श्रीगणेशाय नमः।

श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 11–20

श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 11–20

पृष्ठ 11

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शोध संस्थान 2014/202 पुस्तकालय * विभाग शान्ति कुंज, हरिद्वार 11 1: 11 घेरण्डसंहिता ' राघवीय' - भाषानुवादसहिता - * - अथ प्रथमोपदेशः अथ षट्कर्मसाधनप्रकरणम् भाषानुवादे मंगलाचरणम्

योगराजं हि श्रीकृष्णं वन्दे भवभयनाशकम् ।

घेरण्ड योगशास्त्रेदं योगसाधन साधकम् ॥

घेरण्डसंहिता भाष्यं ‘ राघवीयं ' करोम्यहम् ।

सम्यगर्थ हि ज्ञानाय योगीनां हितसाधकम् ॥

घटस्थयोगकथनम्

एकदा चण्डकापालिर्गत्वा घेरण्डकुट्टिरम् ।

प्रणम्य विनयाद् भक्त्या घेरण्डं परिपृच्छति ॥ १॥

अनुवाद — एक बार चण्डकापालि नाम के एक योगी घेरण्ड नामक एक दूसरे योगीराज की कुटी में जाकर विनय से भक्ति सहित प्रणाम करके घरेण्ड ऋषि से पूछने लगे ॥ १ ॥

श्रीचण्डकापालिरुवाच

घटस्थयोगं योगेश तत्त्वज्ञानस्य कारणम् ।

इदानीं श्रोतुमिच्छामि योगीश्वर वद प्रभो ॥ २ ॥

वे बोले— हे योगेश्वर! जो तत्त्व ज्ञान का कारण है तथा शरीर में

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२ घेरण्डसंहिता स्थित योग है, उसे मैं इस समय सुनना चाहता हूँ । हे स्वामिन्! हे योगेश्वर! यह मुझे ( कृपा करके ) बताइए ॥ २ ॥

घेरण्ड उवाच

साधु साधु महाबाहो यन्मान्त्वं परिपृच्छसि ।

कथयामि हि ते वत्स सावधानाऽवधारय ॥ ३ ॥

तब घेरण्ड ऋषि ने कहा-हे विशालबाहो! बहुत अच्छा, तुम्हे बहुत साधुवाद है— धन्यवाद है । तुम जो पूछ रहे हो, उसे मैं तुमसे कहता हूँ, उसे सावधान होकर सुनो ॥ ३ ॥

नास्ति मायासमः पाशो नास्ति योगात्परं बलम् ।

नास्ति ज्ञानात्परो बन्धुर्नाहङ्कारात्परो रिपुः ॥। ४ ॥

माया के समान ( इस संसार में ) कोई पाश नही है, तथा योग से श्रेष्ठ ( दूसरा) कोई बल नही है, ज्ञान से श्रेष्ठ अन्य कोई बन्धु नही है और अहंकार से बड़ा कोई शत्रु नही हैं ॥ ४ ॥

अभ्यासात्कादिवर्णानि यथा शास्त्राणि बोधयेत् ।

तथा योगं समासाद्य तत्त्वज्ञानञ्च लभ्यते ॥ ५ ॥

जिस प्रकार संसार में क आदि वर्ण या अक्षरों को और अनेक प्रकार के शास्त्रों को जाना जाता है, उसी प्रकार योग को ग्रहण करके तत्त्वज्ञान को प्राप्त किया जाता है ॥ ५ ॥

सुकृतैर्दुष्कृतैः कार्यैर्जायते प्राणिनां घटः ।

घटादुत्पद्यते कर्म घटियन्त्रं यथा भ्रमेत् ॥ ६ ॥

श्रेष्ठ और निम्न कर्मों से प्राणियों का घटरूपी यह शरीर उत्पन्न होता है तथा शरीर रूपी घट से कर्म उत्पन्न होता है, जिस प्रकार कि घटीयंत्र घूमा करता है ॥ ६ ॥

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प्रथमोपदेशः ३

ऊर्ध्वाधो भ्रमते यद्वद् घटियन्त्रं गवां वशात् ।

तद्वत्कर्मवशाज्जीवो भ्रमते जन्ममृत्युभिः ॥ ७ ॥

जिस प्रकार घटीयन्त्र गवों ( चक्रों ) के वश से नित्य ऊपर और नीचे घूमता है, उसी प्रकार कर्म के वश से पुनः - पुनः जन्म और मृत्यु के साथ यह जीव भी घूमा करता है ॥ ७ ॥

