श्रीगणेशाय नमः।
महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 1061–1070
महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 1061–1070
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अथवापीह दग्धेषु भीष्मोऽस्माकं पितामहः ।
धर्म इत्येव कुप्येरन् ये चान्ये कुरुपुङ्गवाः ॥ २५ ॥
अथवा सम्भव है कि यहाँ हमलोगोंके जल जानेपर हमारे पितामह भीष्म तथा कुरुकुलके दूसरे श्रेष्ठ पुरुष धर्म समझकर ही उन आततायियोंपर क्रोध करें ( परंतु वह क्रोध हमारे किस कामका होगा? ) ॥ २५ ॥
वयं तु यदि दाहस्य बिभ्यतः प्रद्रवेमहि ।
स्पशैर्निर्घातयेत् सर्वान् राज्यलुब्धः सुयोधनः ॥ २६ ॥
यदि हम जलनेके भयसे डरकर भाग चलें तो भी राज्यलोभी दुर्योधन हम सबको अपने गुप्तचरोंद्वारा मरवा सकता है ॥ २६ ॥
अपदस्थान् पदे तिष्ठन्नपक्षान् पक्षसंस्थितः ।
हीनकोशान् महाकोशः प्रयोगैर्घातयेद् ध्रुवम् ॥ २७ ॥
इस समय वह अधिकारपूर्ण पदपर प्रतिष्ठित है और हम उससे वंचित हैं । वह सहायकोंके साथ है और हम असहाय हैं । उसके पास बहुत बड़ा खजाना है और हमारे पास उसका सर्वथा अभाव है । अतः निश्चय ही वह अनेक प्रकारके उपायोंद्वारा हमारी हत्या कर सकता है ॥ २७ ॥
तदस्माभिरिमं पापं तं च पापं सुयोधनम् ।
वञ्चयद्भिर्निवस्तव्यं छन्नावासं क्वचित् क्वचित् ॥ २८ ॥
इसलिये इस पापात्मा पुरोचन तथा पापी दुर्योधनको भी धोखेमें रखते हुए हमें यहीं कहीं किसी गुप्त स्थानमें निवास करना चाहिये ॥ २८ ॥
वयं मृगयाशीलाश्चराम वसुधामिमाम् ।
तथा नो विदिता मार्गा भविष्यन्ति पलायताम् ॥ २ ९ ॥
हम सब मृगयामें रत रहकर यहाँकी भूमिपर सब ओर विचरें, इससे भाग निकलनेके लिये हमें बहुत - से मार्ग ज्ञात हो जायँगे ॥ २ ९ ॥
भौमं च बिलमद्यैव करवाम सुसंवृतम् ।
गूढश्वासान्न नस्तत्र हुताशः सम्प्रधक्ष्यति ॥ ३० ॥
इसके सिवा आजसे ही हम जमीनमें एक सुरंग तैयार करें, जो ऊपरसे अच्छी तरह ढकी हो । वहाँ हमारी साँसतक छिपी रहेगी ( फिर हमारे कार्योंकी तो बात ही क्या है ) । उस सुरंगमें घुस जानेपर आग हमें नहीं जला सकेगी ॥ ३० ॥
वसतोऽत्र यथा चास्मान्न बुध्येत पुरोचनः ।
पौरो वापि जनः कश्चित् तथा कार्यमतन्द्रितैः ॥ ३१ ॥
हमें आलस्य छोड़कर इस प्रकार कार्य करना चाहिये, जिससे यहाँ रहते हुए भी हमारे सम्बन्धमें पुरोचनको कुछ भी ज्ञात न हो सके और किसी पुरवासीको भी हमारी कानोंकान खबर न हो ॥ ३१ ॥
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि भीमसेनयुधिष्ठिरसंवादे पञ्चचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें भीमसेन-युधिष्ठिर- संवादविषयक एक सौ पैंतालीसवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ १४५ ॥
