श्रीगणेशाय नमः।

महाभारत — खण्ड १ — पृष्ठ 831–840

महाभारत — खण्ड १ · Gita Press, Gorakhpur · पृष्ठ 831–840

पृष्ठ 831

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प्राप्तः स्वगुणतो राज्यं न तस्मिन् वाच्यमस्ति नः ॥ ३१ ॥

‘ आदरणीय गुरुजनो! हमारे कुलकी कीर्ति बढ़ानेवाले राजकुमार युधिष्ठिर सबसे ज्येष्ठ हैं । वे अपने गुणोंसे राज्यको पानेके अधिकारी हो चुके हैं । उनके विषयमें हमें कुछ नहीं कहना है ॥ ३१ ॥

अयं त्वनन्तरस्तस्मादपि राजा भविष्यति ।

एतद् विब्रूत मे तथ्यं यदत्र भविता ध्रुवम् ॥ ३२ ॥

‘किंतु उनके बाद मेरा यह पुत्र ही ज्येष्ठ है । क्या यह भी राजा बन सकेगा? इस बातपर विचार करके आपलोग ठीक- ठीक बतायें । जो बात अवश्य होनेवाली है, उसे स्पष्ट कहें' ॥ ३२ ॥

वाक्यस्यैतस्य निधने दिक्षु सर्वासु भारत ।

क्रव्यादाः प्राणदन् घोराः शिवाश्चाशिवशंसिनः ॥ ३३ ॥

जनमेजय! धृतराष्ट्रकी यह बात समाप्त होते ही चारों दिशाओंमें भयंकर मांसाहारी

जीव गर्जना करने लगे । गीदड़ अमंगलसूचक बोली बोलने लगे ॥ ३३ ॥

लक्षयित्वा निमित्तानि तानि घोराणि सर्वशः ।

तेऽब्रुवन् ब्राह्मणा राजन् विदुरश्च महामतिः ॥ ३४ ॥

यथेमानि निमित्तानि घोराणि मनुजाधिप ।

उत्थितानि सुते जाते ज्येष्ठे ते पुरुषर्षभ ॥ ३५ ॥

व्यक्तं कुलान्तकरणो भवितैष सुतस्तव ।

तस्य शान्तिः परित्यागे गुप्तावपनयो महान् ॥ ३६ ॥

राजन्! सब ओर होनेवाले उन भयानक अप- शकुनोंको लक्ष्य करके ब्राह्मणलोग तथा परम बुद्धिमान् विदुरजी इस प्रकार बोले –' नरश्रेष्ठ नरेश्वर! आपके ज्येष्ठ पुत्रके जन्म लेनेपर जिस प्रकार ये भयंकर अपशकुन प्रकट हो रहे हैं, उनसे स्पष्ट जान पड़ता है कि आपका यह पुत्र समूचे कुलका संहार करनेवाला होगा। यदि इसका त्याग कर दिया जाय तो सब विघ्नोंकी शान्ति हो जायगी और यदि इसकी रक्षा की गयी तो आगे चलकर बड़ा भारी उपद्रव खड़ा होगा ॥ ३४–३६ ॥

शतमेकोनमप्यस्तु पुत्राणां ते महीपते ।

त्यजैनमेकं शान्तिं चेत् कुलस्येच्छसि भारत ॥ ३७ ॥

‘ महीपते! आपके निन्यानबे पुत्र ही रहें; भारत! यदि आप अपने कुलकी शान्ति चाहते हैं तो इस एक पुत्रको त्याग दें ॥ ३७ ॥

एकेन कुरु वै क्षेमं कुलस्य जगतस्तथा ।

त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत् ॥ ३८ ॥

ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत् ।

स तथा विदुरेणोक्तस्तैश्च सर्वैर्द्विजोत्तमैः ॥ ३ ९ ॥

पृष्ठ 832

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न चकार तथा राजा पुत्रस्नेहसमन्वितः ।