आमकुम्भमिवाम्भस्थो जीर्यमाणः सदा घटः ।

योगानलेन सन्दह्य घटशुद्धिं समाचरेत् ॥। ८ ॥

यह शरीर रूपी घट कच्चे घड़े में जल भरने के समान सर्वदा गल जाने वाला है । किन्तु योगरूप अग्नि से अच्छी प्रकार तपाकर इस घटरूप शरीर की शुद्धि को सम्पन्न करना चाहिये ॥ ८ ॥

अथ सप्तसाधनम्

शोधनं दृढता चैव स्थैर्यं धैर्यञ्च लाघवम् ।

प्रत्यक्षञ्च निर्लिप्तञ्च घटस्य सप्तसाधनम् ॥ ९ ॥

इसके पश्चात् योग के सात प्रकार के साधन बताते हुए घेरण्ड ऋषि बोले ) शोधन, दृढ़ता, स्थिरता, धैर्य, हल्कापन, प्रत्यक्षीकरण तथा निर्लिप्तता ये योग के शरीर रूपी घट में स्थित सात साधन हैं ॥ ९ ॥

अथ सप्तसाधनलक्षणम्

षट्कर्मणा शोधनञ्च आसनेन भवेद्दृढम् ।

मुद्रया स्थिरता चैव प्रत्याहारेण धीरता ॥ १० ॥

( सातों योग साधनों की व्याख्या करते हुए घेरण्ड ऋषि बोले ) प्रथम योग साधन – शोधन छह कार्यों से, योग में दृढ़ता आसनों से, स्थिरता विविध मुद्राओं से और धीरता का भाव प्रत्याहार से होता है ॥ १० ॥

प्राणायामाल्लाघवञ्च ध्यानात्प्रत्यक्षमात्मनि ।

समाधिना च निर्लिप्तं मुक्तिरेवं न संशयः ॥। ११ ॥

पृष्ठ 14

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घेरण्डसंहिता लाघवता ( हल्कापन की स्थिति) प्राणायाम से, तथा ध्यान से स्वयं की आत्मा में प्रत्यक्षीकरण, समाधि से निलिप्तता, और इस प्रकार मुक्ति हो जाती है, इसमें किसी प्रकार का संशय नहीं है ॥ ११ ॥

षट्कर्माणि

धौतिर्वस्तिस्तथा नेतिलौलिकी त्राटकं तथा ।

कपालभातिश्चैतानि षट्कर्माणि समाचरेत् ॥ १२ ॥

( योगियों को अतः ) धौति, बस्ति, नेति, लौलिकी ( नौली ), त्राटक और कपालभाति इन छह कर्मों का आचरण करना चाहिये ॥ १२ ॥

अथ धौतिः अन्तर्धौतिर्दन्तधौतिर्हृद्धौतिर्मूलशोधनम् धौतिं चतुर्विधां कृत्वा घटं कुर्वन्तु निर्मलम् ॥ १३ ॥

( धौति के प्रकार बताते हैं— ) प्रथम—— अन्तर्धौति, द्वितीय— दन्तधौति, तृतीय हृद् धौति और चतुर्थ- मूलशोधन इन चार प्रकारीय धौतियों को करके ( योगीजन ) घट ( शरीर ) को निर्मल - स्वच्छ करें ॥ १३ ॥

अन्तर्धौतिः

वातसारं वारिसारं वह्निसारं बहिष्कृतम् ।

घटस्य निर्मलार्थाय अन्तर्धौतिश्चतुर्विधा ॥ १४ ॥

( अन्तर्धौति क्या हैं? ) प्रथम- वातसार, द्वितीय — वारिसार ( जल का निकालना ), तृतीय— अग्निसार और चतुर्थ- बहिष्कृत, इस प्रकार घट ( शरीर ) को निर्मल करने की चार प्रकारीय अतंर्धीति हैं ॥ १४ ॥