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षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः विदुरके भेजे हुए खनकद्वारा लाक्षागृहमें सुरंगका निर्माण वैशम्पायन उवाच
विदुरस्य सुहृत् कश्चित् खनकः कुशलो नरः ।
विविक्ते पाण्डवान् राजन्निदं वचनमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! एक सुरंग खोदनेवाला मनुष्य विदुरजीका हितैषी एवं विश्वास-पात्र था । वह अपने काममें बड़ा चतुर था । एक दिन वह एकान्तमें पाण्डवोंसे मिला और इस प्रकार कहने लगा ॥ १ ॥
प्रहितो विदुरेणास्मि खनकः कुशलो ह्यहम् ।
पाण्डवानां प्रियं कार्यमिति किं करवाणि वः ॥ २ ॥
प्रच्छन्नं विदुरेणोक्तः श्रेयस्त्वमिति पाण्डवान् ।
प्रतिपादय विश्वासादिति किं करवाणि वः ॥ ३ ॥
'मुझे विदुरजीने भेजा है । मैं सुरंग खोदनेके काममें बड़ा निपुण हूँ। मुझे आप पाण्डवोंका प्रिय कार्य करना है, अतः आपलोग बतायें, मैं आपकी क्या सेवा करूँ? विदुरने गुप्तरूपसे मुझसे यह कहा है कि तुम वारणावतमें जाकर विश्वासपूर्वक पाण्डवोंका हित सम्पादन करो । अतः आप आज्ञा कीजिये कि मैं क्या करूँ? ॥ २-३ ॥
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कृष्णपक्षे चतुर्दश्यां रात्रावस्यां पुरोचनः ।
भवनस्य तव द्वारि प्रदास्यति हुताशनम् ॥ ४ ॥
' इसी कृष्णपक्षकी चतुर्दशीकी रातको पुरोचन आपके घरके दरवाजेपर आग लगा देगा ॥ ४ ॥
मात्रा सह प्रदग्धव्याः पाण्डवाः पुरुषर्षभाः ।
इति व्यवसितं तस्य धार्तराष्ट्रस्य दुर्मतेः ॥ ५ ॥
' दुर्बुद्धि दुर्योधनकी यह चेष्टा है कि नरश्रेष्ठ पाण्डव अपनी माताके साथ जला दिये जायँ ॥ ५ ॥
किंचिच्च विदुरेणोक्तो म्लेच्छवाचासि पाण्डव ।
त्वया च तत् तथेत्युक्तमेतद् विश्वासकारणम् ॥ ६ ॥
'पाण्डुनन्दन! विदुरजीने म्लेच्छभाषामें आपको कुछ संकेत किया था और आपने ‘ तथास्तु ' कहकर उसे स्वीकार किया था । यह बात मैं विश्वास दिलानेके लिये कहता हूँ' ॥ ६ ॥
उवाच तं सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
अभिजानामि सौम्य त्वां सुहृदं विदुरस्य वै ॥ ७ ॥
शुचिमाप्तं प्रियं चैव सदा च दृढभक्तिकम् ।
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न विद्यते कवेः किंचिदविज्ञातं प्रयोजनम् ॥ ८ ॥
तब सत्यवादी कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने उससे कहा – ' सौम्य! मैं तुम्हें पहचानता हूँ । तुम विदुरजीके हितैषी, ईमानदार, विश्वसनीय, प्रिय तथा उनके प्रति सदा अविचल भक्ति रखनेवाले हो । हमारा कोई भी ऐसा प्रयोजन नहीं है, जो परम ज्ञानी विदुरजीको ज्ञात न हो ॥ ७-८ ॥