ततः पुत्रशतं पूर्णं धृतराष्ट्रस्य पार्थिव ॥ ४० ॥

' केवल एक पुत्रके त्यागद्वारा इस सम्पूर्ण कुलका तथा समस्त जगत्का कल्याण कीजिये । नीति कहती है कि समूचे कुलके हितके लिये एक व्यक्तिको त्याग दे, गाँवके हितके लिये एक कुलको छोड़ दे, देशके हितके लिये एक गाँवका परित्याग कर दे और आत्माके कल्याणके लिये सारे भूमण्डलको त्याग दे । ' विदुर तथा उन सभी श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके यों कहनेपर भी पुत्रस्नेहके बन्धनमें बँधे हुए राजा धृतराष्ट्रने वैसा नहीं किया । जनमेजय! इस प्रकार राजा धृतराष्ट्रके पूरे सौ पुत्र हुए ॥ ३८–४० ॥

मासमात्रेण संजज्ञे कन्या चैका शताधिका ।

गान्धार्यां क्लिश्यमानायामुदरेण विवर्धता ॥ ४१ ॥

धृतराष्ट्रं महाराजं वैश्या पर्यचरत् किल ।

तस्मिन् संवत्सरे राजन् धृतराष्ट्रान्महायशाः ॥ ४२ ॥

जज्ञे धीमांस्ततस्तस्यां युयुत्सुः करणो नृप ।

एवं पुत्रशतं जज्ञे धृतराष्ट्रस्य धीमतः ॥ ४३ ॥

महारथानां वीराणां कन्या चैका शताधिका ।

युयुत्सुश्च महातेजा वैश्यापुत्रः प्रतापवान् ॥ ४४ ॥

तदनन्तर एक ही मासमें गान्धारीसे एक कन्या उत्पन्न हुई, जो सौ पुत्रोंके अतिरिक्त थी । जिन दिनों गर्भ धारण करनेके कारण गान्धारीका पेट बढ़ गया था और वह क्लेशमें पड़ी रहती थी, उन दिनों महाराज धृतराष्ट्रकी सेवामें एक वैश्यजातीय स्त्री रहती थी । राजन्! उस वर्ष धृतराष्ट्रके अंशसे उस वैश्यजातीय भार्याके द्वारा महायशस्वी बुद्धिमान् युयुत्सुका जन्म हुआ । जनमेजय! युयुत्सु करण कहे जाते थे। इस प्रकार बुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रके एक सौ वीर महारथी पुत्र हुए । तत्पश्चात् एक कन्या हुई, जो सौ पुत्रोंके अतिरिक्त थी । इन सबके सिवा महातेजस्वी परम प्रतापी वैश्यापुत्र युयुत्सु भी थे ॥ ४१–४४ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि गान्धारीपुत्रोत्पत्ती चतुर्दशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११४ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें गान्धारीपुत्रोत्पत्तिविषयक एक सौचौदहवाँ अध्याय पूराहुआ ॥ ११४ ॥

Face

पृष्ठ 833

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पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः दुःशलाके जन्मकी कथा जनमेजयउवाच

धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामादितः कथितं त्वया ।

ऋषेः प्रसादात् तु शतं न च कन्या प्रकीर्तिता ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा — ब्रह्मन्! महर्षि व्यासके प्रसादसे धृतराष्ट्रके सौ पुत्र हुए, यह बात आपने मुझे पहले ही बता दी थी । परंतु उस समय यह नहीं कहा था कि उन्हें एक कन्या भी हुई ॥ १ ॥

वैश्यापुत्रो युयुत्सुश्च कन्या चैका शताधिका ।

गान्धारराजदुहिता शतपुत्रेति चानघ ॥ २ ॥

उक्ता महर्षिणा तेन व्यासेनामिततेजसा ।

कथं त्विदानीं भगवन् कन्यां त्वं तु ब्रवीषि मे ॥ ३ ॥

अनघ! इस समय आपने वैश्यापुत्र युयुत्सु तथा सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक कन्याकी भी चर्चा की है । अमिततेजस्वी महर्षि व्यासने गान्धारराजकुमारीको सौ पुत्र होनेका ही वरदान दिया था । भगवन्! फिर आप मुझसे यह कैसे कहते हैं कि एक कन्या भी हुई ॥ २-३ ॥

