श्रीगणेशाय नमः।

श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 1–10

श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 1–10

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गोष संस्थान I पुस्तकालय विभाग कुंज, 204/202 संहिताकरण 512

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शोध संस्थान ब्रह्मवर्चस तकालय * विभाग शान्ति कँज, हरिद्वारे वज्रजीवन प्राच्यभारती ग्रन्थमाला 209/202 109 श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) ‘ राघवीय ’ - भाषानुवाद सहिता भाषानुवादकः डा. राघवेन्द्रशर्मा राघवः शिक्षक सम्मान प्राप्तः संपादक: -मानसहंस श्रीराम ( पत्रिका ) लेखक प्रमुख - इतिहास संकलन समितिः पुस्त की धार्मिक 18 ड्रोलिया पुस्तकमाता मंदिर सभी प्रकार भण्डार भारत 249610 निकटहरिद्वार- नं० --01334-200814 फोन ज्ञाने सर्व प्रतिष्ठितम् चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान दिल्ली

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प्रकाशक चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान ('भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक ) 38 यू. ए. जवाहरनगर, बंगलो रोड पो. बा. नं. 2113 दिल्ली 110007 दूरभाषः 23856391 प्रथम संस्करण 2004 ई. मूल्य 50.00 अन्य प्राप्तिस्थान चौखम्बा विद्याभवन चौक (बनारस स्टेट बैंक भवन के पीछे) पो. बा. नं. 1069. वाराणसी 221001 दूरभाष: 2320404 * चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन के. 37 / 117, गोपालमन्दिर लेन पो. बा. नं. 1129, वाराणसी 221001 दूरभाष: 2335263, 2333371 मुद्रक ए. के. लिथोग्राफर दिल्ली

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श संस्थान 2.ब्रह्मवर्चसपुस्तकालय- * शान्ति कुँज, हरिद्वार / विभाग खक २०८ प्राक्कथन भारतीय वाङ्मय में योगशास्त्र ऐसा विषय है, जिसमें मानव सभ्यता के इतिहास में त्रिविध- ( आधिभौतिक- दैविक- आत्मिक) तापों की शांति हेतु नित्य नैमित्तिक आचार पद्धति का सृजन कर मानवकल्याण का सर्वयुगानुकूल ओर वैज्ञानिक व्यवस्था दी गयी है । इहलौकिक सुख के साथ-साथ पारलौकिक सुख की विधि और प्रक्रिया का आमूल वर्णन करते करते योगशास्त्र ने विश्व के प्रत्येक चिन्तक, वैज्ञानिक और भौतिकवादियों तक को भी आदर्श, संयत जीवन जीने की कला सिखायी है । यही नहीं, योगदर्शन ने नितान्तभौतिकवादियों को भी सोचने पर विवश कर दिया है कि देहावसान के पश्चात् निर्गमन कर जाने वाला तत्त्व जगद्वस्तु का वायु नामक तत्व नहीं है तो फिर वह कौन सा तत्व है? जिसके होते शरीर चेतन रहकर सारी क्रियायें करता है, सुखदु: खानुभव करता है, मैं और तू का व्यवहार करता है तथा विभिन्न मानवतुल्य क्रिया करने वाले रोबोट या कम्प्यूटर से यह चेतनशक्ति बिल्कुल ही अलग है । आखिर यह शक्ति या तत्व क्या है? भारतीय दर्शन और योगशास्त्र में इसका सप्रमाण गूढ़ - गहन चिन्तन किया गया है तथा मनुष्य को इस तत्व को जानने की एक सर्वथा सटीक वैज्ञानिक दृष्टि दी है । यह तत्व आत्मा ही है, जिसे जानने समझने हेतु योगशास्त्र में यम नियम आसनादि आचार विधि की व्यवस्थित परिकल्पना की गयी है । इन अष्ट योगाङ्गों की सिद्धि से न केवल शारीरिक आधिव्याधियों की शांति होती है, वरन् आत्मा क्या है? उसकी सिद्धि का उपाय क्या है? यह भी योगशास्त्र में भलीप्रकार समझाया गया है ।