यथा तस्य तथा नस्त्वं निर्विशेषा वयं त्वयि ।
भवतश्च यथा तस्य पालयास्मान् यथा कविः ॥ ९ ॥
' तुम विदुरजीके लिये जैसे आदरणीय और विश्वसनीय हो, वैसे ही हमारे लिये भी हो । तुमसे हमारा कोई अन्तर नहीं है । हमलोग जिस प्रकार विदुरजीके पालनीय हैं, वैसे ही तुम्हारे भी हैं । जैसे वे हमारी रक्षा करते हैं, वैसे ही तुम भी करो ॥ ९ ॥
इदं शरणमाग्नेयं मदर्थमिति मे मतिः ।
पुरोचनेन विहितं धार्तराष्ट्रस्य शासनात् ॥ १० ॥
‘ यह घर आग भड़कानेवाले पदार्थोंसे बना है । हमारा विश्वास है कि दुर्योधनके आदेशसे पुरोचनने हमारे लिये ही इसे बनवाया है ॥ १० ॥
स पापः कोषवांश्चैव ससहायश्च दुर्मतिः ।
अस्मानपि च पापात्मा नित्यकालं प्रबाधते ॥ ११ ॥
‘ पापी दुर्योधनके पास खजाना है और उसके बहुत- से सहायक भी हैं; इसीलिये वह दुर्बुद्धि पापात्मा सदा हमें सताया करता है ॥ ११ ॥
स भवान् मोक्षयत्वस्मान् यत्नेनास्माद् हुताशनात् ।
अस्मास्विह हि दग्धेषु सकामः स्यात् सुयोधनः ॥ १२ ॥
' तुम यत्न करके हमलोगोंको इस आगसे बचा लो; अन्यथा हमलोगोंके यहाँ दग्ध हो जानेपर दुर्योधनका मनोरथ सफल हो जायगा ॥ १२ ॥
समृद्धमायुधागारमिदं तस्य दुरात्मनः ।
वप्रान्तं निष्प्रतीकारमाश्रित्येदं कृतं महत् ॥ १३ ॥
इदं तदशुभं नूनं तस्य कर्म चिकीर्षितम् ।
प्रागेव विदुरो वेद तेनास्मानन्वबोधयत् ॥ १४ ॥
‘ यह उस दुरात्माका अस्त्र- शस्त्रोंसे भरा हुआ आयुधागार है । इसीके सहारे इस महान् गृहका निर्माण किया गया है । इसमें चहारदीवारीके निकटतक कहीं कोई बाहर निकलनेका मार्ग नहीं है । अवश्य ही दुर्योधनका यह अशुभ कर्म, जिसे वह पूर्ण करना चाहता है, पहले ही विदुरजीको मालूम हो गया था। इसीलिये उन्होंने हमें इसकी जानकारी करा दी ॥ १३-१४ ॥
सेयमापदनुप्राप्ता क्षत्ता यां दृष्टवान् पुरा ।
पुरोचनस्याविदितानस्मांस्त्वं प्रतिमोचय ॥ १५ ॥
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' विदुरजीकी दृष्टिमें जो बहुत पहले आ चुकी थी, वही यह विपत्ति आज हमलोगोंपर आयी- की- आयी है । तुम हमें इस संकटसे इस तरह मुक्त करो, जिससे पुरोचनको हमारे विषयमें कुछ भी पता न चले ' ॥ १५ ॥
स तथेति प्रतिश्रुत्य खनको यत्नमास्थितः ।
परिखामुत्किरन्नाम चकार च महाबिलम् ॥ १६ ॥
तब उस सुरंग खोदनेवालेने ' बहुत अच्छा, ऐसा ही होगा', यह प्रतिज्ञा की और कार्यसिद्धिके प्रयत्नमें लग गया । खाईकी सफाई करनेके व्याजसे उसने एक बहुत बड़ी सुरंग तैयार कर दी ॥ १६ ॥
चक्रे च वेश्मनस्तस्य मध्येनातिमहद् बिलम् ।
कपाटयुक्तमज्ञातं समं भूम्याश्च भारत ॥ १७ ॥