यदि भागशतं पेशी कृता तेन महर्षिणा ।

न प्रजास्यति चेद् भूयः सौबलेयी कथंचन ॥ ४ ॥

कथं तु सम्भवस्तस्या दुःशलाया वदस्व I यथावदिह विप्रर्षे परं मेऽत्र कुतूहलम् ॥ ५ ॥

यदि महर्षिने उक्त मांसपिण्डके सौ भाग किये और यदि सुबलपुत्री गान्धारीने किसी प्रकार फिर गर्भ धारण या प्रसव नहीं किया, तो उस दुःशला नामवाली कन्याका जन्म किस प्रकार हुआ? ब्रह्मर्षे! यह सब यथार्थरूपसे मुझे बताइये । मुझे इस विषयमें कौतूहल हो रहा है ॥ ४-५ ॥ वैशम्पायन उवाच

साध्वयं प्रश्न उद्दिष्टः पाण्डवेय ब्रवीमि ते ।

तां मांसपेशीं भगवान् स्वयमेव महातपाः ॥ ६ ॥

शीताभिरद्भिरासिच्य भागं भागमकल्पयत् ।

यो यथा कल्पितो भागस्तं तं धात्र्या तथा नृप ॥ ७ ॥

घृतपूर्णेषु कुण्डेषु एकैकं प्राक्षिपत् तदा ।

एतस्मिन्नन्तरे साध्वी गान्धारी सुदृढव्रता ॥ ८ ॥

पृष्ठ 834

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दुहितुः स्नेहसंयोगमनुध्याय वराङ्गना ।

मनसाचिन्तयद् देवी एतत् पुत्रशतं मम ॥ ९ ॥

भविष्यति न संदेहो न ब्रवीत्यन्यथा मुनिः ।

ममेयं परमा तुष्टिर्दुहिता मे भवेद्यदि ॥ १० ॥

वैशम्पायनजीने कहा - पाण्डवनन्दन! तुमने यह बहुत अच्छा प्रश्न पूछा है। मैं तुम्हें इसका उत्तर देता हूँ । महातपस्वी भगवान् व्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डको शीतल जलसे सींचकर उसके सौ भाग किये । राजन्! उस समय जो भाग जैसा बना, उसे धायद्वारा वे एक- एक करके घीसे भरे हुए कुण्डोंमें डलवाते गये । इसी बीचमें पूर्ण दृढ़तासे सतीव्रतका पालन करनेवाली साध्वी एवं सुन्दरी गान्धारी कन्याके स्नेह - सम्बन्धका विचार करके मन-ही मन सोचने लगी – इसमें संदेह नहीं कि इस मांसपिण्डसे मेरे सौ पुत्र उत्पन्न होंगे; क्योंकि व्यासमुनि कभी झूठ नहीं बोलते; परंतु मुझे अधिक संतोष तो तब होता, यदि एक पुत्री भी हो जाती ॥ ६–१० ॥

एका शताधिका बाला भविष्यति कनीयसी ।

ततो दौहित्रजाल्लोकादबाह्योऽसौ पतिर्मम ॥ ११ ॥

यदि सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक छोटी कन्या हो जायगी तो मेरे ये पति दौहित्रके पुण्यसे प्राप्त होनेवाले उत्तम लोकोंसे भी वंचित नहीं रहेंगे ॥ ११ ॥

अधिका किल नारीणां प्रीतिर्जामातृजा भवेत् ।

यदि नाम ममापि स्याद् दुहितैका शताधिका ॥ १२ ॥

कृतकृत्या भवेयं वै पुत्रदौहित्रसंवृता ।

यदि सत्यं तपस्तप्तं दत्तं वाप्यथवा हुतम् ॥ १३ ॥

गुरवस्तोषिता वापि तथास्तु दुहिता मम ।

एतस्मिन्नेव काले तु कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ॥ १४ ॥

व्यभजत् स तदा पेशीं भगवानृषिसत्तमः ।

गणयित्वा शतं पूर्णमंशानामाह सौबलीम् ॥ १५ ॥

कहते हैं, स्त्रियोंका दामादमें पुत्रसे भी अधिक स्नेह होता है । यदि मुझे भी सौ पुत्रोंके अतिरिक्त एक पुत्री प्राप्त हो जाय तो मैं पुत्र और दौहित्र दोनोंसे घिरी रहकर कृतकृत्य हो जाऊँ । यदि मैंने सचमुच तप, दान अथवा होम किया हो तथा गुरुजनोंको सेवाद्वारा प्रसन्न कर लिया हो, तो मुझे पुत्री अवश्य प्राप्त हो । इसी बीचमें मुनिश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यासने स्वयं ही उस मांसपिण्डके विभाग कर दिये और पूरे सौ अंशोंकी गणना करके गान्धारीसे कहा ॥ १२–१५ ॥ व्यास उवाच पूर्णं पुत्रशतं त्वेतन्न मिथ्या वागुदाहृता ।

