श्रीगणेशाय नमः।
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 91–100
श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 91–100
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अथ सप्तमोपदेशः अथ समाधियोगप्रकरणम् समाधियोगविधिः
समाधिश्च परो योगो बहुभाग्येन लभ्यते ।
गुरोः कृपाप्रसादेन प्राप्यते गुरुभक्तितः ॥ १ ॥
समाधि का श्रेष्ठयोग बहुत भाग्य से प्राप्त होता है । गुरु कृपा प्रसाद से और गुरुभक्ति:से यह प्राप्त होता है ॥ १ ॥ विद्याप्रतीति स्वगुरुप्रतीतिरात्मप्रतीतिर्मनसः प्रबोधः ।
दिने दिने यस्य भवेत् स योगी सुशोभनाभ्यासमुपैति सद्यः ॥ २ ॥
जिसे विद्या में प्रतीति हो, स्वगुरु में प्रतीति हो, आत्मा में भी प्रतीति हो और मन का प्रबोध हो और दिन- दिन जिसे यह होता है, वही सुन्दर अभ्यास को प्राप्त होता है ॥ २ ॥
घटाद्भिन्नं मनः कृत्वा ऐक्यं कुर्यात् परात्मनि ।
समाधिं तं विजानीयान्मुक्तसंज्ञो दशादिभिः ॥ ३ ॥
शरीर से भिन्न मन को करके परमात्मा में एकाकार करके समाधि को जानना चाहिये । (इस प्रकार) दशादि अवस्थाओं से मुक्त होता है ॥ ३ ॥
अहं ब्रह्म न चान्योऽस्मि ब्रह्मैवाहं न शोकभाक् ।
सच्चिदानन्दरूपोऽहं नित्यमुक्तः स्वभाववान् ॥ ४ ॥
मैं ही ब्रह्म हूँ, अन्य कुछ नहीं हूँ । मैं ब्रह्म हूँ, न कि शोकादि का भागी हूँ । मैं नित्यमुक्त स्वभाववाला सच्चिदानन्द स्वरूपात्मा हॅू ॥ ४ ॥
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८२ घेरण्डसंहिता समाधियोगस्य भेदाः
शाम्भव्या चैव खेचर्या भ्रामर्या योनिमुद्रया ।
ध्यानं नादं रसानन्दं लयसिद्धिश्चुतुर्विधा ॥ ५ ॥
( समाधि के भेद कहते हैं— ) शांभवी, खेचरी, भ्रामरी और योनि, ये चार मुद्रायें हैं, जो ध्यान, नाद, रसानन्द, और लयसिद्धि में (क्रमश: धारण करनी चाहिये ) ॥ ५ ॥
पञ्चधा भक्तियोगेन मनोमूर्च्छा च षड्विधा ।
षड्विधोऽयं राजयोगः प्रत्येकमवधारयेत् ॥ ६ ॥
भक्तियोग पाँच प्रकार का है । तथा मनोमूर्च्छा छह प्रकार की है, जो राजयोग कही जाती है । इसमें भी प्रत्येक का धारण करना चाहिये ॥ ६ ॥
ध्यानयोगसमाधिः
शाम्भवीं मुद्रिकां कृत्वा आत्मप्रत्यक्षमानयेत् ।
बिन्दुब्रह्ममयं दृष्ट्वा मनस्तत्र नियोजयेत् ॥ ७ ॥
( ध्यान योग समाधि बताते हैं - ) शांभवी मुद्रा को करके आत्मा का प्रत्यक्ष करना चाहिये । बिन्दुब्रह्म को एकबार देखकर वहाँ मन को नियोजित करे ॥ ७ ॥
खमध्ये कुरु चात्मानं आत्ममध्ये च खं कुरु ।
आत्मानं खमयं दृष्ट्वा न किञ्चिदपि बाधते ।
