लोहानुगन्धि ' शब्द का अर्थ ' लोहे के समान गन्ध ' यह अर्थ आयुर्वेदाचार्य जयदेवजी ने किया है ।

पृष्ठ 585

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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०१ सूजन हो जाती है । अस्थियो तथा पोरुओ मे दर्द रहता है । रोगी को वमन और ज्वर रहता है । रोगी को जो डकार ( उद्गार ) आते है उनमे रक्त की सी गन्ध रहती है, ये उदगार तिक्त ( कटु ) और अम्ल रससे युक्त होते हैं ॥ ५३ ५४ ॥ पूर्वरूप तु तस्येदं तृष्णाऽऽलस्यं बलक्षयः विदाहो s नस्य पाकश्च चिरात्कायस्य गौरवम् ॥ ५५ ॥

ग्रहणी के पूर्वरूप -- ग्यास, आलम्न, बल की क्षीणता, अन्न का विदाह होना, अन का देर मे पचना और शरीर में भारीपन प्रतीत होना ये ग्रहणी रोग के पूर्वरूप है ' || ५'५ ||

अग्न्यधिष्ठानमन्नस्य ग्रहणाद् ग्रहणी मता ।

नाभेपरि सा निलोपस्तम्भहिता ॥ ५६ ॥

अपक्षं धारयत्यन्नं पक्व सृजति पार्श्वतः ।

दुर्नाभिवाद् दुष्टा त्वाममेव २ विमुञ्चति ॥ ५७ ॥

ग्रहणी का स्थान और निरुक्ति - ग्रहणी का स्थान अग्नि का आश्रय स्थान है । वह अन्न को ग्रहण करती है इस कारण इस को ' ग्रहणी ' कहते है । यह ग्रहणी भाग नाभि से ऊपर कोठ मे स्थित है । वहा पर यह ग्रहणी अग्नि के बल की सहायता से स्थित और पुष्ट होकर आमाशय से आये कच्चे ( अपरिपक्क ) अन्न को धारण करती है और दूसरे पके हुए अन्न को ( क्षुद्र आतो मे ) त्याग करती है । जब अभिदुर्नल होती है तो दुष्ट हुई ग्रहणी अक अन्न को नही पचाती । वैसे का वैसे ही न पचे हुए अन्न को वह ग्रहणी इस मार्ग से त्याग करने लगती है | ५६-५७ ॥

१. सुश्रुत में कहा भी है-एकश. सर्वशश्चैव दोषैरव्यर्थमूर्च्छिते. ।

सा दुष्टा बहुशो भुक्तमाममेव विमुञ्चति ॥

पक्क वा सरुज पूति मृदुर्ब्रहं मुहुर्द्रवम् ।

ग्रहणीरोगमाहुस्त आयुर्वेदविदो जना • ॥

२. ' दुर्बलाग्न्यबलाददुष्टादाभमेव ' इति च पाठः । २. ग्रहणी भाग पर क्लोम रस, पित्ताशय का पित्त और आतों का क्षारीय रस आकर मिलते हैं । जिनकी सहायता से आमाशय से श्वेतरस ( काईल ) के रूप में आया- अपक आहार रस मिल कर पक्वावस्था मे आता है । जिस समय ग्रहणी भाग निर्बल हो जाता है उस समय उपरोक्त रस भोजन के साथ नहीं मिलते, जिससे वह अपक्कावस्था मे ही आतों मे चला जाता है । ये सब

पृष्ठ 586

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६०२ चरकसहिता [ अ ० १५

वातात्पित्तात्कफाच्च स्यात्तद्रोगस्त्रिभ्य एव च ' ।

हेतुं लिङ्गं चिकित्सां च शृणु तस्य पृथक् पृथक् ॥ ५८ ॥

ग्रहणी रोग के भेद — ग्रहणी रोग चार प्रकार का है ( १ ) वातजन्य, ( २ ) पित्तजन्य, ( ३ ) कफजन्य और ( ४ ) सन्निपातजन्य, । अब इन चारो के कारण, लक्षण और चिकित्सा पृथक सुनो ॥ ५८ ॥