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( २ ) योग में नित्य साधनकर्मों का महत्व ( यथा– षट्कर्मों, धौति, अन्तर्द्धाति, वातसार, वारिसार, प्रक्षालन, शोधन आदि कर्मों का ) सर्वाधिक महत्व माना गया । अनेक योगीजन योग साधना में इनका नियमानुसार पालन करके मोक्षमार्ग की अपनी साधना को सरल करते हैं । यहाँ तक कि योगीजन कभी अस्वस्थ नहीं होते । और यदि कभी भौतिक- दैविक- आत्मिक तापो से पीड़ित भी होते हैं, तो प्राकृतिक विधि से ही वे योगक्रियाओं से शरीर और मन को पूर्ण स्वस्थ पाते हैं । आसनों, प्राणायाम, मुद्राओं के पालन से उनकी योग सिद्धि का मुख्य लक्ष्य आत्मा का ज्ञान सुलभ हो जाता है । धारणा, ध्यान और समाधि उसी आत्मा के लक्ष्य मात्र हो जाते हैं । घेरण्ड संहिता की पूर्व भाषा-टीकाओं में अनेक अपेक्षाओं और कमियों को देखते हुए प्रस्तुत प्रकाशन की विगत समय से छात्रों द्वारा अपेक्षा प्रकट की जा रही थी, अतः इस प्रकाशन की उपयोगिता छात्रों के हित में निश्चय सिद्ध होगी, ऐसी हमारी कामना है । छात्रों को पुस्तक की पंक्तियों का अनुवाद सम्यक और सरल रूप से समझ में आ सके, चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान द्वारा इसी निमित्त ही इस ग्रन्थ का प्रकाशन किया जा रहा है । डा. राघवेन्द्र शर्मा राघवः ७-५-२००४

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शोध संस्थान / 4 ब्रह्मवर्चसपुस्तकालयविभाग खन 20८ शान्ति कँज, हरिद्वार विषयानुक्रमणिका प्रथमोपदेशः दण्डधौतिः ११ वमनधौतिः ११ भाषानुवादे मंगलाचरणम् १ वासधौतिः १२घटस्थयोग कथनम् १ वासधौतिफलम् १२सप्तसाधनम् ३ १२षट्कर्माणि ४ मूलशोधनकर्म धौति: ४ बस्तिकर्म १३ जलबस्तिकर्म १३अन्तर्धौति ४ जलबस्तिफलम् १३ वातसारः ४ स्थलबस्तिविधिः १४ वातसारफलम् ५ नेतिकर्मविधिः १४वारिसार ५ नेतिफलम् १४वारिसारफलम् ५ लौलिकीकर्मप्रकरणम् १५ वह्निसारान्तर्धौतिः ६ त्राटककर्मप्रकरणम् १५ बहिष्कृतान्तर्धौतिः ६ ७ त्राटकफलम् १५ प्रक्षालनम् ८ कपालभातिप्रकरणम् १५ बहिष्कृतधौति प्रयोगः वातक्रमकपालभातिः १६ दन्तधौतिः ८ ८ व्युत्मकपालभातिः १६ दन्तमूलधौतिः ८ शीत्क्रमकपालभातिः १६ दन्तमूलधौतिफलम् ९ द्वितीयोपदेशःजिह्वा शोधनम् ९ योगासन प्रकरणम् १८2 जिह्वामूलधौति: कर्णधौतिः १० आसनसंख्या १2९ कपालरन्ध्रधौतिः १० सिद्धासनम् १2९ हृद्धौतिकर्म ११ पद्मासनम् १2९