भारत! उसने उस भवनके ठीक बीचसे वह महान् सुरंग निकाली । उसके मुहानेपर किवाड़ लगे थे । वह भूमिके समान सतहमें ही बनी थी; अतः किसीको ज्ञात नहीं हो पाती थी ॥ १७ ॥
पुरोचन भयादेव व्यदधात् संवृतं मुखम् ।
स तस्य तु गृहद्वारि वसत्यशुभधीः सदा ।
तत्र ते सायुधाः सर्वे वसन्ति स्म क्षपां नृप ॥ १८ ॥
दिवा चरन्ति मृगयां पाण्डवेया वनाद् वनम् ।
विश्वस्तवदविश्वस्ता वञ्चयन्तः पुरोचनम् ।
अतुष्टा तुष्टवद् राजन्नूषुः परमविस्मिताः ॥ १ ९ ॥
पुरोचनके भयसे उस सुरंग खोदनेवालेने उसके मुखको बंद कर दिया था । दुष्टबुद्धि पुरोचन सर्वदा मकानके द्वारपर ही निवास करता था और पाण्डवगण भी रात्रिके समय शस्त्र सँभाले सावधानीके साथ उस द्वारपर ही रहा करते थे । ( इसलिये पुरोचनको आग लगानेका अवसर नहीं मिलता था । ) वे दिनमें हिंस्र पशुओंके मारनेके बहाने एक वनसे दूसरे वनमें विचरते रहते थे । पाण्डव भीतरसे तो विश्वास न करनेके कारण सदा चौकन्ने रहते थे, परंतु ऊपरसे पुरोचनको ठगनेके लिये विश्वस्तकी भाँति व्यवहार करते थे । राजन्! वे संतुष्ट न होते हुए भी संतुष्टकी भाँति निवास करते और अत्यन्त विस्मययुक्त रहते थे ॥ १८-१९ ॥
न चैनानन्वबुध्यन्त नरा नगरवासिनः ।
अन्यत्र विदुरामात्यात् तस्मात् खनकसत्तमात् ॥ २० ॥
विदुरके मन्त्री और खोदाईके काममें श्रेष्ठ उस खनकको छोड़कर नगरके निवासी भी पाण्डवोंके विषयमें कुछ नहीं जान पाते थे ॥ २० ॥
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इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि जतुगृहपर्वणि जतुगृहवासे षट्चत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः ॥ १४६ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत जतुगृहपर्वमें जतुगृहवासविषयक एक सौ छियालीसवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ १४६ ॥
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सप्तचत्वारिंशदधिकशततमोऽध्यायः लाक्षागृहका दाह और पाण्डवोंका सुरंगके रास्ते निकल जाना वैशम्पायन उवाच
तांस्तु दृष्ट्वा सुमनसः परिसंवत्सरोषितान् ।
विश्वस्तानिव संलक्ष्य हर्षं चक्रे पुरोचनः ॥ १ ॥
पुरोचने तथा हृष्टे कौन्तेयोऽथ युधिष्ठिरः ।
भीमसेनार्जुनौ चोभौ यमौ प्रोवाच धर्मवित् ॥ २ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं -जनमेजय! पाण्डवोंको एक वर्षसे वहाँ प्रसन्नचित्त हो विश्वस्तकी तरह रहते हुए देख पुरोचनको बड़ा हर्ष हुआ । उसके इस प्रकार प्रसन्न होनेपर धर्मके ज्ञाता कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवसे इस प्रकार कहा ॥ १-२ ॥
अस्मानयं सुविश्वस्तान् वेत्ति पापः पुरोचनः ।
वञ्चितोऽयं नृशंसात्मा कालं मन्ये पलायने ॥ ३ ॥