पृष्ठ 835

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दौहित्रयोगाय भाग एकः शिष्टः शतात् परः ।

एषा ते सुभगा कन्या भविष्यति यथेप्सिता ॥ १६ ॥

व्यासजी बोले — गान्धारी! मैंने झूठी बात नहीं कही थी; ये पूरे सौ पुत्र हैं । सौके अतिरिक्त एक भाग और बचा है, जिससे दौहित्रका योग होगा । इस अंशसे तुम्हें अपने मनके अनुरूप एक सौभाग्यशालिनी कन्या प्राप्त होगी ॥ १६ ॥

ततोऽन्यं घृतकुम्भं च समानाय्य महातपाः ।

तं चापि प्राक्षिपत् तत्र कन्याभागं तपोधनः ॥ १७ ॥

एतत् ते कथितं राजन् दुःशलाजन्म भारत ।

ब्रूहि राजेन्द्र किं भूयो वर्तयिष्यामि तेऽनघ ॥ १८ ॥

यों कहकर महातपस्वी व्यासजीने घीसे भरा हुआ एक और घड़ा मँगाया और उन तपोधन मुनिने उस कन्याभागको उसीमें डाल दिया । भरतवंशी नरेश! इस प्रकार मैंने तुम्हें

दुःशलाके जन्मका प्रसंग सुना दिया । अनघ! बोलो, अब पुनः और क्या कहूँ ॥ १७-१८ ॥

इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि दुःशलोत्पत्तौ पञ्चदशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११५ ॥

इसप्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें दुःशलाकी उत्पत्तिसे सम्बन्ध रखनेवाला एक सौ पंद्रहवाँअध्याय पूरा हुआ ॥ ११५ ॥

पृष्ठ 836

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षोडशाधिकशततमोऽध्यायः धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंकी नामावली जनमेजय उवाच

ज्येष्ठानुज्येष्ठतां तेषां नामानि च पृथक् पृथक् ।

धृतराष्ट्रस्य पुत्राणामानुपूर्व्यात् प्रकीर्तय ॥ १ ॥

जनमेजयने पूछा- ब्रह्मन्! धृतराष्ट्रके पुत्रोंमें सबसे ज्येष्ठ कौन था? फिर और उससे भी छोटा कौन था? उन सबके अलग- अलग नाम क्या थे? इन स् क्रमशः वर्णन कीजिये ॥ १ ॥