कटुतिक्तकपायातिरुक्षशीतात्प ' भोजनैः ।

प्रमितानशनात्य व वेगनिग्रहमैथुनः ॥ ५६ ॥

मारुतः कुपितो वहि संछाद्य कुरुते गदान् । ( १ ) वातजन्य ग्रहणी - कटु, तिक्त, कपाय, अति रूक्ष, अति शीत, आत अल्प भाजन में, मात्रा में न्यून भोजन से, अनशन ( उपवास ) से बहुत अधिक यात्रा या परिश्रम से मल मुत्रादि के पेगो को रोकने से तथा अति मैथुन से कुपित जायु अनि का ढाप कर उसको मन्द करके अनेक रोगो का उत्पन्न करता है ॥ ५६- ॥ तस्यान्नं पच्यते दुःखं शुक्तपार्क खराङ्गता ॥ ६० ॥

कण्ठास्यशोपः क्षुत्तृष्णा तिमिरं कर्णयोः स्वनः ।

पाश्वोरुवंक्षणग्रीवारुजोऽभीक्ष्णं विसूचिका ॥ ६१ ॥।

हृत्पीडा कार्यदौर्बल्यं वरस्यं परिकतिका ।

गृद्धिः सवेरसाना च मनसः सद् • तथा ॥ ६२

जीर्णे जीर्यति चाध्मानं भुक्ते स्वास्थ्यमुपैति च ।

स वातगुल्मद्रोगसीहाशङ्की च मानवः ॥ ६३ ॥

चिराद् दुःखं द्रवं शुष्कं तन्वामं शब्दफेनवत् ।

पुनः पुनः सृजेद्वर्चः कासश्वासार्दितोऽनिलात् ॥

रस अनि गुण वाले अर्थात् क्षारीय होते है इसलिये ग्रहणी को स्थान कहा है । इसी अनि पर ग्रहणी आश्रित है अर्थात् इन ॥ ६४ ॥ अभि का आश्रय रसों के आने ही से उसका ' ग्रहणी ' नाम सार्थक होता है । जैसा कि सुश्रुत में कहा है-षष्ठी पत्ता धरा नाम या कला परिकीर्त्तिता । पक्कामाशयमध्यस्था ग्रहणी सा प्रकीर्त्तिता

evar aorat स चापि ग्रहणीं श्रितः ।

तस्मात्सदूषिते वह्नौ ग्रहणी सम्प्रदुष्यति ॥ सु ० उ ० अ ० ४० ॥

१. ' वातात् पित्तात् कफात्सर्वाद् ग्रहणीदोष उच्यते ' इति पाठान्तरम् । २ ' शीतल ' इति वा पाठ.! ३. ' करोति कुपितो मन्दमग्निं संछाद्य मारुतः ' इति पाठान्तरम् ।

पृष्ठ 587

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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् ६०३ लक्षण – वातजन्य ग्रहणी मे अन्न का परिपाक बहुत कठिनता से होता है । पकने पर अन्न शुक्त ( अम्लीभाव ) हो जाता है । अगों मे रूक्षता, कर्कशता आ जाती है । गला और मुख सूखा रहता है, भूख और प्यास बढ जाती है, आखो के सामने अन्धेरा आता या दृष्टि मन्द हो जाती है, कानो से गुजार रहती है, पासो मे, जघाओ मे, वक्षण और ग्रीवा मे दर्द रहती है बार बार विसूचिका अर्थात् पतला मल तथा वमन आने की शिकायत रहती है । हृदय मे ( आमाशय के कौड़ी भाग पर ) वेदना, दुर्बलता, कृशता मुख मे विरसता और कोष्ठ में कर्त्तन के समान वदना होती है । मधुर आदि सब रसो की खान का बाह रोगी करता है, मानसिक शिथिलता आ जाती है । भाजनके जीर्ण होजाने पर या जीर्णावस्था में आध्मान ( अफरा ) होता है । भोजन के करने पर रोगी को स्वास्थ्य का अनुभव होता है । रोगी को बातगुल्म, हृदयरोग और प्लीहा रोग के आशका बनी रहती है । रोगी बड़ी कठिनाई से बहुत देर में पतला, शुष्क, पानी के समान, कच्चा, शब्द और झाग मिल मल का बार - बार त्याग करता है । रोगी को खासी और श्वात की शिकायत रहती है ॥ ६०-६४ ॥

