श्रीगणेशाय नमः।

श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) — पृष्ठ 81–90

श्रीघेरण्ड संहिता (योगशास्त्रम्) · चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान · पृष्ठ 81–90

पृष्ठ 81

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पञ्चमोपदेशः ७१ भ्रामरीकुम्भकः

अर्धरात्रे गते योगी जन्तूनां शब्दवर्जिते ।

कर्णौपिधाय हस्ताभ्यां कुर्यात् पूरककुम्भकम् ॥ ७७ ॥

( भ्रामरी कुंभक विधि बताते हैं - ) आधी रात्रि होने पर योगी प्राणियों के शब्दों के पूर्ण शान्त होने पर हाथों से कान बन्दकर पूरक और कुंभक करे ॥ ७७ ॥

शृणुयाद्दक्षिणे कर्णे नादमन्तर्गतं शुभम् ।

प्रथमं झिञ्झीनादं च वंशीनादं ततः परम् ॥ ७८ ॥

तब दायें कान से आंतरिक नाद को सुने । प्रथम तो झींगुरों का सा नाद और उसके परे वंशीनाद ( सुनायी देगा ) ॥ ७८ ॥

तुरीभेरीमृदङ्गादिनिनादानकदुन्दुभिःमेघझर्झर भ्रमरी घण्टाकांस्यं ततः परम् ॥। ७ ९ ॥ उसके बाद मेघनाद, फिर झर्झर (झांझ ) का नाद, फिर भ्रमरी नाद, फिर घंटा और काँसे के पात्र का नाद, पुनः तुरइनाद, भेरी- मृदंग और नगाड़ों का नाद सुनायी देगा ॥ ७ ९ ॥

एवं नानाविधो नादो जायते नित्यमभ्यसात् ।

अनाहतस्य शब्दस्य तस्य शब्दस्य यो ध्वनिः ॥ ८० ॥

इस प्रकार अनेक प्रकार का नाद नित्य अभ्यास से सुनाई देता है। यह नाद अनाहत रूप से सुनायी देता है और उस शब्द की अद्भुत ध्वनि होती है ॥ ८० ॥

ध्वनेरन्तर्गतं ज्योति ज्योतिरन्तर्गतं मनः ।

तन्मनो विलयं याति तद्विष्णोः परमं पदम् ।

एवं च भ्रामरीसिद्धिः समाधिसिद्धिमाप्नुयात् ॥ ८१ ॥

पृष्ठ 82

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७२ घेरण्डसंहिता उसी ध्वनि के अन्तर्गत ज्योति है और उसी ज्योति के अन्तर्गत मन है । वह मन उस परमपद विष्णु में मिल जाये तो यही भ्रामरी सिद्धि समाधि सिद्धि को प्राप्त हो जाती है ॥ ८१ ॥

जपादष्टगुणं ध्यानं ध्यानादष्टगुणं तपः ।

तपसोऽष्टगुणं गानं गानात्परतरं नहि ॥ ८२ ॥

जप से आठ गुना ध्यान, ध्यान से आठगुना तप, तप से आठगुना गान और गान से गुना ( अधिक ) अन्य कोई नही है ॥ ८२ ॥

मूर्च्छाकुम्भकः सुखेन कुम्भकं कृत्वा मनश्च भ्रुवोरन्तरम् ।

सन्त्यज्य विषयान् सर्वान् मनोमूर्च्छा सुखप्रदा ।

आत्मनि मनसो योगादानन्दो जायते ध्रुवम् ॥। ८३ ॥

( मूर्छा कुम्भक विधि बताते हैं— ) सुख से कुम्भक करके और मन को भ्रुवों के बीच में सब विषयों से हटाकर मन की मूर्छा को ही मूर्च्छा कहा है । इस मन के आत्मा में योग से निश्चय आनन्द होता है ॥ ८३ ॥

केवलीकुम्भकः हङ्कारेण बहिर्याति सकारेण विशेत् पुनः ।

षट्शतानि दिवारात्रौ सहस्राण्येकविंशतिः ।

अजपां नाम गायत्रीं जीवो जपति सर्वदा ॥ ८४ ॥

( केवली कुम्भक की विधि- ) 'हं' बीज से वायु बाहर जाती है, ' स' कार से वायु प्रवेश करती है । इक्कीस हजार छः सौ दिन रात्रि में सर्वदा जीव अजपा गायत्री को जपता है ॥ ८४ ॥