सदानन्दमयो भूत्वा समाधिस्थो भवेन्नरः ॥ ८ ॥
आत्मा को आकाशस्थ (ब्रह्मरंध्र के अन्दर ) करे और आत्मा के मध्य में आकाश को धारण करे । आत्मा को आकाशरूप करके किसी से भी बँधता नहीं है । सदा आन्नदमय होकर मनुष्य समाधिस्थ हो जाता है ॥ ८ ॥
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षष्ठोपदेशः ८३ नादयोगसमाधिः
साधनात् खेचरीमुद्रा रसनोर्ध्वंगता यदा ।
तदा समाधिसिद्धिः स्याद्धित्वा साधारणक्रियाम् ॥ ९ ॥
( नादयोग समाधि की विधि कहते हैं- ) खेचरी मुद्रा के साधन से जिह्वा को ऊपर ले जाये । साधारण क्रियायें समाप्त होकर समाधि की सिद्धि हो जाती है ॥ ९ ॥
रसानन्दयोगसमाधिः
अनिलं मन्दवेगेन भ्रामरीकुम्भकं चरेत् ।
मन्दं मन्दं रेचयेद्वायुं भृङ्गनादं ततो भवेत् ॥ १० 11
( रसानंद समाधिविधि कहते हैं - ) वायु को मन्द गति से लेकर भ्रामरी कुम्भक करे । वायु मंदगति से विचरे, तब भ्रमर जैसा नाद होता है ॥ १० ॥
अन्तःस्थं भ्रामरीनादं श्रुत्वा तत्र मनो नयेत् ।
समाधिर्जायते तत्र आनन्दः सोऽहमित्यतः ॥ ११ ॥
तब अंतस्थ भ्रामरी नाद को सुनकर वहाँ मन को लगाये, इससे समाधि लग जाती है और वहाँ आनन्द 'वही मैं हूँ' इस प्रकार से होता है ॥ ११ ॥
लयसिद्धियोगसमाधिः
योनिमुद्रां समासाद्य स्वयं शक्तिमयो भवेत् ।
सुशृङ्गाररसेनैव विहरेत् परमात्मनि ॥ १२ ॥
(लयसिद्धि समाधिविधि कहते हैं - ) योनिमुद्रा को करके स्वयं को शक्तिमान बनाये । शृंगाररूप रस से परमात्मा में विहार करे ॥ १२ ॥
आनन्दमयः सम्भूत्वा ऐक्यं ब्रह्मणि सम्भवेत् ।
अहं ब्रह्मेति चाद्वैतं समाधिस्तेन जायते ॥ १३ ॥
आन्नदमय होकर ब्रह्म में ऐक्यभाव हो जाये । मैं ब्रह्म हूँ' इस प्रकार की अद्वैत समाधि हो जाती है ॥ १३ ॥
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८४ घेरण्डसंहिता भक्तियोगसमाधिः
स्वकीयहृदये ध्यायेदिष्टदेवस्वरूपकम् ।
चिन्तयेद् भक्तियोगेन परमाह्लादपूर्वकम् ॥ १४ ॥
( भक्तियोग समाधिविधि बताते हैं- ) अपने हृदय में इष्टदेव के
स्वरूप का ध्यान करे । भक्तिपूर्वक परंआह्लाद का चिन्तन करे ॥ १४ ॥
आनन्दाश्रुपुलकेन दशाभावः प्रजायते ।
समाधिः सम्भवेत्तेन सम्भवेच्च मनोन्मनी ॥ १५ ॥
( भक्तियोग में ) आनन्द के अश्रुओं से हृदय पुलकित हो जाता है तथा भावपूर्ण दशा हो जाती है । उसी से समाधि होती है, तथा मन उन्मन हो जाता है ॥ १५ । राजयोगसमाधिः
मनोमूर्च्छा समासाद्य मन आत्मनि योजयेत् ।
परमात्मन: समायोगात् समाधिं समवाप्नुयात् ॥ १६ ॥