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(४ ) भ्रदासनम् २० भुजंगासनम् मुक्तासनम् २० योगासनम् वज्रासनम्स्वस्तिकासनम् २०२१ तृतीयोपदेश मुद्राप्रकरम् सिहॉसनम् २१ मुद्राणां फलम् गोमुखासनम् २१२२ मुद्रामहा विधिः वीरासनम् महामुद्राफलम् धनुरासनम् २२ नभोमुद्रा मृतासनम् २२ उड्डीयानबन्धः गुप्तासनम् २२ उड्डीयान बन्धफलम् मत्स्यासनम् २३ पश्मित्तानासनम् जालन्धर बन्धः मत्स्येन्द्रासनम् २३२३ जालन्धर बन्धफलम् गोरक्षासनम् २४ मूलबन्ध विधिः उत्कटासनम् २४ मूलबन्ध फलम् संकटासनम् २४ महाबन्ध विधिः मूयरासनम् २५ महाबन्ध फलम् कुक्कुटासनम् २५ महावेध विधि: कूर्मासनम् २५ महावेध फलम् उत्तानकूर्मासनम् २५ खेचरी मुद्रा उत्तानमण्डूकासनम् २६ खेचरीमुद्रा फलम् वृक्षासनम् २६ विपरीतकरणीमुद्रा मण्डूकासनम् २६ विपरीतकरणीमुद्रा फलम् गरुड़ासनम् २६ योनि मुद्रा वृषासनम् २७ योनिमुद्रा फलम् शलभासनम् २७ वज्रोणी मुद्रा मकरासनम् २७ वज्रोणी मुद्रा फलम् उष्ट्रासनम् २७ शक्तिचालनी मुद्रा

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# ब्रह्मव पुस्तकालय 299/202 विभाग शान्तिकुंज,हरिद्वार शक्तिचालनी मुद्राफलम् ५१ ४२ भुजंगिनी मुद्रा फलम् तड़ागी मुद्रा ५१ ४३ मुद्राणां फलम् माण्डूकी मुद्रा ४३ चतुर्थोपदेश माण्डूकी मुद्रा फलम् ५३ ४३ प्रत्याहारप्रकरणम् शांभवी मुद्रा ४३ पञ्चयोपदेश शांभवी मुद्रा फलम् ४४ प्राणायाम प्रकरणम् ५५ पंचधारणा मुद्रा ५५ ४५ स्थाननिर्णय पार्थिवीधारणमुद्रा ५६ ४५ कालनिर्णयः 3 पार्थिवीधारणा मुद्रा फलम् ५८ ४५ मिताहारः आम्भसीधारणा मुद्रा ५८ ४६ ग्राह्याहारः आभंसीधारणा मुद्रा फलम् ५ ९ ४६ अग्राह्याहारः आग्नेयीधारण मुद्रा ६१ ४६ नाड़ी शुद्धिः आग्नेयीधाराण मुद्रा फलम् ६४ ४७ कुम्भकस्य भेदाः वायवी धारणा मुद्रा ६४ ४७ सहित कुम्भकः वायवी धारणामुद्रा फलम् ६४ ४७ सगर्भः आकाशीधारण मुद्रा ६६ ४८ निगर्भः आकाशी धारणा मुद्राफलम् ६७ ४८ सूर्यभेदकुंभकः अश्विनी मुद्रा ६ ९ ४ ९ उज्जायी कुंभकः अश्विनीमुद्राफलम् ७० ४ ९ शीतली कुंभकः पाशिनी मुद्रा ७० ४ ९ भस्त्रिका कुंभकः पाशिनी मुद्रा फलम् ७१ ४ ९ भ्रामरी कुंभकः काकी मुद्रा ७२ ४९ मूर्च्छा कुंभकः काकी मुद्रा फलम् ७२ ५० केवली कुंभकः मातंगिनी मुद्रा ५० षष्ठोपदेश मातंगिनी मुद्रा फलम् ७६ ५० ध्यानयोगप्रकरणम् भुजंगिनी मुद्रा ७६ ५१ ध्यानस्य भेदाः

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( ६ ) स्थूलध्यानम् ७६ समाधियोगस्यभेदाः प्रकारान्तरेणस्थूलध्यानम् ७७ ध्यानयोगसमाधिः ज्योतिर्ध्यानम् ७९ नादयोगसमाधिः प्रकारान्तरेण ज्योतिर्ध्यानम् ७९ रसानन्दयोगसमाधिः सूक्ष्मध्यानम् ७९ लयसिद्धियोगसमाधिः सप्तमोपदेश भक्तियोगसमाधिः समाधियोग प्रकरणम् ८२ राजयोगसमाधिः समाधियोगविधिः ८२333 समाधियोगमाहात्म्यम्