मूलाधारे यथा हंसस्तथा हि हृदि पङ्कजे ।

तथा नासापुटद्वन्द्वे त्रिभिर्हंससमागमः ॥ ८५ ॥

पृष्ठ 83

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पञ्चमोपदेशः ७३ मूलाधार में, हृदय कमल में और नासिका छिद्रों की दोनों नाड़ियों में ' हं' बीज के जप का आवागमन होता है ॥ ८५ ॥

षण्णवत्यङ्गुलीमानं शरीरं कर्मरूपकम् ।

देहाद्बहिर्गतो वायुः स्वभावाद् द्वादशाङ्गुलिः ॥ ८६ ॥

छह अंगुलि के बराबर शारीरिक कर्म में वायु का स्वभाव होता है, देह से बाहर निकलने पर बारह अंगुलि होता है ॥ ८६ ॥

गायने षोडशाङ्गुल्यो भोजने विंशतिस्तथा ।

चतुर्विंशाङ्गुलिः पस्थे निद्रायां त्रिंशदङ्गुलिः ।

मैथुने षट्त्रिंशद् व्यायामे च ततोधिकम् ॥ ८७ ॥

गायन में १६ अंगुलि, भोजन में २० अंगुलि, मार्ग में चलने में २४ अंगुलि, नींद में ३० अंगुलि, रति में ३६ अंगुलि और परिश्रम में और अधिक होता है ॥ ८७ ॥

स्वभावेऽस्य गतेर्न्यूने परमायुः प्रवर्धते ।

आयुः क्षयोऽधिके प्रोक्तो मारुते चान्तराद्गते ॥ ८८ ॥

स्वाभाविक रूप में इसकी गति कम होती है तो आयु बढ़ती है ।

यदि अन्तर्गत वायु अधिक चलती है, तो आयु का क्षय होता है ॥ ८८ ॥

तस्मात् प्राणे स्थिते देहे मरणं नैव जायते ।

वायुना घट सम्बन्धे भवेत् केवलकुम्भकम् ॥ ८ ९ ॥

इसलिये प्राण में स्थित देह में मरण नहीं होता है, वायु से शरीर सम्बध में केवल कुम्भक होता है ॥ ८ ९ ॥

यावज्जीवो जपेन्मन्त्रमजपासङ्ख्यकेवलम् ।

अद्यावधि धृतं सङ्ख्याविभ्रमं केवलीकृते ॥ ९ ० ॥

जब तक जीये, तक तक केवल अजपा को संख्यावत जपे । अब

पृष्ठ 84

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७४ घेरण्डसंहिता तक जो संख्या ( मात्रा) बतायी है, उस प्रकार विभ्रम और केवली करने पर (सिद्धि प्राप्त होती है ) ॥ ९ ० ॥

अत एव हि कर्तव्यः केवलीकुम्भको नरैः ।

केवली चाजपासङ्ख्या द्विगुणा च मनोन्मनी ॥ ९ १ ॥

अतएव मनुष्यों को केवल कुम्भक करना चाहिये । अजपा को दुगना करके केवली करने से मन प्रसन्न होता है ॥ ९ १ ॥

नासाभ्यां वायुमाकृष्य केवलं कुम्भकं चरेत् ।

एकादिकचतुःषष्टिं धारयेत् प्रथमे दिने ॥ ९ २ ॥

नासाछिद्रों से वायु को खींचकर केवल कुम्भक करना चाहिये ।

प्रथम दिन ६४ बार ( इस प्राणायाम को ) धारण करे ॥ ९ २ ॥

केवलीमष्टधां कुर्याद् यामे यामे दिने दिने ।

अथवा पञ्चधा कुर्याद् यथा तत् कथयामि ते ॥ ९ ३ ॥

केवल कुम्भक प्रतिदिन आठ बार प्रहर- प्रहर में करना चाहिये अथवा पाँच बार ( प्राणायाम साधना ) करे, जैसा मैं तुमसे बताता हूँ ॥ ९ ३ ॥