वैशम्पायन उवाच

दुर्योधनो युयुत्सुश्च राजन् दुःशासनस्तथा ।

दुःसहो दुःशलश्चैव जलसंधः समः सहः ॥ २ ॥

विन्दानुविन्दौ दुर्धर्षः सुबाहुर्दुष्प्रधर्षणः ।

दुर्मर्षणो दुर्मुखश्च दुष्कर्णः कर्ण एव च ॥ ३ ॥

विविंशतिर्विकर्णश्च शलः सत्त्वः सुलोचनः ।

चित्रोपचित्रौ चित्राक्षश्चारुचित्रशरासनः ॥ ४ ॥

दुर्मदो दुर्विगाहश्च विवित्सुर्विकटाननः ।

ऊर्णनाभः सुनाभश्च तथा नन्दोपनन्दकौ ॥ ५ ॥

चित्रबाणश्चित्रवर्मा सुवर्मा दुर्विरोचनः ।

अयोबाहुर्महाबाहुश्चित्राङ्गश्चित्रकुण्डलः ॥

भीमवेगो भीमबलो बलाकी बलवर्धनः ।

उग्रायुधः सुषेणश्च कुण्डोदरमहोदरौ ॥ ७ ॥

चित्रायुधो निषङ्गी च पाशी वृन्दारकस्तथा ।

दृढवर्मा दृढक्षत्रः सोमकीर्तिरनूदरः ॥

दृढसन्धो जरासन्धः सत्यसन्धः सदःसुवाक् ।

उग्रश्रवा उग्रसेनः सेनानीर्दुष्पराजयः ॥

अपराजितः पण्डितको विशालाक्षो दुराधरः ।

दृढहस्तः सुहस्तश्च वातवेगसुवर्चसौ ॥ १० ॥

आदित्यकेतुर्बह्वाशी नागदत्तोऽग्रयाय्यपि ।

कवची क्रथनः दण्डी दण्डधारो धनुर्ग्रहः ॥ ११ ॥

उग्र भीमरथौ वीरौ वीरबाहलोलुपः ।

पृष्ठ 837

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अभयो रौद्रकर्मा च तथा दृढरथाश्रयः ॥ १२ ॥

अनाधृष्यः कुण्डभेदी विरावी चित्रकुण्डलः प्रमथश्च प्रमाथी च दीर्घरोमश्च वीर्यवान् ॥ १३ ॥

दीर्घबाहुर्महाबाहुर्व्यूढोरुः कनकध्वजः ।

कुण्डाशी विरजाश्चैव दुःशला च शताधिका ॥ १४ ॥

वैशम्पायनजीने कहा – (जनमेजय! धृतराष्ट्रके पुत्रोंके नाम क्रमशः ये हैं — ) १. दुर्योधन, २. युयुत्सु, ३. दुश्शासन, ४. दुस्सह, ५. दुश्शल, ६. जलसंध, ७. सम, ८. सह, ९. विन्द, १०. अनुविन्द, ११. दुर्धर्ष, १२. सुबाहु, १३. दुष्प्रधर्षण, १४. दुर्मर्षण, १५. दुर्मुख, १६. दुष्कर्ण, १७. कर्ण, १८. विविंशति, १ ९. विकर्ण, २०. शल, २१. सत्त्व, २२. सुलोचन, २३. चित्र, २४. उपचित्र, २५. चित्राक्ष, २६. चारुचित्रशरासन ( चित्र - चाप ), २७. दुर्मद, २८. दुर्विगाह, २ ९. विवित्सु, ३०. विकटानन ( विकट), ३१. ऊर्णनाभ, ३२. सुनाभ ( पद्मनाभ ), ३३. नन्द, ३४. उपनन्द, ३५. चित्रबाण ( चित्रबाहु ), ३६. चित्रवर्मा, ३७. सुवर्मा, ३८. दुर्विरोचन, ३ ९. अयोबाहु, ४०. महाबाहु चित्रांग (चित्रांगद ), ४१. चित्रकुण्डल ( सुकुण्डल ), ४२. भीमवेग, ४३. भीमबल, ४४. बलाकी, ४५. बलवर्धन ( विक्रम), ४६. उग्रायुध, ४७. सुषेण, ४८. कुण्डोदर, ४ ९. महोदर, ५०. चित्रायुध ( दृढायुध), ५१. निषंगी, ५२. पाशी, ५३. वृन्दारक, ५४. दृढ़वर्मा, ५५. दृढ़क्षत्र, ५६. सोमकीर्ति, ५७. अनूदर, ५८. दृढ़सन्ध, ५ ९. जरासन्ध, ६०. सत्यसन्ध, ६१. सदः सुवाक् ( सहस्रवाक् ), ६२. उग्रश्रवा, ६३. उग्रसेन, ६४. सेनानी ( सेनापति ), ६५. दुष्पराजय, ६६. अपराजित, ६७. पण्डितक, ६८. विशालाक्ष, ६ ९. दुराधर ( दुराधन ), ७०. दृढ़हस्त, ७१. सुहस्त, ७२. वातवेग, ७३. सुवर्चा, ७४. आदित्यकेतु, ७५. बह्वाशी, ७६. नागदत्त, ७७. अग्रयायी ( अनुयायी ), ७८. कवची, ७ ९. क्रथन, ८०. दण्डी, ८१. दण्डधार, ८२. धनुर्ग्रह, ८३. उग्र, ८४. भीमरथ, ८५. वीरबाहु, ८६. अलोलुप, ८७. अभय, ८८. रौद्रकर्मा, ८ ९. दृढ़रथाश्रय ( दृढ़रथ ), ९ ०. अनाधृष्य, ९ १. कुण्डभेदी, ९ २. विरावी, ९ ३. विचित्र कुण्डलोंसे सुशोभित प्रमथ, ९४. प्रमाथी, ९ ५. वीर्यवान् दीर्घरोमा ( दीर्घलोचन ), ९ ६. दीर्घबाहु, ९ ७. महाबाहु व्यूढोरु, ९८. कनकध्वज ( कनकांगद ), ९९. कुण्डाशी ( कुण्डज ) तथा १००. विरजा - धृतराष्ट्रके ये सौ पुत्र थे । इनके सिवा दुःशला नामक एक कन्या थी, जो सौसे अधिक थी * ॥ २–१४ ॥