' पापी पुरोचन हमलोगोंको पूर्ण विश्वस्त समझ रहा है । इस क्रूरको अबतक हमलोगोंने धोखा दिया है । अब मेरी रायमें हमारे भाग निकलनेका यह उपयुक्त अवसर आ गया है ॥ ३ ॥
आयुधागारमादीप्य दग्ध्वा चैव पुरोचनम् ।
षट् प्राणिनो निधायेह द्रवामोऽनभिलक्षिताः ॥ ४ ॥
‘ इस आयुधागारमें आग लगाकर पुरोचनको जला करके इसके भीतर छः प्राणियोंको रखकर हम इस तरह भाग निकलें कि कोई हमें देख न सके ' ॥ ४ ॥
अथ दानापदेशेन कुन्ती ब्राह्मणभोजनम् ।
चक्रे निशि महाराज आजग्मुस्तत्र योषितः ॥ ५ ॥
ता विहृत्य यथाकामं भुक्त्वा पीत्वा च भारत ।
जग्मुर्निशि गृहानेव समनुज्ञाप्य माधवीम् ॥ ६ ॥
महाराज! तदनन्तर एक दिन रात्रिके समय कुन्तीने दान देनेके निमित्त ब्राह्मण- भोजन कराया । उसमें बहुत - सी स्त्रियाँ भी आयी थीं । भारत! वे सब स्त्रियाँ इच्छानुसार घूम-फिरकर खा- पी लेनेके बाद कुन्तीदेवीसे आज्ञा ले रातमें फिर अपने - अपने घरोंको ही लौट गयीं ॥ ५-६ ॥ निषादी पञ्चपुत्रा तु तस्मिन् भोज्ये यदृच्छया ।
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अन्नार्थिनी समभ्यागात् सपुत्रा कालचोदिता ॥ ७ ॥
सा पीत्वा मदिरां मत्ता सपुत्रा मदविह्वला ।
सह सर्वैः सुतै राजंस्तस्मिन्नेव निवेशने ॥ ८ ॥
सुष्वाप विगतज्ञाना मृतकल्पा नराधिप ।
अथ प्रवाते तुमुले निशि सुप्ते जने तदा ॥ ९ ॥
तदुपादीपयद् भीमः शेते यत्र पुरोचनः ।
ततो जतुगृहद्वारं दीपयामास पाण्डवः ॥ १० ॥
परंतु दैवेच्छासे उस भोजके समय एक भीलनी अपने पाँच बेटोंके साथ वहाँ भोजनकी इच्छासे आयी, मानो कालने ही उसे प्रेरित करके वहाँ भेजा था । वह भीलनी मदिरा पीकर मतवाली हो चुकी थी । उसके पुत्र भी शराब पीकर मस्त थे । राजन्! शराबके नशेमें बेहोश होनेके कारण अपने सब पुत्रोंके साथ वह उसी घरमें सो गयी । उस समय वह अपनी सुध-बुध खोकर मृतक- सी हो रही थी । रातमें जब सब लोग सो गये, उस समय सहसा बड़े
जोरकी आँधी चली । तब भीमसेनने उस जगह आग लगा दी, जहाँ पुरोचन सो रहा था ।
फिर उन्होंने लाक्षागृहके प्रमुख द्वारपर आग लगायी ॥ ७–१० ॥
समन्ततो ददौ पश्चादग्निं तत्र निवेशने ।
ज्ञात्वा तु तद् गृहं सर्वमादीप्तं पाण्डुनन्दनाः ॥ ११ ॥
सुरङ्गां विविशुस्तूर्णं मात्रा सार्धमरिंदमाः ।
ततः प्रतापः सुमहाञ्छब्दश्चैव विभावसोः ॥ १२ ॥
प्रादुरासीत् तदा तेन बुबुधे स जनव्रजः ।
तदवेक्ष्य गृहं दीप्तमाहुः पौराः कृशाननाः ॥ १३ ॥
इसके पश्चात् उन्होंने उस घरके चारों ओर आग लगा दी । जब वह सारा घर अग्निकी लपेटमें आ गया, तब यह जानकर शत्रुओंका दमन करनेवाले पाण्डव अपनी माताके साथ सुरंगमें घुस गये; फिर तो वहाँ अग्निकी भयंकर लपटें उठने लगीं, भीषण ताप फैल गया । घरको जलानेवाली उस आगका महान् चट- चट शब्द सुनायी देने लगा । इससे उस नगरका जनसमूह जाग उठा । उस घरको जलता देख पुरवासियोंके मुखपर दीनता छा गयी । वे व्याकुल होकर कहने लगे ॥ ११–१३ ॥ पौरा ऊचुः