मनोमूर्च्छा को करके मन को आत्मा में लगाये, तब परमात्मा के योग से समाधि को प्राप्त करना चाहिये ॥ १६ ॥
समाधियोगमाहात्म्यम् इति ते कथितश्चण्ड! समाधिर्मुक्तिलक्षणम् ।
राजयोगसमाधिः स्यादेकात्मन्येव साधनम् ।
उन्मनी सहजावस्था सर्वे चैकात्मवाचकाः ॥ १७ ॥
हे चण्ड! इस प्रकार मुक्ति का लक्षण समाधि योग मेरे द्वारा कहा गया । राजयोग समाधि, उन्मनी, सहजावस्था और एकात्मवाचक योग आत्मैक्य होकर ही करना चाहिये ॥ १७ ॥
जले विष्णुः स्थले विष्णुर्विष्णुः पर्वतमस्तके ।
ज्वालामालाकुले विष्णुः सर्वं विष्णुमयं जगत् ॥ १८ ॥
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षष्ठोपदेशः ८५ जल में विष्णु हैं, स्थल में विष्णु हैं, और पर्वत के मस्तक पर विष्णु हैं, अग्नि ज्वालाओं में विष्णु है और सब विष्णुमय ही है ॥ १८ ॥
भूचरा: खेचराश्चामी यावन्तो जीवजन्तवः ।
वृक्षगुल्मलतावल्लीतृणाद्या वारि पर्वताः ।
सर्वं ब्रह्म विजानीयात् सर्वं पश्यति चात्मनि ॥ १ ९ ॥
भूचर, खेचर और जितने भी जीव जन्तु हैं, वृक्ष, गुल्म, बेल, लता, तृणादि जल और पर्वत सबको ब्रह्म जाने और आत्मा में ही देखे ॥ १ ९ ॥
आत्मा घटस्थचैतन्यमद्वैतं शाश्वतं परम् ।
घटादिभिन्नतो ज्ञात्वा वीतरागं विवासनम् ॥ २० ॥
घटस्थ ( शरीरस्थ ) आत्मा चैतन्य है, अद्वैत है, शाश्वत है और पर है । इस शरीर से अलग मानने से मनुष्य वीतराग और वासनारहित हो जाता है ॥ २० ॥
एवं विधिः समाधिः स्यात् सर्वसङ्कल्पवर्जितः ।
स्वदेहे पुत्रदारादिबान्धवेषु धनादिषु ॥
सर्वेषु निर्ममो भूत्वा समाधिं समवाप्नुयात् ॥ २१ ॥
इस प्रकार सब संकल्पों से वर्जित समाधिविधि होती है । देह, पुत्र, स्त्री, आदि बान्धवों में, धनों में सबमें ममतारहित होकर समाधि को जानना ( पाना ) चाहिये ॥ २१ ॥
तत्त्वं लयामृतं गोप्यं शिवोक्तं विविधानि च ।
तेषां संक्षेपमादाय कथितं मुक्तिलक्षणम् ॥ २२ ॥
यह गोपनीय तत्व ( लयामृत रूप) शिव द्वारा विधिपूर्वक बहुत प्रकार से कहा गया है । उसे संक्षेप में लेकर मुक्तिरूप लक्षण कहा गया है ॥ २२ ॥
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८६ घेरण्डसंहिता
इति ते कथितश्चण्ड! समाधिर्दुर्लभः परः ।
यं ज्ञात्वा न पुनर्जन्म जायते भूमिमण्डले ॥ २३ ॥
इस प्रकार हे चण्ड! यह परं दुर्लभ समाधि का विषय बताया ग् जिसे जानकर भूमि पर पुनर्जन्म नहीं होता है ॥ २३ ॥
॥ इति श्रीघेरण्डसंहितायां राघवीयेभाष्ये समाधियोगो नाम सप्तमोपदेशः ॥
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