कट्वजीर्णविदाह्यम्लक्षाराद्यः पितमुल्बणम् ।

अग्निमालावयद्धन्ति जल तप्तमिवानलम् ॥ ६५ ॥

( २ ) पैत्तिक - ग्रहणी - कटु, अजीर्ण, विदाही, अम्ल तथा क्षार आदि के सेवन बढा हुआ पित्त अभि को आप्लावित करके उसी प्रकार नष्ट कर देता है, जैसे गरम पानी अनि को शान्त कर देता है । पित्त प्रकोपक वस्तुओं से पित्त मे

उष्णमा और द्रवाश दोनो बढते है । द्रवाश के कारण अग्नि बुझ जाती है ॥ ६५ ॥

सोऽजीर्णं नीलपीताभं पीताभः सार्यते द्रवम् ।

पूत्यम्लोद्गारहृत्कण्ठदाहारुचितृडर्दितः ॥ ६६ ॥

लक्षण – रोगी का वर्ण पीला या नीला सा हो जाता है उसका मल पीला तथा पानी जैसा पतला होता है । रोगी का उद्गार ( डकार ) दुर्गन्धयुक्त और खट्टा होता है, हृदय और गले मे जलन होती है । रोगी का अरुचि और प्यास सताती है ॥ ६६ ॥

गुर्वतिस्निग्धशीतादिभोजनादतिभोजनात् ।

भुक्तमात्रस्य च स्वप्नाद्धन्त्यग्नि कुपितः कफः ॥ ६७ ॥

( ३ ) कफजन्यग्रहणी -गुरु, शीत, अति स्निग्ध भोजन के सेवन से अथवा अतिभोजन से, और भोजन के उपरान्त तुरन्त सो जाने से कुपित हुअ कफ अग्नि को नष्ट करता है ॥ ६७ ॥

पृष्ठ 588

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६०४ चरकसहिता [ अ ० १५

तस्यान्नं पच्यते दुःखं हृल्लासच्छर्धरोचकाः ।

आस्योपदेहमाधुर्यकासष्ठीवनपीनसाः ॥ ६८ ॥

हृदयं मन्यते स्त्यानमुदरं स्तिमितं गुरु ।

दुष्टो मधुर उद्गारः सदनं स्त्रीध्वर्पणम् ॥ ६६ ॥

भिन्नामडलेप्न भूयिष्ठगुरुवर्तिनम् ।

अस्यापि दौर्जन्यमालम्यं च कफात्मके ॥ ७० ॥

लक्षण – रोगी का अन्न कठिनाई से पचता है, उसको जीमचलाना, वमन, अरुचि रहती है । लार से तुख लिपा सा रहता है, मुख मे मीठापन रहता है, खामी, बहुत थूक का आना, नाक मे प्रतिव्याय ( जुकाम ) रहता है । रोगी हृदय को रुका हुआ या भारी मानता है, उदर स्तिमित ( जकड़ा ) वा भारी प्रतीत होता है । उद्गार दूपित और मधुर होता है, शरीर के अगों मे शिथिलता रहती है, स्त्रियो के सहयोग मे मैथुन की इच्छा जागृत नही होती । रोगी का मल फटा हुआ ( छिछलेदार ), आम ( कच्चा ) और कफ युक्त तथा भारी होता है । विना कृशता के भी शरीर मे दुर्बलता का अनुभव होता है, शरीर में आलस्य रहता, काम करने को दिल नही चाहता । ६८-७० ॥