प्रातर्मध्याह्नसायाह्ने मध्ये रात्रिचतुर्थके ।

त्रिसन्ध्यमथवा कुर्यात् सममाने दिने दिने ॥ ९ ४ ॥

प्रात: दोपहर सायं, और मध्यरात्रि के चतुर्थ प्रहर में दिन-प्रतिदिन तीनों संध्याओं में समान संख्या में ( इसे करना चाहिये ) ॥ ९ ४ ॥

पञ्चवारं दिने वृद्धिर्वारैकं च दिने तथा ।

अजपापरिमाणं च यावत् सिद्धिः प्रजायते ॥ ९ ५ ॥

दिन में एक बार और पाँच बार वृद्धि करते हुए यह अजपा संख्या जब तक सिद्धि हो ( तब तक करे ) ॥ ९ ५ ॥

पृष्ठ 85

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पञ्चमोपदेशः ७५

प्राणायामं केवलीं च तदा वदति योगवित् ।

केवली कुम्भके सिद्धे किन्न सिद्ध्यति भूतले । ९ ६ ॥

केवली प्राणायाम को (सिद्ध करके ) योगी योगवित् होता है । इस केवली कुम्भक के सिद्ध होने पर भूतल पर क्या नहीं सिद्ध होता? ॥ ९ ६ ॥ ॥ इति श्रीघेरण्डसंहितायां राघवीये भाष्ये प्राणायामप्रयोगो नाम पञ्चमोपदेशः ॥

पृष्ठ 86

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अथ षष्ठोपदेशः अथ ध्यानयोग प्रकरणम् ध्यानस्य भेदाः घेरण्ड उवाच स्थूलं ज्योतिस्तथा सूक्ष्मं ध्यानस्य त्रिविधं विदुः । स्थूलं । मूर्तिमयं प्रोक्तं ज्योतिस्तेजोमयं तथा सूक्ष्मं ॥ १ ॥ बिन्दुमयं ब्रह्म कुण्डलीपरदेवता

( अब ध्यानयोग का वर्णन करते हैं - ) ध्यान के स्थूल, ज्योति और सूक्ष्म ये तीन प्रकार कहे हैं । स्थूल मूर्तिमय कहा गया है, ज्योति तेजस्वरूप तथा सूक्ष्म बिन्दुमय ब्रह्म है, जो कुंडली से परे देवता है ॥ १ ॥

( समीक्षा — बिन्दुमय ध्यान कुंडलिनी शक्ति से जाग्रत होने वाला ध्यान है । अत: कुंडली परादेवता कहा है । ) स्थूलध्यानम्

स्वकीयहृदये ध्यायेत् सुधासागरमुत्तमम् ।

तन्मध्ये रत्नद्वीपं तु सुरत्नं वालुकामयम् ॥ २ ॥

( विधि बताते हैं— ) अपने हृदय में उत्तम अमृत समुद्र का ध्यान करे । उसके मध्य में बालुकामय रत्नों से परिपूर्ण रत्नदीप का ध्यान करे ॥ २ ॥

चतुर्दिक्षु निम्बतरुः बहुपुष्पसमन्वितः ।

निम्बो पवनसं कूलेवेष्टितं परिखा इव ॥ ३ ॥

उसके चारों ओर निम्ब के वृक्ष अनेक पुष्पों से सुशोभित हैं । निम्ब वन के पुष्प मानो खाई जैसे हैं ॥ ३ ॥

पृष्ठ 87

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षष्ठोपदेशः ७७

मालतीमल्लिकाजातीकेशरैश्चम्पकैस्तथा ।

पारिजातैः स्थलपद्यैर्गन्धामोदितदिङ्मुखैः ॥ ४ ॥

तथा मालती, मल्लिका, चमेली, केशर, चंपा, पारिजात ( बकायन ) और स्थल कमलों की सुगंध से सब दिशायें ( सुगंधित है, ऐसा ध्यान करे ) ॥ ४ ॥