वातसारः

काकचञ्चूवदास्येन पिबेद् वायुं शनैः शनैः ।

चालयेदुदरं पश्चाद् वर्त्मना रेचयेच्छनैः ॥ १५ ॥

पृष्ठ 15

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प्रथमोपदेशः ५ ( अब अंतर्धौति का वातसार प्रकार क्या है, यह बताते हैं — ) ( इसके लिये पहले ) काकचंचु ( कौवे की चौंच ) के समान मुख से ( मुख को बनाकर ) वायु को शनैः - शनैः पीना चाहिये । पुनः उदर को चलाना चाहिये और मुख से वायु को शनैः - शनैः निकालना चाहिये ॥ १५ ॥

वातसारफलम् वातसारंसर्वरोगक्षयकरंपरं गोप्यं देहनिर्मलकारणम्देहानलविवर्द्धकम्॥। १६ । ( वातसार का क्या फल है - यह बताते हैं ) वातसार क्रिया ( योगियों को लाभदायी होने के कारण ) अतीव गोपनीय है । यह शरीर को निर्मल करने का कारण है । यह सब रोगों को विनष्ट करने वाली तथा देहाग्नि ( जठराग्नि ) को बढ़ाने वाली है ॥ १६ ॥

वारिसारः

आकण्ठं पूरयेद्वारि वक्त्रेण पिबेच्छनैः ।

चालयेदुदरेणैव चोदराद्रेचयेदधः ॥ १७ ॥

( पुन: वारिसार क्या है— यह बताते हैं ) जल को धीरे - धीरे कण्ठ तक पीना चाहिये, पुनः उसे उदर में डुलायें या चलायें और पुनः उस पानी का रेचन अधोमार्ग से कर देना चाहिये या ( शौच स्थान या मलद्वार से ) निकाल देना चाहिये ॥ १७ ॥

वारिसारफलम्

वारिसारं परं गोप्यं देहनिर्मलकारकम् ।

साधयेत्तत्प्रयत्नेन देवदेहं प्रपद्यते ॥ १८ ॥

( वारिसार का क्या फल है, यह बताते हैं - ) यह वारिसार ( नामक अतंर्धीति क्रिया योगियों का विषय होने से) अतीव गोपनीय है । यह देह को

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६ घेरण्डसंहिता निर्मल करने वाली है । अत: इसे प्रयत्नपूर्वक साधना चाहिये । जिससे साक्षात देवताओं के समान देह प्राप्त हो जाती है ॥ १८ ॥

नाभिग्रन्थि मेरुपृष्ठे शतवारञ्च कारयेत् ।

अग्निसारमेषा धौतिर्योगिनां योगसिद्धिदा ॥ १ ९ ॥

( पुनः अग्निसार अतंर्धीति का अर्थ करते हैं - ) नाभि ग्रन्थी ( नाभिगाँठ ) को सौ बार मेरुदण्ड ( रीढ़ ) से लगाये ( अर्थात् पेट को अन्दर खींचना चाहिये । यह क्रिया योगिओं को सिद्धि देने वाली अग्निसार धौति कही जाती है ॥ १ ९ ॥ वह्निसारान्तर्धौतिः उदरामयजं त्यक्त्वा जठराग्निं विवर्धयेत् ।

एषा धौतिः परा गोप्या देवानामपि दुर्लभा ।

केवलं धौतिमात्रेण देवदेहो भवेद् ध्रुवम् ॥ २० ॥

( यह अग्निसार धौति) उदर रोगों को दूर करने वाली तथा जठराग्नि को बढाने वाली है । यह क्रिया भी ( सबके द्वारा सम्भव न होने से ) देवों को भी दुर्लभ है, अतीव गोपनीय है इसी धति के नियम मात्र से शरीर देवताओं के समान ( सुन्दर हो जाता है ) ॥। २० ॥ बहिष्कृतान्तर्धौतिः काकीमुद्रां साधयित्वा पूरयेदुदरं मरुत् ॥ २१ ॥

काकमुद्रा को शोधकर उदर में वायु का पान करे अर्थात् कौवे जैसा मुख करके वायु को धीरे- धीरे खींचे ॥ २१ ॥

धारयेदर्द्धयामन्तु चालयेदर्धवर्त्मना ।

एषा धौतिः परागोप्या न प्रकाश्या कदाचन ॥ २२ ॥

पृष्ठ 17

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प्रथमोपदेशः ७ पुन: अर्धयाम ( आधे प्रहर) पर्यन्त अर्थात् डेढ़ घन्टे तक उसे उदर में धारण करे और अधोमार्ग ( मलद्वार ) से बाहर निकाले । यह धौति क्रिया भी ( सार्वजनिक न होने से) गोपनीय ही है. ( अर्थात् योगियों द्वारा की जानी ही संभव है ) ॥ २२ ॥