इति पुत्रशतं राजन् कन्या चैव शताधिका ।

नामधेयानुपूर्व्येण विद्धि जन्मक्रमं नृप ॥ १५ ॥

राजन्! इस प्रकार धृतराष्ट्रके सौ पुत्र और उन सौके अतिरिक्त एक कन्या बतायी गयी । राजन्! जिस क्रमसे इनके नाम लिये गये हैं, उसी क्रमसे इनका जन्म हुआ समझो ॥ १५ ॥

सर्वे त्वतिरथाः शूराः सर्वे युद्धविशारदाः ।

सर्वे वेदविदश्चैव सर्वे सर्वास्त्रकोविदाः ॥ १६ ॥

पृष्ठ 838

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ये सभी अतिरथी शूरवीर थे । सबने युद्धविद्यामें निपुणता प्राप्त कर ली थी । सब-के-सब वेदोंके विद्वान् तथा सम्पूर्ण अस्त्रविद्याके मर्मज्ञ थे ॥ १६ ॥

सर्वेषामनुरूपाश्च कृता दारा महीपते ।

धृतराष्ट्रेण समये परीक्ष्य विधिवन्नृप ॥ १७ ॥

दुःशलां चापि समये धृतराष्ट्रो नराधिपः ।

जयद्रथाय प्रददौ विधिना भरतर्षभ ॥ १८ ॥

जनमेजय! राजा धृतराष्ट्रने समयपर भलीभाँति जाँच- पड़ताल करके अपने सभी पुत्रोंका उनके योग्य स्त्रियोंके साथ विवाह कर दिया । भरतश्रेष्ठ! महाराज धृतराष्ट्रने विवाहके योग्य समय आनेपर अपनी पुत्री दुःशलाका राजा जयद्रथके साथ विधिपूर्वक विवाह किया ॥ १७-१८ ॥ इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि धृतराष्ट्रपुत्रनामकथने षोडशाधिकशततमोऽध्यायः ॥ ११६ ॥

इस प्रकार श्रीमहाभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें धृतराष्ट्रपुत्रनामवर्णनविषयक एक सौसोलहवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ११६ ॥

* आदिपर्वके सरसठवें अध्यायमें भी धृतराष्ट्रके सौ पुत्रोंके नाम आये हैं । वहाँ जो नाम दिये गये हैं, उनमेंसे अधिकांश नाम इस अध्यायमें भी ज्यों- के - त्यों हैं । कुछ नामोंमें साधारण अन्तर है, जिन्हें यहाँ कोष्ठकमें दे दिया गया है । इस प्रकार यहाँ और वहाँके नामोंकी एकता की गयी है । थोड़े - से नाम ऐसे भी हैं, जिनका मेल नहीं मिलता । नामोंके क्रममें भी दोनों स्थलोंमें अन्तर है । सम्भव है, उनके दो - दो नाम रहे हों और दोनों स्थलोंमें भिन्न -भिन्न नामोंका उल्लेख हो ।

पृष्ठ 839

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सप्तदशाधिकशततमोऽध्यायः राजा पाण्डुके द्वारा मृगरूपधारी मुनिका वध तथा उनसे शापकी प्राप्ति जनमेजय उवाच