तन्मध्ये संस्मरेद्योगी कल्पवृक्षं मनोहरम् ।

चतुःशाखाचतुर्वेदं नित्यपुष्पफलान्वितम् ॥ ५ ॥

उसके मध्य में योगी कल्पवृक्ष का स्मरण करे, उसमें चारों वेद नित्य फल, फूलों से समन्वित हैं ॥ ५ ॥

भ्रमराः कोकिलास्तत्र गुञ्जन्ति निगदन्ति च ।

ध्यायेत्तत्र स्थिरो भूत्वा महामाणिक्यमण्डपम् ॥ ६ ॥

वहाँ भ्रमर, कोयल गूँज रहे है और बोल रहे हैं, वहाँ स्थिर होकर ( ध्यानस्य होकर ) मणिमण्डप का ( ध्यान करे ) ॥ ६ ॥

तन्मध्ये तु स्मरेद्योगी पर्यङ्कं सुमनोहरम् ।

तत्रेष्टदेवतां ध्यायेद् यद्ध्यानं गुरुभाषितम् ॥ ७ ॥

उसके मध्य योगी मनोहर पलंग का ध्यान करे । तथा गुरु - उक्त ध्यान और इष्ट देवता का ध्यान करे ॥ ७ ॥

यस्य देवस्य यद्रूपं यथा भूषणवाहनम् ।

तद्रूपं ध्यायते नित्यं स्थूलध्यानमिदं विदुः ॥ ८ ॥

जिस देव का जो भूषण और वाहन है, उसका नित्य ध्यान करे, यही स्थूल ध्यान कहा गया है ॥ ८ ॥

प्रकारान्तरेण स्थूलध्यानम्

सहस्रारे महापद्मे कर्णिकायां विचिन्तयेत् ।

विलग्नसहितं पद्मं द्वादशैर्दलसंयुतम् ॥ ९ ॥

पृष्ठ 88

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७८ घेरण्डसंहिता ( प्रकारान्तर स्थूलध्यान बताते हैं - ) बारह पत्तों से युक्त एक कमल सहस्रार नामक महापद्म में स्थित है, कर्णिका में उसका ध्यान करे ॥ ९ ॥

शुक्लवर्णं महातेजो द्वादशैर्बीजभाषितम् ।

हसक्षमलवरयूं हसखफ्रें यथाक्रमम् ॥ १० ॥

वह शुक्ल वर्ण, तेजोमय, ह, ल, क्ष, म, ल, व, र, यूं,ह, स, खफें इन द्वादशबीजों से भूषित ( यह कमल है ) ॥ १० ॥

तन्मध्ये कर्णिकायां तु अकथादि रेखात्रयम् ।

११ ॥ हलक्षकोणसंयुक्तं प्रणवं तत्र वर्तते ॥

उसके मध्य में कर्णिका में अ, क, थ, ये तीन रेखायें ह, ल, क्ष इन तीन से युक्त ॐकार विराजित है ॥ ११ ॥

नादबिन्दुमयं पीठं ध्यायेत्तत्र मनोहरम् ।

तत्रोपरि हंसयुग्मं पादुका तत्र वर्तते ॥ १२ ॥।

नादबिन्दु से युक्त मनोहर पीठ का वहाँ ध्यान करे, उसके ऊपर हंस का जोड़ा है और वहाँ पादुका स्थित हैं ॥ १२ ॥

ध्यायेत्तत्र गुरुं देवं द्विभुजं च त्रिलोचनम् ।

श्वेताम्बरधरं देवं शुक्लगन्धानुलेपनम् ॥। १३ ॥

वहाँ द्विभुजाओं से शोभित और त्रिनेत्र, श्वेताम्बरधारी, श्वेत गंध का लेपन जिन्होंने किया है, ऐसे गुरुदेव का ध्यान करे ॥ १३ ॥

शुक्लपुष्पमयं माल्यं रक्तशक्तिसमन्वितम् ।

एवं विधगुरुध्यानात् स्थूलध्यानं प्रसिध्यति ॥ १४ ॥

श्वेतपुष्प की माला वे पहने हैं, लाल वर्ण की शक्ति से सुशोभित हैं, इस प्रकार गुरु के ध्यान से स्थूल ध्यान सधता है ॥ १४ ॥

पृष्ठ 89

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षष्ठोपदेशः ७९ ज्योतिर्ध्यानम् घेरण्ड उवाच