(विशिष्ट समीक्षा — यहाँ प्रायः योगक्रियाओं को परं गोपनीया तथा देवों को भी दुर्लभ बताया है । इसका अभिप्राय यही है कि सामान्य जन न तो इन क्रियाओं को करते और न जानते ही हैं । जो बिरले योगीजन हैं, मात्र वे ही इन्हें करते और जानते हैं ( और इस प्रकार ) वे ही मात्र देवदुर्लभ शरीर को प्राप्त करते हैं । ) प्रक्षालनम्

नाभिमग्नो जले स्थित्वा शक्तिनाडीं विसर्जयेत् ।

कराभ्यां क्षालयेन्नाडीं यावन्मलविसर्जनम् ॥ २३ ॥

(प्रक्षालन क्रिया का अर्थ करते हैं- ) नाभिमग्न जल में स्थित होकर शक्ति नाड़ी का विसर्जन करना चाहिये । ( अर्थात पेट को फुलाये रखना चाहिये तथा ) दोनों हाथों से त्रिवलि स्थान को धोना चाहिये, जब तक कि मल का विसर्जन न हो जाये ॥ २३ ॥

तावत्प्रक्षाल्य नाडीञ्च उदरे वेशयेत् पुनः ।

इदं प्रक्षालनं गोप्यं देवानामपि दुर्लभम् ।

केवलं धौतिमात्रेण देवदेहो भवेद् ध्रुवम् ॥ २४ ॥

तब तक नाड़ी का प्रक्षालन करके पुन: उदर में (त्रिवलि को ) बिठा दे ( अर्थात् फुलाये हुए पेट को अन्दर कर ले ) यह प्रक्षालन की विधि गोपनीय होने से देवों को भी दुर्लभ है (इस प्रकार इस ) धौतिमात्र से ही मनुष्यों का शरीर देवदेह के समान ( तेजस्वी ) हो जाता है ॥ २४ ॥

पृष्ठ 18

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I घेरण्डसंहिता बहिष्कृतधौतिप्रयोगः

यामार्द्ध धारणा शक्ति यावन्न साधयेन्नरः ।

बहिष्कृतमहद्धौतिस्तावच्चैव न जायते ॥ २५ ॥

जब तक अर्द्धप्रहर तक धारणशक्ति को व्यक्ति धारण न कर सके, तब तक महाधौति को न करे, अन्यथा उससे कुछ भी नहीं होता है ॥ २५ ॥

दन्तधौतिः

दन्तमूलं जिह्वामूलं रन्ध्रञ्च कर्णयुग्मयोः ।

कपालरन्ध्रं पञ्चैते दन्तधौतिं विधीयते ॥ २६ ॥

( अब दन्तधौति के प्रकार बताते हैं - ) दन्तमूल ( दाँतों की जड़ ), जिह्वामूल (जिह्वा के मूलस्थान ), दोनों कानों के रंध्र ( छिद्र ), और कपालरंध्र, ये दन्तधौति कहलाते हैं ॥ २६ ॥

दन्तमूलधौतिः

खादिरेण रसेनाथ मृत्तिकया च शुद्धया ।

मार्जयेद्दन्तमूलञ्च यावत्किल्बिषमाहरेत् ॥ २७ ॥

खदिर वृक्ष ( खैर ) के रस से और सूखी ( शुद्ध ) मिट्टी ( पीली ) से तब तक दन्तमूल का मार्जन करे, जब तक कि सब किल्बिष ( मल ) दूर न हो जाये ॥ २७ ॥

दन्तमूलधौतिफलम् दन्तमूलं परा धौतिर्योगीनां योगसाधने ।

नित्यं कुर्यात्प्रभाते च दन्तरक्षां च योगवित् ।

दन्तमूलं धारणादिकार्येषु योगिनां मतम् ॥ २८ ॥

( यह ) दन्तमूल धौति योगियों के योगसाधन में सर्वाधिक श्रेष्ठ है ।

पृष्ठ 19

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: प्रथमोपदेश ९ योगवित्- योगज्ञानी जन को नित्यप्रति प्रभात समय में इसे करना चाहिये । योगियों के धारणीय कार्यों ( नियमों ) में यह दन्तमूल ( धौतिक्रिया मुख्य ) मानी गयी है ॥ २८ ॥