दुर्योधनप्रयुक्तेन पापेनाकृतबुद्धिना ।
गृहमात्मविनाशाय कारितं दाहितं च तत् ॥ १४ ॥
अहो धिग् धृतराष्ट्रस्य बुद्धिर्नातिसमञ्जसा ।
यः शुचीन् पाण्डुदायादान् दाहयामास शत्रुवत् ॥ १५ ॥
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पुरवासी बोले – अहो! पुरोचनका अन्तःकरण अपने वशमें नहीं था । उस पापीने दुर्योधनकी आज्ञासे अपने ही विनाशके लिये इस घरको बनवाया और जला भी दिया! अहो! धिक्कार है, धृतराष्ट्रकी बुद्धि बहुत बिगड़ गयी है, जिसने शुद्ध हृदयवाले पाण्डुपुत्रोंको शत्रुकी भाँति आगमें जला दिया ॥ १४-१५ ॥
दिष्ट्या त्विदानीं पापात्मा दग्धोऽयमतिदुर्मतिः ।
अनागसः सुविश्वस्तान् यो ददाह नरोत्तमान् ॥ १६ ॥
सौभाग्यकी बात है कि यह अत्यन्त खोटी बुद्धिवाला पापात्मा पुरोचन भी इस समय दग्ध हो गया है, जिसने बिना किसी अपराधके अपने ऊपर पूर्ण विश्वास करनेवाले नरश्रेष्ठ पाण्डवोंको जला दिया है ॥ १६ ॥
वैशम्पायन उवाच
एवं ते विलपन्ति स्म वारणावतका जनाः ।
परिवार्य गृहं तच्च तस्थू रात्रौ समन्ततः ॥ १७ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं - जनमेजय! इस प्रकार वारणावतके लोग विलाप करने लगे ।
वे रातभर उस घरको चारों ओरसे घेरकर खड़े रहे ॥ १७ ॥
पाण्डवाश्चापि ते सर्वे सह मात्रा सुदुःखिताः ।
बिलेन तेन निर्गत्य जग्मुर्द्रुतमलक्षिताः ॥ १८ ॥
उधर समस्त पाण्डव भी अत्यन्त दुःखी हो अपनी माताके साथ सुरंगके मार्गसे
निकलकर तुरंत ही दूर चले गये । उन्हें कोई भी देख न सका ॥ १८ ॥
तेन निद्रोपरोधेन साध्वसेन च पाण्डवाः ।
न शेकुः सहसा गन्तुं सह मात्रा परंतपाः ॥ १ ९ ॥
नींद न ले सकनेके कारण आलस्य और भयसे युक्त परंतप पाण्डव अपनी माताके साथ जल्दी - जल्दी चल नहीं पाते थे ॥ १ ९ ॥
भीमसेनस्तु राजेन्द्र भीमवेगपराक्रमः ।
जगाम भ्रातॄनादाय सर्वान् मातरमेव च ॥ २० ॥
स्कन्धमारोप्य जननीं यमावङ्केन वीर्यवान् ।
पार्थौ गृहीत्वा पाणिभ्यां भ्रातरौ सुमहाबलः ॥ २१ ॥
राजेन्द्र! भयंकर वेग और पराक्रमवाले भीमसेन अपने सब भाइयों तथा माताको भी साथ लिये चल रहे थे । वे महान् बल और पराक्रमसे सम्पन्न थे । उन्होंने माताको तो कंधेपर चढ़ा लिया और नकुल सहदेवको गोदमें उठा लिया तथा शेष दोनों भाइयोंको दोनों हाथोंसे पकड़कर उन्हें सहारा देते हुए चलने लगे ॥ २०-२१ ॥
उरसा पादपान् भञ्जन् महीं पद्भ्यां विदारयन् ।
स जगामाशु तेजस्वी वातरंहा वृकोदरः ॥ २२ ॥