वामः पूर्वमुद्दिष्ट रोगानीके चतुर्विधः ।

तं चापि ग्रहणीदोप समवर्ज प्रचक्ष्महे ॥ ७१ ॥

रोगानीक [ विमानस्थान अ ० ६ ] अध्याय मे जो चार प्रकार के नि बतलाई है, उनमे भी समाग्नि को छोड कर शेष तीन ( विषम, मन्द और तीक्ष्णानि ) अग्नियो को ग्रहणी दोष ही कहते हैं । वायु से विषमाग्मि, कफ से मन्दाग्नि और पित्त से तीक्ष्णाग्नि होता है ॥ ७१ ॥

पृथग्वातादिनिर्दिष्टहेतुलिङ्गसमागमे । त्रिदोषं निर्दिशेत्तेषां -( ४ ) सन्निपातजन्य ग्रहणी – जिस स्थान पर वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य ग्रहणियों के कारण और लक्षण एकत्र मिलित दिखाई देते हो उसको सन्निपातजन्य ग्रहणी समझना चाहिये । १ अतीसार और ग्रहणी मे भेद करना चाहिये । यथा-साम शकृन्निराम वा जीर्णे येनातिसार्यते । सोऽतिसारोऽतिसरणादाशुकारी स्वभावतः ॥

साम सान्नमजीर्णेऽन्ने जीर्णे पक्क तु नैव वा ।

अकस्माद् वा गुरुर्ब्रद्धमकस्माच्छिथिल मुहुः ॥

पृष्ठ 589

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अ ० १५ ] चिकित्सितस्थानम् www भेषज शृण्वतः परम्

ग्रहणीमाश्रितं दोषं विदग्धाहारमूर्छितम् ।

सविष्टम्भप्रसेकार्तिविदाहारुचिगौरवः ॥ ७३ ॥

आमलिङ्गान्वितं ज्ञात्वा सुखोष्णेनाम्बुनोद्धरेत् ।

फलानां वा कषायेण पिप्पलीसर्षपैस्तथा ॥ ७४ ॥

अब ग्रहणी रोग की चिकित्सा सुनो-६०५ ॥ ७२ ॥

( १ ) आम दोष मे चिकित्सा - जिस समय आहार विदग्ध होता हो, विष्टम्भ ( मल का अवरोध ), सुख से लाला साव, पीड़ा, विदाह, अरुचि और भारीपन हो उस समय ग्रहणी मे आश्रित दोषो को आम के लक्षणों से युक्त समझना चाहिये । ' इसके लिये ( १ ) रोगी को गरम सुहाते पानी से वमन कराना चाहिये । अथवा ( २ ) मैनफल के क्वाथ से या ली और सरसो के क्वाथ से वमन कराना चाहिये । या ( ३ ) मैनफल क क्वाथ मे ही पिप्पली और सरसो का कल्क मिला कर वमन कराना चाहिये ॥ ७२-७४ ।

लीनं पक्वाशयस्थं वाप्यामं स्राव्यं सदीपनैः ।

शरीरानुगते सामे रसे लंघनपाचनम् ॥ ७५ ॥

( २ ) यदि आम - दोष कोष्ठ मे लीन ( छिना या व्याप्त ) हो अथवा पक्वाशय ( आतो मे ) मे पहुचा हो तो दीपनीय ओषधियो से रोगी को विरेचन देकर इस आम को निकालना चाहिये और यदि आम सम्पूर्ण शरीर मे ( अपक्का-वस्था मे ) व्याप्त हो जाये तो रोगी को लघन और पाचन देने चाहियें || ७५ ||

विशुद्धामाशयायास्मै पञ्चकोलादिभिः शृतम् ।

दद्यात् पेयादि लघ्वन्नं पुनर्योगाच दीपनान् ॥ ७६ ॥

( ३ ) जिस समय रोगी का आमाशय शुद्ध हो जाये तब पचकोल ( पिप्पली, पिप्पलीमूल, चव्य, चित्रक ओर सोठ ) और दीपनीय ओषधियो से साधित पेयादि लघु अन्न देने चाहिये और अन्य दीपनीय योगो का प्रयोग करना चाहिये ७६