कथितो धार्तराष्ट्राणामार्षः सम्भव उत्तमः ।

अमनुष्यो मनुष्याणां भवता ब्रह्मवादिना ॥ १ ॥

जनमेजयने कहा- भगवन्! आपने धृतराष्ट्रके पुत्रोंके जन्मका उत्तम प्रसंग सुनाया है, जो महर्षि व्यासकी कृपासे सम्भव हुआ था । आप ब्रह्मवादी हैं। आपने यद्यपि यह मनुष्योंके जन्मका वृतान्त बताया है, तथापि यह दूसरे मनुष्योंमें कभी नहीं देखा गया ॥ १ ॥

नामधेयानि चाप्येषां कथ्यमानानि भागशः ।

त्वत्तः श्रुतानि मे ब्रह्मन् पाण्डवानां च कीर्तय ॥ २ ॥

ब्रह्मन्! इन धृतराष्ट्रपुत्रोंके पृथक् - पृथक् नाम भी जो आपने कहे हैं, वे मैंने अच्छी तरह सुन लिये । अब पाण्डवोंके जन्मका वर्णन कीजिये ॥ २ ॥

ते हि सर्वे महात्मानो देवराजपराक्रमाः ।

त्वयैवांशावतरणे देवभागाः प्रकीर्तिताः ॥ ३ ॥

वे सब महात्मा पाण्डव देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे । आपने ही अंशावतरणके प्रसंगमें उन्हें देवताओंका अंश बताया था ॥ ३ ॥

एतदिच्छाम्यहं श्रोतुमतिमानुषकर्मणाम् ।

तेषामाजननं सर्वं वैशम्पायन कीर्तय ॥ ४ ॥

वैशम्पायनजी! वे ऐसे पराक्रम कर दिखाते थे, जो मनुष्योंकी शक्तिके परे हैं; अतः मैं उनके जन्म - सम्बन्धी वृत्तान्तको सम्पूर्णतासे सुनना चाहता हूँ; कृपा करके कहिये ॥ ४ ॥

वैशम्पायन उवाच

राजा पाण्डुर्महारण्ये मृगव्यालनिषेविते ।

चरन् मैथुनधर्मस्थं ददर्श मृगयूथपम् ॥ ५ ॥

वैशम्पायनजी बोले — जनमेजय! एक समय राजा पाण्डु मृगों और सर्पोंसे सेवित विशाल वनमें विचर रहे थे । उन्होंने मृगोंके एक यूथपतिको देखा, जो मृगीके साथ मैथुन कर रहा था ॥ ||

ततस्तां च मृगीं तं च रुक्मपुङ्खैः सुपत्रिभिः ।

निर्बिभेद शरैस्तीक्ष्णैः पाण्डुः पञ्चभिराशुगैः ॥ ६ ॥

पृष्ठ 840

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उसे देखते ही राजा पाण्डुने पाँच सुन्दर एवं सुनहरे पंखोंसे युक्त तीखे तथा शीघ्रगामी बाणोंद्वारा, उस मृगी और मृगको भी बींध डाला ॥ ६ ॥

स च राजन् महातेजा ऋषिपुत्रस्तपोधनः ।

भार्यया सह तेजस्वी मृगरूपेण संगतः ॥ ७ ॥

राजन्! उस मृगके रूपमें एक महातेजस्वी तपोधन ऋषिपुत्र थे, जो अपनी मृगीरूपधारिणी पत्नीके साथ तेजस्वी मृग बनकर समागम कर रहे थे ॥ ७ ॥

संसक्तश्च तया मृग्या मानुषीमीरयन् गिरम् ।

क्षणेन पतितो भूमौ विललापाकुलेन्द्रियः ॥ ८ ॥

वे उस मृगीसे सटे हुए ही मनुष्योंकी- सी बोली बोलते हुए क्षणभरमें पृथ्वीपर गिर पड़े । उनकी इन्द्रियाँ व्याकुल हो गयीं और वे विलाप करने लगे ॥ ८ ॥

मृगउवाच

काममन्युपरीता हि बुद्ध्या विरहिता अपि ।

वर्जयन्ति नृशंसानि पापेष्वपि रता नराः ॥ ९ ॥

न विधिं ग्रसते प्रज्ञा प्रज्ञां तु ग्रसते विधिः ।

विधिपर्यागतानर्थान् प्राज्ञो न प्रतिपद्यते ॥ १० ॥