जिह्वाशोधनम् जरामरणरोगादीन्अथातः सम्प्रवक्ष्यामिनाशयेद्दीर्घलम्बिकाजिह्वाशोधनकारणम् ।॥ २ ९ ॥ ( पुन: जिह्वाशोधन क्या है, यह बताते हैं - ) इसके पश्चात् मैं जिह्वाशोधन का कारण बताता हूँ । यह क्रिया वृद्धावस्था और रोगादियों को नष्ट करती है, तथा जिह्वा इससे लम्बी होती है ॥ २ ९ ॥ जिह्वामूलधौतिः तर्जनीमध्यमान्तानां अङ्गलित्रययोगतः ।

वेशयेद् गलमध्ये तु मार्जयेल्लम्बिकाजडम् ।

शनैः शनैर्मार्जयित्वा कफदोषं निवारयेत् ॥ ३० ॥

तर्जनी, मध्यमा और अनामिका इन तीनों अंगुलियों के योग से गले के मध्य -जिह्वा के मूल को घिसना चाहिये । शनैः - शनै: (इस प्रकार ) मार्जन करके कफदोष का निवारण करना चाहिये ॥ ३० ॥

मार्जयेन्नवनीतेन दोहयेच्च पुनः पुनः ।

तदग्रं लौहयन्त्रेण कर्षयित्वा शनैः शनैः ॥ ३१ ॥

पुनः मक्खन से (जिह्वा का ) मार्जन करना चाहिये और पुनः -पुनः दोहन करना चाहिये । उसके (जिह्वा के ) अग्रभाग को लौहयंत्र (चिमटा ) से धीरे - धीरे खींचकर ( यह अभ्यास करना चाहिये ) ॥ ३१ ॥

नित्यं कुर्यात्प्रयत्नेन वेरुदयकेऽस्तके । एवं कृते च नित्यं सा लम्बिका दीर्घतां व्रजेत् ॥ ३२ ॥

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१० घेरण्डसंहिता प्रयत्नपूर्वक सूर्योदय और सूर्यास्त के समय नित्यप्रति ( यह धौति क्रिया ) करनी चाहिये । और इस प्रकार नित्य किये जाने पर जिह्वा लम्बी हो जाती है ॥ ३२ ॥

कर्णधौतिः

तर्जन्यनामिकायोगान्मार्जयेत् कर्णरन्ध्रयोः ।

नित्यमभ्यासयोगेन नादान्तरं प्रकाशयेत् ॥ ३३ ॥

कर्णधौति क्या है, बताते हैं— ) तर्जनी तथा अनामिका दो अङ्गुलियों

के योग से दोनों कानों के छिद्रों को नित्य ही मार्जन ( स्वच्छ ) करना चाहिये ।

इसके नियमित अभ्यास करने से एक विशिष्ट नाद प्रकट हुआ करता है ॥ ३३ ॥

कपालरन्ध्रधौतिः

बद्धाङ्गुष्ठेन दक्षेण मार्जयेद्भालरन्ध्रकम् ।

निद्रान्ते भोजनान्ते न दिवान्ते च दिने दिने ॥ ३४ ॥

नाडी निर्मलतां याति दिव्यदृष्टिः प्रजायते ।

एवमभ्यासयोगेन कफदोषं निवारयेत् ॥ ३५ ॥

( कपालरंध्र का शोधन कैसे करें, यह बताते हैं ) प्रतिदिन निद्रा के अन्त में ( अर्थात् प्रात: काल उठने के पश्चात ), भोजन करने के बाद तथा दिनान्त ( सोने से पूर्व ) दाहिने हाथ के अंगुष्ठ से भालरंध्र (सिर में स्थित कपाल स्थान ) को मार्जन ( स्वच्छ) करना चाहिये । इस अभ्यास को करने से कफ दोष निवारण होता है । नाड़ी निर्मलता को प्राप्त हो जाती है तथा दिव्य दृष्टि ( स्वच्छदृष्टि ) हो जाती है ॥ ३४-३५ ॥ [ विशेष — यह क्रिया करने से निद्रा अच्छी आती है, वायुविकार कफ विकार शांत होता है । ]