ज्ञात्वा तु परिपक्कामं मारुतग्रहणीगदम् ।

दीपनीयतं सर्पिः पाययेताल्पशो भिपकू ॥ ७७ ॥

१ चिरद् ग्रहणी दोष सञ्चाञ्च्चोपवेशयेत् ॥ अ ० स ० । अतिसार मे मल अत्यधिक और साम तथा निराम बार - बार आता है । जब अन्न पचता नही तब ग्रहणी मे मल साम ओर भुक्त अन्न से युक्त होता है और जब अन्न पच जाता है तब मल पका हुआ आता है या आता ही नही । इसमे मल विना कारण ही बना और विना कारण ही शिथिल आता है ।

पृष्ठ 590

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६०६ चरकसंहिता [ अ ० १५ I ( ४ ) वातजन्य ग्रहणी मे पेया और दीपनीय योगो से जब आम का परि-पाक हो जाये तब वैद्य को चाहिये कि सूत्रस्थान मे कहे ( चतुर्थ ) दीपनीय औपधियो से साधित वृत को थोड़ा थोड़ा करके देवे ॥ ७७ ॥

किचित्सन्धुक्षिते त्वन्नौ सक्तविण्मूत्रमारुतम् ।

द्वयहं त्र्यहं वा संस्नेह्य स्विन्नाभ्यक्तं ' निरूहयेत् ॥ ७८ ॥

( ५ ) घृत के प्रयोग से जब अनि कुछ प्रदीप्त हो जाये तो यदि रोगी के मल, मूत्र और आयु रुके हो तो दो या तीन दिन वृत पान कराना चाहिये और रोगी को स्वेदन तथा तैल का अभ्यग देकर आस्थापन कराना चाहिये ॥ ७८ ॥

तत ऐरण्डतैलेन सर्पिषा तैल्वकेन वा ।

सक्षारेणानिले शान्ते स्रस्तदोषं विरेचयेत् ॥ ७६ ॥

( ६ ) इस प्रकार से जब वायु शान्त हो जाये और दोष ढीले हा जाऍ तत्र एरण्ड तैल से अथवा यवक्षारयुक्त तिल्वक घृत से रोगी को विरेचन देना चाहिये || ७६ ॥

शुद्धं रूक्षाशयं बद्धवर्चसं चानुवासयेत् ।

दीपनीयाम्लवातन्नसिद्धतैलेन मात्रया ॥ ८० ॥

( ७ ) रोगी के आशय और पक्काशय जब शुद्ध हो जाये, तथा कोठ या आशयों मे रूक्षता अनुभव होने पर, मल के बँध जाने पर अनुवासन देना चाहिये । इसके लिये दीपनीय अम्ल तथा बात- नाशक ओषधियों से तल सिद्ध करके मात्रा मे अनुवासन देना चाहिये ॥ ८० ॥

निरूढं च विरिक्तं च सम्यक् चैवानुवासितम् ।

लघ्वन्नप्रतिसंयुक्तं सर्पिरभ्यासयेत्पुनः ॥ ८१ ॥।

जब रोगी को निरूह बस्ति, विरेचन और अनुवासन भली प्रकार से दिये जा चुके तब पेया आदि लघु अन्न का भोजन करने वाले रोगी धीरे धीरे अभ्यास कराना चाहिये ॥ ८१ ॥

द्वे पञ्चमूले सरलं देवदारु सनागरम् ।

पिप्पलीं पिप्पलीमूलं चित्रकं हस्तिपिप्पलीम् ॥ ८२

शणबीजं यवान्कोलान्कुलत्थान्सुरभीस्तथा ।

पाचयेदारनालेन दघ्ना सौवीरकेण वा ॥ ८३ ॥

चातुर्भागावशेषेण पचेत्तेन घृताढकम् । १. ' द्वित्रीण्यद्दानि सस्नेहं स्नेहाभ्यक्त ' इति पाठान्तरम् । २. ' सभुक्तः ' इति पाठान्तरम् । को घृत का पुन. ॥