कथितं स्थूलध्यानं तु तेजोध्यानं शृणुष्व मे ।

यद्ध्यानेन योगसिद्धिरात्मप्रत्यक्षमेव च ॥ १५ ॥

( ज्योतिध्यान की विधि बताते हैं - ) स्थूलध्यान कहने के बाद अब ज्योतिध्यान को सुनो, जिसके ध्यान से योगसिद्धि और आत्मसिद्धि का प्रत्यक्ष होता है ॥ १५ ॥

मूलाधारे कुण्डलिनी भुजगाकाररूपिणी ।

जीवात्मा तिष्ठति तत्र प्रदीपकलिकाकृतिः ।

ध्यायेत्तेजोमयं ब्रह्म तेजोध्यानं परात्परम् ॥ १६ ॥

मूलाधार में सर्पाकार कुण्डलिनी है । वहाँ दीपज्योति के समान जीवात्मा विद्यमान है । वहाँ तेजोमय ब्रह्म का ध्यान करें, जो परात्पर है ( पर से भी पर है ) ॥ १६ ॥

प्रकारान्तरेण ज्योतिर्ध्यानम्

भ्रुवोर्मध्ये मनोर्ध्वे च यत्तेजः प्रणवात्मकम् ।

ध्यायेत् ज्वालावतीयुक्तं तेजोध्यानं तदेव हि ॥ १७ ॥

( प्रकारान्तर से ज्योतिध्यान विधि कहते हैं - ) भ्रुवों के मध्य और मन के ऊपर प्रणवात्मक जो तेज है, वही ज्वालावली युक्त जो ध्यान है, उसका ध्यान करे ॥ १७ ॥

सूक्ष्मध्यानम् घेरण्ड उवाच

तेजोध्यानं श्रुतं चण्ड सूक्ष्मध्यानं शृणुष्व मे ।

बहुभाग्यवशाद् यस्य कुण्डली जाग्रती भवेत् ॥ १८ ॥

हे चण्डकापालि! तेजोध्यान कहने के बाद अब सूक्ष्मध्यान को मैं कहता हूँ । वह भाग्यवान् है, जिसकी कुण्डलिनी जाग्रत हो जाती है ॥ १८ ॥

पृष्ठ 90

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८० घेरण्डसंहिता

आत्मना सहयोगेन नेत्ररन्ध्राद्विनिर्गता ।

विहरेद् राजमार्गे च चञ्चलत्वान्न दृश्यते ॥ १ ९ ॥

( तब ) नेत्ररंध्रों से निकलकर आत्मा के योग से राजमार्ग में विहार करता है और चंचलता के कारण दिखलायी नहीं देता है ॥ १ ९ ॥

शाम्भवीमुद्रया योगी ध्यानयोगेन सिध्यति ।

सूक्ष्मध्यानमिदं गोप्यं देवानामपि दुर्लभम् ॥ २० ॥

योगी इसे शांभवी मुद्रा के ध्यानयोग से सिद्ध करता है । यह सूक्ष्मध्यान देवों को भी दुर्लभ और गोपनीय है ॥ २० ॥

स्थूलध्यानाच्छतगुणं तेजोध्यानं प्रचक्षते । तेजोस्थूलध्यानध्यानाल्लक्षगुणंगुनासूक्ष्मध्यानंयह तेजोध्यानपरात्परम्कहा जाता॥ २१है और॥ तेजोध्यान से लक्षगुना पर से भी पर यह सूक्ष्मध्यान है ॥ २१ ॥

इति ते कथितं चण्ड ध्यानयोगं सुदुर्लभम् ।

आत्मा साक्षाद् भवेद् यस्मात्तस्माद्ध्यानं विशिष्यते ॥ २२ ॥

इस प्रकार हे चण्ड! यह दुर्लभ ध्यानयोग कहा है । इससे आत्मा का साक्षात्कार होता है, अत: यह ध्यान सबसे विशेष कहा जाता है ॥ २२ ॥

॥ इति श्रीघेरण्डसंहितायां राघवीये भाष्ये ध्यानयोगवर्णनं नाम षष्ठोपदेशः ॥